आपदा पीडि़त उत्तराखण्ड की मेहनतकश जनता के साथ खड़े हो!
हालात बदलने के लिए आगे आओ!
साथियों,
उत्तराखण्ड में भारी तबाही अपने सबसे कुरूप चेहरे के साथ उपस्थित हो चुकी है। 15 जून के बाद हुई भारी बारिश और भूस्खलन ने हजारों लोगों को अत्यंत खेद और क्षोभ पैदा करने वाली मौतें दी। जो लोग पानी में बहने या मलबे में दबने से बच गये वे किसी आश्रय के अभाव में भूख और ठंड का दोहरा कोप झेलने को विवश हुए। चार पट्टियों. रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड, ऋषिकेश -जोशीमठ-माणा, ऋषिकेश-धरासू-गंगोत्री और पिथौरागढ़-घाटी बगरा पर बर्बादी का मंजर छाया हुआ है।
पूरे देश के हम मजदूर.मेहनतकश लोग इस विपदा की घड़ी में पूंजीवाद द्वारा जनित इन असमय मौतों के लिए दुःख और क्षोभ महसूस कर रहे हैं। हमें रह-रह कर यह बात टीस मार रही है कि इस विपदा ने अपने आने की पूर्व सूचना बार-बार दी। पिछले साल भी उत्तरकाशी के पास असी गंगा में बाढ़ आने से सैकड़ों लोग मारे गये थे। बल्कि उत्तराखण्ड में बाढ़ और भू-स्खलन का क्रम लगातार जारी है। अलकनंदा घाटी का भू-स्खलन (1978), भगीरथी घाटी का कनोरिया गाद भू-स्खलन(1978), काली और मध्यमेश्वर नदी घाटी का मालपा और उखीमठ भू-स्खलन(1998) उत्तरकाशी का वरूणावत पर्वत भू-स्खलन (2003), मुनस्यारी भू-स्खलन(2009) इत्यादि ये सारी घटनाएं इस बात की मांग कर रही थी कि सरकार उत्तराखण्ड पहाड़ों के भौगोलिक बनावट का गंभीर अध्ययन करवाएं और आज के वैज्ञानिक युग की उपलब्धियों का इस्तेमाल पहाड़ के प्राकृतिक व जल संसाधनों के सिर्फ दोहन करने के लिए न हो, बल्कि लोगों के जीवन को ज्यादा से ज्यादा आसान और सुरक्षित बनाने के लिए हो। लेकिन 'नेशनल रिमोट सेसिंग एजेंसी', हैदराबाद के 2005 की इस रिपोर्ट कि 1200 गांव आपदा संभावित भू-स्खलन क्षेत्र में हैं, सरकार ने न तो कोई और अध्ययन करवाया और न ही इन गांवों के बचाव के संबंध में कोई योजना ली।
ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए न तो शासन-प्रशासन तैयार होता है और न ही कभी वह आम जनता को इससे निपटने के लिए प्रशिक्षित करता है। आपदा प्रबंधन के राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बने निकायों की मीटिंगों का न होना इस बात को दिखलाता है कि शासक कितने गम्भीर हैं। तुरंत कार्यवाही न होना, प्राथमिक उपचार का अभाव, ऐसे मौकों पर मृतकों की संख्या को हजारों में पहुंचाने के लिए पर्याप्त होता है।
असल में यह आपदा प्राकृतिक नहीं है। और न ही जैसा कुछ लोग कह रहे हैं कि "यह मानवीय आपदा है" भी नहीं है। इस आपदा के लिए उत्तराखण्ड के मजदूर, किसान और आम मेहनतकश कतई दोषी नहीं हैं। यह आपदा हमारे समाज के शासकों की नीतियों व व्यवस्था की देन है। यह आपदा उन लोगों के द्वारा पैदा की गयी है जो वी आई पी बन कर इन इलाकों के भ्रमण कर रहे हैं। इस आपदा के जनक अब लोगों के आंसू पोंछने का काम कर रहे हैं। इसे सिर्फ ढोंग-पाखण्ड कहा जा सकता है। जो कातिल हैं वही अब मसीहा बन रहे हैं।
उत्तराखण्ड में ही नहीं पूरे देश में पूंजीवादी विकास ने जगह-जगह ऐसी विनाशकारी आपदाओं की पृष्ठभूमि तैयार की हुयी है। उत्तराखण्ड की तरह की आपदा कभी भी देश में कहीं भी किसी भूकम्प के आने, किसी भी क्षेत्र में 1984 के भोपाल गैस काण्ड की तरह 'औद्योगिक दुर्घटना' घटने या किसी भी परमाणु संयत्र में दुर्घटना होने से आ सकती है। पूंजीवादी विकास के केन्द्र में मुनाफा होता है। और इस मुनाफे को कमाने के लिए पूंजीपतियों में तीखी होड़ होती है और मुनाफा वही ज्यादा से ज्यादा कमा सकता है जो मजदूरों का अधिक से अधिक निर्मम शोषण करे और अपनी लागत कम से कम करे। लागत कम से कम करने के लिए घटिया सामग्री का इस्तेमाल करना एक तरीका है तो पिछड़ी तकनीक का इस्तेमाल दूसरा।
उत्तराखण्ड में जिस तरह से विकास किया जा रहा है वह अपने भीतर विनाश को छुपाये बैठा है। इस आपदा में यह जाहिर हुआ है। मनमाने ढंग का शहरीकरण जिसमें वैज्ञानिक नियमों की धज्जियों उड़ायी जाती हैं।विधुत परियोजनाओं, सड़कों के निर्माण के लिए पहाड़ों में बड़े पैमाने पर डायनामाइट का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसके कारण भारी मलवा पैदा होता है जो नदियों व नालों के मार्गों को अवरुद्ध कर देता है। पहाड़ की व्यापक आबादी जो लगातार आधुनिक संसाधनों से वंचित रहने के कारण इस आपदा के दौरान भारी कष्ट भोग रही है। उनकी गतिविधियों को नियंत्रित और सीमित करने के लिए 'ईको सेसिंटिव जोन' की साजिश को सफल बनाने के लिए पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतें अब इस आपदा का इस्तेमाल कर रही हैं।
पूंजीवादी विकास में गरीब आबादी को शहरों के बाहरी खतरनाक क्षेत्रों में धकेल दिया जाता है। रुद्रपुयाग, उत्तरकाशी, चमोली, श्रीनगर आदि-आदि शहरों में गरीब आबादी बेहद असुरक्षित स्थानों में रह रही है। जिस कारण ऐसी आपदाओं के समय उसे भारी नुकसान उठाना पड़ता है। ऐसा ही हाल ग्रामीण आबादी का भी है। पूरे वर्ष ही उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। बरसात के मौसम में अक्सर भू-स्खलन, बादल फटने, बाढ़ आ जाने से उसका जीवन और भयावह हो जाता है। अगर शहरों व गांवों के हालत आजादी के 66 साल बाद भी ऐसे बने हुए हैं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? स्पष्ट तौर पर आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हमारे शासक।
भारत का शासक वर्ग अपनी हर जरूरत, अपनी इच्छा व महत्वाकांक्षा का पूरा ख्याल रखता है। योजना बनाकर उसको परवान चढ़ाता है। जो बाधा इसमें आती है उसे समाप्त करता है। और यदि इसमें बाधा बनकर मजदूर किसान आबादी की जीवन, रिहायश, इच्छाये आती हैं तो उसे निर्ममतापूर्वक कुचल देता है। उत्तराखण्ड सहित देश के मेहनतकशों के जीवन, इच्छाय, आवश्यकताओ को कुचलकर ही देश का विकास हो रहा है।
आजादी के बाद से एक समस्या हमारे देश में शासकों द्वारा धर्म का इस्तेमाल है। धार्मिक पाखण्ड को रोज बढ़ावा दिया जा रहा है। जब आम लोगों की जीवन में समस्यायें पूंजीवादी समाज के कारण गहरा रही हैं तब अधिक से अधिक अंधविश्वास, कूपमण्डूकता की ओर धकेला जा रहा है। भारत का शासक वर्ग, सरकार ने आम लोगों की जीवन की समस्यायें पैदा की है। वे इनका समाधान करने में अक्षम है। धार्मिक पाखण्ड, अंधविश्वास, कूपमण्डूकता को बढ़ावा दे कर वह लगातार ऐसी दुर्घटना की जमीन कभी इलाहाबाद के कुम्भ में तो कभी केदारनाथ में तैयार करता है।
ऐसे हालात में आज जब हम आंसुओं से भीगे हुए हैं, गम में डूबे हुए हैं, गहरा शोक छाया हुआ है तब इस पर विचार करना लाजिमी है कि शासक हमें क्या दे रहे हैं। यह व्यवस्था हमारे किस काम की है?
ऐसे मौके पर हम आम जनता से अपील करते हैं कि वे इस समाज व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता को महसूस करें और आगे आयें।
फिलवक्त पीडि़त जनता के लिए हम सभी को हर संभव मदद करने के लिए आगे आना चाहिए।
जैसे पैसे, दवाइयों व अन्य जरूरी सामनों आदि के जरिये हम मदद कर सकते हैं।
आपदा पीडि़तों की राहत के नाम पर बांटे जा रहे पैसे व राहत की निगरानी कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर सकते है कि वह उचित व सही लोगों पर पहुंचे। स्थान-स्थान पर जागरूक शहरों व ग्रामीण लोगों की कमेटियां बनाये जो इस सब पर निगरानी रखे। वे कमेटियां इस काम में होने वाले भ्रष्टाचार पर निगाह रखें। भ्रष्ट अफसरों-कर्मचारियों से लेकर घटिया सामग्री इस्तेमाल करने वाली कम्पनियों ठेकेदारों पर नजर रखे। कफन खसोटों पर नजर रखें।
आइये! इस मौके पर उत्तराखण्ड की मेहनतकश जनता के साथ खड़े हों। उसका साथ दें। देश व उत्तराखण्ड के मजदूर, किसान, छात्र, महिला संगठनों व जनपक्षधर ताकतों ने उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच का गठन कर नागरिक अखबार के सहयोग से आपदा ग्रस्त क्षेत्रों में मेडिकल शिविर लगाने का निर्णय लिया है जिसके लिये प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम के डाक्टरों की टीम कार्य करने के लिये तैयार है।
अपील
1- पैसे, दवाइयों व अन्य जरूरी सामान से आपदा पीडि़तों की सहायता करें।
2- आपदा के नाम पर खर्च हो रहे पैसे की निगरानी करें। स्थान-स्थान पर निगरानी कमेटी बनायें।
3- सरकार से मांग करें कि व राहत कार्य व पुर्नवास में तेजी लायें।
उत्तराखंड आपदा राहत मंच
घटकः नागरिक (पाक्षिक अखबार), इंकलाबी मजदूर केन्द्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र, प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम, ठेका मजदूर कल्याण समिति, भेल मजदूर ट्रेड यूनियन(हरिद्वार), मार्केट वर्कर्स ऐसोसिएशन(बरेली), मेडिकल वर्कर्स ऐसोसिएशन(बरेली), आटो रिक्सा वैलफेयर ऐसोसिएशन (बरेली), प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच (बरेली), बरेली औद्योगिक मजदूर यूनियन
आर्थिक सहयोग आप 'नागरिक अधिकारों को समर्पित' के खाता संख्या 30488926725 स्टेट बैंक आफ इंडिया, रामनगर के माध्यम से भी कर सकते है।
सम्पर्क सूत्र- डा आसुतोष (मेडिकल कालेज,मेरठ) मो - 9319843319, कैलाश (रूद्रपुर) 9675117739, कमलेश (रामनगर) 7500714375, पंकज (कोटद्वार) 7409467787, बिन्दु गुप्ता (लालकुंआ) 9536338308, भूपाल (देहरादून) 8923465895.

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