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13 December 2019

यौन हिंसा एनकाउण्टर और हमारा समाज

       27 नवम्बर हैदराबाद में 26 वर्षीय वेटनरी डॉक्टर की गैंग रेप कर नृशंस हत्या कर दी गयी। समाज में महिलाअें के खिलाफ हो रहे ऐसे नृशंस अपराधों में क्षुब्ध व आक्रोशित तमाम लोगों द्वारा हैदराबाद सहित पूरे देश में ढेरों प्रदर्शन किये गये। रोज ब रोज महिलाओं के साथ आपराधिक घटनायें हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है। घृणित पूंजीवादी व्यवस्था महिलाओं को सुरक्षा व बराबरी देने में सर्वथा अक्षम रही है। या ज्यादा सही कहें तो यह पूंजीवादी व्यवस्था ही मुख्यतः, मूलतः ऐसे अपराधों के लिए जिम्मेदार है। यह व्यवस्था पुरुषप्रधानता की सोच को बनाये हुए है। अश्लील उपभोक्तावादी संस्कृति को पाल-पोस रही है और समाज में कुण्ठित-विकृत मानसिकता के लोगों को पैदा कर रही है। 


         इस जघन्य अपराध के दो दिन बाद ही पुलिस ने 4 लोगों को गिरफ्तार किया और कुछ दिन बाद उसी जगह सबूतों की तफ्तीश की बात कहते हुए आरोपियों को घटना स्थल पर ले जाया गया। घटना स्थल पर चारों आरोपियों का एनकाउण्टर कर दिया गया। एनकाउण्टर के बाद कई पूंजीवादी नेता, अधिकारी व लोग पुलिस के इस कदम को जायज ठहरा रहे हैं। उसकी तारीफ कर रहे हैं। ‘तुरंत न्याय मिला’, ‘दिल्ली निर्भया के अपराधी तो अभी जिन्दा हैं’, ‘जनता के हवाले अपराधियों कर देना चाहिए’ जैसी खतरनाक बातें समाज में हो रही है।

           यह जनवाद-लोकतंत्र को खत्म कर एक बर्बर समाज की ओर बढ़ने की मांग है या उस दिशा में बड़े कदम हैं। भीड़ द्वारा आरोपियों या अपराधियों को चौराहे पर पत्थरों से पीटकर मार देना किसी बर्बर समाज में ही हो सकता है सामंती व्यवस्था में सामन्त की जवान ही कानून थी। वह जो कह दे, जब कह दे वही कानून हो जाता था। समय आगे बढ़ा और ‘ईश्वर के पुत्र’, राजा का जमाना चला गया और पूंजीपति वर्ग का जमाना आया। पूंजीवाद ने इस किस्म के विधान को खत्म कर ‘कानून का राज’ कहकर अपने राज को महान राज कहा। स्वतंत्रता, बराबरी, जनवाद की बातें हुयी और पूंजीपति वर्ग ने अपना अन्यायपूर्ण शासक मजदूर-मेहनतकशों पर थोप दिया। समानता, बराबरी, न्याय सब कुछ पैसे से तय होने लगा और पैसे का मालिक था पूंजीपति। इस तरह सुन्दर-सुन्दर बातों को करते हुए पूंजीपति वर्ग ने गुलामी की व्यवस्था कायम की। पूंजीपति वर्ग के इस शासन में सारा जनवाद पूंजीपतियों के पाले में गया और मेहनतकशों के हिस्से में आयी तानाशाही।

           पूंजीपति वर्ग का कानून न तो समानता का था, न ही आदर्श था। गरीबों, मजदूरों, को न्याय के मामले में यह रोज ही तार-तार होता है। यदि महिलाओं को भी खासकर गरीब, दलित महिलाओं को न्याय के सन्दर्भ में देखें तो पूंजीवाद का कानून पूरी तरह नंगा हो जाता है। गरीब वर्ग की महिलाओं, दलितों-आदिवासी महिलाओं के साथ जघन्य से जघन्य अपराधों की रिपोर्ट ही दर्ज नहीं होती। यह तभी दर्ज होती है जब समाज का भारी दबाव हो। पुलिस, प्रशासन, कानून द्वारा पीड़ित महिला को ही प्रताड़ित किया जाता रहा है। कुलदीप सेंगर, चिन्मयानन्द का मामला सबके सामने है। किसी तरह पीड़ित लड़कियों को ही प्रताड़ित किया जा रहा है। बलात्कार के ज्यादातर मामलों में आरोपी कानून की पकड़ से छूट जाते हैं।

             कानून का पक्षपात, अपराधियों का धन-बल से छूट जाना और लम्बी प्रक्रिया के कारण जनता का इस पर से विश्वास लगातार खिसकता रहता है। पूंजीवादी व्यवस्था की इस कानून व्यवस्था पर से विश्वास खत्म हो जनता सकारात्मक दिशा यानी समाजवादी क्रांति की तरफ भी बढ़ सकती है। समाजवाद में कानून मजदूर वर्ग के पक्ष में रहता है। जहां समाज से अपराध की जमीन को ही खत्म कर दिया जाता है। 

         किन्तु आज इस अविश्वास की फासीवादी अपने पक्ष में भुना रहे हैं। वे जनता को मौजूदा कानूनों को भला-बुरा कहकर बर्बरता का पैरोकार बना रहे हैं। जनता को अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की ओर ढकेला जा रहा है। अपने ही जनवादी अधिकारों को खत्म करने की पैरोकारी की जा रही है। क्रूर पूंजीवादी शासक भी यही चाहते हैं। वे सत्ता में फासीवाद को बढ़ावा दे रहे हैं और इसके प्रचार तंत्र फासीवादी बर्बरता को ही न्याय कह रहे हैं। भारत की जनता को भी यही सोच अपनाने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

         हमें समझना होगा कि पूंजीवादी जनवाद के मुकाबले फासीवादी बर्बरता ज्यादा बुरी है। किन्तु यह दोनों ही रूप घृणित पूंजीवादी व्यवस्था के शासन के रूप है। इसलिए हमें इन दोनों का ही मुकाबला करना होगा। संघर्ष कर इसे खत्म कर समाजवादी व्यवस्था का निर्माण करना होगा।

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