राज्य में वर्तमान में 10,940 प्राथमिक सरकारी स्कूल संचालित हैं। कई में एकल शिक्षक या शून्य नामांकन की दयनीय स्थिति है। सरकार पलायन का बहाना बनाकर स्कूल बंदी से अपना पल्ला झाड़ रही है। और खुद पलायन के लिए सरकार ही जिम्मेदार है। पहाड़ी गांवों से युवा रोजगार, स्वास्थ्य और बेहतर शिक्षा की तलाश में मैदानों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। क्योंकि सरकारों ने इन क्षेत्रों में स्थानीय रोजगार, बुनियादी ढांचा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकामी दिखाई है।
क्लस्टर सिस्टम के नाम पर स्कूलों को मर्ज करने की चल रही नीति न केवल शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), 2009 का खुला उल्लंघन है। बल्कि दुर्गम इलाकों के बच्चों को लंबी दूरी तय करने पर मजबूर कर रही है। इसका नतीजा— गरीबों, दलितों, आदिवासियों, छात्राओं और अल्पसंख्यकों में ड्रॉपआउट दर बढ़ रही है और शिक्षा से वंचित पीढ़ी तैयार हो रही है। सरकार की प्रशासनिक उदासीनता यह है कि बजट में शिक्षा के नाम पर न्यूनतम खर्च किया जा रहा है। उसमें भी CAG रिपोर्ट्स में पैसे की बर्बादी के आरोप लगते हैं।
स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं (शिक्षक, शौचालय, बिजली, पुस्तकालय आदि) की कमी और निजी स्कूलों की बढ़ती लहर सरकारी व्यवस्था की विफलता को चीख-चीखकर बता रही है। सरकार मात्र स्कूल बंद या मर्ज करके समस्या को दबाने का प्रयास कर रही है। जबकि जड़ में विकास की असमानता, पहाड़ी क्षेत्रों में उद्योग-रोजगार की अनुपस्थिति और भ्रष्टाचारपूर्ण खर्च है। 2025 में एक भी नया सरकारी स्कूल नहीं खुला। यह आंकड़ा स्वयं सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है।
शिक्षा राष्ट्र की नींव है। और यह किसी भी समाज में नयी पीढ़ी को आगे बढ़ाने का जरिया है। यदि उत्तराखंड सरकार पलायन रोकने, स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत करने और शिक्षा को प्राथमिकता देने में अभी भी असफल रही, तो पहाड़ों के 'भूत गांव' और 'भूत स्कूल' भविष्य की सामाजिक तथा आर्थिक तबाही का कारण बनेंगे। समय आ गया है सतही उपायों से ऊपर उठकर ठोस, दीर्घकालिक नीतियां अपनाई जाएं। वरना शिक्षा का यह संकट राज्य को अपूरणीय क्षति पहुंचाएगा। मेहनतकश जनता के बच्चों को शिक्षा से दूर करने से बचाने के लिए जनसंघर्षों की राह पकड़नी होगी। इसी से मेहनतकश जनता जीवन को कुछ सुरक्षित कर सकती है।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
केंद्रीय कार्यकारणी
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

