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4 February 2026

UGC रेगुलेशन 2026 हंगामा है क्यों बरपा


UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने 13 जनवरी 2026 को एक अधिसूचना जारी की। इसका नाम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026 रखा गया। इसके जरिए देशभर के उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए नए नियम बनाए गए हैं। इन नियमों के तहत प्रत्येक संस्थान में समान अवसर केंद्र (EOC) स्थापित करना अनिवार्य होगा। जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में समाज के सभी वर्गों के लिए समान अवसर और समावेशन सुनिश्चित करना है। EOC के अंतर्गत इक्विटी कमेटी (समता समिति) गठित होगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे। कमेटी में OBC, विकलांग, SC, ST और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा। EOC को अर्द्धवार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।

नए नियमों के हिसाब से प्रत्येक संस्थान को एक चौबीसों घंटे उपलब्ध 'समता हेल्पलाइन' चलानी होगी। अगर किसी छात्र, शिक्षक या कर्मचारी को लगे कि उसके साथ भेदभाव हुआ है तो वह हेल्पलाइन, ऑनलाइन पोर्टल या समान अवसर केंद्र को ईमेल के ज़रिए शिकायत दर्ज कर सकता है। भेदभाव- संबंधी कोई भी सूचना मिलते ही 24 घंटे के भीतर समता समिति की बैठक कर पंद्रह वर्किंग डेज़ में जांच रिपोर्ट संस्थान प्रमुख को भेजनी होगी और प्रमुख को सात वर्किंग डेज़ के भीतर ज़रूरी कार्रवाई करनी होगी। अगर मामला दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है, तो पुलिस को तुरंत सूचित करना होगा।

इक्विटी कमेटी को वर्ष में कम-से-कम दो बार बैठक करनी होगी। प्रत्येक संस्थान को EOC की कार्यप्रणाली पर वार्षिक रिपोर्ट UGC को प्रस्तुत करनी होगी। इनका पालन न करने पर संस्थान को यूजीसी की सूची से हटाने, डिग्री प्रदान करने से रोकने जैसे दंड या मामले की गंभीरता के आधार पर और कड़े दंड का सामना करना पड़ सकता है।

इन नियमों के जारी होते ही समाज के सवर्ण तबके ने इनका विरोध शुरू कर दिया। विरोध की मूल वजह जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को भी शामिल करना है। इस नोटिफ़िकेशन का विरोध करने वालों का तर्क है कि ये सामान्य वर्ग के लोगों के ख़िलाफ़ है। विरोध को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन नियमों को लागू करने पर अगली सुनवाई (19 मार्च) तक रोक लगा दी है।

कैंपसों में भेदभाव के शिकार हैदराबाद यूनिवर्सिटी के होनहार दलित छात्र रोहिथ वेमुला (2016), मुंबई मेडिकल कॉलेज की आदिवासी छात्रा पायल तड़वी (2019), IIT मुंबई के दलित छात्र दर्शन सोलंकी (2023) और IIT दिल्ली के ही दलित छात्र आयुष आश्ना और अनिल कुमार (2023) की दर्दनाक आत्महत्या को कैसे भुलाया जा सकता है। IITs में 2018-23 के बीच SC/ST के 7 से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्याएं की। यूजीसी की रिपोर्ट्स बताती हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें 2017-18 में 173 से बढ़कर 2023-24 में 378 हो गईं, जो 118% की वृद्धि दर्शाती है। ये आंकड़े हमारे शिक्षण संस्थानों और सत्ता को आईना दिखाने वाले हैं। 

 यह रेगुलेशन यूं ही नहीं आए हैं। असल में दलितों, आदिवासियों और अन्य वंचित समूह के छात्र- छात्राओं की संस्थानिक हत्याओं और उत्पीड़न इसके पीछे एक कारण है तो दूसरा कारण इस उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष है। शिक्षण संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न को रोकने और दोषियों को दंडित करने के लिए रोहिथ एक्ट की मांग लंबे समय से रही है। लेकिन उसके बाद भी UGC या मोदी सरकार यह कमजोर रेगुलेशन लेकर आई है। जिस हद तक भारतीय समाज और हमारे शिक्षण संस्थानों में जातिवाद समाया हुआ है यह रेगुलेशन उसको रोकने में नाकाफी है। लेकिन इस कमजोर रेगुलेशन पर भी जातिवादी सवर्ण मानसिकता के लोग इसका विरोध कर रहे हैं। ऐसे लोगों को अचानक छात्रों के मध्य विभाजन का दर्द सताने लगा है। अभी तक विभाजन और संत्रास का दंश झेल रहे दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक आदि वंचित छात्रों का दर्द उन्हें नहीं दिखा। अब इस रेगुलेशन के दुरुपयोग और सवर्णों का "समता समिति" में प्रतिनिधित्व न होने पर विरोध किया जा रहा है। जबकि "समता समिति" में सवर्ण प्रतिनिधित्व पर मनाही नहीं है। 

 आज उच्च शिक्षण संस्थानों में नियुक्ति के मामले में सवर्ण वर्चस्व में हैं। वहां अनुसूचित जाति/जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। यह आरक्षण की उस व्यवस्था के बावजूद है, जिसके खिलाफ संघ-भाजपा के सवर्ण मानसिकता के लोग काफी हो-हल्ला मचाते हैं। ऐसे में "समान अवसर केंद्र" और "समता समिति" में पहुंचने वाले कितने "समता" वादी होंगे कहना मुश्किल है। अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग, महिला आयोग, बाल अधिकार आयोग की मौजूदगी के बावजूद इनके प्रति हिंसा के मामलों में कोई कमी नहीं है। लेकिन यह आयोग जो भी नाम मात्र का काम करते हैं वह भी ना हो तो भेदभाव, हिंसा का स्तर कितना बढ़ जाएगा, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। अतः यूजीसी का विनियम 2026 क्या और कितना कर पाएगा यह देखने वाली बात है।

सिर्फ उच्च शिक्षण संस्थानों में ही नहीं बल्कि समाज में भी धार्मिक (खास तौर पर मुस्लिम, ईसाई) आधार पर भेदभाव व हिंसा-हत्या के साथ ही जातिगत आधार पर भेदभाव, हिंसा प्रमुख है। लिंग, नस्ल, जन्म-स्थान, दिव्यांगता के आधार पर भी भेदभाव/हिंसा बढ़ी है। इस बढ़ती हिंसा व भेदभाव का एक कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा, भाजपा, का सत्ता में होना है। संघ-भाजपा अपने सवर्ण वर्चस्ववादी व फासीवादी विचारों और व्यवहार के लिए जाने जाते हैं। 

आज जरूरी है कि यह मांग की जाय और इसके लिए संघर्ष किया जाय कि इस रेगुलेशन की समता समिति में वंचित समूह के लोगों का बहुमत हो और इसे हर शिक्षण संस्थान में लागू किया जाय। 

जाति, धर्म, नस्ल, लिंग आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को सामाजिक आंदोलन- संघर्ष के दबाव में ही कम से कमतर किया जा सकता है। पूंजीवादी शासन सत्ता संघर्षों के दबाव में ही इस पर कुछ करने को मजबूर होती है। बल्कि मौजूदा फासीवादी संघ-भाजपा तो उल्टी गंगा बहाने में लिप्त है। पिछले 11-12 साल का मोदी का कार्यकाल इसका प्रमाण है। ऐसे में समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन से ही जाति, नस्ल, धर्म, लिंग आदि भेदभाव को तेजी से खत्म करने की ओर बढ़ा जा सकता है। जहां सिर्फ कानून बनाकर ही नहीं बल्कि जनता के व्यापक संघर्षों से जाति, धर्म, नस्ल, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव व अन्य सामाजिक बुराइयों के समूल नाश की ओर बढ़ा जाएगा।