18 March 2026

उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों का बंद होना: घोर नीतिगत लापरवाही का उदाहरण

उत्तराखंड आज शिक्षा के क्षेत्र में एक गंभीर संकट का शिकार है। जो राज्य सरकार की नीतिगत असफलता और दूरदर्शिता की पूर्ण कमी को उजागर करता है। पिछले पांच वर्षों (2020-25) में 826 सरकारी प्राथमिक स्कूल बंद हो चुके हैं। टिहरी गढ़वाल में 262, पौड़ी गढ़वाल में 120, पिथौरागढ़ में 104 और अल्मोड़ा में 83 स्कूलों पर ताले लग चुके हैं। यही हालात राज्य के अन्य जिलों में है। यह जानकारी उत्तराखंड सरकार ने एक सवाल के जबाव में गैरसैंण में विधानसभा सत्र में दी।

राज्य में वर्तमान में 10,940 प्राथमिक सरकारी स्कूल संचालित हैं। कई में एकल शिक्षक या शून्य नामांकन की दयनीय स्थिति है। सरकार पलायन का बहाना बनाकर स्कूल बंदी से अपना पल्ला झाड़ रही है। और खुद पलायन के लिए सरकार ही जिम्मेदार है। पहाड़ी गांवों से युवा रोजगार, स्वास्थ्य और बेहतर शिक्षा की तलाश में मैदानों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। क्योंकि सरकारों ने इन क्षेत्रों में स्थानीय रोजगार, बुनियादी ढांचा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकामी दिखाई है।

क्लस्टर सिस्टम के नाम पर स्कूलों को मर्ज करने की चल रही नीति न केवल शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), 2009 का खुला उल्लंघन है। बल्कि दुर्गम इलाकों के बच्चों को लंबी दूरी तय करने पर मजबूर कर रही है। इसका नतीजा— गरीबों, दलितों, आदिवासियों, छात्राओं और अल्पसंख्यकों में ड्रॉपआउट दर बढ़ रही है और शिक्षा से वंचित पीढ़ी तैयार हो रही है। सरकार की प्रशासनिक उदासीनता यह है कि बजट में शिक्षा के नाम पर न्यूनतम खर्च किया जा रहा है। उसमें भी CAG रिपोर्ट्स में पैसे की बर्बादी के आरोप लगते हैं।


स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं (शिक्षक, शौचालय, बिजली, पुस्तकालय आदि) की कमी और निजी स्कूलों की बढ़ती लहर सरकारी व्यवस्था की विफलता को चीख-चीखकर बता रही है। सरकार मात्र स्कूल बंद या मर्ज करके समस्या को दबाने का प्रयास कर रही है। जबकि जड़ में विकास की असमानता, पहाड़ी क्षेत्रों में उद्योग-रोजगार की अनुपस्थिति और भ्रष्टाचारपूर्ण खर्च है। 2025 में एक भी नया सरकारी स्कूल नहीं खुला। यह आंकड़ा स्वयं सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है।

शिक्षा राष्ट्र की नींव है। और यह किसी भी समाज में नयी पीढ़ी को आगे बढ़ाने का जरिया है। यदि उत्तराखंड सरकार पलायन रोकने, स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत करने और शिक्षा को प्राथमिकता देने में अभी भी असफल रही, तो पहाड़ों के 'भूत गांव' और 'भूत स्कूल' भविष्य की सामाजिक तथा आर्थिक तबाही का कारण बनेंगे। समय आ गया है सतही उपायों से ऊपर उठकर ठोस, दीर्घकालिक नीतियां अपनाई जाएं। वरना शिक्षा का यह संकट राज्य को अपूरणीय क्षति पहुंचाएगा। मेहनतकश जनता के बच्चों को शिक्षा से दूर करने से बचाने के लिए जनसंघर्षों की राह पकड़नी होगी। इसी से मेहनतकश जनता जीवन को कुछ सुरक्षित कर सकती है।

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ 
केंद्रीय कार्यकारणी 
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

4 February 2026

UGC रेगुलेशन 2026 हंगामा है क्यों बरपा


UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने 13 जनवरी 2026 को एक अधिसूचना जारी की। इसका नाम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026 रखा गया। इसके जरिए देशभर के उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए नए नियम बनाए गए हैं। इन नियमों के तहत प्रत्येक संस्थान में समान अवसर केंद्र (EOC) स्थापित करना अनिवार्य होगा। जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में समाज के सभी वर्गों के लिए समान अवसर और समावेशन सुनिश्चित करना है। EOC के अंतर्गत इक्विटी कमेटी (समता समिति) गठित होगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे। कमेटी में OBC, विकलांग, SC, ST और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा। EOC को अर्द्धवार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।

नए नियमों के हिसाब से प्रत्येक संस्थान को एक चौबीसों घंटे उपलब्ध 'समता हेल्पलाइन' चलानी होगी। अगर किसी छात्र, शिक्षक या कर्मचारी को लगे कि उसके साथ भेदभाव हुआ है तो वह हेल्पलाइन, ऑनलाइन पोर्टल या समान अवसर केंद्र को ईमेल के ज़रिए शिकायत दर्ज कर सकता है। भेदभाव- संबंधी कोई भी सूचना मिलते ही 24 घंटे के भीतर समता समिति की बैठक कर पंद्रह वर्किंग डेज़ में जांच रिपोर्ट संस्थान प्रमुख को भेजनी होगी और प्रमुख को सात वर्किंग डेज़ के भीतर ज़रूरी कार्रवाई करनी होगी। अगर मामला दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है, तो पुलिस को तुरंत सूचित करना होगा।

इक्विटी कमेटी को वर्ष में कम-से-कम दो बार बैठक करनी होगी। प्रत्येक संस्थान को EOC की कार्यप्रणाली पर वार्षिक रिपोर्ट UGC को प्रस्तुत करनी होगी। इनका पालन न करने पर संस्थान को यूजीसी की सूची से हटाने, डिग्री प्रदान करने से रोकने जैसे दंड या मामले की गंभीरता के आधार पर और कड़े दंड का सामना करना पड़ सकता है।

इन नियमों के जारी होते ही समाज के सवर्ण तबके ने इनका विरोध शुरू कर दिया। विरोध की मूल वजह जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को भी शामिल करना है। इस नोटिफ़िकेशन का विरोध करने वालों का तर्क है कि ये सामान्य वर्ग के लोगों के ख़िलाफ़ है। विरोध को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन नियमों को लागू करने पर अगली सुनवाई (19 मार्च) तक रोक लगा दी है।

कैंपसों में भेदभाव के शिकार हैदराबाद यूनिवर्सिटी के होनहार दलित छात्र रोहिथ वेमुला (2016), मुंबई मेडिकल कॉलेज की आदिवासी छात्रा पायल तड़वी (2019), IIT मुंबई के दलित छात्र दर्शन सोलंकी (2023) और IIT दिल्ली के ही दलित छात्र आयुष आश्ना और अनिल कुमार (2023) की दर्दनाक आत्महत्या को कैसे भुलाया जा सकता है। IITs में 2018-23 के बीच SC/ST के 7 से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्याएं की। यूजीसी की रिपोर्ट्स बताती हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें 2017-18 में 173 से बढ़कर 2023-24 में 378 हो गईं, जो 118% की वृद्धि दर्शाती है। ये आंकड़े हमारे शिक्षण संस्थानों और सत्ता को आईना दिखाने वाले हैं। 

 यह रेगुलेशन यूं ही नहीं आए हैं। असल में दलितों, आदिवासियों और अन्य वंचित समूह के छात्र- छात्राओं की संस्थानिक हत्याओं और उत्पीड़न इसके पीछे एक कारण है तो दूसरा कारण इस उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष है। शिक्षण संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न को रोकने और दोषियों को दंडित करने के लिए रोहिथ एक्ट की मांग लंबे समय से रही है। लेकिन उसके बाद भी UGC या मोदी सरकार यह कमजोर रेगुलेशन लेकर आई है। जिस हद तक भारतीय समाज और हमारे शिक्षण संस्थानों में जातिवाद समाया हुआ है यह रेगुलेशन उसको रोकने में नाकाफी है। लेकिन इस कमजोर रेगुलेशन पर भी जातिवादी सवर्ण मानसिकता के लोग इसका विरोध कर रहे हैं। ऐसे लोगों को अचानक छात्रों के मध्य विभाजन का दर्द सताने लगा है। अभी तक विभाजन और संत्रास का दंश झेल रहे दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक आदि वंचित छात्रों का दर्द उन्हें नहीं दिखा। अब इस रेगुलेशन के दुरुपयोग और सवर्णों का "समता समिति" में प्रतिनिधित्व न होने पर विरोध किया जा रहा है। जबकि "समता समिति" में सवर्ण प्रतिनिधित्व पर मनाही नहीं है। 

 आज उच्च शिक्षण संस्थानों में नियुक्ति के मामले में सवर्ण वर्चस्व में हैं। वहां अनुसूचित जाति/जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। यह आरक्षण की उस व्यवस्था के बावजूद है, जिसके खिलाफ संघ-भाजपा के सवर्ण मानसिकता के लोग काफी हो-हल्ला मचाते हैं। ऐसे में "समान अवसर केंद्र" और "समता समिति" में पहुंचने वाले कितने "समता" वादी होंगे कहना मुश्किल है। अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग, महिला आयोग, बाल अधिकार आयोग की मौजूदगी के बावजूद इनके प्रति हिंसा के मामलों में कोई कमी नहीं है। लेकिन यह आयोग जो भी नाम मात्र का काम करते हैं वह भी ना हो तो भेदभाव, हिंसा का स्तर कितना बढ़ जाएगा, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। अतः यूजीसी का विनियम 2026 क्या और कितना कर पाएगा यह देखने वाली बात है।

सिर्फ उच्च शिक्षण संस्थानों में ही नहीं बल्कि समाज में भी धार्मिक (खास तौर पर मुस्लिम, ईसाई) आधार पर भेदभाव व हिंसा-हत्या के साथ ही जातिगत आधार पर भेदभाव, हिंसा प्रमुख है। लिंग, नस्ल, जन्म-स्थान, दिव्यांगता के आधार पर भी भेदभाव/हिंसा बढ़ी है। इस बढ़ती हिंसा व भेदभाव का एक कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा, भाजपा, का सत्ता में होना है। संघ-भाजपा अपने सवर्ण वर्चस्ववादी व फासीवादी विचारों और व्यवहार के लिए जाने जाते हैं। 

आज जरूरी है कि यह मांग की जाय और इसके लिए संघर्ष किया जाय कि इस रेगुलेशन की समता समिति में वंचित समूह के लोगों का बहुमत हो और इसे हर शिक्षण संस्थान में लागू किया जाय। 

जाति, धर्म, नस्ल, लिंग आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को सामाजिक आंदोलन- संघर्ष के दबाव में ही कम से कमतर किया जा सकता है। पूंजीवादी शासन सत्ता संघर्षों के दबाव में ही इस पर कुछ करने को मजबूर होती है। बल्कि मौजूदा फासीवादी संघ-भाजपा तो उल्टी गंगा बहाने में लिप्त है। पिछले 11-12 साल का मोदी का कार्यकाल इसका प्रमाण है। ऐसे में समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन से ही जाति, नस्ल, धर्म, लिंग आदि भेदभाव को तेजी से खत्म करने की ओर बढ़ा जा सकता है। जहां सिर्फ कानून बनाकर ही नहीं बल्कि जनता के व्यापक संघर्षों से जाति, धर्म, नस्ल, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव व अन्य सामाजिक बुराइयों के समूल नाश की ओर बढ़ा जाएगा।

5 January 2026

हमलावर अमेरिकी साम्राज्यवादियों का विरोध करें!



अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश से 3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला पर हमला कर उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा कर लिया गया। अमेरिकी सैनिक मादुरो व उनकी पत्नी को अगवा कर अमेरिका ले आये। जहां उन पर ड्रग माफियाओं से सम्बन्ध के तथाकथित आरोप में मुकदमा चलाया जाएगा। वेनेजुएला में हुई इस अस्थिरता को सामान्य करने के लिए सैनिक रखने तक कि बात डोनाल्ड ट्रंप ने कही।

29 December 2025

एंजेल चकमा के हत्यारों को सजा दो!

9 दिसंबर की शाम देहरादून के सेलाकुई इलाके में एक साधारण खरीददारी का सफर मौत का पैगाम बन गया। 24 वर्षीय त्रिपुरा निवासी आदिवासी छात्र एंजेल चकमा, जो जिज्ञासा यूनिवर्सिटी में एमबीए अंतिम सेमेस्टर का छात्र था, अपने छोटे भाई माइकल के साथ बाजार गया था। नशे में धुत कुछ स्थानीय युवकों ने उन्हें नस्लीय गालियां दीं।

27 November 2025

VIT भोपाल के छात्रों से मारपीट के दोषी मैनेजमेंट पर कार्यवाही करो!


छात्रों का दमन बंद करो!

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में स्थित वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (VIT) के भोपाल कैंपस में 25 नवंबर की रात के लगभग 10 बजे कुछ छात्र मेस के खराब खाने और गंदे पानी की शिकायत लेकर अपने असिस्टेंट प्रोफेसर प्रशांत कुमार पांडे के पास पहुंचे थे. उन्हें उम्मीद थी कि उनकी समस्या सुनी जाएगी. लेकिन जो हुआ वह किसी ने सोचा भी नहीं था. प्रोफेसर ने छात्रों की शिकायत सुनने के बजाय आपा खो दिया और उनके साथ मारपीट शुरू कर दी. छात्रों के बालों को पकड़कर घसीटा गया, उन्हें थप्पड़ मारे गए और जलील किया गया. यही रात में छात्रों के आक्रोश का कारण बना.

25 November 2025

शिक्षण संस्थाओं का साम्प्रदायिक विभाजन के लिए दुरुपयोग


    जम्मू-कश्मीर के 'श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस' में 2025-26 के सत्र में 90% कश्मीरी मुस्लिम छात्रों का चयन हुआ। यानी 50 सीटों में 42 पर कश्मीरी और 8 सीटों पर जम्मू के छात्रों का नाम आया। जम्मू कश्मीर बोर्ड ऑफ प्रोफेशनल एंट्रेंस एग्जामिनेशन (जेकेबीओपीईई) पर किसी तरह की अनियमितता का आरोप भी नहीं है। तब भाजपा ने वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा मेडिकल इंस्टिट्यूट के संचालन का हवाला दे, प्रवेश रद्द करने की मांग की। केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल मनोज सिन्हा ने ज्ञापन स्वीकार कर लिया।

22 November 2025

पंजाब विश्‍वविद्यालय में संघर्षरत छात्रों के समर्थन में

    केन्द्र सरकार ने पंजाब विश्‍वविद्यालय की सीनेट को भंग करने के इरादे से 28 अक्टूबर को एक 'नोटिफ़िकेशन' जारी किया था। इस नोटिफिकेशन में सीनेट-सिण्डिकेट में चुनाव की प्रक्रिया को रद्द करके इसे पूरी तरह नामांकित पदों वाली संस्था बना दिये जाने का प्रावधान था। यही नहीं इसके सदस्यों की संख्या को 91 से कम करके 31 कर दिया गया।

1 November 2025

उत्तराखण्ड UKSSSC पेपर लीक


छात्रों के संघर्ष से सरकार के होश ठिकाने पर 

       विगत 21 सितम्बर 2025 को उत्तराखण्ड में समूह ‘ग’ की भर्ती के लिए आयोजित परीक्षा का पेपर लीक हो गया था। परीक्षा शुरू होने के आधे घण्टे के अंदर पेपर लीक की खबर सार्वजनिक हो गयी थी। इस पर छात्रों का रोष उमड़ पड़ा। देहरादून का परेड ग्राउण्ड छात्रों के धरने प्रदर्शन का केन्द्र बन गया। 

28 September 2025

लद्दाख में जनता के आंदोलन का दमन बंद करो!


    बीते दिन उत्तराखंड से लेकर लद्दाख तक छात्र-युवाओं के संघर्ष के नाम रहे हैं। लद्दाख की जनता अपने जनवादी अधिकारों के लिए, युवाओं को सम्मानजनक रोजगार दिलाने के लिए संघर्ष कर रही है।

21 September 2025

फिर पेपर लीक.....


    21 सितम्बर 2025, रविवार को उत्तराखंड में ग्रुप- सी के 416 पदों के लिए परीक्षा हुई। जिसके तहत पटवारी, लेखपाल, ग्राम विकास अधिकारी, आदि पदों के लिए सुबह 11 बजे परीक्षा शुरू हुई। परीक्षा शुरू होने के आधे घंटे बाद पेपर के स्क्रीन शॉट और उसके जवाब सोशल मीडिया में घूमने लगे।