अमेरिका-इजरायल अपनी धौंसपट्टी के लिए हमला कर रहे थे। दूसरी तरफ खुद अमेरिका-इजरायल सहित दुनियाभर में मेहनतकश जनता के बड़े-बड़े प्रदर्शनों ने इस युद्ध को जल्द खत्म करने का दबाव बनाया। यही वजह थी कि ट्रम्प तमाम गीदड़भभकी के बावजूद ज्यादा बड़ा हमला करने की ओर जाने की हिम्मत न कर सका। बिना अमेरिकी सहयोग के नेतन्याहू के सारे युद्धोन्माद की हवा निकल गयी।
ईरानी जनता मजबूती से अमेरिकी-इजरायली हमले के खिलाफ अपने शासकों के साथ खड़ी हुई। दुनियाभर की मेहनतकश जनता का सहयोग-समर्थन भी ईरानी जनता के साथ था। मेहनतकश जनता के मजबूत सहयोग ने ईरानी शासकों को इस युद्ध में मजबूत स्थिति में पहुंचाया। उनकी लम्बी तैयारी और रणनीतिक योजना ने अतिरिक्त मदद की।
आज सभी देश वैश्विक तौर पर आपस में जुड़े हुए हैं। इस कारण दुनियाभर में इस युद्ध का असर तुरंत दिखा। ऐसे में भारतीय जनता पर जो कुछ भी इस युद्ध का बुरा असर पड़ा, उसके जिम्मेदार मोदी सरकार है। दुनिया की "सबसे बड़ी" ताकत अमेरिका के पिछलग्गू बनने को मोदी सरकार अपनी "विदेशी नीति" कहती रही। दुनियाभर की मेहनतकश जनता के समर्थन से ईरानी शासकों ने दिखा दिया कि अन्याय के खिलाफ छोटा देश कम ताकत के बावजूद बड़े देश की बड़ी ताकत को धराशाही कर सकता है।
युद्ध विराम के अगले ही दिन लेबनान में इसके उल्लंघन ने दिखा दिया कि अभी भी अमेरिकी-इजरायली शासक अपनी खोयी साख बचाने के लिए हमलावर बने हुए हैं। ऐसे में युद्ध विराम अगले किसी युद्ध की तैयारी का वायस भी बन एकता है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के रहते युद्ध मेहनतकश जनता पर फिर किसी युद्ध का खतरा बना ही रहेगा। युद्धों का स्थायी खात्मा मजदूर-मेहनतकश जनता की समाजवादी क्रांति से ही संभव है। तब तक हर युद्ध विराम नए युद्ध की तैयारी साबित होने का खतरा बना रहेगा।
केंद्रीय कार्यकारणी
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

