पर्चे

नये छात्र-छात्राओं के नाम हल्द्वानी इकाई द्वारा जारी पर्चा, 2025


दिल्ली विश्वविद्यालय साउथ कैंपस में CCTV लगाए जाने के विरोध में भगत सिंह स्टडी सर्किल द्वारा जारी पर्चा



23 मार्च, 2025 शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु की शहादत दिवस पर जारी पर्चा



काकोरी ट्रेन एक्शन के 100 साल पर जारी पर्चा...



12 वां सम्मेलन अक्टूबर, 2024 जारी पर्चा...




हल्द्वानी कॉलेज में शहीद भगत सिंह की जयन्ती मना रहे पछास के साथियों पर ABVP द्वारा  हमले के विरोध में जारी पर्चा




लोकसभा चुनाव 2024 के मौके पर छात्रों-नौजवानों का मांग पत्र


23 मार्च शहादत दिवस पर जारी केंद्रीय पर्चा, 2024


मोदी सरकार के दस साल पर जारी संयुक्त पर्चा
काकोरी शहीदों पर जारी केंद्रीय पर्चा


कुमाऊँ विश्वविद्यालय नैनीताल छात्र संघ चुनाव के लिए जारी पर्चा...




क्रांतिकारी छात्र-युवा अभियान के तहत 8 अक्टूबर, 2023 दिल्ली कन्वेंशन के लिए पर्चा हिंदी व english...









जी-20 शिखर सम्मेलन के विरोध में जारी संयुक्त पर्चा हिंदी व english





बढ़ते हिन्दू फ़ासीवादी खतरे के विरोध में जारी संयुक्त पर्चा






भगत सिंह पर जारी पर्चा



23 मार्च शहीदी दिवस पर जारी केंद्रीय पर्चा 2023



देहरादून में बेरोजगार नौजवानों पर लाठीचार्ज के विरोध में


काकोरी कांड एक्शन पर जारी केंद्रीय पर्चा, 2022




भगत सिंह जन्म दिवस पर केंद्रीय पर्चा 2022




हरियाणा में स्कूली शिक्षा के निजीकरण के विरोध में जारी पर्चा



छात्र-युवा विरोधी 'अग्निपथ' योजना को तत्काल वापस लो!



हल्द्वानी में बस्ती उजाड़े जाने के विरोध में संयुक्त पर्चे जारी






लालकुआं में बस्ती उजाड़े जाने के विरोध में संयुक्त पर्चा जारी



बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ उत्तराखंड के लिए जारी पर्चा



बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ उत्तर-प्रदेश के लिए जारी पर्चा



27 फरवरी से 23 मार्च तक अभियान हेतु जारी पर्चा




विधानसभा चुनाव 2022 उत्तराखंड, उत्तर-प्रदेश के लिए जारी पर्चा



11 वें सम्मेलन के लिए जारी पर्चा





17 सितंबर राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस पर जारी पर्चा




कोरोना महामारी और छात्र पर्चा जारी



23 मार्च शहीदी दिवस पर जारी पर्चा




बेरोजगारी के खिलाफ जारी केन्द्रीय पर्चा





लालकुआं में कच्ची शराब व अवैध नशे के विरोध में जारी पर्चा 




23 मार्च भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत दिवस पर निकाला केन्द्रीय पर्चा 2020




अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के विरोध में निकाला संयुक्त पर्चा 




काकोरी के शहीदों की शहादत पर निकाला केन्द्रीय पर्चा





JNU व अन्य संस्थानों में फीस वृद्धि के विरोध में निकाला केन्द्रीय पर्चा





भगत सिंह की
112 वीं जयंती पर केन्द्रीय पर्चा जारी






जलियांवाला बाग हत्याकांड के 100 वें साल पर सयुंक्त जारी पर्चा





04 नैनीताल-उधम सिंह नगर संसदीय सीट हेतु जारी पर्चा



लोकसभा चुनाव 2019 हेतु संयुक्त पर्चा



23 मार्च भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की शहादत पर निकाला केन्द्रीय संयुक्त पर्चा 2019 










मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल पर 
सयुंक्त तौर पर जारी पर्चा





काकोरी काण्ड के शहीदों की शहादत पर निकाला केंद्रीय पर्चा, 2018




दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा कांचा इलैया की किताबों पर रोक लगाये जाने के विरोध में पर्चा


सीमित प्रवेश नीति के विरोध में निकाला गया पर्चा


परिवर्तनकामी छात्र संगठन के दसवें सम्मेलन के लिए जारी पर्चा




भगत सिंह जयंती पर किए जा रहे सेमिनार के लिए निकाला गया पर्चा




दिल्ली इकाई द्वारा नए छात्रों के लिए निकाला गया पर्चा



23 मार्च भगत सिंह शहादत दिवस पर निकाला गया संयुक्त पर्चा



8 मार्च अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर निकाला गया संयुक्त पर्चा


विधानसभा चुनाव पर निकाला गया सुयंक्त पर्चा

नोटबंदी के 50 दिन पूरे होने पर निकाला गया संयुक्त पर्चा


मोदी सरकार द्वारा मुद्रा वापसी करने के विरोध में जारी पर्चा


अक्टूबर क्रांति शताब्दी वर्ष में निकाला गया पर्चा


नजीब की गुमशुदगी के खिलाफ जारी पर्चा



पछास की दिल्ली इकाई द्वारा DU में हाॅस्टल की समस्या पर जारी पर्चा


पछास द्वारा बेरोजगारी के खिलाफ जारी पर्चा


उधम सिंह की शहादत दिवस पर पछास द्वारा जार पर्चा

पंतनगर, उत्तराखण्ड में 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला के बलात्कार व हत्या के खिलाफ, विरोध-प्रदर्शन के लिए निकाला गया संयुक्त पर्चा  


पछास द्वारा फ्रांसीसी साम्राज्यवादी फ्रांस्वां ओलांद की भारत यात्रा के विरोध में जारी केन्द्रीय पर्चा

रोहित वेमुला ‘आत्महत्या’ प्रकरण पर पछास की दिल्ली इकाई द्वारा निकाला गया पर्चा।

काकोरी के शहीदों की शहादत पर निकाला गया पर्चा



9वें सम्मेलन का पोस्टर

9वें सम्मेलन का पर्चा


UGC गाइडलाइन के खिलाफ जारी पर्चा


छात्र संघ चुनाव पर निकाला गया पर्चा




CBCS के खिलाफ दिल्ली इकाई द्वारा जारी पर्चा


23 मार्च शहादत दिवस पर निकाला गया पर्चा

 

दिल्ली विधान सभा चुनाव पर इकाई द्वारा जारी पर्चा

8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जारी पर्चा

दिल्ली में प्रदर्शन का पोस्टर 

साम्प्रदायिकता कि खिलाफ जंतर-मंतर प्रर्दशन के लिए निकाला गया पर्चा


साम्प्रदायिकता के खिलाफ निकाला गया पर्चा

दिल्ली छात्र-संघ चुनाव 2014 में निकाला गया पर्चा

काकोरी कांड के शहिदों की शहादत दिवस पर निकाला गया पर्चा

लालकुंआ इकाई द्वारा निकाला गया पर्चा

8वें सम्मेलन के लिए जारी पर्चा व पोस्टर

दिल्ली में अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार संघ की रैली में बांटा गया पर्चा 

उत्तराखंड आपदा राहत मंच द्वारा जारी पर्चा

   आइये! उत्तराखंड आपदा प्रभावित क्षेत्रो में तबाही झेल रहे

    लोगों के हक में आवाज उठायें !

साथियो
    उत्तराखंड में आई आपदा को लगभग 3 माह गुजर चुके हैं। इन बीते तीन माह ने आम ग्रामीण गरीब नागरिकों के प्रति हमारे शासकों की घोर उपेक्षाए संवेदनहीनता व लापरवाही तथा कुप्रबंधन को खूब उजागर किया है ना केवल राज्य सरकार बल्कि संसाधनों से सम्पन्न केंद्र सरकार व उसके समूचे शासन प्रशासन को भी इस आपदा ने आम जनता के सामने नग्न कर दिया।
    16.17 जून को रुद्रप्रयाग व उत्तरकाशी समेत पिथौरागढ़ व अन्य इलाकों में आई आपदा से भयानक तबाही-बर्बादी होती है। पर्यटकों व स्थानीय लोगों समेत हजारों लोग मारे जाते हैं। तब सबसे ज्यादा जरूरत थी तत्काल वहाँ फंसे लोगो को बाहर निकालने की, लोगों तक भोजन, पानी, दवा आदि पहुंचाने की आदि। लेकिन हम सबने देखा कि राज्य का मुखिया आपदा से निपटने में नेतृत्व देने, आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बजाय दिल्ली पहुंच जाता है। मीडिया में व चौतरफा थू -थू होने पर, व आपदा में हाई प्रोफ़ाइल पर्यटकों के भी फंसे होने के चलते फिर पर्यटकों को बाहर निकालने के प्रबंध केंद्र व राज्य सरकार द्वारा किए गए। जबकि इस वक्त इससे निपटने का काम केवल हर जरूरी संसाधनों से सम्पन्न व प्रशासनिक ताने-बाने वाली ताकत (सरकार) ही कर सकती थी।
     लेकिन आपदा प्रभावित क्षेत्रों में हजारों की तादाद में जिन गरीब ग्रामीणों के मकान, खेत व जानवर खत्म हो जाते हैं तथा सैकड़ों की संख्या में वे परिवार जिनके घर के पुरुष सदस्य आपदा में मारे जाते हैं उनके लिए सरकारों ने घोषणा बाजी के अलावा क्या किया? इन लोगो को मेडिकल सुविधाओं व राशन आदि की सख्त जरूरत थी लेकिन सरकारों ने जो दावा करती हैं कि वह जनता के लिए है उन्होंने क्या किया? कुछ भी नहीं सिवाय कुछ औपचारिकताओं के, नाम का राहत। और हकीकत यही है कि हालात आज भी बेहद खराब हैं। आखिर सरकारों व उसके प्रशासन की जवाबदेही व ज़िम्मेदारी किसके प्रति है, यह किन लोगों के लिए काम करता हैं व चिंतित रहता है? क्या जनता के लिए? नहीं; बांधों, टनलों, होटल-रिज़ॉर्ट, खनन आदि-आदि के कारोबार में लगे पूंजीपतियों के लिए। और इन्होंने, खूब मुनाफा बटोर सकें इसलिए यहां की भौगोलिक बनावट को ध्यान दिये बिना अनियंत्रित व अवैज्ञानिक तरीके से पिछड़ी तकनीक का इस्तेमाल करके अंधाधुध ढंग से भारी तादाद में बांधों-सुरंगो, सड़कों आदि आदि का निर्माण किया। दूसरी ओर अनियंत्रित पर्यटन बेरोक टोक जारी था। अतः देर सबेर इस अंधाधुध लूट का 16.17 जून जैसी आपदा के रूप में बिस्फोट होना ही था। यही स्थिति व सच पूरे देश के संबंध में भी है।  टाटा-बिडला, मित्तल- अंबानी आदि द्वारा देश की संपत्ति संसाधनों की लूट अब किसी से छुपी नही है, हमारे जनप्रतिनिधि होने का दावा करने वाले लोग जो कि संसद या विधान सभाओं में बैठते है तथा पूरा शासन व प्रशासनिक महकमा इन टाटा- अंबानी जैसे देशी विदेशी पूंजी की सेवा में मुस्तैद रहता है। 
     और इसलिए सरकारें, उसके विकास का यह पूंजीवादी माडल और ये पूंजीपति अंततः यह पूंजीवादी व्यवस्था ही इस आपदा की असल वजह हैं इसके लिए जिम्मेदार हैं जो कि इसे प्राकृतिक या दैवीय आपदा कहकर अपने गुनाहों पर पर्दा डालने का काम कर रहे हैं। इसीलिए यह सब भी हुआ व होता है कि आम गरीब जनता के प्रति बेहद लापरवाह, संवेदनहीन व संकल्पहीन दिखने व रहने वाले ये पूंजीवादी शासक केदारनाथ धाम को 11 सितंबर से खोल देने के मामले में पूरे प्रशासनिक अमले के साथ संकल्पबद्ध होकर जुट जाते हैं ऐसा क्यो? इसे समझना कठिन नहीं है। जैसे ही इस दौरान केदारनाथ के आस-पास जंगलो में सैकड़ों लाशें मिली जिसकी संख्या और बढ़ती लेकिन इसे रोक दिया गया और इस इलाके में जाने पर रोक लगा दी गई।
    इन स्थितियों में तब यह सवाल पैदा होना लाजिमी है कि तब क्या किया जाय, समस्याओं को हल करने के संबंध में किस रास्ते की ओर बढ़ा जाय। निश्चित तौर पर जो रास्ता है वह एकजुट होकर संघर्ष करने का ही है इसी माह शहीद भगत सिंह का जन्मदिन है जिनका क्रांतिकारी संघर्ष ना केवल विदेशी लुटेरे (अंग्रेज़ो) के खिलाफ था बल्कि देशी पूंजीपतियों व जमीदारों के खिलाफ भी था और इस संघर्ष के जरिये वह देश में समाजवाद (मजदूर-मेहनतकश जनता का राज) लाना चाहते थे। तब से आज हालात बहुत बदले हैं आज भगत सिंह की विचारधारा व समाजवाद का उनका लक्ष्य आज बहुत ज्यादा प्रासंगिक हो चुका है इसलिए जरूरत है इस विचारधारा को समझने की व समाजवाद की दिशा में संघर्ष करने की। 
    इसीलिए आपदा में राहत काम व आपदा के असली कारणों को आम जनता तक पहुचाने व अपने हक के लिए आवाज उठाने-संगठित होने के मकसद से ही ‘उत्तराखंड आपदा राहत मंच’ का गठन विभिन्न संगठनों व नागरिक अखबार द्वारा किया गया। मंच के नेतृत्व में उत्तरकाशी में कुछ दिन तो रुद्रप्रयाग के गुप्तकाशी, कालीमठ व ऊखीमठ वाले क्षेत्र में कई दिन तक मेडिकल कैंप लगाए गए। और अब इसी की अगली कड़ी में मंच द्वारा एक सेमीनार का आयोजन देहरादून में किया जा रहा है। उम्मीद है आप इस कार्यक्रम में शिरकत करेंगे।
   

                  कार्यक्रम                                     

विषयः उत्तराखण्ड आपदा से उपजे सवाल व उनका समाधान

दिनांकः 29 सितम्बर, रविवार 2013,

समयः 10 बजे प्रातः से शाम 5 बजे तक।     

स्थानः कालूमल धर्मशाला, राजा रोड़, प्रिंस चैक (निकट रेलवे स्टेशन), देहरादून।           

संपर्कः 8126975771, 9837205978 

उत्तराखंड आपदा राहत मंच 

घटक संगठनः परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रोग्रेसिव मेडिकोज

            फोरम, नागरिक (पाक्षिक अखबार), इंकलाबी मजदूर केंद्र, प्रगतिशील महिला एकता

            केंद्र, भेल मजदूर ट्रेड यूनियन          

 दिल्ली में चार वर्षीय स्नातक प्रोग्राम के विरोध में निकाला गया पर्चा


छात्र संघ चुनाव पर

पूंजीवाद मुर्दाबाद!            इंकलाब जिन्दाबाद!                    समाजवाद जिन्दाबाद!
      भगतसिंह की बात सुनो, क्रांतिकारी छात्र राजनीति की राह चुनो!

साथियों,
    विभिन्न सरकारी महाविधालयों व विश्वविधालयों में छात्र संघ चुनावों की तैयारी आरम्भ हो चुकी है। इन परिसरों में प्रवेश लेने वाले लाखों नये छात्रों के लिए यह पहली बार अपने प्रतिनिधि चुनने का मौका है। छात्र संघ चुनाव के इस मौके पर परिवर्तनकामी छात्र संगठन आपसे चंद बातें करने चाहता है।
    भारत की आजादी के आंदोलन में छात्रों ने बढ़-चढ़ का भूमिका निभाई थी देश की आजादी के लिए की जाने वाली विभिन्न गतिविधियों के साथ जुड़ते हुए छात्रों ने विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। कुछ मौकों पर छात्रों ने अपनी पढ़ाई तक का त्याग कर दिया और अपने जीवन का बलिदान करने से भी पीछे नहीं हटे। इन्हीं छात्रों में से भगत सिंह सुखदेव, भगवती चरण बोरा, बटकेश्वर दत्त, कल्पना दत्त, मास्टर सूर्य सैन और अनेक स्कूली छात्र आदि असंख्य नौजवनों ने आजादी के आंदोलन को मजबूती प्रदान की। इस प्रकार उन्होंने देश के मेहनतकश जनता के साथ एकजुट होते हुए ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई में असीम बहादुरी व त्याग का परिचय दिया।
    आजादी के बाद देश में अमीर और गरीब का अंतर कम होने की बजाए बढ़ता गया। आजाद भारत की सरकारों नें अमीरों के हितों में एक के बाद दूसरी जनविरोधी नीतियां लागू कीं। जिस कारण आजाद भारत में आंदोलनों का सिलसिला जारी रहा। इन आंदोलनों में भी छात्र नौजवानों ने बढ़-चढ़ कर भागीदारी की। साठ व सत्तर के दशक में पश्चिम बंगाल, बिहार, व पूर्वी उत्तर प्रदेश में चले किसान विद्रोहों में कालेज छात्रों ने भी अपने जीवन को बलिदान किया। 70 के दशक में देश में बढ़ती मंहगाई भ्रष्टाचार के खिलाफ गुजरात और बिहार राज्यों के छात्रों ने लाखों की संख्या में आंदोलन में हिस्सेदारी की। इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गये आपातकाल (1975-77) के खिलाफ भी छात्रों ने जबरदस्त प्रतिरोध किया। साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में भाषायी, क्षेत्रिय, राष्टीय व जातीय गैरबराबरी के खिलाफ चलने वाले आंदोलनों में भी छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह सब भारत के प्रगतिशील छात्र आंदोलन की विरासत है।
    अपनी विरासत के इस संक्षिप्त परिचय के बाद अब हम भारत के वर्तमान छात्र संघ राजनीति पर एक नजर डालते हैं। आज छात्र संघ मंचों पर अधिकांशता अमीर वर्ग की पार्टियों कांग्रेस, भाजपा, सपा, सीपीआई, सीपीएम, आदि पार्टियों द्वारा बनाये छात्र संगठनों का कब्जा है। केन्द्र व राज्यों की सरकारों में काबिज यही पार्टियां पूंजीपति वर्ग के हितों में तमाम जनविरोधी नीतियां लागू कर रही हैं, इन नीतियों के कारण मेहनतकश जनता के जीवन में तबाही-बर्बादी फैल रही है। छात्रों नौजवानों के हाथों से रोजगार व बेहतर शिक्षा के अवसर छूटते जा रहे हैं। शिक्षा के निजीकरण करने के मामले में यह सब एक हैं। इन पार्टियों के ये छात्र संगठन छात्रों के बीच इन्हीं के लिए वैचारिक माहौल तैयार करने का काम करते हैं। साथ ही छात्रों के बीच इनका वोट बैंक भी बढ़ाते हैं।
    यह छात्र संगठन व अन्य स्वतंत्र पूंजीवादी छात्र नेता अपने प्रभाव व ग्लैमर युक्त पूंजीवादी राजनीति इस्तेमाल कर छात्रों को उनकी वास्तविक मांगों के लिए संघर्ष करने के मार्ग से भटकाते हैं। इनकी छात्र राजनीति का उद्देश्य पूंजीवादी राजनीति में अपना कैरियर बनाना होता है और इसके लिए ये पैसा, गुंडागर्दी जैसे हथकंडों का जमकर इस्तेमाल करते हैं। चूंकि छात्रों व उनकी मांगों से इनका आमतौर पर कोई सरोकार नहीं होता इसलिए चुनाव के अतिरिक्त यह छात्रों के बीच में नजर नहीं आते हैं। इनके इस व्यवहार के कारण पूरी छात्र राजनीति बदनाम होती है और एक आम छात्र, छात्र राजनीति से खुद को अलग कर लेता है। इस प्रकार छात्र स्वयं ही अपना गैर राजनीतिकरण कर लेते हैं। दरअसल सरकार भी यही चाहती है कि छात्र नौजवान वोट डालने के अलावा आम तौर पर राजनीति से दूर ही रहें। अपने सचेतन प्रयासों के तहत भी वह परिसरों का गैर राजनीतिकरण करने में लगी है। लिंगदोह समिति की सिफारिसों को लागू कर पिछले दिनों उसने छात्रों के जनवादी अधिकारों पर कुठाराघात किया। यूजीसी ने भी पिछले वर्ष छात्रों के राजनीतिकरण को रोकने के लिए उचित कदम उठाने के निर्देश सभी विश्वविधालयों को जारी किये। इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि पूंजीवादी छात्र संगठन व नेता अपने लम्पट गुंडागर्दी वाले व्यवहार से सरकार की परिसरों को गैर जनवादीकरण करने की छात्र विरोधी योजना में ही सहयोग कर रहे है। आज हम छात्रों के सामने छात्र राजनीति को पूंजीवादी प्रभावों से मुक्त करने और सरकार की साजिशों को नाकाम करने की गंभीर चुनौती है।
    
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) भारत के छात्र आंदोलन की क्रांतिकारी विरासत को आगे बढ़ाना चाहता है। पछास शहीद भगतसिंह के विचारों के अनुरूप एक समाजवादी भारत के निर्माण के लिए संघर्षरत है। शहीद भगतसिंह के ही शब्दों में ‘‘हम एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं जो समानता पर आधारित हो जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण ना हो’’
    
आईये, साथियों  हम उपरोक्त कथन को अपना लक्ष्य बनाते हुए एकजुट हों और मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्षों को आगे बढ़ायें।

                            क्रांतिकारी आह्वान के साथ
                    परिवर्तनकामी छात्र संगठन पछास

  

      इण्टर कालेज के छात्रों के नाम

  पढें!    एकजुट हों!!       संघर्ष करें!!!

         
          उठो और अपने भीतर
          सोये हुए जंगल को
          आवाज दो
          उसे जगाओ और देखो-
          कि तुम अकेले नहीं हो
          और न किसी के मुहताज हो
          लाखों हैं जो तुम्हारे इंतजार में खडे़ हैं
          वहां चलो। उनका साथ दो
          और इस तिलस्म का जादू उतारने मे
          उनकी मदद करो.....

                                             (धूमिल की कविता ‘पटकथा’ के अंश)
   आप सभी छात्र-छात्राओं का विध्यालय के नये सत्र में परिवर्तनकामी छात्र संगठन अभिवादन करता है। छात्र जीवन के इस पड़ाव में आप दुनिया को समझने के शुरूआती प्रयास करते हैं। जिसमें हमारे शिक्षक, पुस्तकें एक भूमिका निभाते हैं। किन्तु ढेर सारी सच्चाईयों का ज्ञान हमारी पुस्तकें हमें नहीं कराती बल्कि यह इन सच्चाईयों को छिपाती हैं। ये सच्चाईयां क्या हैं? और इन्हें क्यों छिपाया जाता है?
    हमारे विद्यालयों की जर्जर बिल्डिगें, अपर्याप्त फर्निचर, बस नाम की प्रयोगशालाएं तथा शिक्षकों के रिक्त पद क्यों हैं? यह बात हमारी शिक्षा हमें नहीं बताती। हमारे विद्यालयों में अनुशासन के नाम पर तानाशाही, गैरजनवादी तौर तरीके क्यों अपनाये जाते हैं? हमारे शिक्षकों व हमारे बीच क्यों स्वस्थ जनवादी सम्बंध नहीं है? क्यों क्लास रूम में दोनो ही बस घंटे खत्म होने का इंतजार करते हैं? गरीमामय रोजगार की तलाश में क्यों हमें गला काटू प्रतियोगिता में झोंका जाता है? क्यों सबको रोजगार नहीं मिलता? देश में अमीर घरों के बच्चों के लिए अलग और हमारे लिए अलग शिक्षा की व्यवस्था क्यों है? हमारी किताबें क्यों इस सच को छिपाती हैं कि देश में अमीरों (पूंजीपतियों) का शासन है। ये गरीबों (मजदूरों-मेहनतकशों) पर शासन करते हैं। ऐसे तमाम सवाल हैं जिनका जवाब मिले बिना हम देश-दुनिया व अपने विध्यालयों को नहीं समझ सकते और ना ही इसे बदल सकते हैं।
    इन सभी सवालों के जवाब तलाशने के लिए हमें इस समाज व्यवस्था के मूल को समझना होगा। मौजूदा समाज व्यवस्था एक पूंजीवादी समाज व्यवस्था है। इस व्यवस्था में एक ओर पूंजीपति-नेता-अफसर हैं तो दूसरी ओर मजदूर-मेहनतकश। यह पूंजीपति वर्ग, मजदूरों-मेहनतकशों के शोषण पर जिंदा रहते हैं। मजदूरों-मेहनतकशों को लूट-लूट कर ये अपनी तिजोरियां भरते हैं। हम मजदूर-मेहनतकश घरों के लड़के-लड़कियों के मन में यह व्यवस्था मेहनत (शारीरीक श्रम) से घृणा करने का भाव पैदा करती है। ताकि हम मेहनतकशों से घृणा करें और अपना आदर्श पैसा कमाना बनायें। पैसा चाहे ठगी-धोखाधड़ी से ही क्यों ना कमाया गया हो।
    पूंजीपति वर्ग के हिसाब से ही देश का पूरा तंत्र चलता है। शिक्षा का तंत्र भी पूंजीवादी व्यवस्था का ही एक अंग है। यह भी पूंजीपति वर्ग के हितों के हिसाब से ही काम करता है। किसको-कितनी और कैसी शिक्षा दी जाये यह सब यह पूंजीवादी व्यवस्था ही तय करती है। यह व्यवस्था हमें गैर बराबरी पूर्ण, अवैज्ञानिक व जीवन श्रम से कटी शिक्षा देती है। ताकि हम एक आज्ञाकारी, ‘अनुशासित’ मजदूर बन सके, जो कि अपने शोषण को चुपचाप सहता रहे, कोई आवाज ना उठाये।
    अपनी व्यवस्था को चलाने के लिए पूंजीपति को सभी तरह के लोगों की जरूरत होती है। पढ़े-लिखे मजदूर, कर्मचारी तैयार करने के लिए सरकारी स्कूल खोले और अपने वर्ग के बच्चों को पढ़ाने के लिए आलीशान स्कूल खोले। अब पूंजीपतियों की सरकारें शिक्षा पर खर्च गैर जरूरी समझ रही है। और शिक्षा से सीधे मुनाफा कमाने के लिए पूंजीपतियों को छूट दे रही है। इस कारण ही तमाम पूंजीपति निजी स्कूल खोल कर मुनाफा कमा रहे हैं। हमारे स्कूलों को सरकार की तरफ से बजट में कम पैसा मिलने के कारण जर्जर अवस्था में पहुंचाया जा रहा है। ताकि हम अच्छी शिक्षा के नाम पर प्राइवेट स्कूलों में दाखिला लेकर पूंजीपति की दौलत बढ़ायें। साथ ही धीरे-धीरे वह माहौल बन जाए की सरकार इन सरकारी स्कूलों को नीजि हाथों में सौंप कर इन्हें भी पूंजीपतियों के मुनाफे की वस्तु बना दे।
    हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें इस अन्यापूर्ण पूजीवादी व्यवस्था का चाकर बने रहने की शिक्षा देती है। इसके खिलाफ ना बोलने की शिक्षा देती है। यह शिक्षा व्यवस्था ऐसे विचारों को छिपाती है जो इस अन्यापूर्ण व्यवस्था का विरोध करते हैं। शहीद भगत सिंह को सरफिरे, जोशिले नौजवान के रूप में हमारे समाने पेश किया जाता है। किन्तु उसके विचारों को छिपाया जाता है। इसी डर से कि कहीं आज के नौजवान इन विचारों को पढ़कर भगत सिंह के विचारों के हमसफर ना बन जाएं। भगत सिंह ने अपने जमाने की अन्यायपूर्ण व्यवस्था के बारे में लिखा था-
‘‘ हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है- चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति और अंगे्रज या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है। चाहे शुद्ध भारतीय पूंजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो, तो भी इस स्थिति में कोई अंतर नहीं पड़ता।’’ (‘फांसी नहीं हमें गोली से उड़ा दो’ पंजाब गवर्नर के नाम पत्र के अंश)
    भगत सिंह अन्याय को अंग्रेजों द्वारा भारतीय मजदूर-मेहनतकशों के शोषण तक ही नहीं देखते थे। बल्कि यह भारतीय पूंजीपति वर्ग द्वारा श्रमिकों के शोषण को भी अन्यायपूर्ण देखते थे। इसके खिलाफ संघर्ष का रास्ता भी भगत सिंह दिखाते हैं।
‘‘इसलिए कोई आमूल परिवर्तन आवश्यक हो जाता है और यह उन तमाम लोगों का कर्तव्य है जो इस बात को समझते हैं कि समाज सामाजवादी आधार पर पुनर्गठन किया जाना चाहिए। जब तक इस काम को सम्पंन नहीं किया जाता और मानव द्वारा मानव के शोषण तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण का अंत नहीं किया जाता, तब तक मानवजाति आज जिन दुःख-कष्ट और हिंसा का सामना कर रही है उससे बचा नहीं जा सकता.....’’
    दोस्तों, भगत सिंह के विचार दुनिया को समझने की दृष्टि हमें देते हैं व इसे बदलने की जरूरत को एक कर्तव्य के रूप में हमारे सामने पेश करते हैं भगत सिंह का पूरा जीवन इस कर्तव्य के निर्वाह में लगा रहा। अब कर्तव्य आज के नौजवानों के समाने हैं। निश्चित ही आज का नौजवान इस कर्तव्य को पूर्ण जिम्मेदारी से अपने कंधों पर लेगा। इसी उम्मीद के साथ-
    परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) समाज परिवर्तन के इस संघर्ष में आप सभी छात्र-छात्राओं का आह्वान करता है। पछास के सदस्य बने और इस संघर्ष को मजबूती दें।
            क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
          

     परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

  pdf फाइल डाउनलोड करें             इण्टर कालेज के छात्रों के नाम 

 

 

 


  

          दिल्ली के छात्रों के नाम पर्चा

 


 

 उधम सिंह शहादत दिवस पर सांप्रदायिकता के खिलाफ जारी पर्चा व  पोस्टर

 


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