5 राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मिजोरम में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गये। तीन बड़े राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़) में जहाँ कांग्रेस बहुमत या गठबंधन से सरकार बनाने जा रही हैं। वही मिजोरम में कांग्रेस की हार हुई और तेलंगाना में टी.आर.एस. (तेलगांना राष्ट्र समिति) दुबारा सत्ता में आ गई।
मोदी-शाह-योगी की धुंआधार रैलियों के बावजूद मोदी-शाह की जोड़ी यहाँ जीत हासिल ना कर सकी। जैसा की हर बार ही होता है। जीत का शेहरा मोदी-शाह के सर बंधता हैं और हार का ठीकरा अन्य के। इस बार भी यही हुआ हार के बाद रमन सिंह, शिवराज सिंह आदि हार की जिम्मेदारी ले रहे हैं। भाजपा-संघ के नेता लगातार कह रहे है कि चुनावी परिणामों को मोदी के काम से जोड़कर ना देखा जाए। कुल मिलाकर इन विधान सभा चुनाव से भाजपा खेमे में खासी निराशा हैं। और 2019 के आम चुनावों के लिए उनकी चिंताए काफी बढ़ गयी हैं।
कांग्रेस पार्टी इस जीत को राहुल गाँधी के कुशल नेतृत्व के रूप में प्रचारित कर रही है। साथ ही मोदी के विरोध के रूप में भी दर्ज करवा रही है। कांग्रेस पार्टी चुनाव परिणाम को मोदी की विफल नीतियों का परिणाम साबित कर रही है।
भाजपा-संघ द्वारा इन चुनावों में जमकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करने की कोशिशें की। राम मंदिर, धर्म सम्मेलन आदि के जरिये अल्पसंख्यकों को डराने और हिन्दुओं का भयदोहन करने की कोशिशें की। साथ ही जातिवाद का भी बखूबी इस्तेमाल किया गया। इन सबके पीछे जनता के मुद्दे हवा में उड़ा दीये गये। भाजपा-संघ के हिंदुत्व की राजनीति का जवाब कांग्रेस ने मन्दिर-मन्दिर मत्था टेक्कर, कैलाश मानसरोवर यात्रा कर दिया। राजस्थान में तो राहुल गाँधी अपना गोत्र बताकर कुल "श्रेष्ठ ब्राहमण" शाबित करने तक से नहीं चुके। मध्यम मार्गी कांग्रेस पार्टी इससे अतिरिक्त और कर भी क्या सकती है। यह संघ-भाजपा के हिंदुत्ववादी फासीवादी विचारों के खिलाफ संघर्ष की जगह उसी कीचड़ में लोट-पोट करने में अपने को ज्यादा महफूस पाती हैं। यह सारी स्थिति बता देती है कि किस तरह हिंदुत्ववादी ब्राहमणवादी विचार समाज में जड़ जमा चुका है। जो कि संघ-भाजपा के फलने-फूलने के लिए मजबूत जमीन तैयार कर देता है। हिन्दू फासीवाद के लिए वैचारिक माहौल तैयार कर देता है। आज कोई भी शासक वर्गीय पार्टी इस वैचारिक जमीन पर हमला करने को तैयार नहीं हैं। इसलिए कांग्रेस की जीत को भाजपा-संघ के हिन्दू फासीवाद के हार के तौर पर देखना बेहद खतरनाक होगा। वोट प्रतिशत के हिसाब से भी भाजपा की स्थिति में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया हैं। राजस्थान में भाजपा के वोट प्रतिशत में कोई खास गिरावट नहीं आयी और मध्य प्रदेश में कांग्रेस को 40.9 प्रतिशत तो भाजपा को 41 प्रतिशत वोट मिले।
भाजपा संघ के बढ़ते फासीवाद से वही लोग लड़ सकते है। जो हर चुनाव की तरह ही इस चुनाव में भी हासिये पर रहे, ठगे गये। वे है देश के मेहनतकश, और युवा। पूरे चुनाव में धर्म, मन्दिर, शराब, पैसा, नेताओं की नुक्ताचीनी आदि चलता रहा। बेरोजगारों को रोजगार, किसानों की दुर्दसा, मज़दूरों के हालात, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों का दमन-उत्पीड़न प्रसंगवश ही नेताओं की जुबान पर आते हैं। और जब आते है तो उनके साथ आता है एक झूठा वादा। हर बार की तरह ही इस झूठे वादे की उम्र बहुत थोड़ी होगी। जल्द ही राजनेता अपने द्वारा किया वादे भूल जाएंगे। जनता पहले के ही समान अपने को ठगा पायेगी।
छल, प्रपंच, झूठ से भरे इस चुनावी खेल को पूंजीवाद किसी महान कार्य की संज्ञा देता है। और मेहनतकशों को लूटता-खसौटता है। अपनी इसी तानाशाही को छिपाने के लिए वह लोकतंत्र, जनवाद की दुहाई देता है। देश के युवाओं, मेहनतकशों, हर शोषित-उत्पीडत जन को इस तानाशाही के खिलाफ एक होना चाहिए। सरकार नहीं पूंजीवादी व्यवस्था बदलने के लिए संघर्ष करना चाहिए।
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