गतिविधियां

लॉक डाउन की मार झेल रहे गरीब मजदूरों-छात्रों के समर्थन में भूख हड़ताल

गरीब मजदूरों और जरूरतमंदों का सहयोग जारी है...


लालकुआं, (उत्तराखंड) परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इंकलाबी मजदूर केंद्र और प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के साथियों ने संयुक्त रूप से आज 5 अप्रैल को नगीना कॉलोनी, बजरी कंपनी के गरीब मजदूरों, विधवा महिलाओं को मेहनतकश समुदाय से आर्थिक सहयोग व खाद्य सामग्री जुटाकर चावल, आटा और दाल का वितरण किया।

इस दौरान साथियों ने पाया कि बेहद गरीब परिस्थितियों में जीवन निर्वाह करने वाले लोगों के सामने विकराल स्थिति खड़ी हो गई हैं। उनके लिए पेट भर खाना भी मिल पाना भी मुश्किल हो गया है। पहले से ही मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता था कोरोना महामारी से विकट स्थिति खड़ी हो गई हैं। सरकार को ऐसे लोगों को चिन्हित कर इनको राहत देनी चाहिए। साथियों ने कहा हमारा सहयोग आगे भी जारी रहेगा।


कोरोना से सम्बंधित जानकारी के साथ खाद्य सामग्री का वितरण किया...




बरेली (उत्तर-प्रदेश) आज 4 अप्रैल बाकरगंज डलाओ के पीछे वाली बस्ती में ऐसे गरीबों को जिनके लिए हमारी देश की पूंजीवादी व्यवस्था आज तक कोई भी बुनियादी सुविधाओं का इंतजाम तक नहीं कर पाई है और उन गरीबों, बेसहारा मजदूर-मेहनतकशों की फांकाकशी भरी ज़िन्दगी को और भी तकलीफ देह बनाने के लिए उनके राशन कार्ड भी रद्द कर दिए गए है। 


समाज के ऐसे लोगों से जो समाज के लिए कार्य कर रहे है, समाज के लिए संवेदनशील हैं। उनसे आर्थिक व खाद्य सहयोग लेकर परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इंकलाबी मजदूर केंद्र और क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के साथियों ने इस तरह के गरीब लोगों को आज कुछ खाद्य सामग्री का वितरण किया और उनको कोरोना से सम्बन्धित जानकारी भी दी।




गरीब मजदूरों के बीच वितरित की कच्ची राशन सामग्री 


लालकुआं (उत्तराखंड) परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इंकलाबी मजदूर केंद्र और प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के साथियों ने आज 4 अप्रैल को लालकुआं, (उत्तराखंड) के बजरी कंपनी, 25 एकड़, बिन्दुखत्ता और हल्दूचौड़ में डेली वेज पर काम करने वाले गरीब मजदूरों व विधवा महिलाओं के बीच, साथियों व मेहनतकशों के सहयोग से जुटाई कच्ची राशन सामग्री आटा, चावल और दाल का वितरण किया।

गरीब मजदूरों ने बताया कि सरकार ने 3 माह का राशन व 10-10 किलो अनाज देने का वादा किया हैं। अभी 1 महीने का राशन ही मिला हुआ है। परिवार की संख्या के हिसाब से यह राशन भी इतना नाकाफी है कि महीना तो छोड़ो सप्ताह भर तक भी यह चल नहीं पाता है। ऐसे समय में कोरोना महामारी से जब काम बंद है और पैसा पास में है नहीं तो थोड़ा राशन के अलावा अन्य सामान मिल पाना मुश्किल हो गया है।


वहीं दूसरी तरफ प्रवासी मजदूरों के पास राशन कार्ड भी नहीं है। वह दूसरी जगहों से यहां आकर भवन निर्माण या अन्य काम करते हैं और किराये, झुग्गियों में रह रहे हैं। उनको तो यह थोड़ा राशन भी नहीं मिल पा रहा है। उनके पास छोटे-छोटे बच्चों सहित परिवार हैं। उनके सामने सुचारु रुप से जीवन आगे चलाने का संकट खड़ा हो गया हैं।

राशन पैकिंग व वितरण करते साथियों ने मांग की कि ऐसे कोरोना महामारी के समय में सरकार को गरीबों के भोजन व किराए में रहने वाले लोगों के किराए आदि का इंतजाम करना चाहिए। क्रांतिकारी संगठनों का मेहनतकशों के साथ छमतानुसार यह सहयोग आगे भी जारी रहेगा।



समाज के जनपक्षधर लोगों के सहयोग से जारी है.....


बरेली (उत्तर-प्रदेश) 3 अप्रैल को समाज के जनपक्षधर लोगों के आर्थिक सहयोग से मजदूर वर्ग एवं अन्य गरीब तबकों से अपनी एकता प्रस्तुत करते हुए परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इंकलाबी मजदूर केन्द्र और क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के साथी लॉक डाउन में चावल, आटा, आलू, बड़ी, प्याज और हरी मिर्च आदि का वितरण कर रहें हैं। 


जरुरतमंदों को बाकरगंज दलाओं खड्ड, बरेली में बांटते हुए। वहाँ दिहाड़ी मजदूर परिवारों के हालात बहुत बुरे हैं। जो कई दिनों से बेहद कठीन परिस्थितियों में जी रहें हैं।



रामनगर में मेहनतकशों के बीच वितरित करने हेतु सामग्री तैयार करते 


 रामनगर (उत्तराखंड) परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इंक़लाबी मज़दूर केंद्र और प्रगतिशील महिला एकता केंद्र ने लोंगों से इकट्ठा किये फण्ड से मेहनतकशों के बीच रोजमर्रा की जरूरत की चीजों का वितरण किया गया।

संगठन के लोगों ने सर्वे किया था। सर्वे में पाया गया कि मज़दूरों के परिवारों में छोटे-छोटे बच्चे हैं जिनके लिए दूध की व्यवस्था नही हो पा रही है। सरकार ने कंट्रोल का जो राशन अभी दिया है उसमें केवल चावल और गेंहू है। क्या केवल ये दो चीजें ही हैं जो एक परिवार की जरूरतों को पूरा करती हैं। चावल और गेंहू के अलावा तेल, नमक, हल्दी, मिर्च, आदि चीजें भी चाहिए होती हैं। इसके अलावा बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास राशन कार्ड नही हैं। उनको चावल और गेंहू भी नही मिल रहा है। 

इसके अलावा कुछ फैक्ट्री के मज़दूरों से भी मिले जिनके मालिकों ने उन्हें 500 या 1000 रुपये दिए है एडवांस के बतौर। जब काम शुरू होगा तो वो उनकी तनख्वाह में से काट लेगा। उसके बाद मालिकों ने भी उनकी सुध लेना छोड़ दिया है। प्रधानमंत्री ने यह आदेश दिया था कि लॉक डाउन के दौरान मज़दूरों की पूरी जिम्मेदारी मालिक की होगी। लेकिन व्यवहार में यह लागू नही हो रहा है। वजह साफ है संघर्षों के बाद बने श्रम क़ानून लागू नही होतें। 

कुल मिलाकर सरकार के पास मज़दूरों के लिए ऐसी कोई ठोस सुरक्षा व्यवस्था नही है जिसके दम पर सरकार मालिकों से मज़दूरों की जिम्मेदारी का वहन करवा सके। मज़दूर जानता है कि वो सामान्य परस्थिति में भी मालिक के खिलाफ खड़ा होता है तो सरकार और शासन प्रशाशन मालिक के साथ खडे नजर आते है। सामान्य समय में पूंजीपतियों को खुलेआम मज़दूरों को लूटने की छूट देने और श्रम कानूनों को पूंजीपतियों के हिसाब से ढालना पूंजीपतियों को हिम्मत और हौसला देता हैं वो आज इस महामारी के समय में सरकार के आदेश के वावजूद मज़दूरों की जिम्मेदारी नही उठाना चाहता है। उसके अंदर सरकार के आदेश का कोई भय नही है। पहले भी वो खुलेआम श्रम कानूनों का उल्लंघन करता रहा है और आज भी प्रधानमंत्री की बातों का उल्लंघन कर रहा है।

इसके अलावा साथियों को यह भी देखने को मिला कि लोंगो के घरों में सिलेण्डर खत्म होने वाले हैं। सरकार ने उज्जवला योजना के तहत कुछ सिलेंडर देकर कॉफी वाहवाही लूटनी चाही। परन्तु जो दिहाड़ी मजदूर है जिसके पास उज्जवला योजना का सिलेण्डर नही है वो क्या करेगा? उस मज़दूर को जंगल से लकड़ी लाने की भी मनाही है। ऐसे में वो मज़दूर खाना कैसे बनाएगा।

दरअसल कोरोना वायरस ने व्यवस्था की उन कमियों को उजागर किया है जो लगातार बनी हुई है और बढती जा रही है। और आने वाले समय में अगर कोई भी आपदा या महामारी आती है तो आम मज़दूर मेहनतकशों की हालत और खराब होगी।

हम प्रदेश के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री के समक्ष कुछ तात्कालिक मांगें पेश करना चाहतें हैं जो मज़दूरों के जीवन के लिए निहायत जरूरी है- 
1. कंट्रोल पर चावल और गेंहू के अलावा रोजमर्रा की जरूरत की चीजों मसलन दाल, मसाले, तेल, नमक आदि निःशुल्क उपलब्ध करवाया जाए। और बीमार होने पर फ्री में इलाज़ की व्यवस्था की जाए। 
2. जिन घरों में सिलेण्डर की व्यवस्था नही है उनको निशुल्क सिलेण्डर उपलब्ध करवाया जाए।
3. जिन लोंगों के पास राशन कार्ड नही हैं उनके भी राशन कार्ड बना कर कंट्रोल से राशन मुहैय्या करवाया जाए।



जारी हैं मेहनतकशों का सहयोग...


फरीदाबाद (हरियाणा) 3 अप्रैल परिवर्तनकामी छात्र संगठन व इंकलाबी मजदूर केंद्र भी गरीब मेहनतकश लोगों को भोजन तथा राशन उपलब्ध करा रहे है । इस तरह की सीधी मदद हम आम जनता के सहयोग से कर रहे हैं। 

कोरोना माहामारी एवं देश में लाकडाउन से मजदूर मेहनतकश मुश्किल में है। असंगठित व निर्माण क्षेत्र के मजदूर भूख व अन्य कई दूसरी समस्याओं से जूझ रहा है। यह सब बिना तैयारी के किए गये लाकडाउन की वजह से है। जिसके लिए प्रधानमंत्री मोदी ने माफी मांगी है। सरकार अभी भी भोजन तथा दवाई जैसे जरूरी सामानों को उपलब्ध कराने का उचित प्रबंध नहीं कर सकी है। सरकार की लापरवाही का खामियाजा लोग भुगत रहे है ।


सभी सक्षम साथियों से अपील है कि आप भी मेहनतकश गरीब लोगों की मदद व सहयोग के लिए आगे आयें। फरीदाबाद में आपको पता चले कि कोई व्यक्ति अथवा परिवार मुश्किल में हो और उसे तत्काल मदद की जरूरत हो तो हमें बताएं अथवा उसे हमारा फोन न. दे दें ।



मज़दूरों के बीच राहत सामग्री वितरित की! ऐसे लोगों के लिए उठ खड़ा होना ही होगा। नहीं तो परिणाम बुरे होंगे


बरेली, (उत्तर-प्रदेश) इंकलाबी मजदूर केंद्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन इस लॉक डाउन के माहौल में पिछले कई दिनों से गरीब मजदूर-मेहनतकशों के बीच जाकर लगातार अपनी क्षमतानुसार मदद कर रहा है। इस कड़ी में आगे बढ़ते हुए 1 अप्रैल 2020 को संगठन के साथियों द्वारा कुछ कच्ची खाद्य सामग्री का वितरण किया गया। वितरण की गई सामग्री में आटा, चावल, आलू और सोयाबीन की बड़ी के 4-5 किलो के पैकेटों का वितरण किया गया।

वितरण करते समय हमें लोगों ने बताया कि सरकार ने तीन महीने का राशन एडवांस में देने को कहा था। लेकिन कई वजहों से हमें राशन देने से मना कर दिया गया। राशन की दुकान से भगा दिया गया और कुछ लोगों को तो राशन बांटने बालों ने बिना उनके राशन कार्ड की जांच किए कह दिया कि तुम्हारी यूनिट्स कट गई है तो आपको राशन नहीं मिलेगा।
सरकार द्वारा सरकारी योजनाओं का ढोल कैसे पीटा जाता है और जमीनी हकीकत क्या होती है यह लोगों से बात करके पता चला। राशन बांटना सरकार की जिम्मेदारी है पर ऐसा व्यवहार किया जाता है मानों वे गरीबों पर अहसान कर रहे हों। महामारी के समय में गरीबों को तीन माह का राशन एक साथ देने में सरकारें अपने ही वायदे से पलट रही हैं। वही दूसरी ओर पूंजीपतियों पर रात-दिन धन वर्षा की जा रही है।
कई ऐसे लोगों कि मदद की जो दिहाड़ी मजदूर हैं। यह लोग रोज कुआं खोदो रोज पानी पियो जैसे हालात में अपना जीवन चला रहे थे। काम बंद होने के कारण वे बेहद परेशानी में है। उनकी यह भी चिंता है कि जब यह लॉक डाउन हटेगा तो ना जाने कितने दिनों बाद जिंदगी पटरी पर आएगी की नहीं आएगी। संगठनों का यह अभियान आगे भी जारी है।



वितरण हेतु खाद्य सामग्री तैयार करते

बरेली (उत्तर-प्रदेश) इंक़लाबी मजदूर केंद्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन इस लॉक डाउन के माहौल में पिछले कई दिनों से गरीब मजदूर-मेहनतकशों के बीच जाकर लगातार अपनी क्षमतानुसार मदद कर रहा है।


इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए 1 अप्रैल 2020 को संगठन के साथियों के द्वारा कुछ कच्ची खाद्य सामग्री का वितरण किया जाना है। वितरण करने के लिए हमारे साथियों द्वारा खाद्य सामग्री कि पैकिंग की जा रही हैं।






परेशानी में फंसे मेहनतकश साथियों का साथ निभाओ !

छात्र-मजदूर एकता जिंदाबाद !

जालिम शासक मुर्दाबाद !!


बरेली के साथी कई दिनों से लगातार मजदूर मेहनतकशों और अन्य जरूरतमन्दों के बीच सहायता पहुंचाने का काम कर रहे हैं। इस काम में परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इंकलाबी मजदूर केंद्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन और कई अन्य सामाजिक संगठन शामिल हैं।

शुरुआत में बरेली से पैदल गुजर रहे मजदूरों (जो कि कई कई किलोमीटर का सफर तय कर अपने घरों को जा रहे थे) के बीच खाने, पानी, फलों, बिस्किट का वितरण किया गया। साथ ही हाइवे में कुछ अन्य लोगों से भी प्रयास करके खाना बनवाकर वितरित करने के लिए कुछ लोगों को प्रेरित किया गया।


स्थानीय मेहनतकशों की मदद करते हुए अब राशन के पैकेट जरूरतमन्दों तक पहुंचाए जा रहे है। 31 मार्च को जोगी नवादा, बंशी नगला में खाने के पैकेटों का वितरण किया गया। साथ ही जोगी नवादा मुहल्ले के कुछ लोगों को साथ लेकर खाने के पैकेट बनाकर भी बांटे गए। यह पैकेट रुहेलखण्ड मेडिकल कालेज में मरीजों के साथ आये तीमारदारों व कुछ स्थानीय लोगों के बीच बांटे गए। राहत सामग्री बांटते हुए हमने देखा कि कई ऐसे बुजर्ग हैं जिनका कोई कमाने वाला नही हैं। वे बेहद अशक्त है और बहुत परेशानी में है। कई लोग ऐसे है जो रिक्शा खीचते है या बैटरी रिक्शा चलाते है वे रोज कमाते और खाते हैं पर कई दिनों के लॉक डाउन के कारण कोई कमाई नहीं, कोई खाना नहीं। जो थोड़ा बचाया था वो भी खत्म हो चुका हैं।

अभियान के दौरान बिहार से लाए गए ऐसे मजदूर भी हमें मिले जिनके ठेकेदार ने लॉक डाउन में उनका राशन आधा कर दिया था। पहले भी कम ही मिलता था पर अब आधे राशन में गुजारा बेहद मुश्किल हो गया है।


पछास, इमके, क्रालोस का यह अभियान जारी है इसके लिए बरेली स्तर पर चन्दा और राशन एकत्रित किया जा रहा है।






बरेली में मदद करते साथी 


क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, इंकलाबी मज़दूर केंद्र, मार्केट वर्कर्स एसोसिएशन,ऑटो टेम्पो चालक वेलफेयर एसोसिएशन और परिवर्तनकामी छात्र संगठन के साथियों ने दिल्ली, गुंडग़ांव, फरीदाबाद से सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर आ रहे मज़दूरों के लिए भोजन सामग्री की व्यवस्था पीलीभीत रोड पर विलयधाम चौराहे पर की।


हज़ारों की संख्या में मज़दूर, सरकार द्वारा बगैर योजना और व्यवस्था के किये गए लाॅक डाऊन के चलते बेरोजगार होकर और कोरोना वायरस के खौफ के चलते अपने घरों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए हैं। जिनके खाने पीने की व्यवस्था का सरकार के द्वारा कोई इंतजाम नही किया गया है। संवेदनशील नागरिक और संगठन के द्वारा इसका इंतज़ाम किया जा रहा है। उनको गंतव्य तक पहुंचाने का भी कोई ढंग का इंतज़ाम सरकार के द्वारा नही किया जा रहा है।




घर लौटते मज़दूरों के लिए मदद 


परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास), इंक़लाबी मजदूर केंद्र (इमके) व सामाजिक कार्यकर्ता इन साथियों ने 29 मार्च को 'कोरोना' महामारी के चलते देशव्यापी लॉक डाउन से पहाड़ों व आस-पास से घरों को सैकड़ों किलोमीटर मीटर पैदल चल कर आ रहे मजदूरों व पहाड़ों की ओर जा रहे लोगों के लिए लालकुआं, हल्दूचौड़ (उत्तराखंड) में बिस्कुट, गुड़ और चने की मदद की।


वहां मौजूद साथियों ने कहा कि सरकार ने बिना तैयारी के देश व्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर दी। पढ़ाई व कामगार आबादी जो घरों से बाहर रह रही है। सरकारों द्वारा उनके रहने, खाने, घर भेजने के इंतजाम नहीं किए गए। जिससे वह अपनी जगहों से घरों की ओर जाने को मजबूर हैं। जिसके चलते मजदूरों पर दोहरी मार पड़ी हैं। यह लोग सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही चल रहे हैं। पैदल चल रहे लोगों के लिए भी सरकारों द्वारा कोई ठीक से इंतजाम नहीं किए गए हैं। यहाँ से यह लोग बरेली, पीलीभीत, बदायूँ, गोरखपुर व लखनऊ आदि जगहों के लिए जा रहे हैं।

वही दूसरी ओर रुद्रपुर, लखनऊ, हरिद्वार, बरेली व दिल्ली से अल्मोड़ा, रानीखेत, नैनीताल पहाड़ों के दूर गांवों की ओर जाने वाले लोग भी पैदल ही जाने को मजबूर हैं।


ऐसे समय में यह इनके लिए यह थोड़ी सी छोटी मदद हैं।
सामाजिक संगठन, समाज से लोग स्वयं ऐसे लोगों की मदत को आगे आ रहे है इन पैदल चल रहे मजदूरों के लिए कुछ भोजन व अन्य सामान की मदद कर रहे हैं।

हमारी सरकारों से मांग है कि देश व्यापी लॉकडाउन तक वह देश के तमाम जगहों पर फंसे छात्रों-मजदूरों अन्य लोगों का इलाज के साथ रहने खाने का उचित इंतजाम करें। रास्तों में घर जा रहे लोगों के इलाज, खाने और घर तक पहुंचाने का इंतजाम किया जाए।



घर लौटते मजदूरों के लिए छोटी सी मदद पर सरकारों पर दवाब बनाना ही होगा नहीं तो परिणाम बेहद बुरे होगें।


फरीदाबाद (बल्लभगढ़) में दिनांक 28 मार्च, मथूरा रोड पर कोरोना महामारी तथा देश में लाॅक डाऊन से प्रभावित भूखे - प्यासे पैदल अपने घरों की और जाते मजदूरों को बिस्कुट, नमकीन व पानी से मदद करते हुए इंकलाबी मजदूर केंद्र, पछास व समाजिक कार्यकर्ता साथी।


हालांकि यहां से गुजरते लाखों मजदूरों की संख्या और उनकी भयानक स्तिथि को देखते हुए ये मदद भी नहीं कही जा सकती है। सरकार के तत्काल युद्ध स्तर पर उठाए गए प्रयासों के बगैर इन मजदूरों की उचित मदद नही की जा सकती। इसलिए हमें सरकारों पर निरंतर दबाव बनाना होगा जिससे वे इन मजदूरों के संदर्भ में उचित कदम उठाने के लिए मजबूर हो जाये।


तब तक आम जनता से अपील है कि वो जिस भी तरह से इनकी मदद कर सकती हैं जरूर करें।



लालकुआं में सभा कर शहर में जुलूस निकाला गया 


लालकुआं (उत्तराखंड) 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक महिला दिवस के अवसर पर लालकुआँ शहर के गांधी पार्क में सभा की गई। उसके पश्चात शहर में जुलूस निकालकर 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक महिला दिवस मनाया गया।

इस दौरान चली सभा में बोलते हुए साथियों ने कहा की 8 मार्च की विरासत संघर्षशील महिलाओं के संघर्षों की दास्तान है। यह दिवस मेहनतकश महिलाओं द्वारा पूरी ही दुनिया के अंदर मेहनतकश व महिलाओं की बराबरी चाहने वाले साथियों के साथ मनाया जा रहा है। हमारे देश के अंदर भी यह मनाया जा रहा है। आज महिलाओं के ऊपर यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न, कार्यस्थलों पर उत्पीड़न तमाम जगहों पर इसी तरह की  महिलाओं के साथ में हिंसा हो रही है।


अन्य वक्ताओं ने कहा महिला हिंसा के खिलाफ हमें एक होकर लड़ना पड़ेगा और उसमें छात्रों-नौजवानों, महिलाओं, मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों सभी मेहनतकश वर्गों, तबकों को एक होना पड़ेगा। समाज में जो भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा हो रही है जिस तरीके से हिंसा हो रही है उसके साथ-साथ अन्य सामाजिक समस्याओं किसानों, मजदूरों, छात्रों-नौजवानों, शोषित-उत्पीड़ित सभी मेहनतकश वर्गों-तबकों को एक करते हुए समाजवादी समाज मज़दूरराज की स्थापना के लिए एक होना पड़ेगा। समाजवाद में महिलाओं के साथ-साथ अन्य वर्गों-तबकों के साथ न्याय किया जा सकता है।


कार्यक्रम में परिवर्तनकामी छात्र संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, इंकलाबी मजदूर केंद्र व सर्व श्रमिक निर्माण कर्मकार संगठन (यूनियन) के सदस्य व कार्यकर्ता शामिल रहे।

सभा , जुलूस व पुतला दहन किया।


बरेली (उत्तर-प्रदेश) 8 मार्च अंतराष्ट्रीय मजदूर महिला दिवस मनाते हुए एक सभा की गई और जुलूस निकाला गया। जुलूस के अंत मे मढ़ीनाथ पुलिया के पास यौन हिंसा, अश्लील सँस्कृति औऱ महिलाओं को सुरक्षा न देने वाले पूँजीवादी समाज की होली जलाई गई। पुरुष प्रधानता के विचारों की होली जलाई गई।


सभा को सम्बोधित करते हुए दिशा ने कहा महिलाओं की असुरक्षा के लिए यह पूँजीवादी समाज जिम्मेदार है। आये दिन छोटी-छोटी बच्चियों से लेकर बूढ़ी महिलायें हिंसा का शिकार हो रही है।


शोभा ने बात रखते हुए मजदूर महिलाओं की दशा पर बात रखी और मजदूर राज समाजवाद में ही महिलाओं की समस्याओं को अंतिम तौर पर हल किया जा सकता है।

कार्यक्रम का आयोजन प्रगतिशील महिला एकता केंद्र ने किया। कार्यक्रम में परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इंकलाबी मजदूर केंद्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन आदि ने हिस्सेदारी की।


8 मार्च की पूर्व संध्या पर हल्द्वानी में महिला दिवस मनाया गया।


हल्द्वानी, लालकुआं (उत्तराखंड) हल्द्वानी के ताज चौराहे पर इकठ्ठे होकर एक सभा की गई। सभा के शुरू में दिल्ली साम्प्रदायिक दंगों में मारे गए लोगों को श्रद्धान्जलि देते हुए दो मिनट का मौन रखा गया।


सभा के अंत में कैंडल मार्च निकाला गया। सभा और कैंडल मार्च में परिवर्तनकामी छात्र संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र और क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के सदस्य और कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की।


आपसी भाईचारे और सौहार्द बढ़ाने के लिए लालकुआं में निकाला नागरिक शांति मार्च


लालकुआं (उत्तराखंड) परिवर्तनकामी छात्र संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र व इंक़लाबी मज़दूर केंद्र ने दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ सेंचुरी गेट से बाजार में होते हुए लालकुआं शहर में 'आपसी भाईचारे व सौहार्द बढ़ाने के लिए नागरिक शांति मार्च' निकाला। और रेलवे स्टेशन तिराहे पर मारे गए लोगों की याद में श्रद्धांजलि सभा की।


इस दौरान चली सभा में बोलते हुए बिंदु गुप्ता ने कहा कि दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा में इतनी बड़ी संख्या में आम नागरिकों का मारा जाना एक दुखद व निंदनीय घटना है। हम अपनी संवेदना मारे गए लोगों के प्रति व्यक्त करते हैं और आपसी भाईचारे व सौहार्द बनाने की अपील करते हैं। यह दंगे पूर्व नियोजित थे। बड़ी संख्या में बाहरी लोगों को लाकर इन दंगों को अंजाम दिया गया। इसमें हिंदू-मुस्लिम दोनों ही कट्टरपंथी लोग थे। मीडिया से ज्ञात कपिल मिश्रा जैसे भाजपा-संघ के लोग इन दंगों को नेतृत्व देकर अंजाम दे रहे थे। 


महेश ने कहा कि हिंदू-मुस्लिम दोनों ही धर्मों के मेहनतकश लोग इन दंगों में मारे गए हैं। बड़ी भारी संख्या में दुकानों, कारोबार, घरों, और सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट कर दिया गया हैं। दंगाइयों ने ड्यूटी पर तैनात पुलिस के सिपाही तक को नहीं छोड़ा। कवर करने गये मीडिया के लोगों के साथ भी मारपीट की गई है। इन दंगाइयों को खुली छूट मिली हुई थी। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस हाथ में हाथ धरे बैठे रही। इन दंगों में कुछ जगह हिंदुओं ने मुसलमानों व मुसलमानों ने हिंदुओं को बचाकर एक अच्छी मिसाल कायम की है। इसी तरह का भाईचारा समाज में कायम करने की जरूरत है। समाज को बांटने वाली ताकतों को परास्त करने के लिए जनपक्षधर व न्यायप्रिय लोगों को आगे आकर समाज में एकता कायम करने की जरूरत है। 

इस दौरान अग्रलिखित मांग की गई-
1- दिल्ली में हुई हिंसा की न्यायिक जांच हो।
2- दंगो को रोकने में नाकाम रहे गृह मंत्री अमित शाह इस्तीफा दो।
3- दिल्ली पुलिस की साम्प्रदायिक भूमिका की जांच हो।
4- दिल्ली हिंसा के आरोपी कपिल मिश्रा को तत्काल गिरफ्तार करो।



सभा कर ज्ञापन दिया।


बरेली (उत्तर-प्रदेश) परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, इंक़लाबी मज़दूर केंद्र, प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच,ऑटो चालक यूनियन, आदि ने मिलकर दिल्ली में हो रही साम्प्रदायिक हिंसा के विरोध में कलेक्ट्रेट पर एक सभा की जिसमें मांग थी तुरंत हिंसा को रोका जाये व हिंसा को जिम्मेदार लोगों को जेल भेजा जाए, भाजपा नेता कपिल मिश्रा को गिरफ्तार किया जाए। दंगे को व्यापक करने में दिल्ली पुलिस की भूमिका की आलोचना करते हुए इसके लिए सभी जिम्मेदार अधिकारीयों को गिरफ्तारी की मांग की गई। 


वक्ताओं ने कहा दिल्ली साम्प्रदायिक हिंसा भाजपा की गहरी साजिश का परिणाम है। जिसके द्वारा वह CAA के विरोध के आंदोलन को खत्म करना चाहती है। भाजपा सरकार व पुलिस की भूमिका इस दौरान बेहद निंदनीय रही है। जनता को इनका चरित्र समझने की जरूरत है। और इन्हें बेनकाब करने की जरूरत है।


उपरोक्त मांगो को लेकरजिलाधिकारी महोदय के माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया गया


दिल्ली में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाफ सभा

हल्द्वानी (उत्तराखंड) परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रालोस, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र व अन्य सामाजिक संगठनों के सांथ बुद्धपार्क हल्द्वानी में धरना प्रदर्शन किया गया। 

इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि भाजपा और संघ ने सोच समझ कर दिल्ली में सांप्रदायिकता फैलाने का काम किया है। CAA, NPR और NRC विरोधी आंदोलन की व्यापकता, उसके अनुशासन, उसके अहिंसात्मक स्वरूप और उसको बड़े पैमाने पर लोकतान्त्रिक शक्तियों से मिल रहे समर्थन के चलते संघ भाजपा और उसकी सरकारें विचलित हो गयी और वे अब उसे बदनाम कर, हिंसा का आरोप लगा कर उसकी आड़ में सांप्रदायिक विभाजन पैदा करना चाहती हैं। इसके लिये वे अपने ट्रेण्ड काडर और पुलिस-प्रशासन का संयुक्त स्तेमाल कर रही हैं।

वक्ताओ ने आगे कहा कि संघ-भाजपा जहां आंदोलन को सांप्रदायिक रूप देकर उसे बदनाम करना और अंततः नष्ट करना चाहते हैं, वहीं पुलिस प्रशासन सत्ताधारियों को खुश करने को अविवेकपूर्ण तरीके से बल प्रयोग कर रहे हैं। निहित स्वार्थों के तहत दोनों ही भूल रहे हैं कि इसके दीर्घकालिक परिणाम देश और समाज के लिये अहितकर होंगे। आगे कहा कि आम लोग राजनीति शक्तियों के उकसावे में न आयें और शान्ति और भाईचारा बनाए रखें।

जिसमें अग्रलिखित मांग रखी गयी-
दिल्ली में हो रही हिंसा का भाजपा प्रायोजित हिंसा की न्यायिक जांच हो
दिल्ली हिंसा के मुख्य आरोपी कपिल मिश्रा को तत्काल गिरफ्तार करो
दिल्ली उत्पात के जिम्मेदार गृहमंत्री अमित शाह इस्तीफा दो
दिल्ली पुलिस की सांप्रदायिक भूमिका की जांच की जाय। 



अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के विरोध में सभा कर पुतला दहन किया।


पूरी दुनिया में लूट व तबाही मचाये साम्राज्यवादी सरगना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा का हल्द्वानी (उत्तराखंड) में विरोध स्वरूप सभा कर पुतला फूँकते करते परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र के कार्यकर्ता।



आरक्षण में हमले के विरोध में ज्ञापन दिया।


लालकुआं (उत्तराखंड) 19 फरवरी को, सुप्रीम कोर्ट के द्वारा पदोन्नती में आरक्षण में हमले के विरोध में विभिन्न संगठनों द्वारा तहसीलदार के माध्यम से मुख्यमंत्री माननीय त्रिवेंद्र सिंह रावत जी को ज्ञापन प्रेषित किया गया।

इस ज्ञापन के माध्यम से यह बताया गया कि उत्तराखंड राज्य के अंदर अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़ा वर्ग समाज आजादी के बाद भी आज दयनीय स्थिति में अपना जीवन व्यतीत कर रहा है और गैर बराबरी से जूझ रहा है। जबकि विभिन्न सरकारी विभागों में आरक्षित वर्ग के हजारों पद खाली होने के बावजूद भी दलित समाज का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। तथा सरकारी उच्च पदों में दलित समाज का प्रतिनिधित्व नगण्य है। ज्ञापन में आगे कहा गया कि उत्तराखंड में जातिगत भेदभाव पूर्व की भांति विद्यमान है। इसका जीता जागता उदाहरण देश व प्रदेश में दलितों के साथ जातिगत भेदभाव की घटनाएं आए दिन हो रही है। आज उत्तराखंड मैं दलित समाज भूमिहीन है, अशिक्षित है, शिक्षित बेरोजगार हैं, आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा हुआ है तथा मेहनत मजदूरी से अपने परिवार का पालन पोषण करता हैं। इसलिए उत्तराखंड में एससी, एसटी व ओबीसी को आरक्षण की नितांत आवश्यकता है। 


ज्ञापन में प्रमुख मांगे
1- सीधी भर्ती प्रक्रिया में पूर्व की भांति रोस्टर प्रणाली लागू किया जाए। 
2- पदोन्नती मैं आरक्षण पूर्व की भांति लागू किया जाए।
3- दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर रोक लगाई जाए।
4- विभिन्न विभागों में आरक्षित वर्ग की बैकलॉग के रिक्त पदों पर सीधी भर्ती प्रक्रिया को तत्काल लागू किया जाए।
5- भारतीय संविधान के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ ना की जाए, आरक्षित वर्ग के हक अधिकार सुरक्षित रखें जाए।
ज्ञापन में कहा गया कि आरक्षण पर हमले नहीं रोके गये तो हम सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने को बाध्य होंगे।
ज्ञापन की प्रतिलिपि माननीय त्रिवेंद्र सिंह रावत जी मुख्यमंत्री उत्तराखंड सरकार, देहरादून माननीय राष्ट्रपति महोदय भारत सरकार, माननीय प्रधानमंत्री भारत सरकार, माननीय अध्यक्ष महोदय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग भारत सरकार, माननीय राज्यपाल महोदय उत्तराखंड सरकार, को प्रेषित किया गया ज्ञापन देने में सर्वोदय शिल्पकार समिति, डॉक्टर बी. आर. अंबेडकर मानव उत्थान सेवा समिति, प्रगतिशील युवा संगठन, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र सर्व श्रमिक कर्मकार संगठन, आदि संगठनों ने मिलकर ज्ञापन प्रेषित किया।


गुजरात अम्बुजा के आंदोलन में पहुंच कर समर्थन दिया।


हल्द्वानी, लालकुआं (उत्तराखंड) परिवर्तनकामी छात्र संगठन की दोनों इकाई के कार्यकर्ताओं द्वारा सितारगंज में स्थित गुजरात अम्बुजा के मजदूर जो पिछले 22 दिनों से अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे है 18 फरवरी को रुद्रपुर में DLC का घेराव किया गया साथ में सभा व ज्ञापन दिया गया। 


मजदूर अपनी ESI, PF व श्रम कानून लागू करने आदि मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।


पछास के साथी भी उनके आंदोलन में मौजूद रहे। इससे पूर्व दोनों इकाइयों के साथी सितारगंज धरना स्थल में भी शामिल रहे। इस दौरान साथियों द्वारा वहाँ पर क्रांतिकारी गीत गाए गये। बात रखी गयी और नारे लगाये गए। मजदूर आंदोलन के साथ एकजुटता कायम की गई।



पुतला फूंककर निंदा की गई।

हल्द्वानी, उत्तराखंड गुजरात अंबुजा ( सिडकुल सितारगंज जिला उधम सिंह नगर उत्तराखंड)के मजदूरों और उनकी पत्नियों पर 30 जनवरी को हुए लाठीचार्ज और शांति भंग का मुकदमा दर्ज करने के विरोध में परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन और प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के कार्यकर्ताओं ने बुद्ध पार्क में उत्तराखंड सरकार का पुतला फूंका और लाठीचार्ज, मुकदमा दर्ज करने की निंदा की।


बुद्ध पार्क हल्द्वानी में हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि आज सरकारें मजदूरों का तीखा दमन कर रही हैं वह मजदूरों की वेतन वृद्धि, ईएसआई लागू करने और अस्थाई मजदूरों को स्थाई करने की जायज मांगों को नहीं सुन रही हैं। मजदूरों के मामलों को श्रम कानूनों के जरिए हल करने के बजाय वह पुलिस और प्रशासन का डंडा उन पर बरसा रही हैं। पुलिस प्रशासन और पूरा सरकारी अमला मजदूरों की जायज मांगों को सुनने के बजाय उनको लाठियों से कुचल रहा है। वक्ताओं ने गुजरात अंबुजा प्रबंधन मुर्दाबाद, पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद, मजदूरों का दमन बंद करो, उत्तराखंड सरकार शर्म करो आदि नारे लगाए।


मजदूर आंदोलनों के दमन के विरोध में पुतला दहन किया।


लालकुआं, उत्तराखंड परिवर्तनकामी छात्र संगठन व प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र ने सयुंक्त रूप से गुजरात अम्बुजा के मजदूरों के ऊपर लाठीचार्ज करने के विरोध में उधम सिंह नगर पुलिस व प्रशासन का सभा कर रेलवे स्टेशन तिराहे पर पुतला दहन किया। 

सभा में बोलते हुए वक्ताओं ने कहा कि गुजरात अम्बुजा के मजदूर पिछले 3 दिनों से अपनी मांगों वेतन बढोत्तरी, ईएसआई, अस्थाई मजदूरों को स्थाई करने, श्रम कानून लागू करने आदि मांगो को लेकर अपनी कंपनी में धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन 30 जनवरी को अचानक से शाम के समय भारी संख्या में पुलिस व पीएसी ने आकर लाठीचार्ज किया। पुरूष मजदूरों सहित महिलाओं को भी थाने उठाकर ले गये। भारी जनदबाव के बाद मजदूरों सहित महिलाओं को रिहा किया गया।


वक्ताओं ने कहा कि यह मजदूर आंदोलन का दमन कम्पनी मालिक व उत्तराखंड सरकार के इशारे पर किया गया। आज देश के अंदर जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष करना भी गुनाह किया जा रहा है। गुजरात अम्बुजा के मजदूर अपने मिले हुए अपने जनवादी अधिकारों के तहत ही संघर्ष कर रहे थे। 


अन्य वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड सरकार व कंपनी मालिकों के गठजोड़ द्वारा यह निर्मम दमन किया गया हैं। इसके खिलाफ लड़कर ही मालिक सरकार के गठबंधन को परास्त कर सकते है। इस दौरान मांग की गई कि लाठीचार्ज करने का आदेश देने वाले पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों को बर्खास्त किया जाए, मजदूरों की मांगों जल्दी पूरा किया जाए।


जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एबीवीपी के गुण्डों द्वारा मारपीट करने के विरोध में किये कार्यक्रम

लालकुआं में तहसीलदार के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन प्रेषित किया गया

लालकुआं, उत्तराखंड परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) व प्रगतिशील महिला एकता केंद्र ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 5 जनवरी की शाम को जे.एन.यू. में छात्रों पर बर्बर मारपीट व तोड़फोड़ के विरोध में तहसीलदार लालकुआं के माध्यम से राष्ट्रपति महोदय के नाम ज्ञापन प्रेषित किया।


इस दौरान हुई सभा में बोलते हुए पछास के महेश ने कहां कि जेएनयू में 5 जनवरी की शाम को नकाबकोश गुण्डे जो कि लाठी, डंडे हथियारों से लैस थे। उन्होंने जेएनयू विश्वविद्यालय के हॉस्टल में घुसकर जबरन छात्रों पर हमला किया। दर्जनों छात्र-छात्राएं व कई प्रोफेसरों को गम्भीर चोटें आयी हैं। और कइयों के सर फूटे हैं। जिनको अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। घायल छात्रों, प्रत्यक्षदर्शी छात्रों व मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह हमलावर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के थे। यह हमला बिना विश्विद्यालय प्रशासन व दिल्ली पुलिस की शह के बिना मुमकिन नहीं था। क्योंकि यह छात्र नवम्बर माह से विश्विद्यालय में फीस बढ़ोतरी के खिलाफ संघर्षरत हैं। यह घटना दिखाती है कि आज विश्विद्यालयों के छात्रों को भी मोदी-शाह सरकार नहीं छोड़ रही हैं। इससे पूर्व जामिया मिल्लिया में दिल्ली पुलिस छात्रों पर गुण्डा गिरोह बनकर टूट पड़ी थी।

बिन्दू गुप्ता ने बात रखते हुए कहा कि जेएनयू पर यह पहला हमला नहीं है इससे पूर्व भी दिल्ली पुलिस उनके फीस बढ़ोतरी के आंदोलनों का निर्ममता से दमन कर चुकी है इस बार विद्यार्थी परिषद के गुंडों से यह कार्यवाही कराई गई। गृहमंत्री अमित शाह के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस घण्टो तक जेएनयू के गेट पर जेएनयू कुलपति के अनुमति के लिए खड़ी रही। और ना ही छात्रों के गम्भीर रूप से जख्मी होने तक कुलपति ने अनुमति दी। परन्तु इससे पहले कई बार दिल्ली पुलिस विश्विद्यालयों में बिना अनुमति के खुद ही जाकर छात्रों का दमन कर चुकी है और इस बार अनुमति के लिए इंतजार करती रही। यह दिल्ली पुलिस व विश्विद्यालय प्रशासन की संलिप्तता को उजागर करता है व उनकी निष्पक्षता को कटघरे में खड़ा करता हैं।

अन्य वक्ताओं ने कहा कि आज जरूरत न्याय के पक्ष में खड़े होने व अन्याय के खिलाफ लड़कर ही निरंकुश सरकारों के खिलाफ लड़ा जा सकता हैं। पछास व प्रमएके इसकी कड़े शब्दों में निंदा करते हैं और मांग करते हैं कि-

1- पूरी घटना की उच्च स्तरीय जांच करायी जाये।
2- हमलावरों को चिन्हित कर उन पर कानूनी कार्यवाही की जाये।
3- जेएनयू विश्विद्यालय में बढ़ाई गई फीसों को वापस लिया जाये।
4- जेएनयू विश्विद्यालय में छात्रों को सुरक्षा दी जाये।
5- जेएनयू के कुलपति का इस्तीफा लिया जाये।



बरेली में ज्ञापन दिया गया



बरेली, उत्तर-प्रदेश जिला अधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन दिया गया। ज्ञापन में अग्र लिखित मांग की गई- जेएनयू के छात्रों को सुरक्षा प्रदान की जाए। छात्रों की सुरक्षा में भारी लापरवाही बरतने वाले कुलपति को बर्खास्त किया जाये। पूरे घटनाक्रम की उच्चस्तरीय जाँच कराई जाए। जेएनयू में बढ़ाई गई फीसें वापस ली जाए।


हल्द्वानी में पुतला दहन व ज्ञापन दिया गया

हल्द्वानी, उत्तराखंड जेएनयू छात्रों पर कायराना हमले के विरोध में परिवर्तनकामी छात्र संगठन की हल्द्वानी इकाई के बैनर तले क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन और माले द्वारा सयुंक्त रूप से जेएनयू कुलपति का पुतला दहन कर सभा व ज्ञापन का कार्यक्रम किया गया।


सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओ ने कहा कि 5 जनवरी की रात जेएनयू में एबीवीपी के गुंडे डंडे, लाठियों और चाकू को हाथ में लेकर कैंपस में घुस गए और हाॅस्टल में छात्रों पर जानलेवा हमला किया और तोड़फोड़ की। छात्र संघ अध्यक्ष सहित कई छात्रों को बुरी तरह से घायल कर दिया। 

जब छात्रों को पीटा जा रहा था तो वह लगातार मदद की मांग कर रहे थे। ना तो विश्वविद्यालय प्रशासन और ना ही पुलिस उनकी मदद करने को आए। यह वही जेएनयू प्रशासन और वीसी हैं जो छात्रों को आंदोलन करने से रोकने के लिए बार-बार पुलिस को कैंपस के अंदर बुलाते रहे हैं। छात्र अपनी आवाज को ना उठा सके इसके लिए कैंपस को पुलिस छावनी बनाने से भी उन्हें कभी गुरेज नहीं रहा है। लेकिन जब विद्यार्थि परिषद के गुंडे अपना आतंक हॉस्टलों के अंदर कायम कर रहे थे तब पुलिस प्रशासन और वीसी मौन रहकर इन पर कोई कार्यवाही ना कर एक तरीके से हमले को बढ़ावा दे रहे थे। और जेएनयू में जब छात्र और टीचर पुलिस से मदद मांग रहे थे तो पुलिस वीसी से इजाजत लेने की बात का बहाना बनाकर कैंपस के अंदर नहीं आयी। पुलिस का कहना था कि वीसी से पूछेंगे उसके बाद ही कैंपस में प्रवेश करेंगे। यह कितने शर्म की बात है। दिल्ली पुलिस घंटों तक वीसी से अनुमति नहीं ले सकी साफ जाहिर है कि वीसी व दिल्ली पुलिस जो कि केंद्र की भाजपा सरकार के मातहत आती है उनकी पूरी शह इन एबीवीपी के गुंडों को थी। जेएनयू छात्रों पर यह गुंडागर्दी, मारपीट फीस वृद्धि के खिलाफ हो रहे आंदोलन को तोड़ने के लिए किया गया क्योंकि नया हाॅस्टल मैनुअल को लागू करते हुए एडमिशन की प्रक्रिया यूनिवर्सिटी के अंदर चल रही थी जिसका कि जेएनयू छात्र संघ और छात्र विरोध कर रहे थे जबकि जेएनयू प्रशासन जबरन प्रवेश की प्रक्रिया चलाना चाहता था ताकि बढ़ी हुई फीस वृद्धि लागू हो सके। जाहिर सी बात है यह हमला सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के फायदे में था। इस हमले से वह आंदोलनकारी छात्रों को डराकर, मारपीट कर चुप करवाना चाहता है।

भाजपा संघ जो कि अपने फांसीवादी एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है। जिसके लिए देश मे हो रहे आंदोलनों को किसी भी कीमत पर तोड़ने की कोशिश में लगे हैं। फांसीवादी हमेशा से अपने खिलाफ कुछ भी नही सुन्ना पसंद करते हैं और पढ़ने लिखने वालों से कुछ ज्यादा नफरत करते हैं। जेएनयू छात्रों व देश के अन्य यूनवर्सिटी पर हो रहे हमले इसी बात का घोतक हैं। पहले पुलिस द्वारा फीसवृद्धि के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों पर हमला किया गया था और बाद में सी.ए.ए का विरोध कर रहे जामियाँ मिलिया के छात्रों पर।

आज जरूरत है इन फ़ांसीवादियो को मुंहतोड़ जवाब दें.


रामनगर में ज्ञापन दिया गया


रामनगर, उत्तराखंड एस.डीएम. के माध्यम से मानव संसाधन विकास मंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा गया। ज्ञापन में मांग की गई कि- जेएनयू में फीस वृद्धि के फैसले को तुरंत वापस लिया जाए। विश्विद्यालय के कुलपति जगदीश कुमार को बर्खास्त करो। छात्रों-शिक्षकों पर हमला करने वालों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाये। जेएनयू में छात्र 28 अक्टूबर से ही फीस वृद्धि के खिलाफ आंदोलित हैं। विश्विद्यालय प्रशासन फीस वृद्धि वापस न लेने पर अड़ा हुआ हैं। इसी तरह मानव संसाधन विकास मंत्रालय इसमें हस्तक्षेप नहीं कर रहा हैं। इस दौरान फीस वृद्धि का विरोध करने वाला छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद संघर्षरत छात्रों का ही विरोध करने लगा। एबीवीपी लगातार छात्रों में ही आपसी संघर्ष पैदा करने पर तुला हुआ है। इसलिए विश्विद्यालय में छात्रों पर हमले का मुख्य आरोपी एबीवीपी व उसके सहयोगी लोग ही हैं।


काकोरी कांड के शहीदों की शहादत दिवस पर किये कार्यक्रम

काकोरी कांड के शहीदों की याद में प्रातः 6 बजे काररोड़, बिन्दुखत्ता (उत्तराखंड) में निकाली प्रभात फेरी।


लालकुआं, (उत्तराखण्ड) परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास), प्रगतिशील महिला एकता केंद्र (प्रमएके) व इंकलाबी मजदूर केंद्र (इमके) ने संयुक्त्त रूप से काकोरी के शहीदों की याद में काररोड़ (बिन्दुखत्ता) में प्रातः 6 बजे प्रभात फेरी निकाली। उसके पश्चात काकोरी कांड के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए एक सभा की गई।


इस दौरान चली सभा में बात रखते हुए पुष्पा ने कहा कि आज के दिन 19 दिसम्बर को अश्फाक उल्लाह खान, राम प्रसाद बिस्मिल, व रोशन सिंह को फासी दी गई थी। 17 दिसम्बर को राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी को फासी दी गई थी। यह चारों क्रांतिकारी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के खिलाफ भारत की आजादी के लिए लड़ रहे थे। इसी संघर्ष के दौरान इनको फासी दी गई थी। जिस आजाद भारत के। लिए यह क्रांतिकारी लड़े, वह आज भी अधूरा है। उनके सपनों का भारत बनाने के लिए हमको आगे आना होगा।


सभा में बात रखते हुए साथी महेश ने कहा कि यह देश अश्फाक-बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों की साझी शहादत का देश है और आज देश के अन्दर मोदी सरकार NRC/NAA जैसे विभाजनकारी कानून पास करके काकोरी जैसे शहीदों का अपमान कर रही है। यह शहीद धर्म और मजहब को छोड़कर अपने प्यारे वतन के लिए एक साथ फासी पर चढ़ गए थे। मोदी सरकार अर्थव्यवस्था, रोजगार, महिला हिंसा जैसे आम जनता से जुड़ी हुए समस्याओं पर नाकाम साबित हो चुकी हैं। इन पर पर्दा डालने के लिए इस तरीके के विभाजनकारी कानून पास कर रही है। जो धर्म के आधार पर जनता को बांटता हैं। न्याय पसन्द व मेहनतकश जनसमुदाय इस तरह के बंटवारे को कभी स्वीकार नहीं करेगा।


साथी पंकज ने बात रखते हुए कहा मेहनतकश व न्याय पसन्द जनता को एकजूट होकर संघी फासीवादियों के इस तरीके के मंसूबों को नाकाम करना होगा। तभी जाकर काकोरी कांड के शहीदों के भारत का निर्माण हो सकता हैं। काकोरी के शहीदों के सपनों का भारत समाजवादी भारत बनाने के लिए आगे आना होगा।


जामियां मिलिया व अन्य शिक्षण संस्थानों में छात्रों के दमन व CAA/NRC के विरोध में किये कार्यक्रम

DU भी बोल रहा है, CAA/NRC नहीं चलेगा......



              डीयू में छात्रों ने जामिया के समर्थन में अपनी परिक्षाओं का बहिष्कार कर के छात्र एकता की एक मिसाल कायम की। छात्रों के समूह पर ABVP द्वारा मारपीट की गयी। ऐसे में CAA/NRC के खिलाफ, जामिया-एएमयू में पुलिस दमन के खिलाफ, डीयू में ABVP की गुण्डागर्दी के खिलाफ छात्रों ने जोरदार प्रदर्शन किया।

         ABVP द्वारा भी कैम्पस में प्रोटेस्ट की काॅल दी गयी थी। सरकार, पुलिस, सत्ता का साथ होने के बावजूद विश्व के 'सबसे बड़ा' छात्र संगठन होने का दावा करने वाली ABVP CAA/NRC के समर्थन में मुश्किल से 30 लोग भी नहीं जुटा पाया। जो लोग आए भी थे वो भी बाहर से बुलाए गए थे। वो डीयू के छात्र नहीं थे। दूसरी तरफ CAA/NRC के विरोध में होने वाली सभा में लगभग 500 छात्रों ने भागीदारी कर के दिखा दिया कि वह इस कानून के खिलाफ खड़े हैं।


         ABVP ने अपनी नीच हरकत दिखाते हुए आज भी छात्रों पर हमला किया। 2 बार पत्थर फेंके गए। 3 साथियों को पीटा गया और दिल्ली पुलिस ने भी ABVP का साथ देते हुए पिटे हुए छात्रों को ही डिटेन भी कर लिया। इस दमन के बावजूद 4 घण्टे लगातार छात्र नारेबाजी करते रहे और शान्तिपूर्ण तरीके से सभा भी चलायी। सभा के अंत में पूरे जोश-खरोश के साथ मैट्रो तक मार्च निकाला गया। पुलिस द्वारा छात्रों को लगातार रोकने की कोशिश की गयी परंतु छात्रों के आगे झुकते हुए उन्हें छात्रों के मार्च को रास्ता देना पड़ा साथ ही गिरफ्तार छात्रों को भी रिहा करना पड़ा।


          आज के प्रदर्शन ने दिखा दिया है कि केवल जामिया, एएमयू नहीं बल्कि हर प्रगतिशील छात्र देश बांटने वाले इस कानून के खिलाफ खड़ा है। यह लड़ाई जारी रहेगी


देहरादून में प्रदर्शन करते




देहरादून (उत्तराखण्ड) गांधी पार्क में जामिया व ए. एम. यू. के छात्रों के पुलिसिया दमन तथा विभाजनकारी नागरिकता संशोधन कानून व एन आर सी का विरोध करते पछास तथा अन्य जनसंगठनों के कार्यकर्त्ता!




जामियां मिलिया में पुलिसीया दमन के विरोध में दिल्ली पुलिस का पुतला दहन किया।


लालकुआं, (उत्तराखण्ड) जामिया विश्विद्यालय दिल्ली के छात्रों पर दिल्ली पुलिस द्वारा किये गए हमले व बर्बर लाठीचार्ज के विरोध में परिवर्तनकामी छात्र संगठन व प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र द्वारा आज रेलवे स्टेशन तिराहे पर दिल्ली पुलिस का पुतला दहन कर आक्रोश व्यक्त किया गया। 


              पुतला दहन से पूर्व हुई सभा में वक्ताओं ने कहा जामिया के छात्रों पर 15 दिसम्बर को पुलिस द्वारा बर्बर हमला किया गया। हॉस्टल, लाइब्रेरी व बाथरूम में घुसकर छात्र-छात्राओं को लाठियों से पीटा गया। यहां तक की आंसू गैस के दर्जनों गोले दागकर जामिया कैंपस को निहत्थे छात्रों के खिलाफ युद्ध क्षेत्र में बदल दिया गया। छात्राओं के साथ भी कोई रियायत नहीं कि गई। उनको भी बुरे तरीके से पीटा गया। कई छात्रों को आई.सी.यू में भर्ती करना पड़ा हैं। विश्वविद्यालय के सुरक्षा क्रमियों के साथ भी लाठी डंडों के साथ मारपीट की गई। पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया। रिपोर्ट करने पहुँचे बी.बी.सी. के पत्रकारों के साथ भी पुलिस ने मारपीट की। उनका कैमरा तोड़ दिया। पूरी बेशर्मी के साथ जनता द्वारा चुनी गई सरकार के गृह मंत्री के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस द्वारा यह वहशियाना हरकत की गई। सँगठनों ने इसकी कड़ी भर्त्सना की। 


            सँगठनों द्वारा नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करते हुए कहा गया कि यह कानून संविधान के खिलाफ है और देश के नागरिकों को धर्म के आधार पर बांटता है। इसलिए इसे देश की अमनपसंद जनता स्वीकार नहीं करेगी। इस कानून के बहाने व बाद में एन.आर.सी.के जरिये देश की गरीब जनता खासकर मुस्लिमों व अन्य समुदायों के गरीब मेहनतकशों के ख़िलाफ़ सरकार बड़ा हमला बोलने जा रही है जिसे बर्दाश्त नही किया जाएगा। लोकसभा में मिले बहुमत के बाद सरकार पूरी तरह निरंकुश हो चुकी है और लगातार जन विरोधी कानून बना रही है। बेरोजगारी, महंगाई व महिला हिंसा को हल करने में सरकार फेल हो चुकी है तो अब वो धार्मिक विभाजन कर अपने समर्थकों को खुश करना चाहती है और धर्म की आड़ में पर अपनी नाकामियों को छिपा रही है। जामिया ही नहीं पुलिस ने अलीगढ़ सहित अन्य शिक्षण संस्थाओं में भी छात्रों के साथ मारपीट व लाठीचार्ज किया है। पछास व प्रमएके छात्रों के पुलिसीयां दमन का विरोध करते हैं। दमन करने का आदेश देने वाले पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त किया जाए।




           रामनगर (उत्तराखण्ड) में पछास सहित जनवादी संगठनों ने दिल्ली पुलिस का पुतला दहन किया।



नागरिकता संशोधन कानून वापस लो।



            काशीपुर (उत्तराखण्ड) जामिया विश्विद्यालय दिल्ली के छात्रों पर दिल्ली पुलिस द्वारा किये गए हमले व बर्बर लाठीचार्ज के विरोध में परिवर्तनकामी छात्र संगठन, भीम आर्मी, इंकलाबी मजदूर केंद्र संगठन द्वारा आज महाराणा प्रताप चौक पर देश के गृह मंत्री अमित शाह का पुतला दहन कर आक्रोश व्यक्त किया गया। पुतला दहन से पूर्व हुई सभा मे वक्ताओं ने कहा कि मोदी सरकार एक फासीवादी सरकार है। गृह मंत्री के इशारे पर जामिया के छात्रों पर 15 दिसम्बर को पुलिस द्वारा बर्बर हमला किया गया। हॉस्टल व लाइब्रेरी में घुसकर छात्र-छात्राओं को लाठियों से पीटा गया। यहां तक की आंसू गैस के दर्जनों गोले दागकर जामिया कैंपस को निहत्थे छात्रों के खिलाफ युद्ध क्षेत्र में बदल दिया गया। पूरी बेशर्मी के साथ जनता द्वारा चुनी गई सरकार के गृह मंत्री के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस द्वारा यह वहशियाना हरकत की गई।सभी सँगठनों ने इसकी कड़ी भर्त्सना की। इस घृणित कार्यवाही के लिए जिम्मेदार गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की गई।



            सँगठनों द्वारा नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करते हुए कहा गया कि यह कानून संविधान के खिलाफ है और देश के नागरिकों को धर्म के आधार पर बांटता है। इसलिए इसे देश की अमनपसंद जनता स्वीकार नहीं करेगी। इस कानून के बहाने व बाद में एन आर सी के जरिये देश की गरीब जनता खासकर मुस्लिमों व अन्य समुदायों के गरीब मेहनतकशों के ख़िलाफ़ सरकार बड़ा हमला बोलने जा रही है जिसे बर्दाश्त नही किया जाएगा। लोकसभा में मिले बहुमत के बाद सरकार पूरी तरह निरंकुश हो चुकी है और लगातार जन विरोधी कानून बना रही है। बेरोजगारी, महंगाई को हल करने में सरकार फेल हो चुकी है तो अब वो धार्मिक विभाजन कर अपने समर्थकों को खुश करना चाहती है और धर्म की आड़ में पर अपनी नाकामियों को छिपा रही है।






जघन्य हैदराबाद यौन हिंसा व महिला हिंसा के विरोध में किये कार्यक्रम


औरतें उठी नहीं तो जुर्म बढ़ता जाएगा ....


             गांधी पार्क (देहरादून) के सामने हैदराबाद में हुई घटना विरोध में प्रदर्शन किया गया। पछास, क्रालोस सहित कई सारे संगठन और सामाजिक लोग इसमें शामिल हुए।



           पछास की प्रिया ने कहा कि पुरुषवादी सत्ता और गैरबराबरी, पतनशील फिल्में और संस्कृति, ऐसे अपराधों की जड़ में है। सख्त सजा की मांग पर उन्होंने कहा कि कठोर कानूनों की पकड़ में अक्सर गरीब और मजलूम ही आते हैं चिन्मयानन्द और सेंगर जैसे तो बच निकलते हैं। साथ ही केवल बलात्कारी को फांसी पर चढ़ाकर हम समाज को सुरक्षित नही बना सकते बल्कि बलात्कारी सोच पैदा करने वाली इस व्यवस्था के खिलाफ लड़ने की जरूरत है।


        कुल मिलाकर यह प्रदर्शन इस बात की अभिव्यक्ति था कि ऐसे अपराधों के खिलाफ जनाक्रोश सडकों पर है, सरकार को चेतावनी है।




          हल्द्वानी (उत्तराखंड) परिवर्तकमी छात्र संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र और क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा पूंजीवादी अश्लील संस्कृति का पुतला दहन किया गया।

       
  वक्ताओं ने कहा भारत में लगातार महिलायें हिंसा का शिकार हो रही हैं। बलात्कार, दहेज उत्पीड़न, हत्या, अपहरण, छेड़छाड़, ऐसिड अटैक, आदि के रूप में ये हिंसा सामने आ रही हैं। निर्भया हत्या कांड, कठुआ में 8 साल की बच्ची से लेकर हाल ही में हैदराबाद में पशुचिकिसक से रेप और हत्या की घटनाएं प्रकाश में आई ऐसे ही बहुत घटाएँ हैं जो प्रकाश में नही आती हैं। भारत मे हर 20 मिनट में एक रेप होता है। और भारत महिला हिंसा के मामले में विश्व में नम्बर 1 पर है। जो दिखता है कि भारत में महिलाएं कितनी असुरक्षित हैं।

          पोर्नोग्राफी, उपभोग्तावादी संस्कृति, फिल्मों और विज्ञापन के जरिये देश में अश्लील संस्कृति लगातर समाज मे परोसी जा रही है। जो एक तरफ देश के पूंजीपतियों को विज्ञापनों, फिल्मों के जरिये फायदा पहुँचाने का काम करती है और पूंजीपतियों को बाजार मुहैया कराती है। जिसके चलते छोटे-छोटे बच्चों तक को पोर्न फिल्मों से लेकर तमाम प्रकार की अश्लील चीजें आसानी से मुहैय्या हो जाती हैं। बचपन से ही अश्लीलता से बच्चे प्रभावित रहेंगें तो समाज कैसा बनेगा ये समझने वाली बात है। दूसरी ओर भारत में व्याप्त सामन्तवादी मूल्य मान्यताएं जो महिलाओं को दोयम दर्जे का मानती है यह पुरुष प्रधान मानसिकता व्याप्त है। जिस कारण से आज महिलायें देश में सुरक्षित नही हैं।

               आज जरूरत है इस पूंजीवादी सड़ी गली पतित संस्कृति जो इंसान को जानवर बनाने का काम करती है, महिलाओं, मजदूरों, गरीबों, छात्रों को तबाह करने का काम करती। ऐसे पूंजीवादी निजाम को नेस्तनाबूद करने की और ऐसा समाज बनाने की जिसका सपना भारत के क्रांतिकारी शहीदे आजम भगत सिंह ने देखा था ऐसा समाज जिसमे इंसान द्वारा इंसान का शोषण न होता हो जिसमें सभी को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की गारंटी सरकार की हो। महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा हो जहां महिलाएं सुरक्षित हों ऐसे समाजवादी समाज बनाने की तभी महिलाएं सुरक्षित रहेंगी।



             लालकुआं (उत्तराखंड) परिवर्तनकामी छात्र संगठन व प्रगतिशील महिला एकता केंद्र ने संयुक्त्त रूप से हैदराबाद में महिला डॉक्टर की सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या के विरोध में सेंचुरी गेट से लालकुआं बाजार में जुलूस निकालकर रेलवे स्टेशन तिराहे पर पतित पूंजीवादी उपभोक्तावादी अश्लील संस्कृति का पुतला फूंका। 


            इस दौरान चली सभा का संचालन करते हुए प्रमएके की साथी ने कहाँ कि 27 नवम्बर की रात में हैदराबाद में पशु चिकित्सक के साथ में सामूहिक बलात्कार के बाद उसको जला दिया गया। उसकी लाश पास के एक पुल के नीचे मिली। अभी इसी तरह की घटना रांची में 12 लोगों ने एक महिला के साथ बलात्कार के बाद हत्या कर दी। तमिलनाडु में बच्ची के साथ बलात्कार के बाद हत्या कर दी। यह घटनाएं दिखा देती है कि आज भी महिलाओं के साथ कितनी विभत्स तरीके से हिंसा बढ़ रही है। आए दिन इस तरह की घटनाएं प्रकाश में आती रहती है।


         पछास की साथी ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा का एक बड़ा कारण पतित पूंजीवादी उपभोक्तावादी संस्कृति है। जो महिलाओं को केवल उपभोग की वस्तु के रूप में पेश करती है। आज समाज में अश्लील फिल्में, गाने, पोस्टर सरेआम रहते है। जो महिलाओं के खिलाफ हिंसा का एक बड़ा कारण है। दूसरा पितृसत्तात्मक मूल्य समाज में आज भी कई जगह मौजूद है। जो महिलाओं को एक इंसान या खुद का व्यक्तित्व के बतौर नही देखता है। वह महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद करना चाहता है। इसके खिलाफ आवाज उठाने पर उनके साथ भी अमानवीय व्यवहार होता है।

               अन्य वक्ताओं ने भी महिला उत्पीड़न की घटनाओं पर रोक लगाने मांग की। मांग कि की महिलाओं की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। महिला उत्पीड़न के आरोपियों को कठोर सजा दी जाए। महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाए।


पतित पूँजीवादी उपभोक्तावादी अश्लील संस्कृति मुर्दाबाद!
महिला हिंसा पर रोक लगाओ!
पूंजीवाद का नाश हो!
महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करो!
महिलाओं को मुक्ति कहा मिलेगी- समाजवाद में मज़दूर राज में!



23 नवम्बर नागरिक मार्च के समर्थन में






हम शिक्षा बचाने निकले हैं,आओ हमारे साथ चलो !




       दिल्ली की सड़कों पर हजारों की संख्या में आम जनता ने इस नारे के साथ मार्च किया। JNU सहित अन्य संस्थानों में फीस वृद्धि वापस लेने व सबको निशुल्क व समान शिक्षा की मांग को लेकर आज दिल्ली में मण्डी हाउस से जंतर मंतर तक ‘नागरिक मार्च’ निकाला गया। मार्च में मजदूर, महिला, दलित, शिक्षक व छात्र संगठनों ने भागीदारी की। आज के प्रदर्शन के जरिए सत्ता के गलियारों तक एक मांग पहुंचायी गयी। वो मांग थी कि सबको निशुल्क और समान शिक्षा मिलनी चाहिए। ये हर नागरिक का अधिकार है।



        सरकार का काम है कि वो जनता से प्राप्त टैक्स, जनता के शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी चीजों पर करें। परंतु मोदी सरकार लगातार इन चीजों का निजीकरण कर अंबानी-अणानी की तिजोरी भरने का काम कर रही है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हम निशुल्क व समान शिक्षा के लिए सरकार और शिक्षा को माल बनाने वाली इस पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़े हों।



JNU में फीस वृद्धि के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चलाते आराजक तत्वों ने डाला व्यवधान 


      23 नवम्बर 2019 को परिवर्तनकामी छात्र संगठन ने पी.एन.जी. कॉलेज, रामनगर में फीस वृद्धि के विरोध में छात्रों के बीच हस्ताक्षर अभियान चलाया। हस्ताक्षर अभियान के बाद प्राचार्य के माध्यम से राष्ट्रपति महोदय को ज्ञापन प्रेषित किया गया।


       ज्ञात हो कि विगत अक्टूबर माह में जे.एन.यू., आई.आई.टी. में फीसों में वृद्धि की गयी। जिसका छात्र विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा उत्तराखण्ड के आयुर्वेदिक मेडिकल शिक्षा के छात्र भी फीस वृद्धि पर रोक के उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के आदेश को लागू करवाने के लिए देहरादून के परेड ग्राउण्ड में लगातार संघर्षरत हैं। इसके अलावा फीस वृद्धि के एक अन्य कारण स्ववित्तपोषित (ऑटोनोमस) के विरोध में दिल्ली वि.वि. के छात्र पिछले समय प्रदर्शन करते रहे। फीस वृद्धि के उपरोक्त कदम पूरे देश में ही लगातार उठाये जा रहे हैं।

      ऐसे में जे.एन.यू. के छात्र फीस वृद्धि के खिलाफ लगातार संघर्षरत हैं। वि.वि. प्रशासन लगातार फीस वृद्धि को जायज ठहरा रहा है। सरकार बीच-बीच के रास्ते की बात कर रही है, जिससे साफ है कि भारी पैमाने पर की गई फीस वृद्धि की जगह फीस में कुछ कम वृद्धि की जाये। अभी फीस में कुल वृद्धि 27,600-32000 से बढ़ाकर 55,000-61,000 वार्षिक तक कर दी गई हैं। छात्र फीस वृद्धि को पूरी तरह से वापस लेने के पक्षधर हैं।


      सरकार न सिर्फ शिक्षा बल्कि स्वास्थ्य व जनकल्याण की अन्य मदों में लगातार कटौती कर रही है। वह कॉरपोरेट टैक्स में कमी कर रही है। सरकार अपने सांसदों-विधायकों के वेतन-भत्तों में बढ़ोत्तरी कर रही है। पर मेहनतकश जनता, गरीबों पर होने वाले नाममात्र के खर्चों में भी कटौती कर रही है। इसी क्रम में शिक्षा में होने वाले खर्च को लगातार कम किया जा रहा है। पछास इसका पुरजोर विरोध करता है और जे.एन.यू. सहित अन्य संस्थानों में फीस वृद्धि के कदमों का विरोध करता है। संघर्षरत छात्रों के साथ अपना पूर्ण सहयोग-समर्थन प्रदर्शित करता है।

       इसी क्रम में रामनगर पी.एन.जी. कॉलेज में हस्ताक्षर अभियान चलाते समय 22 नव. को कुछ अराजक छात्रों ने व्यवधान पैदा किया। महाविद्यालय प्रशासन द्वारा पोस्टर जमा कर लिये गये। महाविद्यालय प्रशासन से फीस वृद्धि के बारे में बात करने व विरोध करने के अपने अधिकार की बात करने पर पोस्टर वापस मिल गये व अभियान चलाने की अनुमति भी मिल गयी। महाविद्यालय के गेट पर चलाये गये हस्ताक्षर अभियान में 196 छात्रों ने हस्ताक्षर किए। छात्रों ने हस्ताक्षर करते हुए अपने विचार भी रखे और मांगों के साथ अपना समर्थन भी दर्ज कराया। कुछ छात्रों ने विरोध जताते हुए हस्ताक्षर नहीं भी किये व मामले को और अधिक जानने-समझने पर विचार-विमर्श किया।

     हस्ताक्षर अभियान को इंकलाबी मजदूर केन्द्र ने भी समर्थन दिया।


कश्मीरी दमन के 100 से अधिक दिन पुरे होने पर कार्यक्रम 


        DU के प्रगतिशील छात्र संगठनों ने मिलकर कश्मीर को कैदखाने में तब्दील किए जाने के 100 से अधिक दिन पूरे होने और प्रोफेसर SAR गिलानी को याद करते हुए एक सभा का आयोजन किया।

        सभा में वक्ताओं ने कश्मीर में अब तक जारी कफर्यू की निंदा करते हुए कहा कि कश्मीर को कैद कर के कश्मीरी जनता के दिल में हम अपने लिए और अधिक नफरत बढ़ा रहे हैं। अब तक उनको भारत सरकार द्वारा खुली जेल में रखना, दिखाता है कि वहां सब ‘चंगा’ नही है। मोदी सरकार देश के मजदूरों, किसानों, छात्रों-नौजवानों की तरह कश्मीर की जनता की आवाज को भी दबाने की कोशिश कर रही है। हर इंसाफ पसंद नागरिक का ये फर्ज बनता है कि वो कश्मीर की जनता के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करे।

       प्रोफेसर SAR गिलानी दिल्ली विश्विद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में अध्यापन करते थे। संसद भवन पर हमले के साजिशकर्ता के तौर पर उनको फसाया गया, वो कश्मीरी भी थे और मुस्लिम भी इसलिए वे सरकार के आसान निशाने पर आ गए। बाद में वो निर्दोष पाए गए न्यायालय ने उनको बरी कर दिया। लेकिन उनके खिलाफ उसके बाद भी आतंकवादी होने का माहौल बनाया जाता रहा। उन्होंने तमाम साजिशों के बावजूद राजनीतिक कैदियों की लड़ाई लड़ते रहे। अभी हाल ही में उनका देहांत हुआ।


       सभा में डीयू के प्रोफेसर नंदिता, मधु प्रसाद, एन. सचिन, सरोज गिरी, लक्ष्मण यादव, राकेश रंजन, विजयन और बेलसोनिका यूनियन के साथी अजीत ने अपनी बात रखी। पछास के साथियों ने कार्यक्रम में क्रांतिकारी गीत "जोगीरा सा रा रा" रखा।
इंकलाब जिंदाबाद!
फासीवाद हो बर्बाद!!


18 नवम्बर JNU छात्रों के दमन के विरोध में किये कार्यक्रम



JNU व आयुर्वेद मेडिकल कालेज में फीस वृद्धि के खिलाफ देहरादून गांधी पार्क पर प्रदर्शन


       आज पीपुल्स फोरम उत्तराखण्ड के आहवान पर देहरादून के प्रगतिशील छात्र संगठनों ने JNU और आयुर्वेद मडिकल कालेज में फीस वृद्धि और छात्रों के दमन के विरोध में गांधी पार्क पर सभा का आयोजन किया। सभा में बात रखते हुए वक्ताओं ने कहा कि सरकार को तत्काल ही सभी संस्थानों में बड़ी हुई फीस वापस लेनी चाहिए। सभा में छात्रों पर दमन करने वाले पुलिस कर्मियों पर कार्यवाही करने की भी मांग की गयी। पछास के साथियों ने भी सभा में भागीदारी की।



DU से उठी आवाज शिक्षा बेचना बंद करो !


        आज DU के प्रगतिशील छात्र संगठनों के आहवान पर सैकड़ों छात्रों ने JNU और अन्य संस्थानों में फीस वृद्धि और छात्रों के दमन के खिलाफ कैम्पस में मार्च निकालते हुए MHRD और JNU VC का पुतला दहन किया।

       सभा में बात रखते हुए वक्ताओं ने कहा कि केवल JNU ही नहीं बल्कि देश के अधिकांश संस्थानों में फीस वृद्धि की जा रही है। JNU में हास्टल फीस 25 हजार सलाना से 60 हजार सलाना कर दी गयी है, IIT M.Tech. के छात्रों की फीस 20 हजार से 2 लाख और उत्तराखण्ड आयुर्वेद मेडिकल कालेज के छात्रों की फीस 80 हजार से 2 लाख 15 हजार कर दी गयी है।


         इसी तरह की वृद्धि लगभग सभी संस्थानों में की जा रही है। इस बढ़ी हुई फीस के खिलाफ जब छात्र आवाज उठा रहे हैं तो उन पर सरकार द्वारा दमन किया जा रहा है। सरकार द्वारा पैसा ना होने का तर्क दिया जा रहा है जबकि मोदी सरकार पिछले सालों में पूंजीपतियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर 5 लाख करोड़ रूपये दान कर चुकी है। ये दिखाता है कि मोदी सरकार की प्राथमिकता पूंजीतियों की तिजोरी भरना है छात्रों को शिक्षा देना नहीं। इसलिए हम सभी को सबके लिए मुफत शिक्षा की मांग करते हुए सरकार और पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ने की जरूरत है।

        सभा में सरकार द्वारा छात्रों के दमन का विरोध करते हुए तत्काल फीस वृद्धि वापस लेने की मांग की गयी। साथ ही JNU छात्रों पर दिल्ली पुलिस द्वारा की गयी बर्बरता की भी आलोचना की गयी। पछास के साथियों ने भी भागीदारी की। 


JNU व अन्य संस्थानों में फीस वृद्धि के खिलाफ बरेली कालेज के गेट पर प्रदर्शन


            परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) व क्रन्तिकारी लोक अधिकार संगठन ने बरेली कॉलेज बरेली गेट पर JNU के छात्रों के आंदोलन के समर्थन व उन पर हुए दमन के विरोध में एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया ।


          जेएनयू देश के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में एक हैं। गत माह में जेएनयू के हॉस्टल की विभिन्न मदों में कुल बढोत्तरी 300 प्रतिशत तक कर दी हैं। इसके अतिरिक्त मैस में उचित ड्रेस व हॉस्टल में प्रवेश/निषेध का समय बदल दिया है। जेएनयू ऐसे विश्वविद्यालयों में है जहां की लाइब्रेरी 24 घंटे खुली रहती है।ऐसे में छात्रों के लिए हॉस्टल के दरवाजे 11-11:30 बजे बन्द करना छात्र विरोधी कदम है।


छात्र-मजदूर एकता जिंदाबाद !


         JNU छात्रों पर दिल्ली प्रशासन द्वारा किया गया लाठीचार्ज को लेकर फरीदाबाद की ट्रेड यूनियनों ,इंकलाबी मजदूर केंद्र और परिवर्तनकामी छात्र संगठन के साथियों ने बीके चौक पर विरोध प्रदर्शन किया।


इस दौरान सभी साथियो ने मांग की
जेएनयू की फ़ीस वृद्धि वापस ले जाये।


JNU में फीस वृद्धि, मैस में ड्रेस कोड लागू करने व हॉस्टल टाइमिंग बदलने आदि के खिलाफ संघर्षरत छात्रों के दमन का विरोध हुए व छात्रों की जनवादी मांगों का समर्थन करते हुए किये कार्यक्रम         
  
                   JNU में फीस वृद्धि वापस लो!
                        दिल्ली पुलिस मुर्दाबाद!



        हल्द्वानी, उत्तराखंड JNU में फीस बढ़ोतरी को लेकर छात्र आंदोलन के दमन के खिलाफ JNU प्रशासन का M.B.G.P.G. कॉलेज हल्द्वानी (उत्तराखंड) में पुतला फूंकते पछास के कार्यकर्ता।


जेएनयू के संघर्षरत छात्रों के सर्मथन में पछास ने दिया ज्ञापन

      

     लालकुआं, उत्तराखंड परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) ने (जवाहरलाल लाल नेहरू विश्वविद्यालय) जेएनयू में संघर्षरत छात्रों के समर्थन में तहसीलदार लालकुआं के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति को ज्ञापन प्रेषित किया।

       सभा में बोलते हुए वक्ताओं ने कहां कि जेएनयू देश के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में एक हैं। गत माह में जेएनयू के हॉस्टल की विभिन्न मदों में कुल बढोत्तरी ढाई सौ से तीन सौ  गुने तक कर दी हैं। इसके अतिरिक्त मैस में उचित ड्रेस व हॉस्टल में प्रवेश/निषेध का समय बदल दिया है। जेएनयू ऐसे विश्वविद्यालयों में है जहां की लाइब्रेरी 24 घंटे खुली रहती है।ऐसे में छात्रों के लिए हॉस्टल के दरवाजे 11-11:30 बजे बन्द करना छात्र विरोधी कदम है। 

        साथियों ने बोलते हुए कहां देश की सरकारें कल्याणकारी चीजों में लगातार कटौती कर रही है। वह शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकारों में भी कटौती कर रही है। इसमें फीस बढ़ाने से लेकर,कॉलेज-कैम्पसों में अध्यापकों व संसाधनों की काफी कमी है। जेएनयू ही नही बल्कि पीछले माह अक्टूबर में ही आई.आई.टी (भारतीय तकनीकी संस्थान) बी.टेक, एम. टेक की फीस बढ़ाने का फैसला लिया गया है। राज्य सरकारें भी इसी नक्शे कदम पर आगे चल रही है। उत्तराखंड में आयुर्वेद शिक्षण संस्थानों में फीस वृद्धि की गई हैं। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले के वावजूद न तो संस्थान फीस वृद्धि वापस ले रहे है और न ही सरकार इस ओर कदम उठा रही है। उत्तराखंड सरकार ने कुछ समय पहले आईटीआई की फीसों में भी भारी बढ़ोत्तरी की है। इसी तरह खटीमा के डिग्री कॉलेज में छात्र, छात्र संख्या के अनुसार अध्यापकों की नियुक्ति व अन्य मांगों को लेकर संघर्षरत है। यह सरकारों का शिक्षा से हाथ खिंचना व शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार को भी पूंजीपतियों को लूटने की खुली छूट देना हैं। यह सब सरकारों के छात्र विरोधी कदम है। इसके कम आय व मजदूर-मेहनतकशों के बच्चे तकनीकी व उच्च शिक्षा से दूर होते जाएगें।

       ऐसे में छात्रों के विरोध को सुना भी नही जा रहा है। पुलिस द्वारा महंगी होती शिक्षा के विरोध के स्वरों का निर्ममतापूर्वक से दमन किया जा रहा है। जेएनयू के छात्रों द्वारा 11 नवंबर के विरोध-प्रदर्शन का पुलिस द्वारा दमन किया गया। जिसमें वॉटर केनन का भी प्रयोग किया गया। इस दमन से सैकड़ों छात्र-छात्राएं जख्मी हैं। परिवर्तनकामी छात्र संगठन जेएनयू के संघर्षरत छात्रों के दमन की कठोर शब्दों में भर्त्सना करता है। और मांग करता है कि-

1- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में बढ़ाई गई फीसों को तुरंत वापस लिया जाए। अन्य विश्वविद्यालयों में फीस बढोत्तरी के प्रयासों पर तुरंत रोक लगाई जाए।
2- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में संघर्षरत छात्रों का दमन-उत्पीड़न बन्द किया जाए।
3- छात्रों पर हॉस्टल टाइमिंग व ड्रेस कोड सम्बन्धी अन्यत्र गैरजनवादी फैसलों को तुरन्त वापस लिया जाए। 
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)
लालकुआं इकाई

           ज्ञापन भेज कर पुतला दहन किया

             

            काशीपुर, उत्तराखंड आज दिनांक 13 नवंबर 2019 को परिवर्तनकामी छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं ने जेएनयू में हुई फीस वृद्धि व पुलिस दमन के विरोध में राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा। साथ ही महाराणा प्रताप चौराहे, काशीपुर में जेएनयू प्रशासन का पुतला दहन किया। 

          परिवर्तनकामी छात्र संगठन का साफ मानना है कि ज्ञान एक सामाजिक सम्पत्ति है, उसका व्यापार नहीं होना चाहिये। फीस वृद्धि एक प्रकार का आर्थिक आरक्षण है, जिससे काम आय वर्ग वाले गरीब मज़दूरों के बच्चों को शिक्षा से दूर कर दिया जा रहा है। चाहे वो जेएनयू के छात्र हों, आई.आई.टी. के छात्र हों या फिर उत्तराखंड के मेडिकल छात्र।फीस वृद्धि का साफ असर गरीब छात्रों पर पड़ता है। शिक्षा निःशुल्क और सर्व सुलभ होनी चाहिए।

          ऐसे में जब जेएनयू के छात्र विरोध करते हैं तो पुलिस उनका दमन करती है। कुलपति छात्रों से मिलता नहीं है बात नहीं करता है। कुलपति, प्रशासन, आदि मिलकर अराजक माहौल बना देते हैं। जिसमें छात्रों को भी पिसना पड़ता है। इस कारण कई छात्र घायल हो गए। 

       शासन-प्रशासन की हठधर्मिता इस हद तक है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद मेडिकल छात्रों की फीस वृद्धि वापस नहीं ली जा रही है। कहीं दमन तो कहीं अनसुना कर देना और कहीं हठधर्मिता का रुख बताता है कि बिना व्यापक एकजुटता और संघर्ष के छात्र अपनी बातें नहीं मनवा सकते।

               JNU के छात्रों का संघर्ष ज़िंदाबाद


                

     बरेली जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में फीसवृद्धि के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों पर 11 नवम्बर को पुलिस द्वारा लाठीचार्ज व वाटर केनल से हमला किया गया। ये छात्र पिछले 15 दिनों से जबरन थोपे गए हॉस्टल की फीसवृद्धि व यूनिवर्सिटी द्वारा मैस में ड्रेस कोड लागू करने सहित अन्य कोर्स में फीसवृद्धि के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। जेएनयू के कुलपति छात्रों से बात करने के लिए भी तैयार नही हैं। कुलपति का यह अड़ियल रवैय्या अपने आप मे गलत है। 

      आज देश की अलग-अलग यूनिवर्सिटी भी फीसवृद्धि कर रही हैं जिसका सीधा मतलब है छात्रों के जेब पर अतिरिक्त डंका। इससे होगा ये की गरीब छात्र आबादी शिक्षा से दूर होते जाएगी। 

     आज जरूरत यह बनती है कि देश के सभी छात्र-नौजवान एकजुट होकर फीसवृद्धि का विरोध करें। जेएनयू के छात्र जो फीसवृद्धि का विरोध कर रहे हैं उनके साथ खड़े हों । 

       बरेली में परिवर्तनकामी छात्र संगठन ने JNU में चल रहे फिस वृद्धि के खिलाफ आंदोलन व अपनी मांगों के लिए संघर्ष कर रहे छात्रों के समर्थन में SDM के द्वारा राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया गया। ज्ञापन में मांग की गयी कि JNU के छात्रों की जनवादी मांगों माना जाए, देश में बढ़ रहे शिक्षा के निजीकरण को बंद किया जाए तथा छात्रों को वैज्ञानिक व निशुल्क शिक्षा दी जाए.


           दो दिवसीय केंद्रीय शिविर का आयोजन

                     

          परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) ने 9 व 10 नवम्बर को "भगत सिंह के विचार और हमारे कार्यभार" विषय पर शिविर का आयोजन किया। रात्रि में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन भी किया गया।

               


            'ऐ भगत सिंह तू जिंदा है' गीत से शिविर की शुरुआत की गई। शिविर में बात करते हुए वक्ताओं ने भगत सिंह के जीवन के बारे में बोलते हुए कहा कि बचपन से ही भगत सिंह सामाजिक विचारों का रुझान लिये हुए थे। भगत सिंह के जीवन में 12 साल की उम्र में 'जलियांवाला बाग हत्याकांड' घटा। जिससे भगत सिंह काफी व्यथित हुए। इसके बाद उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष करने का संकल्प लिया। लाहौर के नैशनल कॉलेज में जाकर भगत सिंह समाजवादी विचारों की ओर बढ़े। उसके बाद उन्होंने अपने छोटे से जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आजन्म ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हुए। त्याग, समर्पण, अध्ययन व अपने समय की समस्याओं को समझकर उनको मेहनतकशों के पक्ष में हल करना आदि उनके जीवन की प्रमुख बातों में हैं।

                                               

         भगत सिंह के लेखों "विद्यार्थी और राजनीति", "बम का दर्शन", "साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज", "मैं नास्तिक क्यों हूं" व "क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसविदा" आदि लेखों में विस्तार से चर्चा की गई। भगत सिंह के लेखों व विचारों की आज भी नौजवानों व मेहनतकशों के लिए काफी महत्वता हैं।

                                               


                                       



       सांस्कृतिक संध्या में गीत, लघु नाटक व कविता पाठ आदि कार्यक्रम किए गए। 

                                                      

         शिविर के अन्त में चर्चा करते हुए साथियों ने कहा कि शासक वर्ग भगत सिंह के विचारों को दबाता है। उनको वह जनता के सामने नहीं लाता है। लाता भी है तो वह उनकी 'बम' व 'बन्दूक' वाली तस्वीर उभारता हैं। शासक पूँजीपति वर्ग भगत सिंह को एक देव प्रतिमा के रूप में पेश कर जनता से उनकी पूजा करने को कहता हैं। भगत सिंह के समाजवादी विचारों- जिसमें वे कहते हैं कि मौजूदा समाज की सभी समस्याओं का समाधान समाजवादी क्रांति में ही सम्भव है- को मारने का काम पूंजीपति वर्ग के अलावा संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टियां एवं उनके संगठन भी करते हैं। भगत सिंह ने क्रांतिकारी विचारों को तथा भविष्य की समाजवादी क्रांति की रूपरेखा को "क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसविदा" लेख में दिया है। शिविर में कार्यकर्ताओं ने संकल्प लेते हुए कहा कि हमारा कार्यभार बनता है कि उनके जीवन से प्रेरणा लेकर हम उनके विचारों को कॉलेज-कैम्पसों, मज़दूरों, किसानों व मेहनतकशों के बीच लेकर जाए। उनके विचारों को समाज में स्थापित करें। उन्हीं के शब्दों में समाजवादी क्रांति की ओर बढ़ें तभी पूँजीवादी समाज की समस्याओं से मुक्ति मिलेगी। 'मेरा रंग दे बसंती चोला' गीत गाकर शिविर का समापन किया गया।

                                                 


भगत सिंह की  112 वीं  जयन्ती पर अनेक कार्यक्रम  किये  गए 

भगत सिंह के जन्म दिवस पर विचार गोष्ठी का आयोजन 


         लालकुआं, उत्तराखंड 28 सितम्बर शहीदे आजम भगत सिंह के जन्म दिवस पर परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) ने लाल बहादुर शास्त्री राजकीय महाविद्यालय हल्दूचौड़ ( नैनीताल) उत्तराखंड में "भगत सिंह के विचारों की प्रासंगिगता" नामक विषय पर "रंग दे बसंती" गीत से शुरुआत कर विचार गोष्ठी का आयोजन किया। इससे पूर्व लालकुआं शहर व आसपास के इलाकों में पर्चा वितरित किया गया। इसी क्रम में 29 सितम्बर को भगत सिंह पर बनी फिल्म 'द लीजेण्ड आफ भगत सिंह ' का प्रदर्शन किया गया l 

       
             गोष्ठी का संचालन करते हुए पछास के महेश ने कहा कि भगत सिंह के विचारों की आज भी प्रासंगिगता है। भगत सिंह ने शहादत से पहले कहाँ था गोरे अंग्रेज चले जायेंगे और काले अंग्रेज यही रह जायेगे। यह भारतीय जनता का शोषण- उत्पीड़न जारी रखेंगे। यही आज का भारतीय पूँजीवादी वर्ग कर रहा है। शिक्षा का निजीकरण जारी है,अधिकतर छात्र कॉलेजों के मुंह तक नहीं देख पाते हैं। गरिमामय रोजगार मिल पाना तो दूर की कौडी हो गया है। रोजगार के नाम पर "पकौड़ा" तलने की बात की जाने लगी है। मजदूर - मेहनतकश हो, किसान हो, नौजवानों, महिलाएं हो, समाज के सभी वर्ग इस पूँजीवादी व्यवस्था से कराह रहे हैं। इसी के स्थान पर भगत सिंह समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्षरत थे। जहाँ पर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसी मूलभूत चीजें सरकारों की जिम्मेदारी हुआ करती है। बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, भ्रष्टाचार, कुपोषण, महिला हिंसा जैसे पूँजीवादी समस्याओं के लिए संघर्ष का कार्यभार आज छात्र-नौजवानों व मेहनतकश जनता का है।


        छात्र विशाल कांडपाल ने कहा कि भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को मारा जा सकता है। उनके विचारों को नहीं मार सकते हैं।उनके सपनों का भारत बनाने के लिए सभी को आगे आना होगा। समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए नौजवानों सहित सभी को अपना योगदान देना होगा।


        कार्यक्रम में बात रखते हुए रुपाली ने कहाँ की भगत सिंह आजीवन साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्षरत रहे। आज पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था अथाह शोषण-उत्पीड़न किये हुए हैं। इसलिए भगत सिंह के सपनों का भारत समाजवादी भारत बनाने के लिए सभी को आगे आना होगा।

         गोष्ठि में मनोज, ज्योति, महेंद्र आदि वक्ताओं ने भी बात रखी।


भगत सिंह की क्रांतिकारी विरासत अमर रहे !


        भगत सिंह के 112 वें जन्मदिवस पर परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) द्वारा डीयू में एक सभा व क्रांतिकारी गीतों का आयोजन किया गया। सभा में छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की।

        सभा का संचालन करते हुए साथी अमन ने कहा की 23 मार्च 1931 को ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने भगत सिंह की हत्या की थी। देश आजाद होने के बाद हमारे शासकों ने भगत सिंह के विचारों को मार कर उनकी दूसरी हत्या की। भगत सिंह के विचार हर दौर के पूंजीवादी शासकों के लिए खतरनाक हैं इसलिए सरकारों ने उनके विचारों को आम जनता तक पहुंचने नहीं दिया।

        सभा में बात रखते हुए इंक़लाबी मजदूर केंद्र के श्यामवीर ने कहा कि आज भगत सिंह को याद करने की जरूरत पहले से कई गुना ज्यादा है। आज भारत की सत्ता पर मौजूद मोदी सरकार मजदूरों-मेहनतकशो पर निरंतर हमले कर रही है। श्रम कानूनों में बदलाव कर मजदूरों को 150 साल पीछे धकेला जा रहा है। उनके द्वारा हासिल सभी अधिकारों को छीना जा रहा है। ऐसे में भगत सिंह के विचार हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं और फासीवादी हुक्मरानों से लड़ने का रास्ता बताते हैं।

        सभा में आगे बोलते हुए पत्रकार अनिल चमडिया ने कहा की पूंजीवादी-साम्राज्यवादी संस्कृति ने छात्रों-नौजवानों को निरंतर पतित किया है। इसलिए देश समाज के हालातों पर सोचने के बजाय वे केवल और केवल अपने बारे में सोच रहे हैं। आज छात्रों नौजवानों को समझना होगा कि उनकी मुक्ति व्यक्तिगत प्रयासों में नहीं बल्कि संगठित होने में है। और संगठित होकर भगत सिंह के रास्ते पर चलने में है। 

             सभा के अंत में पछास के साथी दीपक ने कहा की आज फासीवादी दौर में हम युवाओं के सामने दो विकल्प हैं। एक रास्ता बर्बरता यानी फासीवाद की ओर जाता है, दूसरा मानव मुक्ति यानी समाजवाद की ओर जाता है। भगत सिंह ने दूसरे रास्ते को चुना था और आज हम छात्रों-नौजवानों को भगत सिंह से प्रेरणा लेते हुए दूसरे रास्ते को चुनने की जरूरत है। समाजवादी भारत के निर्माण में एकजुट होने की जरूरत है।

     सभा में क्रांतिकारी गीतों को रखा गया और क्रांतिकारी नारों के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।


       रामनगर (उत्तराखंड) पी. जी. कॉलेज रामनगर में विचार गोष्ठि की गई।



       काशीपुर (उत्तराखंड) राधे हरि राजकीय महाविद्यालय में पर्चा वितरण करते हुए क्लास गैदरिंग की गई। कॉलेज गेट पर बैनर-पोस्टरों के साथ नारे लगाए गए। क्रांतिकारी विचारों का प्रचार-प्रसार किया गया।



फोटो पर माल्यार्पण कर गोष्ठी की गई


        हल्द्वानी (उत्तराखंड) 28 सितंबर भगत सिंह के जन्म दिवस के अवसर पर परिवर्तनकामी छात्र संगठन की हल्द्वानी इकाई द्वारा एम.बी.पी.जी.कॉलेज के गेट पर भगत सिंह के फोटो पर माल्यार्पण किया और उसके बाद कॉलेज के राजनीतिक शास्त्र विभाग में एक गोष्ठि का आयोजन किया गया। जिसमें भगत सिंह के विचारों पर चर्चा की गई।


जनता की आवाज उठाने वालों की आवाज को दबाना बंद करो
                   प्रोफेसर हनी बाबू पर हमला नही सहेंगे


          आज डीयू के प्रोफेसर हनी बाबू पर सरकार द्वारा किए जा रहे दमन के खिलाफ डीयू के शिक्षकों व छात्रों ने आर्ट फैकेल्टी गेट पर विरोध सभा का आयोजन किया। सभा का आयोजन डीयू के अंग्रेजी विभाग के छात्र-छात्राओं द्वारा किया गया था। सभा में भारी संख्या में छात्रों और शिक्षकों ने भागीदारी कर सरकार के दमनकारी चरित्र को बेनकाब किया।


      सभा में बोलते हुए वक्ताओं ने कहा की सरकार विरोध की हर आवाज को दबाना चाहती है वह चाहे मजदूर हो चाहे किसान चाहे छात्र या चाहे शिक्षक। हर वह आवाज जो सरकार के विरोध में खड़ी है उसका गला घोंटने की कोशिश की जा रही है। ताजा मामला डीयू के प्रोफेसर हनी बाबू का है। 10 सितंबर की सुबह पुणे पुलिस के 20 सिपाही उनके घर पर छापा मारते हैं और उन पर भीमा कोरेगांव की हिंसा में शामिल होने का आरोप लगाया जाता है।


        1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा मुख्यतः दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा आयोजित की गई थी जिसमें संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे नाम के दक्षिणपंथी लोगों का नाम आया था। इस घटना में दलितों पर हमला किया गया था। परंतु इस घटना के बाद दोषियों पर कार्यवाही करने के बजाए सरकार जनता की आवाज उठाने वाले कार्यकर्ताओं को ही एक-एक करके फर्जी मुकदमों में गिरफ्तार कर रही है। पिछले 1 साल में एक दर्जन से ऊपर लोगों को फर्जी मुकदमों में गिरफ्तार किया गया है और इसी तरह साजिश के तहत प्रोफ़ेसर हनी बाबू को फसाया जा रहा है।


      हनी बाबू एक शिक्षक होने के साथ-साथ मजदूरों, दलितों और छात्रों की आवाज को उठाते रहे हैं। यही बात सरकार को नागवार गुजरती है। इसीलिए उनकी आवाज को फर्जी मुकदमों के तहत दबाने की कोशिश की जा रही है। वक्ताओं ने एक स्वर में सरकार के इस मंसूबे का विरोध करते हुए प्रोफेसर हनी बाबू के साथ एकजुटता जाहिर की। साथ ही सरकार के खिलाफ संघर्ष करने का संकल्प लिया। सभा में तय किया गया कि इस पूरे मामले की सच्चाई को व्यापक रूप से छात्रों व जनता के बीच ले जाकर सरकार के मंसूबों को बेनकाब किया जाएगा।

इंकलाब जिंदाबाद ! 
जनता की आवाज को दबाना बंद करो !!
प्रोफेसर हनी बाबू पर सरकार द्वारा किए गए हमले का विरोध करो !!!

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
परिवर्तनकामी छात्र संगठन
(पछास)


भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस व सावरकर की मूर्ति एक साथ लगाने का विरोध करने पर पछास के दो कार्यकर्ता गिरफ्तार

              दिल्ली पुलिस भी ABVP और सावरकर के साथ खड़ी है ....




        दिल्ली विश्वविद्यालय इकाई साथियों 19 अगस्त की रात को ABVP ने चोरी-छुपे बिना प्रशासन की अनुमति के बिना डीयू आर्ट फैकल्टी के गेट पर भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस की मूर्ति के साथ सावरकर की मूर्ति लगा दी थी। भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस को पूरा देश जानता है और आज भी वो हम जैसे युवाओं के लिए आर्दश हैं। परंतु इन दोनों के साथ लगाए गए सावरकर, आजादी के आंदोलन के भगौड़े थे। 1910 में सजा होने के बाद 5 बार उन्होने अंग्रेजों से माफीनामा लिखा था। जेल से छूटने के बाद अंग्रेजों के प्रति वफादार रहने की कसमें खायी थी। इसलिए ही अंग्रेजों ने सावरकर की स्वामिभक्ति से प्रसन्न होकर 50 साल की सजा को कम करके 14 साल में ही उन्हें रिहा कर दिया। यही नही अंग्रेज उन्हें प्रतिमाह 60 रूपये पेंशन भी देते थे। इस मेहनताने का कर्ज सावरकर जिंदगी भर चुकाते रहे। जेल से छुटने के बाद उन्होने आजादी के ओदोलन से तौबा कर ली और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को आगे बढ़ाते हुए ‘द्वि राष्ट्र’ जैसा विभाजनकार सिद्धांत दिया। 1942 में जब पूरा देश भारत छोड़ो आंदोलन में शरीक था, उस समय सावरकर पूरा देश घूमकर हिन्दूओं को अंग्रेजों की सेना में भर्ती करवा रहे थे। कांग्रेसी सरकारों ने इस्तीफा दे दिया था परंतु सावरकर मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सिंध आर बंगाल में सरकार चला रहे थे। इन सभी तथ्यों को कोई भी किसी भी ढ़ंग की इतिहास की किताब से पड़ सकते हैं। इन तथ्यों से पता चलता है कि सावरकर ना तो वीर थे और ना ही क्रांतिकारी।


        ऐसे में डीयू के क्रांतिकारी संगठनों ने तय किया कि वह ABVP व संघ परिवार द्वारा भगत सिंह और हजारों शहीदों का अपमान नही होने देंगे। और सावरकर को आम छात्रों के बीच बेनकाब करेंगे। इसी प्रण के साथ आर्ट फैकल्टी गेट पर छात्रों के बीच हस्ताक्षर अभियान चला रहे थे। हस्ताक्षर अभियान में छात्रों की तरफ से बहुत अच्छा सर्मथन मिल रहा था। परंतु ABVP व उनकी मित्र पुलिस को ये बात नागवार गुजरी। शांतिपूर्वक हस्ताक्षर अभियान को पुलिस द्वारा गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। पोस्टर फाड़ डाले गए। इसका प्रतिरोध करने पर पुलिस मारते हुए पछास के दो साथियों मनीष और दीपक को डीटेन कर के ले गयी।




      थाने में बैठाकर रखा गया। फिर 1 घण्टे बाद पूरा बायोडाटा लेते हुए एक पुलिस वाले ने बताया कि दोनों पर धारा 188 के तहम मुकदमा दर्ज किया जा रहा है। फिर दोनों को बैठने को बोला गया। कुछ समय बाद साथी दीपक को अकेले एक कमरे में बुलाया गया। कमरे में एक पुलिसवाला सिविल ड्रेस में और दूसरा यूनिफार्म में था। नाम किसी पर नहीं लिखा था। अंदर घुसते ही जब दीपक कुर्सी पर बैठने लगे तो उन्होने दीपक को खड़े रहने का आदेश दिया। सामने पानी की बोतल पड़ी थी साथी ने पीने के लिए पानी मांगा तो दुत्कारते हुए कहा गया कि तुम लोगों के लिए पीने का पानी बाहर है। बाहर जाकर पीओ। इस बीच साथी को लगातार डराने की कोशिश की गयी। कपड़ों पर कमेंट किया गया। उसमें से एक पुलिसवाना बोला कि तुम वीर सावरकर के खिलाफ बोल रहे हो तुम्हें पता क्या है सावरकर के बारे में। 10 बातें बता, तुझे पता है तो, साथी ने सावरकर इतिहास बताया। पर पुलिसवाले पर कोई फर्क नहीं पड़ा, स्पष्ट था कि उन्हें उत्तर से कोई लेना-देना नही था। वो सावरकर के साथ खड़े थे। साथी दीपक के पिताजी का नम्बर लेकर उन्हें कॉल किया गया। सिग्नल ठीक न होने के चलते बात नहीं हो पायी। आधे घण्टे की पूछताछ में लगातार डराने की कोशिश की गयी। और ये सब इसलिए किया गया कि हम सावरकर का विरोध शातिपूर्ण तरीके से कर रहे थे।

      पूछताछ के बीच में ही ABVP दो लड़के जिन्हें किसी मामले में पकड़कर लाया गया था दरवाजे से अंदर आए। पुलिसवाले का सख्त भाव गायब हो चुका था। साथी आधे घण्टे से खड़ा थे और उनके घुसते ही पुलिस वाले ने उन्हें बैठने के लिए कुर्सी आफर की। जबकि वो दोनों साथियों की तरह ही डीटेन थे। कानून की नजरों में सब बराबर होते हैं- कोई शक नहीं होता हैं।


        गिरफ्तारी के बाद से प्रदर्शन कर रहे संगठनों के लोग दोनों साथियों की रिहाई के लिए डटे रहे। बारिश और पुलिस की धमकियां भी उन्हें हिला न सकी। लगातार बनते दबाव के बाद अन्ततः साढ़े तीन घण्टे बाद दोनों को छोड़ दिया गया। इस पूरे मानसिक उत्पीड़न के बाद भी साथी डरे नही हैं। ये लड़ाई आगे भी जारी रहेगी।

       पूरे कार्यक्रम में AIDSO, BSCEM, Collective, DSU, Pinjra Tod, KYS, Pachhas और SFI के साथी शामिल रहे। उन सभी साथियों को पछास क्रातिकारी सलाम पेश करता है।

ग़द्दार सावरकर मुर्दाबाद !
इंक़लाब जिन्दाबाद !!


औरतें उठी नहीं तो जुल्म बढ़ता जाएगा!


         देहरादून (उत्तराखंड) उन्नाव की घटना के विरोध में देहरादून के तमाम प्रगतिशील संगठनों ने कचहरी स्थित शहीद स्मारक पर प्रदर्शन किया और डीएम के माध्यम से माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा। इस प्रदर्शन में शामिल संगठनों में परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास), उत्तराखंड पीपुल्स फोरम, जन संवाद समिति, उत्तराखंड महिला मंच, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया, भारत ज्ञान विज्ञान समिति, जनवादी महिला समिति आदि संगठन शामिल थे।

         प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने उन्नाव और उस जैसी लगातार हो रही घटनाओं पर नाराजगी जताई और कहा कि सरकारें कानून व्यवस्था को संभाल पाने में नाकाम हो गई हैं। अपराधियों को शासन-प्रशासन द्वारा दिए जा रहे संरक्षण पर रोष जताया। समाज में फैले हुए पुरुष प्रधान मूल्यों व महिला विरोधी उपभोक्तावादी संस्कृति के खिलाफ संघर्ष का आह्वान किया।

         डीएम के माध्यम से माध्यम से राष्ट्रपति को भेजे गए ज्ञापन में विभिन्न राज्यों में कानून व्यवस्था दुरुस्त करने, उन्नाव की रेप और हत्या की घटना के सभी दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देने और इस तरह के मामलों में शामिल राजनीतिज्ञों को उनके पदों से बर्खास्त करने की मांग की गई।

         प्रदर्शनकारियों को डॉ लाल बहादुर वर्मा, डॉ एसके कुलश्रेष्ठ, डॉ एस एन सचान, इना, कुसुम पंत, अनुराधा सिंह, दीप्ति रावत, इंदु नौडियाल, सुप्रिया भंडारी आदि लोगों ने संबोधित किया।

        बाद में प्रदर्शनकारी सतीश धौलाखंडी और जयदीप सकलानी के नेतृत्व में "औरतें उठी नहीं तो जुल्म बढ़ता जाएगा, जुल्म करने वाला सीनाजोर बनता जाएगा" जनगीत गाते हुए डीएम ऑफिस पहुंचे और जोरदार नारेबाजी करने के बाद डीएम को ज्ञापन दिया।


छात्राओं की एकदिवसीय बैठक

                 परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) ने आज लालकुआं (उत्तराखंड) में एक दिवसीय केंद्रीय छात्रा कार्यकर्ता बैठक की। बैठक की शुरुआत "नफ़स-नफ़स कदम-कदम, बस एक फिक्र दम ब दम" गीत से की गई।


                बैठक में बोलते हुए छात्रा साथियों ने कहा कि आज देश व समाज के अंदर छात्राओं को काफी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं। आज भी पैदा होते ही उनके साथ गैरबराबरी का व्यवहार किया जाता है। बहुत से परिवारों में उनको पढ़ाया तक नहीं जाता है। जहां छात्राएं पढ़ भी रही हैं तो उनके विषय, इच्छा के अनुरूप पढ़ने एवं उनको फैसला लेने का अधिकार नहीं है। इक्कीसवीं सदी का भारत कितना पिछड़ा समाज है यह अपने आप बयां कर देता है। 

                            बैठक में बोलते हुए छात्राओं ने कहा आज भी सामंती मूल्य मान्यताएं समाज में मौजूद हैं। यह महिलाओं को घरों में कैद किए हुए हैं। वहीं दूसरी तरफ पितृसत्तात्मक मूल्यों के साथ-साथ पतित उपभोक्तावादी पूंजीवादी संस्कृति व बढ़ती फासीवादी जकड़बंदी महिलाओं की मुक्ति में बाधा बना हुआ है।

                            असंगठित क्षेत्र में महिलाओं को पुरुषों से कम वेतन दिया जा रहा है। पूंजीवाद के अंदर महिलाओं को एक सस्ते श्रम के रूप में देखा जाता है। पितृसत्तात्मक मूल्यों के साथ महिलाओं को यह दोहरी मार भी सहनी पड़ती है।

                       सामंती मूल्यों, पूंजीवादी शोषण-उत्पीड़न व बढ़ती फासीवादी जकड़बंदी के खिलाफ लड़कर ही हम आगे बढ़ सकते हैं। मेहनतकशों के साथ एकता कायम करते हुए अपनी मुक्ति का रास्ता खोल सकते हैं। बैठक के अंत में "वो सुबह कभी तो आएगी" गीत गाया गया।

"पुस्तक-शिक्षक आंदोलन" के समर्थन में कुलपति का पुतला दहन किया।


                पिथौरागढ़ में चल रहे "पुस्तक-शिक्षक आंदोलन" का परिवर्तनकामी छात्र संगठन ने समर्थन किया तथा छात्रों की मांगों को न मानने वाले कुलपति का एम. बी. पी. जी. कॉलेज हल्द्वानी (उत्तराखंड) में पुतला दहन किया। साथ में नारे लगाते हुए माँग की गई छात्रों की मांगों को अनदेखा करने वाले वी. सी. शर्म करो, कुमाऊँ विश्वविद्यालय के सभी कॉलेजों के पुस्तकालयों में नई पुस्तकें व शिक्षकों-कर्मचारियों के रिक्त पदों पर तत्काल स्थायी नियुक्ति करों। छात्रों की मांगें पूरी करो, उत्तराखंड के उच्च शिक्षण-संस्थानों को बर्बाद करने वाली उत्तराखंड सरकार मुर्दाबाद!

                सभा करते हुए पछास कार्यकर्ताओं ने कहाँ कि पिथौरागढ़ में छात्रों के धरने को आज 29 दिन हो गये हैं लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन उनको आश्वासन देने से आगे नहीं बढ़ पाया है। छात्र अपनी मांगे माने जाने तक आंदोलन को जारी रखने का एलान कर चुके हैं। परिवर्तनकामी छात्र संगठन छात्रों की जायज मांगों का सर्मथन करता है। ज्ञात हो पूरे कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कॉलेजों में शिक्षकों की भारी कमी है। पुस्तकालय में पुस्तकें दशकों पुरानी हैं। न ही छात्र संख्या के अनुरूप अन्य संसाधन हैं। ऐसे में पठन-पाठन का काम बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। यह उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को गिरा रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकार इसके लिए जिम्मेदार हैं।


शिक्षा का भगवाकरण नहीं चलेगा ......


         23 जुलाई आज डीयू में तमाम छात्र संगठनों के नेतृत्व में छात्रों ने ABVP की गुण्डागर्दी व RSS की शिक्षा को भगवा रंग में रगने की साजिशों के खिलाफ कैम्पस में जुलूस निकाला। पछास के साथियों ने भी प्रदर्शन में भागीदारी की।

        दरअसल हर बार की तरह इस बार भी डीयू में सोशल साइंस के कई विभागों में कुछ नए टाॅपिक जोड़े गए थे। डीयू के तमाम प्रोफेसरों ने मिलकर इसे तैयार किया और मई माह में इसे फाइनल कर दिया गया। परंतु नए टापिक और कुछ पुराने भी संघी मण्डली को नागवार गुजरे। जिसका विरोध करते हुए AC मीटिंग में वो शिक्षकों को मार-पीट की धमकी देते हुए गरियाने लगे। विभागों पर नए टाॅपिक को हटाने का दवाब बनाया जाने लगा.

          इसके विरोध में ही डीयू के छात्रों ने आज ये जुलूस निकाला। छात्रों का कहना था कि हमारे खाने, पहनने से लेकर सबकुछ ये सरकार तय कर रही है। अब वो हमारे पाठ्यक्रम को भी अपने हिसाब से तैयार करना चाहते हैं। जो उनकी राजनीति को नंगा करता हो उस पाठ्यक्रम को वो ‘देशद्रोही’ का तमगा लगाकर खत्म कर देना चाहते हैं। हम ऐसा होने नही देगें। और जब भी संघ मण्डली द्वारा शिक्षा पर हमला बोला जाएगा हम हर कदम पर उन्हे बेनकाब करेगें।

DU में ABVP की गुंडागर्दी के खिलाफ छात्र संगठनों का संयुक्त प्रदर्शन।


             17 जुलाई, कल DU अकैडमिक कॉउन्सिल की मीटिंग में ABVP ने शिक्षकों के साथ अभद्रता करते हुए उन्हें धमकाने की कोशिश की। जिसके खिलाफ छात्रो और शिक्षकों ने गुंडागर्दी के विरोध में आज DU मे इन गुंडों के खिलाफ प्रदर्शन किया। पछास के साथियों ने भी भागीदारी की.


बिहार में बच्चों की हो रही मौतों को खिलाफ राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन

                हल्द्वानी (उत्तराखण्ड) बिहार में बच्चों की हो रही मौतों को खिलाफ प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन व क्रांतिकारी लोक अधिकार सेगठन के साथियों ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन प्रेषित किया।


                  बिहार के मुजफ्फरपुर व उसके आस-पास के इलाकों में दिमागी बुखार से बच्चों की हो रही मौतो के संबंध में राष्ट्रपति को ज्ञापन प्रेषित किया !!! यह जो मौत हो रही हैं ,वह सब मजदूर- मेहनतकशों के बच्चे है। जरा सोचना होगा की इस प्रकार की बीमारियों के चपेट में मेहनतकशों के बच्चे ही क़्यों आते हैं ? क़्यों सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों, ऑक्सीजन ,दवाओ इत्यादि के अभाव बच्चे दम तोड़ देते हैं ? क्या जो स्वास्थ्य योजनाये लागू होती है ,उनका लाभ मजदूर-मेहनतकशो को मिल पाता हैं ?




बिहार में बच्चों की हो रही मौत के खिलाफ तहसीलदार लालकुआं के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन


          लालकुआँ (उत्तराखण्ड) परिवर्तनकामी छात्र संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र, इंक़लाबी मज़दूर केंद्र व प्रगतिशील युवा संगठन ने सयुंक्त रूप से बिहार में बच्चों की हो रही मौत के खिलाफ तहसीलदार लालकुआं के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन प्रेषित किया।


              महोदय जैसा की ज्ञात है बिहार के मुजफ्फरपुर व आस-पास के जिलो में 'चमकी बुखार' से अभी तक 138 बच्चों की मौत हो चुकी हैं। इससे पूर्व 2014 में -86, 2015 में -11, 2016 में -4, 2017 में 4, व 2018 में - 11 बच्चों की मौत हो चुकी है। 

           साल दर साल बच्चों की मौत एक ही बिमारी से हो रही है। परन्तु बिहार सरकार व केन्द्र सरकार आँख मूदकर बैठी हुई हैं। यह घटनाएं सरकारों की आमजनमानस के प्रति संवेदनहीनता को भी दिखाती है। 

          महोदय हम यह अवगत कराना चाहते है कि आजादी 72 सालों बाद भी सरकार आम जनता को मामूली सी बिमारी के इलाज से निजात नही दिला पा रही है। 
 
            सरकारें नयी-नयी स्वास्थ योजना ला रही है। अभी 'आयुष्मान' योजना को काफी प्रचारित किया गया। परन्तु यह मौते दिखा देती है यह सारी योजनाए खोखली है।आम जनता को यह कोई राहत नही दे पा रही है। अतः हम महोदय से मांग करते है-

1- बिहार में 'चमकी बुखार' से पीड़ित बच्चों की इलाज की उचित व्यवस्था की जाए।
2- सबको निःशुल्क इलाज का प्रबंध किया जाए।
3- बच्चों की मौत पर लापरवाही बरतने वाले लोगों पर मुकदमा दर्ज किया जाए।
द्वारा --
परिवर्तनकामी छात्र संगठन
प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र
इंकलाबी मजदूर केन्द्र
प्रगतिशील युवा संगठन



दलित नौजवान की पिटाई के बाद मौत के विरोध में ज्ञापन दिया

लालकुआं, उत्तराखंड बीते 26 अप्रैल को टिहरी जिले के श्रीकोट गाँव में शादी-समारोह के दौरान कुर्सी पर बैठकर खाने को लेकर स्वर्ण युवकों द्वारा दलित नौजवान जितेंद्र दास की पिटाई की गई। इतनी गंभीर पिटाई की गई कि अस्पताल में इलाज के दौरान जितेंद्र की मौत हो गई। उसी घटना के विरोध में 8 मई को तहसीलदार लालकुआं के माध्यम से मुख्यमंत्री उत्तराखंड सरकार, राज्यपाल महोदया उत्तराखंड, जिला अधिकारी टिहरी गढ़वाल व एस. सी, एस. टी. आयोग उत्तराखंड को ज्ञापन प्रेषित किया गया


ज्ञापन में मांग की गई कि-
1- जितेन्द्र दास की मृत्यु की निष्पक्ष जाँच कर आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाए।
2- युवक के परिवार से किसी एक व्यक्ति को उत्तराखंड सरकार सरकारी नौकरी दें।
3- दलितों के उत्पीड़न पर रोक लगाई जाए।
द्वारा- परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास), प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, प्रगतिशील युवा संगठन, सर्वोदय शिल्पकार सेवा समिति, बहुजन समाज पार्टी व डॉ. बी. आर. अम्बेडकर मानव उत्थान सेवा समिति संगठनों के कार्यकर्ता शामिल रहें।


जलियांवाला बाग हत्याकांड के 100 वर्ष पूरे होने पर किये कार्यक्रम





जलियांवाला बाग हत्याकांड के शहिदों को लाल सलाम।




फरीदाबाद, इंकलाबी मजदूर केन्द्र, वीनस यूनियन, औद्योगिक ठेका मजदूर यूनियन, परिवर्तनकामी छात्र संगठन द्वारा जन सभा की गयी। जन सभा में मजदूर, छात्र - नौजवान, मजदूर महिलाएं व सामाजिक कार्यकर्ता शामिल रहे।

            सभी वक्ता ने अंग्रेज़ों द्वारा जलियांवाला बाग हत्याकांड व आज के हत्यारी पूंजीवादी सरकारों पर बात रखते हुए कहा कि जैसे जालिम अंग्रेजी हुक्मरानों ने नरसंहार रचे। हजारों लाखों मजदूरों छात्रों किसानों ने कुर्बानी दी। भगतसिंह, राजगुरु सुखदेव राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला खां, चन्द्रशेखर आजाद, ऊधम सिंह व मजदूरों किसानों के क्रांतिकारी संगठनों को पैदा किया। आजाद भारत की पहली पूंजीपतियों की सरकार बनी।

            
               उसके बाद से अब तक जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसे नरसंहार का इतिहास भरा पड़ा है। मजदूरों किसानों दलितों आदिवासियों को पुलिस फौज द्वारा कत्लेआम किया गया है। बस्तूर जारी है। काँग्रेस सरकार द्वारा दमन जारी था। उससे बड़ी हत्यारी भाजपा सरकार की करतूत जारी है। मजदूरों के अधिकारों पर हमला किया। अमीरी गरीबी खाई लगातार बढ़ती जा रही है। इनकी गलत नीतियों के खिलाफ कोई आवाज उठाता तो वो देश द्रोही हैं। अदानी, अंबानी की दलाली के लिए रात दिन हमारे खिलाफ मेहनतकश विरोधी नीतियां संसद में बनाते हैं। काले कानून के द्वारा मेहनतकशों की आवाजों कुचलना तो आम हो गया है। भगतसिंह ने कहा था कि अगर भारत में मजदूरों किसानों का राज लाना है तो रुस की क्रांति की तरह यहां भी क्रांति करनी पड़ेगी। पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकना होगा। समाजवादी समाज का निर्माण करना होगा।



जलियांवाला शहादत के 100 साल पर डीयू में सभा व सांस्कृतिक कार्यक्रम


दिल्ली 13 अप्रैल 2019 को जलियांवाला काण्ड के 100 साल पूरे होने पर शहीदों को याद करते हुए साम्राज्यवाद और राजकीय दमन के खिलाफ एक सभा व सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह सभा डीयू के छात्र संगठनों व दिल्ली के कई मजदूर व सांस्कृतिक संगठनों द्वारा बुलाई गयी थी। 

               सभा में बात रखते हुए वक्ताओं ने कहा कि 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के जलियांवाला बाग में अंग्रजों के दमनकारी कानून ‘रोलेट एक्ट’ का विरोध करने के लिए होने वाली सभा पर अंग्रेजी हुक्मरानों ने गोलियां चलवाकर हजारों बेगुनाह भारतीयों का कत्ल किया था। हजारों शहीदों की शहादत के बाद भी ब्रिटिश साम्राज्यवादी आजादी की लड़ाई को दबाने में असफल रहे थे। इस दमन के बाद भगत सिंह, अश्फाक, आजाद जैसे हजारों क्रांतिकारियों ने जलियांवाला से पैदा हुए संघर्ष को रूकने नही दिया। अन्ततः लाखों शहीदों की शहादत के दम पर हमने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से आजादी पा ली।

           
              परंतु आजादी हासिल करने के बाद साम्राज्यवादी लूट, शोषण, उत्पीड़न आज भी हमारे देश में जारी है। यही नहीं आजादी के बाद सत्ता में आए शासकों ने भी अंग्रेजों से प्रेरणा लेते हुए ‘रोलेट एक्ट’ जैसे कई काले कानून तथाकथित लोकतंत्र की आड़ में छुपाकर रखे हुए हैं। एक तरफ देशी-विदेशी पूंजीपति हमारे देश के प्राकृतिक संसाधनों से लेकर यहां के सस्ते श्रम का दोहन कर रहे हैं। तो दूसरी तरफ इस लूट के विरोध में उठने वाली आवाज को अफस्पा, यूएपीए जैसे काले कानूनों के जरिए दबाया जा रहा है। कश्मीर से लेकर पूंर्वोत्तर के राज्यों में जनता के जनवादी अधिकारों को हर पल-हर क्षण कुचला जा रहा है। आज हर विरोध करने वाली आवाज को सत्ताधारी दल द्वारा ‘देशद्रोह’ का तमगा लगाकर कुचला जा रहा है। देश की परिस्थितियां चीख-चीखकर जलियांवाला की ओर इशारा कर रही हैं। और आज जरूरत भी है कि हम जलियांवाला के शहीदों को याद करे। उनसे प्रेरणा लेते हुए आज भी जारी साम्राज्वादी लूट और भारतीय राजसत्ता द्वारा दमन के खिलाफ आवाज उठाएं।  

            सभा में BsCEM, DSU, DISSC, KYS, पछास, PDSU, LSI, IMK, MMS आदि संगठनों के साथियों द्वारा बात व क्रांतिकारी गीत रखे गए.



लालकुआं, उत्तराखंड परिवर्तनकामी छात्र संगठन व प्रगतिशील महिला एकता केंद्र ने संयुक्त तौर पर काररोड, लालकुआं में बैठक की। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 100 वर्ष पूरे होने पर चर्चा की गई। इसके पश्चात सेन्चुरी गेट पर मजदूरों के बीच पर्चा भी वितरित किया गया।


              बैठक में बोलते हुए पछास के महेश ने कहा की आज से 100 वर्ष पहले अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल "ओ डायर" के नेतृत्व में हजारों निहत्थे किसानों, मजदूरों, नौजवानों सहित देश की मेहनतकश जनता का नरसंहार किया गया। जलियावांला में लोग "रौलेट एक्ट" काले कानून का विरोध कर रहे थे। अंग्रेजों की दमनकारी नीति के विरोध में खड़े थे। "रौलट एक्ट" अंग्रेज सरकार ने भारतीय जनता के दमन के लिए बनाया हुआ था। जो जनता आजादी की लड़ाई लड़ रही थी और अंग्रेजों से पूर्ण स्वराज की मांग कर रही थी। इसी के विरोध में अंग्रेजों ने उस आजादी के आंदोलन को कुचलने के लिए यह जलियांवाला जैसे नरसंहार करवाएं और भारतीय जनता का बर्बरता पूर्वक दमन किया गया। लेकिन हुआ इसके विपरीत भारतीय नौजवानों ने इसके विरोध में असँख्य कुर्बानियां दी। आजादी की लड़ाई लड़ते हुए भगत सिंह, उधम सिंह, अशफ़ाक़ उल्ला खान, राजगुरु जैसे नायक पैदा किये। उधम सिंह ने तो जनरल "डायर" को ब्रिटेन में जाकर गोली मारकर जलियांवाला बाग के नरसंहार का बदला लिया।


            प्रगतिशील महिला एकता केंद्र की बिंदु गुप्ता ने कहा की 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड की तरह ही आज की सरकारें भी देश की मेहनत का जनता के ऊपर कई तरह के बर-बर नरसंहारों को अंजाम दे रही हैं। अभी कुछ समय पहले तमिलनाडु के तूतीकोरिन में अग्रवाल के स्टील प्लांट का विरोध कर रहे जनता पर बर्बरता पूर्वक दमन किया गया। कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। इसी तरीके से सिंदूर, नंदीग्राम हो या उत्तराखंड आंदोलन आदि के दौरान शाशकों ने ऐसे नरसंहार अंजाम दिये। मेहनतकशों की एकता के दम के बल पर ही इनसे निपटा जा सकता हैं.





रामनगर, उत्तराखंड जलियावाला बाग़ हत्याकांड के 100 वर्ष पूरे होने पर इमके, पछास, और प्रमएके ने प्रभात फेरी निकली।





               भवानीगंज में सभा करते हुए वक्ताओं ने कहाँ आज भारतीय शासक वर्ग द्वारा साम्राज्यवादियों के साथ कि जा रही सांठ-गांठ को भारतीय जनता के लिए खतरनाक बताया। 'रौलेट एक्ट' के विरोध में हो रही सभा पर गोलीबारी कर ब्रिटिश हुकूमत ने जैसे लोगों का कत्लेआम किया था वैसे ही भारतीय शाशक वर्ग आज भी जलियावाला बाग हत्याकांड रच रहा है। इसका विरोध किया जाना चाहिए।




हल्द्वानी, उत्तराखंड 13 अप्रैल जलियांवाला बाग हत्याकांड को 100 साल पूरे हो गए हैं। इस अवसर पर जलियांवाला बाग हत्याकांड के शहीदों को याद करते हुए और साम्राज्यवाद के विरोध में हल्द्वानी में प्रभातफेरी निकाली गई। साथ में पर्चा भी वितरित किया गया।

          
            हल्द्वानी के मुखानी चौराहे से प्रभातफेरी की शुरुआत की गयी। क्रान्तिकारी नारों औऱ क्रांतिकारी गीतों के साथ पनचक्की तक प्रभात फेरी निकाली गई। एक सभा के साथ प्रभातफेरी का समापन किया गया। परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन व प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र के साथियों ने कार्यक्रम में भागीदारी की।



शहीद दिवस पर इकाइयों द्वारा विभिन्न कार्यक्रम किए गए


भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू की शहादत अमर रहे !
                                            

             दिल्ली 23 मार्च शहादत दिवस पर इमके, पछास व प्रमएके ने संयुक्त तौर पर शाहबाद डेरी मजदूर बस्ती में सभा की। इससे पहले सुबह पूरे इलाके में प्रभात फेरी निकाल कर शहीदों के विचारों को जनता तक पहुंचाया गया।
          सभा में बात रखते हुए इमके के अरविन्द ने कहा कि भगत सिंह ने अपनी शहादत के समय कहा था कि 'गोरे अंग्रेजों से आजादी के बाद भी काले अंग्रेज (पूंजीपति और सामंत) देश को लूटेगें।’ आज देश के हालात भगत सिंह की बातों को पूरी तरह सच साबित कर रहे हैं।। देश के मजदूर-किसान-छात्र-नौजवान सभी आज पूंजी के जुए तले बर्बाद हैं। देश आजाद तो हुआ पर आज भी अंबानी-अडानी देश की सारी सम्पत्ति पर कब्जा जमाए हुए हैं। जब तक मेहनत करने वालों का इस सम्पत्ति पर अधिकार नही होता तब तक देश की सूरत नही बदल सकती।
        पछास की प्रियंका ने कहा कि मोदी सरकार आने के बाद शिक्षा की स्थिति में और अधिक गिरावट हुयी है। शिक्षा को तेजी के साथ पूंजीपतियों को बेचा जा रहा है। ऐसी स्थिति के बाद भी डिग्रियां हासिल करने वाले युवा बेरोजगार हैं। पिछले 45 सालों में देश में सबसे अधिक बेरोजगारी है। इस पर भी सरकार नौजवानों से ‘पकौड़ा तलने’ जैसी बात कर के उनका मजाक उड़ा रही है। युवा इन भयानक परिस्थितियों में सत्ता के खिलाफ उठ न खड़े हों इसके लिए उन्हें धर्म और जाति के नाम पर लड़ाया जा रहा है। विरोध करने वाली हर ताकत को ‘देशद्रोही’ का तमगा पकड़ाया जा रहा है। आज देश के युवाओं को भगत सिंह के विचारों को अपनाते हुए फासीवादी मोदी सरकार और इस पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करते हुए समाजवादी भारत के निर्माण का लक्ष्य लेना चाहिए।

               प्रभातफेरी निकाली



         

       बेरली उत्तरप्रदेश 23 मार्च भगतसिंह,सुखदेव,राजगुरु के शहादत दिवस पर इंक़लाबी मज़दूर केंद्र,परिवर्तनकामी छात्र संगठन,क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रगतिशील संस्कृति मंच, द्वारा एक प्रभातफेरी बंसी नगला से होकर मढ़ीनाथ,गल्ला मंडी,नेकपुर, नई बस्ती, बेनीपुर से होगर बंसी नगला पहुँची.
बेनीपुर बंसी नगला में एक सभा की व क्रांतिकारी गीत गाये.
                ''अमर शहीदों का पैगाम जारी रखना है संग्राम''
                ''भगत सिंह तुम जिंदा हो हम सबके अरमानो में''

                          मजदूरों के बीच सभा की गई 



काशीपुर उत्तराखंड आज 23 मार्च भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के शहादत दिवस के अवसर पर रिचा फैक्ट्री में मज़दूरों के बीच सभा की गई। सभा का संचालन इंक़लाबी मज़दूर केंद्र के खीमानंद ने किया। सभा में परिवर्तनकामी छात्र संगठन के चन्दन ने भी अपनी बात रखी।
        वक्ताओं ने कहा कि "23 मार्च के शहीद शोषण मुक्त मज़दूरों का राज चाहते थे और आजीवन उसी के लिए संघर्षरत रहे। जो आज़ादी हासिल हुई उसमें पूंजीपतियों का तंत्र है जो मज़दूरों पर शासन करता है।" आम चुनाव  की रोशनी में वक्ताओं ने कहा" चुनाव व्यवस्था के एक अंग विधायिका का होता है उसे भी वापस बुलाने का अधिकार जनता को नहीं है। जबकि अन्य स्थायी अंग कार्यपालिका, न्यायपालिका को तो जनता चुन ही नहीं सकती है, वापस बुलाने तो दूर। चुनाव का भारी-भरकम खर्च छोड़ भी दें तो सिर्फ वैध फीस ही इतनी है कि आम मज़दूर तो कभी चुनाव में खड़े होने की सोच भी नहीं सकता। जनता का विश्वास अपने संघर्षों में होना चाहिये न कि इस पूंजीवादी तंत्र पर।

             शहादत दिवस पर पद यात्रा निकाली


         हल्द्वानी (उत्तराखंड) हल्द्वानी इकाई द्वारा 23 मार्च को भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव का शहादत दिवस मनाया गया। जिसमें पदयात्रा तथा नुक्कड़ सभाओं का आयोजन किया गया। पदयात्रा के दौरान "ऐ भगत सिंह तू जिन्दा है" गाना गाते हुए, क्रांतिकारी नारों के साथ पदयात्रा बड़ी मंडी से प्रारम्भ की गयी।
          विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग साथियों द्वारा नुक्कड़ सभा के दौरान बातचीत करते हुए बताया गया कि आज का भारत भगत सिंह के सपनों का भारत नहीं हैं। भगत सिंह एक ऐसा समाजवादी भारत चाहते थे जिसमें इंसान द्वारा इंसान का शोषण ना होता हो। एक ऐसा समाज जिसमें आम मेहनतकश मजदूरों का राज हो। जिसमें सारी नीतियाँ बनाने वाले भी आम मेहनतकश हो और सारी नीतियाँ मेहनतकशों के लिए हो। आज एक तरफ अंबानी, अडानी जैसे लोग है जिनके पास अथाह सम्पदा है जिसे उन्होंने मज़दूरों के शोषण के दम पर कमाया है। और एक तरफ आम मेहनत करने वाले लोग है जो दिन-रात खून पसीना एक करके भी जिंदगी जीने के लिए पैसा भी नहीं कमा पाते हैं। 
             आज की सरकारें जो की पूंजीपतियों की हाथ की कटपुतली मात्र हैं। जिनके चेहरे बदल जाते हैं पर नीतियाँ सभी की एक सी होती हैं। ये नीतियाँ पूंजीपतियों के लिए ही बनाती है। आम जनता के सवाल इनकी नीतियों से परे रहते है। आज जहाँ जनता महँगाई, बेरोजगारी, ग़रीबी, भुखमरी जैसी परेशानियों को सह रही है तब आज की ये जरुरत बनती है की सारी जनता एकजुट होकर आवाज उठाये और समाजवादी समाज के लिए संघर्ष तेज करें। जिसका सपना हमारे देश के क्रांतिकारियों ने देखा था।
       परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र. ने सयुंक्त तौर पर ये कार्यक्रम आयोजित किया।

              पर्चा बाटते हुए नुक्कड़ सभा की


                  भगत सिंह को याद करो!
          पूंजीवाद की कब्र खोदो! समाजवाद का झंडा बुलंद करो!

          लालकुआँ उत्तराखण्ड 23 मार्च शहीदे आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू का शहादत दिवस है। परिवर्तनकामी छात्र संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र ने भारत की आजादी के लिए शहीद हुए भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत दिवस के मौके पर हाथीखाना व 25 एकड़ में पर्चा बाँटते हुए नुक्क्ड़ सभा की। सभा में बोलते हुए पछास के महेश ने कहाँ भगत सिंह व उनके साथियों की शहादत दिवस हम ऐसे समय में मना रहे हैं, जब हमारे शासक 'लोकतंत्र का महापर्व' मना रहे है। वे इसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते नहीं थक रहे हैं। उनका सारा तंत्र 24 घंटे और दिन-रात महान लोकतंत्र के बखान में लगा हुआ है। लेकिन ये सारे लोग ये नहीं बता रहे हैं कि यह 'महापर्व' दुनिया का सबसे खर्चिला पर्व है। अखबारों में बताया जा रहा है कि इस बार का चुनाव दुनिया में सबसे खर्चीला चुनाव होगा। वे यह भी नहीं बता रहे हैं कि इस लोकतंत्र में जन तो कहीं हैं ही नहीं। जब से चुनाव हो रहे हैं तब से इस जन की चुनाव के समय ही झूठे नारों के साथ जय होती है। और शेष दिन वह पुलिस, प्रशासन, पूंजीपतियों के शोषण-उत्पीड़न से कराह रहा होता है। मजदूर, गरीब किसान, महिलाएं, छात्र-युवा, आदिवासी, छोटे कारोबारी अपने जीवन की हकीकत से इस शोषण-उत्पीड़न को बखूबी जानते हैं। ये वही जन हैं जिनकी जिंदगी में चुनाव होने से कोई बदलाव नहीं आया।
        भारत के ‘महान लोकतंत्र’ में भारत के मजदूरों, किसानों, शोषितों-उत्पीड़ितों को वर्षों से गरीबी, तंगहाली के अलावा कुछ नहीं मिला है। एक तरफ भारत के पूंजीपतियों की दौलत रात-दिन बढ़ रही है और दूसरी तरफ मजदूर-किसान गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, गैरबराबरी के दलदल में गले तक फंसे हुये हैं। 
        भारत के छात्र-नौजवान महंगी शिक्षा, असुरक्षित भविष्य और बेरोजगारी के कारण हैरान-परेशान हैं।
भारत की आम मेहनतकश औरतें आये-दिन अपमान, उत्पीड़न और यौन हमलों की शिकार हो रही हैं।
दलित, आदिवासी, गरीब मुसलमान इनके दिये जख्मों को सहला रहे है। 
         भगत सिंह ने अपनी फांसी के फंदे पर झूलने से पहले ही देख लिया था कि यदि भारत में गोरे अंग्रेजों के जाने के बाद काले अंग्रेजों का राज आयेगा तो ऐसा ही होगा। भारत के मजदूर, किसान, नौजवान नई तरह की गुलामी में फंस जायेंगे। और यह नई गुलामी पूंजीपतियों की गुलामी है। अम्बानी, अडाणी, टाटा-बिडला की गुलामी है। भगत सिंह ने यह भी देख लिया था कि भारत तभी गोरे-काले अंग्रेजों की गुलामी से निजात पायेगा जब मजदूरों-किसानों का राज आयेगा। समाजवाद आयेगा।
        प्रमएके की पुष्पा ने कहाँ की जब शासक अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने पाया कि ये क्रांतिकारी और इनके विचार उनके राज के लिए खतरा हैं, तो 1931 को इसी दिन अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने इनको फांसी पर चढ़ा दिया। साम्राज्यवादियों के इस डर का एक मजबूत आधार था। भगत सिंह के विचार ही वह ताकत थे जिससे आज भी शोषक, शासक और साम्राज्यवादी बहुत डरते हैं। भगत सिंह ने कहा था,
            ‘‘हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली, ये मुश्ते-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे’’।
        भगत सिंह और उनके साथी साम्राज्यवाद के खिलाफ समझौताविहीन संघर्ष के प्रतीक हैं। दुनिया को गुलाम बनाने वाले साम्राज्यवादियों के खिलाफ दुनिया के मजदूर मेहनतकशों ने अपनी एकता को मजबूत करते हुए संघर्ष का ऐलान किया था। रूस में हुई समाजवादी क्रांति ने इसमें अहम भूमिका निभाई और गुलाम देशों को मुक्ति का मार्ग दिखाया। पूरी ही दुनिया में समाजवाद ने शोषणमुक्त व वास्तविक बराबरी पर आधारित समाज का विकल्प पेश किया। जाहिर है कि साम्राज्यवाद व सामंतवाद के खिलाफ संघर्षरत जनता इससे प्रभावित होती और अपने देश को ऐसा ही बनाने का सपना देखती। ऐसा सपना देखने वालों के ही प्रतिनिधि भगत सिंह थे। मजदूर-मेहनतकशों की सत्ता समाजवादी सोवियत संघ से प्रभावित होकर भारत में भी मजदूरों-मेहनतकशों की ऐसी सत्ता के प्रबल समर्थक थे। भगत सिंह वह शख्सियत थे जो हर गुलाम देश में साम्राज्यवाद के विरूद्ध संघर्ष करने वाले मेहनतकशों को उर्जा और प्रेरणा देते थे। 
        पूरी दुनिया आज भी साम्राज्यवाद नामक दानव से मुक्त नहीं है। कभी अफगानिस्तान, कभी इराक तो कभी अन्य देश साम्राज्यवादी लूट शोषण व दमन का शिकार होता है। साम्राज्यवादी जब-तब गरीब मुल्कों को अपने मनमाफिक चलाने, आर्थिक मंचों के जरिये उन पर प्रतिबंध थोपते रहते हैं। साम्राज्यवाद आज भी खुले-छिपे युद्धों व प्रतिबंधों के जरिये इन गरीब देशों की मेहनतकश जनता को मौत के घाट उतार रहा है। और साम्राज्यवाद के कुकर्मों में देशी शासक पूंजीपति वर्ग उनका साथ देते हैं। भारत में अमेरिकी साम्राज्यावाद की जी हजूरी करने में मोदी सरकार ने तो मनमोहन की सरकार को भी पीछे छोड़ दिया है।
        आज जब मजदूरों-किसानों-छात्रों-दलितों के संघर्ष हो रहे हैं तो यह इसी बात को दर्शाते हैं कि वे इस पूंजीवादी लूट-शोषण से ना सिर्फ नाखुश हैं बल्कि इसके खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। देश में उत्पीड़ित दलितों, मजदूरों, पूंजीवादी लूट और शासकों की बेरूखी से त्रस्त किसानों, कालेज-विश्वविद्यालयों के छात्रों के संघर्ष एक अच्छा संकेत है। इन सभी का यह सैलाब एक दिन भगत सिंह की विरासत को आगे बढ़ायेगा और अपनी मुक्ति की ओर बढ़ेगा। जब देश की मेहनतकश जनता एकजुट हो इस पूंजीवादी लूट और दमन का अंत कर देगी। वह अपना वास्तवितक लोकतंत्र-समाजवादी लोकतंत्र स्थापित करेगी। 
        पछास की पिंकी ने कहाँ पांच साल पहले चुनाव के समय मोदी सरकार ने कई-कई वायदे किये थे। ‘अच्छे दिन’ का नारा तो मजाक बनकर रह गया है। जैसे-जैसे मोदी की पोल खुलन लगी और अलोकप्रियता बढ़ने लगी तो नये-नये दांव खेेले गये। 2019 का चुनाव जीतने के लिए देश में युद्ध का माहौल खड़ा कर दिया। युद्धोन्माद, अंधराष्ट्रवाद की हवा फैलाकर चुनाव जीतने की हर चंद कोशिश की जा रही है। राष्ट्रवाद को चुनावी हथकंडा बनाया जा रहा है।
        अन्य वक्ताओं ने भी बात रखी। उन्होंने कहाँ मजदूर, किसान, शोषित-उत्पीड़ित कुछ समय में समझ गये कि यह सब चुनावी हथकंडा है। वे फिर से अपनी रोजी-रोटी, बेरोजगारी, बदहाली की बातों को उठा रहे हैं। वे जल्द ही समझ जायेंगे कि पूंजीवाद में उनकी समस्याओं का कभी भी समाधान नहीं हो सकता है। सिर्फ और सिर्फ समाजवाद ही मजदूरों, किसानों, नौजवानों, शोषितों-उत्पीड़ितों का रास्ता है। और यह रास्ता इंकलाब से होकर जाता है।
        भगत सिंह को आज याद करने का सीधा मतलब है पूंजीवाद-साम्राज्यवाद की कब्र खोदना और समाजवाद का रास्ता बुलंद करना।

   हालिया छात्र आंदोलन पुस्तिका पर कॉलेज में अभियान चलाया


   हल्द्वानी उत्तराखंड परिवर्तनकामी छात्र संगठन की हल्द्वानी इकाई द्वारा एम.बी.पी.जी. कॉलेज में "हालिया छात्र आंदोलन :सबक और चुनौतियाँ " विषय पर निकली पुस्तिका का अभियान लिया।
           छात्र-छात्राओं के मध्य पुस्तिका के बारे में बताते हुए पछास के कार्यकर्ताओं ने कहा कि हाल के समय में कई विश्वविद्यालयों में छात्रों के आंदोलन हुए हैं लेकिन हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (HNLU) व मणिपुर केंद्रीय यूनिवर्सिटी के आंदोलन हमारे लिए महत्वपूर्ण सबक देने वाले हैं।
          HNLU में छात्राओं ने अपने ऊपर हो रहे यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए आंदोलन की शुरुआत की। छात्र-छात्राओं के लिए एच.एन.एल.यू. के भीतर ढेरों पाबंदियां थोपी गयी थी। पढ़ने-लिखने, कैम्पस/हॉस्टल आने-जाने को लेकर उनपर पाबंदियां थोपी गयी और उनकी निगरानी की जाती थी। कुलपति भी इस सब पर मौन धारण किये रहे तथा दोषियों को सजा देने से बचते रहे। कुलपति को हटाने व अपने लिए जनवाद का विस्तार करने में यह आंदोलन सफल रहा। मणीपुर यूनिवर्सिटी के आंदोलन के बारे बताते हुए कार्यकर्ताओं ने कहा कि छोटी मांगों को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन शासन-प्रशासन के भीषण दमन का शिकार हुआ। 6 माह से ज्यादा समय चला यह आंदोलन गिरफ्तारियों,लाठी चार्ज,आंसू गैस व हल्के गोले आदि दमनात्मक कार्यवाहियों के बावजूद आगे बढ़ता रहा और कुलपति को हटाने की मुख्य मांग को मनवाने में सफल रहा।


          इन दोनों आंदोलनों के मुख्य निशाना रहे कुलपतियों के पीछे शासन-प्रशासन से लेकर पी.एम.ओ. का सहयोग समर्थन रहा है। ये दोनों ही आंदोलन अपनी न्यायपूर्ण व जायज मांगो को मनवाने में सफल रहे हैं। इस रूप में ये भविष्य छात्र आंदोलन को एक सबक देते हैं।
          पत्रिका के अभियान में छात्र-छात्राओं के मध्य मध्य लंबी बातचीत कर पुस्तिका का वितरण किया गया।

भोजनमाताओं के समर्थन में पछास

            07 जनवरी को प्रगतिशील भोजनमाता संगठन द्वारा अपने विभिन्न मांगों के लिए धरना प्रदर्शन किया। परिवर्तनकामी छात्र संगठन भोजनमाताओं की मांगो का समर्थन करते हुए कार्यक्रम में शामिल हुआ। सभा को सम्बोधित करते हुए संगठन के साथी उमेश ने कहा कि प्रदेश में भोजनमाताओं की स्थिति बेहद खराब है। उत्तराखण्ड सरकार भोजनमाताओं का बहुत शोषण कर रही है। भोजनमाताओं से मात्र 2000 रूपये में महीने भर काम लिया जाता है। इस तरह सरकार अपने संस्थान में भी महिलाओं को न्यूनतम वेतन नहीं दे रही है। भोजनमाताओं के संघर्ष को सदैव सहयोग, समर्थन का आश्वासन पछास के साथियों द्वारा दिया गया। गौरतलब है, भोजनमाताएं 2000 रूपये मासिक पर स्कूल में बच्चों के लिए भोजन बनाती हैं। जिसमें ईधन (लकड़ी) का इंतजाम वे स्वयं करती हैं। लकड़ी का कोई पैसा तक सरकार नहीं देती। वे लगातार स्कूलों में शोषित-उत्पीड़ित हो रही हैं। कभी भी नौकरी छिन जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। इन तमाम बुरे हालात से लड़ने के लिए भोजनमाताएं संगठित हुई। उनके द्वारा अपनी यूनियन ’प्रगतिशील भोजनमाता संगठन’ बनाया गया। यूनियन बनाने और उपरोक्त कार्यक्रम में प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र की महती भूमिका रही।
              सभा को कई भोजनमाताओं, इंकलाबी मजदूर केन्द्र के अध्यक्ष कैलाश, क्रान्तिकारी लोक अधिकार संगठन के अध्यक्ष पी0पी0 आर्या व प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र की अध्यक्षा शीला शर्मा आदि द्वारा सम्बोधित किया गया।


 
          सावित्रीबाई फुले की याद में सेमिनार
         
   बरेली सावित्री बाई फुले की याद में 6 जनवरी को एक सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार का आयोजन परिवर्तनकामी छात्र संगठन,प्रगतिशील महिला एकता केंद्र,इंक़लाबी मज़दूर केंद्र व क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन द्वारा सयुंक्त तौर पर किया गया। सेमिनार का विषय 'आज महिला मुक्ति आंदोलन के सामने मौजूद चुनौतियां' था।
          सेमिनार में पछास की छात्रा साथियों द्वारा 'आ गये यहां जवा कदम', 'घुंघटे को चेहरे से हटाओ तो सखी' गीत प्रस्तुत किये। पछास के साथियों द्वारा 'आत्म रक्षा' से सम्बन्धित झलकी भी प्रस्तुत की।
          कार्यक्रम का संचालन प्रमएके की रजनी ने किया। प्रमएके की नीता ने सेमिनार पत्र पर विस्तार से बात रखी।इंक़लाबी मज़दूर केंद्र की पूर्णिमा ने मज़दूर महिलाओं के हालात पर बात रखी। 
           कार्यक्रम आज के महिला आंदोलन के समझ चुनौतियों को स्पष्ट कराने में सफल रहाl


      
  महिला हिंसा के विरोध में किये कार्यक्रम

          देहरादून उत्तराखंड आज दिनाक 24/12/18 को महिलाओं पर हो रहे जघन्य अपराधों, आगरा व पौड़ी में छात्राओं के ऊपर हुए हमले के उपरान्त उनकी मौत से आक्रोशित विभिन्न जनसंगठनों व न्यायप्रिय नागरिकों सहित परिवर्तनकामी छात्र संगठन ने गांधी पार्क, देहरादून में धरना दिया व दरिंदों की शिकार हुई छात्राओं को श्रदांजली दी।
          धरने में वक्ताओं ने छात्राओं की हत्या के आरोपियों को जल्द से जल्द कड़ी सजा देने, महिला हिंसा पर रोक लगाने, छात्राओं-महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने, अश्लील फिल्मों-विज्ञापनों पर रोक लगाने, पुरुष-प्रधान मानसिकता पर रोक लगाने, महिलाओं को 'उपभोग की वस्तु' के बतौर प्रस्तुत करने वाली पूंजीवादी संस्कृति पर रोक लगाने की मांग की।

संजली को न्याय दिलाने हेतु सौपा ज्ञापन

         बरेली, उत्तर-प्रदेश 18 दिसम्बर 2018 को आगरा में दलित छात्रा संजली को अपराधियों द्वारा पैट्रोल डालकर आग लगा दी गयी। छात्रा का शरीर अत्यधिक जल जाने की वजह से उसकी मृत्यु हो गयी। महिला हिंसा रोकने हेतु जिला अधिकारी बरेली के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौपा गया। ज्ञापन में मांग की गई-
1- 'संजली दलित छात्रा हत्याकांड' के अपराधियों पर कड़ी कानूनी कार्यवाही की जाये। 
2- महिला हिंसा रोकने हेतु अति संवेदनशील होते हुए कड़े कदम उठाये जाये। 
          कार्यक्रम में परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन व आटो-रिक्शा टैम्पो चालक चालक वैलफियर ऐशोसिसन के कार्यकर्ता मौजूद रहे।

काकोरी के शहीदों को श्रद्धांजली में विभिन्न इकाइयों द्वारा किये गये कार्यक्रम

हल्द्वानी (उत्तराखंड) 19 दिसम्बर को परिवर्तनकामी छात्र संगठन ,क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन तथा प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के कार्यकर्ताओं ने काकोरी के शहीदों को श्रद्धांजली दी । हल्द्वानी (नैनीताल ) के बुद्ध पार्क में एकत्रित होकर सभी ने काकोरी के शहीद अशफाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह व राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी की फोटो पर पुष्प अर्पित कर उनको श्रद्धांजली दी और उनके बताये मार्ग पर चलने तथा उनके सपनो को साकार करने का संकल्प लिया।
          श्रद्धांजली अर्पित करने के बाद बुद्ध पार्क में ही एक सभा की गई। जिसको सभी संगठनों के प्रतिनिधियों ने संम्बोधित किया। सभा की शुरुआत में क्रांतिकारी गीत 'सरफरोशी की तमन्ना' से की गई। सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि काकोरी के शहीदों की विरासत हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल है। कैसे अशफाक उल्ला खा और राम प्रसाद बिस्मिल एक ही उद्देश्य के सांथ फांसी पर चढ़ गए। काकोरी के शहीदों का सपना एक शोषणमुक्त व बराबरी वाले भारत का सपना था। क्योंकि उनका सपना आज भी अधूरा है। इसलिए इन शहीदों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए हमें शोषण मुक्त व बराबरी पर आधारित समाज के निर्माण के संघर्ष को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
          19दिसम्बर की श्रद्धांजली सभा से पूर्व परिवर्तनकामी छात्र संगठन ने "अमर शहीदों का पैगाम जारी रखना है संग्राम"नामक पर्चों का प्रकाशन कर उसको छात्रों और युवाओं के मध्य वितरित किया। इस पर्चे को विभिन्न कोचिंग सेंटरों तथा इंटर कालेज के छात्रों के मध्य क्लास गैदरिंग कर वितरित किया गया।


लालकुआं (उत्तराखंड) परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास), प्रगतिशील महिला एकता केंद्र ने संयुक्त रूप से काररोड़, लालकुआं (नैनीताल) में 17 दिसम्बर की सुबह प्रभात फेरी निकाली। उससे पूर्व "अमर शहीदों का पैगाम जारी रखना है संग्राम" नामक पर्चे को जारी कर कोचिंग सेंटर व युवाओं के मध्य वितरण किया गया।
          प्रभात फेरी में काकोरी के शहीदों को लाल सलाम। अश्फाक-बिस्मिल की शहादत अमर रहें। रोशन-लाहिणी की शहादत अमर रहें। अमर शहीदों का पैगाम जारी रखना है संग्राम। आदि नारों से नगर को गुंजायमान किया। 
          19 दिसंबर बुधवार को काकोरी के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए काली मन्दिर बंगाली कालौनी लालकुआं में एक नुक्कड़ सभा की ।
          सभा में वक्ताओं ने शहीदों के सपनो को पूरा करने के लिए छात्रों-नौजवानों, मजदूर-मेहनतकशों, महिलाओं के संघर्षों को तेज करने का संकल्प लिया। सभी वर्गों की मुक्ति के लिए मजदूर राज समाजवाद लाना होगा। इस संघर्ष को तेज करना ही शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इसके लिए हम सभी को आगे आना होगा। सभा के अंत में 'जागो फिर एक बार' गीत भी गाया गया।


काशीपुर (उत्तराखंड) काशीपुर में पंत पार्क में सभा की। सभा के अंत में 'नफ़स-नफ़स, कदम-कदम' गीत गाया गया। पछास के अलावा इमके, रिचा श्रमिक संगठन व डेल्टा श्रमिक संगठन के कार्यकर्ता शामिल रहे

रामनगर (उत्तराखंड) 19 दिसम्बर को काकोरी के शहीदों को याद करते हुए परिवर्तनकामी छात्र संगठन ने शहीद पार्क, रामनगर (उत्तराखंड) में सभा का आयोजन किया। सभा का संचालन रवि ने किया। सभा की शुरूआत ‘जागो फिर एक बार’ गीत के द्वारा की गयी।
           सभा में बात रखते हुए वक्ताओं ने बताया कि स्वंतत्रता के संघर्ष को लड़ते हुए काकोरी के क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासकों को खुली चुनौती पेश की, आज ‘अशफाक-बिस्मिल’ की साझी विरासत को आगे बढ़ाते हुए फासीवाद के खिलाफ लड़ने की जरूरत हैं। वहीं साम्राज्यवाद की जारी लूट-शोषण को खत्म करने का संघर्ष भी बाकी है।
          अन्य वक्ता ने कहा, आज सरकार मजदूरों-मेहनतकशों की आवाज उठाने वालों को 'अर्बन नक्सल' के नाम पर दबाने पर आमादा है। यह अंग्रेजों द्वारा क्रांतिकारियों को ‘आतंकवादी’ कहकर जनता के बीच बदनाम करने जैसा ही है।
          सभा में अन्य वक्ता ने कहा कि आज देश में मजदूर-किसान लूट-शोषण के शिकार हैं, बेरोजगार नौजवान दर-दर की ठोकरों खाकर भी बेरोजगार है। महिलायें यौन हिंसा की शिकार हो रही हैं। शासक पार्टियां धार्मिक उन्माद फैलाने की गलाकांटू प्रतियोगिता कर रही हैं। फैज अहमद फैज की पंक्ति ‘ये वो सहर तो नहीं जिस की आरजू लेकर चले थे’ आज के समय पर लागू होती हैं।
          कार्यक्रम में इंकलाबी मजदूर केन्द्र, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र, देवभूमि विकास मंच, डेल्टा श्रमिक संगठन के कार्यकर्ता शामिल हुए।


संघी डी.यू. प्रशासन मुर्दाबाद........



      आज डीयू में कांचा इलैया, नंदिनी सुंदर, क्रिस्टोफर की किताबों को राजनीतिक विज्ञान के पाठ्यक्रम से हटाए जाने के खिलाफ पब्लिक मीटिंग आयोजित की गयी। पब्लिक मीटिंग में बात रखते हुए तमाम वक्ताओं ने कहा कि लेखकों की किताबों को पाठ्यक्रम से हटाने की कार्यवाही ये दिखाती है कि संघी सरकार इनके विचारों से कितना घबराती है।



         कांचा एक दलित चिंतक हैं। और उनकी सभी किताबों में ब्राह्मणवाद की कटु आलोचना मौजूद है। इसी तरह से नंदिनी की किताब बक्सर में सरकार द्वारा आदिवासियों पर किए जा रहे जुल्मों-सितम को खोल कर रखती है। क्रिस्टोफर अपनी किताब में आरएसएस की खुली आलोचना करते है। कुल मिलाकर ये सभी लेखक मौजूदा सरकार की विचारधारा को चुनौती देते हैं। ऐसे में उनके विचारों को छात्रों तक पहुंचने से रोकने के लिए उनकी किताबों को बैन किया जा रहा है जोकि एक फासीवादी कदम है। जिसका पुरजोर विरोध होना चाहिए।

                    

                      सभा में सभी छात्र संगठनों सहित पछास के साथियों ने भी अपनी बात रखी। राजनीतिक विज्ञान के छात्रों ने अपनी बात रखते हुए कहा कि बिना हमसे पूछे ‘स्टेंडिंग कमेटी’ द्वारा ये निर्धारित किया जा रहा है कि हमें क्या पढ़ना चाहिए। जबकि हम सभी लेखकों को पढ़ना चाहते हैं। तमाम विचारधाराओं को पढ़ने के बाद ही एक छात्र ये निर्धारित कर सकता है कि कौन सी विचारधारा सही है। परंतु आज बीजेपी सरकार सभी शिक्षा संस्थानों पर केवल अपनी विचारधारा थोपना चाहती है जोकि बिल्कुल गलत है।

       सभा में डीयू के प्रोफेसर केशवा कुमार, सरोज गिरी, अपूर्वानंद, भूपेंन्द्र चौधरी तथा जेएनयू से अजमेर सिंह ने अपनी बात रखी।


गैर गुजराती लोगों के खिलाफ हिंसा के विरोध में





        रामनगर  गैर गुजरातियों खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के मजदूरों पर हो रहे हमलों के विरोध में परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोकअधिकार संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र ने एस.डी.एम. हल्द्वानी के माध्यम से राष्ट्रपति, भारत को ज्ञापन प्रेषित किया गया।




       गुजरात में गैर गुजराती प्रवासियों खास तौर पर बिहार, यू.पी., मध्यप्रदेश के मजदूरों पर हमले किये जा रहे हैं। इन प्रदेशों से मजदूरी करने गये मजदूरों को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे वे पलायन को मजबूर हैं। बेरोजगारी देशभर के सभी राज्यों में विद्यमान है। जिस कारण से लोगों को मजदूरी करने हेतु जिन राज्यों में रोजगार मिलता है, वहां जाने को मजबूर हैं। इस प्रकार देश के हर नागरिक का अधिकार बनता है कि वो देश के किसी भी राज्य में जाकर रोजी-रोटी कमा सकता है। ऐसे में तमाम बहानों से मजदूरों पर हमले किये जाने को क्षेत्रवादी दल तैयार रहते हैं। महाराष्ट्र में शिव सेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ऐसे हमलों को प्रायोजित करती हैं। तो गुजरात में संघ-भाजपा की शह पर यह हो रहा है। 


समाज में मजदूर वर्ग असुरक्षित है। सरकारें मजदूरों के खिलाफ श्रम कानून बना उन पर हमलावर हैं। मजदूर भाजपा-संघ के मजदूर विरोधी व विघटनकारी फासीवादी हथकण्डों के शिकार हो रहे हैं। वहीं कांग्रेस या अन्य राजनीतिक दल भी अपने तुच्छ राजनीतिक लाभों के लिए क्षेत्रवादी राजनीति के जरिये हमलावर हैं। 


मजदूर वर्ग को चाहिए कि वह अपनी वर्गीय एकता के बल पर इस फासीवादी, विघटनकारी राजनीति को चुनौती पेश करे। यह समाजवाद के क्रांतिकारी विचारों पर खड़े होकर ही संभव है। पूंजीवादी व्यवस्था के समूल नाश और मजदूर राज समाजवाद के निर्माण से ही ऐसे हमलों से अंतिम तौर पर निजात मिल सकती है। 

सीमित प्रवेश नीति के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चला ज्ञापन सौंपा

कुमाऊं विश्वविद्यालय में सीमित संख्या में छात्रों को प्रवेश देने के फैसले के खिलाफ छात्र संघर्षरत रहे। इसको लेकर परिवर्तनकामी छात्र संगठन ने एम.बी.पी.जी. कॉलेज हल्द्वानी, लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय हल्दूचौड़ व पी.एन.जी. महाविद्यालय रामनगर में छात्रों के बीच सम्पर्क अभियान चलाया। इस दौरान ‘आओ, सबको प्रवेश के लिए वास्तविक संघर्ष के लिए लड़े’ शीर्षक से पर्चा भी वितरित किया। छात्रों के बीच हस्ताक्षर अभियान चलाया गया तथा प्राचार्य के माध्यम से मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड को ज्ञापन प्रेषित किया गया। 


इस पूरे मामले में सरकार, उच्च न्यायालय, विश्वविद्यालय का रुख सभी छात्रों को प्रवेश देने का नहीं है। संसाधनों के अभाव का बहाना बना इसकी कीमत छात्रों को चुकाने पर मजबूर किया जा रहा है। शासन-विश्वविद्यालय अपनी जिम्मेदारी (सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की) निभाने की जगह छात्रों को ही शिक्षा से दूर कर रहा है। 
इस समय उत्तराखण्ड में भाजपा की सरकार है। सरकार गुणवत्ता की बातें जोर-शोर से कर रही है। यह कितना लफ्फाजी भरा तर्क है। एक तरफ संघी मंत्री शिक्षा में अतार्किकता-कूपमण्डूकता का प्रचार करते हैं, संस्थानों में संसाधनों की कमी पूरी नहीं करते हैं; और बातें गुणवत्ता की। गुणवत्ता; संस्थानों के लिए बजट जारी करने, शिक्षकों-संसाधनों की कमी दूर करने से बढ़ेगी। हम पाते हैं कि पूरे देश में ही शिक्षण संस्थानों में संघी कूपमण्डूकता-फासीवादी हमले जारी हैं तो दूसरी तरफ सरकार उच्च शिक्षा में बजट कटौती कर रही है। ऐसे में छात्रों के संघर्ष को सरकार एवं व्यवस्था के खिलाफ लामबन्द किये जाने की जरूरत है। 
इस दौरान हुए छात्र आन्दोलनों में संघी छात्र संगठन सीमित प्रवेश नीति का विरोध करता दिखा। इस आन्दोलन का मकसद सभी छात्रों को प्रवेश दिलाने की जगह छात्र संघ चुनाव का क्षुद्र स्वार्थ था। सरकार की निजीकरण की नीति को कहीं निशाना नहीं बनाया गया। 

ऐसे में परिवर्तनकामी छात्र संगठन सभी को प्रवेश देने, शिक्षकों-कर्मचारियों के रिक्त पदों को भरने, उच्च शिक्षा में बजट खर्च को बढ़ाने की मांग के साथ छात्रों को उद्वेलित करने का प्रयास करता रहा है। आज सबको शिक्षा और रोजगार का संघर्ष यह मांग करता है कि इस अन्यायपूर्ण पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष किया जाये। केवल ऐसा संघर्ष ही इस पूंजीवादी व्यवस्था से मुक्ति दिला सकता है। समाजवाद ही छात्रों एवं नागरिकों को एक सम्मानपूर्ण जीवन दे सकता है। 



उधम सिंह शहादत दिवस पर प्रचार अभियान



काशीपुर (उत्तराखण्ड), 31 जलाई उधम सिंह शहादत दिवस पर इकाई ने राधे हरी महाविद्यालय में छात्रों के बीच प्रचार अभियान चलाया। इस दौरान संगठन द्वारा उधम सिंह पर जारी पुस्तिकाओं का छात्रों के बीच वितरण करके उधम सिंह के साम्प्रदायिकता व साम्राज्यवाद विरोधी विचारों को छात्रों के बीच प्रचारित किया गया।

बुक स्टाल का आयोजन


रामनगर (उत्तराखण्ड) की इकाई ने 31 जुलाई को उधम सिंह की शहादत और प्रेमचंद के जन्म दिवस पर छात्रों के बीच उनके विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए क्रांतिकारी साहित्य का स्टाल लगाया। इस बीच भारी संख्या में छात्रों ने स्टाल में भागीदारी की। स्टाल में इमके के साथी भी मौजूद थे।

मजदूर बस्ती में मेडिकल केम्प का आयोजन

    दिनाँक 14-05-2017 को क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इंकलाबी मजदूर केन्द्र, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र. प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम, द्वारा एक मेडिकल केम्प का आयोजन हजरत चिराग अली शाह बाबा की दरगाह (बुध बाजार )गफूर बस्ती हल्द्बानी (नैनीताल) में किया गया।



      मेडिकल केम्प में प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम के मेरठ से आये डॉक्टर अजीत व डॉक्टर शिवांगी और देहरादून से डॉक्टर आशुतोष कुमार ने मरीजों की जांच की और दवा वितरित की। प्रातः 10:30 बजे से सांय 5:30 बजे तक केम्प मे डॉक्टर साथियों ने करीब 600 मरीजों को देखा और दवा वितरित की। केम्प मे इंकलाबी मजदूर केन्द्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्ररिवर्तनकामी छात्र संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र और प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम के कार्यकर्ताओ ने भागीदारी की ।






महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों के विरोध में प्रदर्शन



        लालकुंआ (उत्तराखण्ड), 11 दिसम्बर को इन्द्रानगर गौलागेट बिन्दुखत्ता में 80 वर्षीय वृद्धा के साथ 22 वर्षीय धीरज तिवारी नामक शख्स ने बलात्कार कर उन्हें जान से मारने की कोशिश की। आमा(दादी मां) घटना के बाद से अस्पताल में भर्ती हैं और विकट परिस्थितियों में मौत से जूझ रही हैं। 

        इस पूरी घटना के बाद से आरोपी की गिरफ्तारी होने के बाद प्रशासन आमा के इलाज आदि के प्रति निरंतर लापरवाही दिखाता रहा है। ऐसे में पीड़िता को तत्काल राहत देने व महिलाओं पर बढ़ रहे अपराधों के विरोध में प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र ने शहर के विभिन्न इलाकों में ‘आमा जूझ रही हैं मौत से और समाज खामोश है’ शिर्षक वाले पर्चे का वितरण किया। इसी कड़ी में आज 9 दिसम्बर को उपरोक्त मांगों को लेकर हल्द्वानी में एक विशाल जुलूस निकाला गया। इस पूरे कार्यक्रम में पछास के साथियों ने भी भागीदारी की। 

        इस दौरान चली सभा को सम्बोधित करते हुए पछास के महेन्द्र ने कहा कि आज समाज में किसी भी उम्र की महिलाएं सुरक्षित नही हैं। समाज में ऐसे बहशी दरिंदे पैदा होते जा रहे हैं जोकि छोटी बच्चियों से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक को अपनी हवस का  शिकार बना रहे हैं। पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा पोषित उपभोक्तावादी संस्कृति और सामंती पुरूष प्रधान मानसिकता निरंतर ही ऐसे दरिंदों को पैदा कर रही है। ऐसे में केवल अपराधी की गिरफ्तारी की मांग को लेकर नही बल्कि हमें समाज में मौजूद महिलाओं की हर तरह की गैरबराबरी के खिलाफ संघर्ष तेज करने होंगे।

        जुलूस-प्रदर्शन में प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, इंकलाबी मजदूर केन्द्र, उत्तराखण्ड महिला मंच व उत्तराखण्ड अधिकार मंच के कार्यकर्ता शामिल थे।






काकोरी काण्ड के शहीदों की याद में........


18 दिसम्बर लालकुंआ (उत्तराखण्ड), परिवर्तनकामी छात्र संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र तथा इंकलाबी मजदूर केन्द्र ने संयुक्त तौर पर काकोरी काण्ड के शहीदों अशफाक, बिस्मिल, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी व रोशन सिंह को याद करते हुए श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया।

सभा की शुरूआत चारों शहीदों को श्रद्धांजलि देकर व बिस्मिल के गीत ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ गााकर की गयी।

पछास की रश्मि ने सभा का संचालन करते हुए कहा कि काकोरी के शहीदों ने देश को ब्रिटिश साम्राज्यवाद से आजाद कराने की कोशिश में फांसी के फंदे को हंसते-हंसते चूम लिया। ब्रिटिश साम्राज्यवाद का समूल नाश ही उनका लक्ष्य था।

महेश ने बात रखते हुए कहा कि आज भी काकोरी के शहीदों के सपनों का भारत अधूरा है। जिस गैरबराबरी पर टिके समाज के निर्माण के लिए उन्होने अपनी शहादत दी वह अभी तक नही बन पाया है। आज भी मजदूरों, किसानों, महिलाओं, दलितों का शोषण-उत्पीड़न-दमन जारी है। एक बराबरी पर टिका भारत ही इन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगा। इसलिए भी हम छात्रों-नौजवानों को शहीदों के सपनों का समाज ‘समाजवादी समाज’ के निर्माण के लिए संघर्षो को तेज करने के लिए जोर-शोर से लग जाना चाहिए।


18 दिसम्बर रामनगर(उत्तराखण्ड), काकोरी के शहीदों को याद करते हुए परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इंकलाबी मजदूर केन्द्र व प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र ने शहीद पार्क लखनपुर पर एक सभा की। इससे पूर्व 16 व 17 दिसम्बर को खताड़ी एवं रेलवे कालोनी में अभियान चलाया गया। सभा का विषय ‘शहादतें व हत्याएं’ रखा गया था। 

सभा का संचालन करते हुए पछास के चंदन ने कहा कि जनता के खिलाफ पूंजीपति वर्ग निरंतर हमले बोलते रहता है। जो लोग शासक वर्ग के खिलाफ लड़ते हुए मारे जाते हैं वे शहीद कहलाते हैं। जो लोग बिना लड़े हुए मरते हैं वे मौतें होती हैं। जब हम लड़ते हैं तभी समाज में बदलाव आता है। इसलिए आज हमें शहीदों के बताए हुए रास्तों पर आगे बढ़ने की जरूरत है।

सभा को इमके के पंकज, सूरज, भुवन, उबैद, प्रमएके की शीला शर्मा, पछास के लोकेश, उमेश ने सम्बोधित किया। अपने सम्बोधन में वक्ताओं ने शहीदों को याद करते हुए बताया कि वर्तमान व्यवस्था पूरी तरह फैल हो चुकी है। नोटबंदी करके सरकार ने मजदूर-मेहनतकश जनता पर हमला बोला है। छोटे दुकानदारों और छोटे व्यापारियों पर भी नोटबंदी का व्यापक असर हुआ है। मात्र कैशलेस से समाज को भ्रष्टाचार, कालेधन, आतंकवाद से मुक्त नही किया जा सकता है। ऐसा केवल तभी हो सकता है जब पूंजीवादी व्यवस्था की जगह पर समाजवादी व्यवस्था स्थापित हो। सभा में क्रांतिकारी गीतों के जरिए भी शहीदों को याद किया गया। 



अक्टूबर क्राति शताब्दी वर्ष पर विभिन्न स्थानों पर सेमिनारों का आयोजन

           27 नवंबर रूद्रपुर(उत्तराखण्ड), रूसी अक्टूबर समाजवादी क्रांति की 100वीं वर्षगांठ के अवसर पर ‘अक्टूबर क्रांति शताब्दी समारोह समिति’ ने महाराजा पैलेस में एक सेमिनार आयोजित किया। ‘संकटग्रस्त पूंजीवाद विकल्प सिर्फ और सिर्फ समाजवाद’ विषयक सेमिनार का संचालन सुरेन्द्र और बिन्दू गुप्ता ने किया तथा अध्यक्षता क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के अध्यक्ष पी.पी. आर्या, शिवदेव सिंह, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र की अध्यक्षा शीला शर्मा तथा मजदूर सहयोग केन्द्र के मुकुल ने की। 

        सेमिनार पत्र प्रस्तुत करते हुए परिवर्तनकामी छात्र संगठन के चंदन ने कहा कि मौजूदा समय में विश्व पूंजीवादी व्यवस्था गहरे संकट में फंसी है। सरकारों ने पूंजीपतियों को बचाने के लिए सारा बोझ मजदूरों-मेहनतकशों पर डाल दिया है। पूंजीवाद के इस असमाधेय संकट का हल सिर्फ और सिर्फ समाजवादी क्रांति है। सीटू के मणिन्द्र मण्डल ने कहा कि जनता की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है और व्यवस्था के पास इसका कोई हल नही है। अक्टूबर क्रांति के विचार ही मुक्ति के विचार हैं।

         सेमिनार में बात रखते हुए पछास के महेन्द्र ने कहा कि मौजूदा आर्थिक संकट अमेेरिका में ‘सबप्राइम संकट’ के रूप में शुरू हुआ और देखते ही देखते पूरी दुनिया को इसने अपने आगोश में ले लिया। सरकारों के विभिन्न प्रयास असफल हो रहे हैं। यह संकट अपनी बारी में राजनीतिक व समाजिक संकटों को भी पैदा कर रहा है। हाल-बेहाल पूंजीपति वर्ग फासीवादी ताकतों को बढ़ावा देकर इस संकट से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहा है।

          इंकलाबी मजदूर केन्द्र के अध्यक्ष कैलाश भट्ट ने कहा कि अक्टूबर क्रांति ने स्वंय को पूंजीवाद के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। आज मानवजाति के पास समाजवाद के रूप में एक बेहतर विकल्प उपलब्ध है। रूसी क्रांति द्वारा निर्मित समाजवादी समाज के सहयोग-समर्थन से ही बींसवी सदी के मध्य तक दुनिया वहां पहुंच गयी जहां एक-तिहाई दुनिया पूंजीवादी-सम्राज्यवादी जकड़बंदी को तोड़कर समाजवादी खेमे का निर्माण कर सकी। भारत समेत दुनिया में चलने वाले राष्ट्र-मुक्ति के संघर्षो को सोवियत समाजवाद ने तीव्र उर्जा प्रदान की।

         सेमिनार का समापन भाषण देते हुए क्रालोस के अध्यक्ष पी.पी. आर्या ने कहा कि अक्टूबर क्रांति सरीखी समाजवादी क्रांति ही भारत के मेहनतकशों के दुख-तकलीफों का अंत कर सकती है। समाज से शोषण, दमन व उत्पीड़न का खात्मा कर सकती है। दुनियाभर के लुटेरे शासकों को नयी समाजवादी क्रांतियों का डर सता रहा है। पूंजीवाद की हार व समाजवाद की जीत दोनों ही निश्चित है। इसलिए हमें समाजवाद के लिए संघर्ष को तेज करने की जरूरत है।

         सेमिनार में विभिन्न इलाकों से आए सैकड़ों लोगों ने भागीदारी की। सेमिनार को प्रभुनाथ वर्मा, सीपीआई के जिला मंत्री राजेन्द्र गुप्ता, आटोलाइन ट्रेड यूनियन के आशीष रस्तोगी, प्रिकाॅल मजदूर संगठन के अध्यक्ष विजय चैहान, रिचा श्रमिक संगठन के सुरेश, किच्छा चीनी मिल के रूद्रपताप सिंह, मजदूर सहयोग केन्द्र के मुकुल आदि ने संबोधित किया। 



बरेली(यूपी), अक्टूबर क्रांति शताब्दी समारोह समिति द्वारा 27 नवंबर को ‘संकटग्रस्त पूंजीवाद विकल्प सिर्फ और सिर्फ समाजवाद’ विषय पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। 

सेमिनार में वक्ताओं द्वारा पूंजीवादी व्यवस्था में संकट, मंदी की अवश्यमभाविता पर बोलते हुए बताया कि संकट से निकलने के लिए पूंजीवाद, फासीवादी सत्ताओं और युद्धों को जन्म देता है। पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा जनित इस संकट की कीमत दुनिया का मजदूर वर्ग व युवा वर्ग चुका रहा है। संकट से तबाह-हाल दुनिया का मजदूर, बेरोजगार, युवा शासको के खिलाफ संघर्ष भी कर रहा है। इन संघर्षो को समाजवाद की दिशा में बढ़ने की आवश्यकता पर भी वक्ताओं ने जोर दिया।

सेमिनार को पछास, इमके, क्रालोस के साथियों द्वारा संबोधित किया गया। आमीर खां, अशोक कुमार, कृष्ण गोपाल आदि साथियों द्वारा सेमिनार को संबोधित किया गया।


18 दिसम्बर को अक्टूबर क्राति शताब्दी वर्ष समारोह समिति (घटक संगठन- इंकलाबी मजदूर केन्द्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र) तथा जन संघर्ष मंच (हरियाणा) द्वारा संयुक्त रूप से 1917 की अक्टूबर क्रांति के जारी शताब्दी वर्ष पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार का विषय ‘अक्टूबर क्रांतिः सबक और प्रासंगिकता’ था। सेमिनार में अक्टूबर क्राति शताब्दी वर्ष समारोह समिति द्वारा ‘संकटग्रस्त पूंजीवाद विकल्प सिर्फ और सिर्फ समाजवाद’ शिर्षक से सेमिनार पेपर (सेमिनार पेपर पढ़ने के लिए क्लिक करें-संकटग्रस्त पूंजीवाद विकल्प सिर्फ और सिर्फ समाजवाद) भी रखा गया जिस पर सेमिनार में उपस्थित सभी साथियों ने सहमति जतायी।

सेमिनार पेपर पर अपनी बात रखते हुए इंकलाबी मजदूर केन्द्र के साथी नगेन्द्र ने कहा कि ‘आज पूरी विश्व अर्थव्यवस्था संकट का शिकार है। भारत समेत तमाम देशों में बेरोजगारी से लेकर समाजिक असमानता लगातार बढ़ती जा रही है। संकट से बर्बाद जनता को बांटने व उनके दमन के लिए पूंजीवादी शासक निरंतर फासीवादी ताकतों की गोद में बैठते जा रहे हैं। यही कारण है कि प्रत्येक देश में दक्षिणपंथी ताकतें मजबूत हो रही हैं जो पहले से ही तबाह मेहनतकश जनता को और निचोड़ने का काम कर रही हैं। पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा किए गए इस संकट का हल केवल और केवल पूंजीवादी व्यवस्था के अंत में है। समाजवाद ही पूरी दुनिया को इन संकटों और फलस्वरूप फासीवाद से मुक्ति दिला सकता है।’

सेमिनार में बात रखते हुए जन संघर्ष मंच के साथी श्याम सुन्दर ने कहा कि महान अक्टूबर क्रांति पहली ऐसी क्रांति थी जिसने मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को खत्म कर दिया। ये पहली ऐसी क्रांति थी जिसमें मेहनकश तबका सत्ता को चला रहा था और जिसने ये साबित किया कि ये दुनिया पूंजीपतियों के बगैर बहुत बेहतर तरीके से चलायी जा सकती है। उन्होने रूसी क्रांति से सबक निकालते हुए भारत में भी क्रांति की जरूरत पर जोर दिया और इसके जिए सभी क्रांतिकारी ताकतों को माक्र्सवादी विचारों पर एक होने का विचार रखा।

परिवर्तनकामी छात्र संगठन के साथी दीपक ने अक्टूबर क्राति के सबक पर बात रखते हुए कहा कि ‘ अक्टूबर क्राति ने साबित किया कि माक्र्सवाद कोई जड़सूत्रवादी सिद्धांत नही है बल्कि ये दुनिया को बदलने का विज्ञान है। आज भारत के भीतर सरकारी वामपंथियों द्वारा चुनाव के जरिए क्रांति लाने की बातें की जा रही हैं। व्यवस्था परिवर्तन के रास्ते को छोड़ चुकी ये पार्टियां पूंजीपति वर्ग की बी टीम हैं। अक्टूबर क्रांति के सबको में एक सबक ये भी है कि मजदूर आंदोलन से जब तक ऐसी ताकतों को बाहर नही किया जाता तब तक मजदूर वर्ग क्रांति की ओर आगे नही बढ सकता है। अक्टूबर क्रांति ने ये साबित किया कि पूंजीवाद द्वारा जनित सभी बिमारियों जैसे-बेरोजगारी, गरीबी, वेश्यावृत्ति, राष्ट्रीय समस्या, मंदी आदि का हल सिर्फ और सिर्फ समाजवाद ही कर सकता है। इसलिए भी छात्रों-नौजवानों को मजदूर वर्ग के साथ मिलकर समाजवाद की दिशा में संघर्षों को तेज करने की जरूरत है।’

प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र की रिचा ने ‘अक्टूबर क्रांति और महिलाएं’ विषय पर बात रखते हुए कहा कि अक्टूबर क्रांति  में मजदूर महिलाएं, पुरूष मजदूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पूंजीपति वर्ग के खिलाफ संघर्ष कर रही थी। अक्टूबर क्रांति ने पहली बार वो परिस्थितियां उपलब्ध करायी जो महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक गुलामी को तोड़ने का काम करती थी। महिलाओं को सामाजिक उत्पादन से जोड़ते हुए समाजवादी समाज ने उन्हें समाज में बराबरी के फैसले लेने का अधिकार दिया। जायज-नाजायज सभी बच्चों की जिम्मेदारी राज्य की होती थी। सामूहिक भोजनालय, शिशुपालन गृह आदि के द्वारा समाजवादी समाज ने महिलाओं के पैरों में पड़ी पारिवारिक बेड़ी को छिन्न-भिन्न कर दिया। अक्टूबर क्रांति ने दिखाया कि महिलाओं की मुक्ति केवल और केवल समाजवाद में ही सम्भव है।’

सेमिनार में जन संघर्ष मंच के सी. डी. शर्मा, कविता विद्रोही इंकलाबी मजदूर केन्द्र के श्यामवीर, योगेश,  डब्लू.एस.एस. की पायल, क्रांतिकारी नौजवान सभा के पराग, डीयू के छात्र मनीष आदि वक्ताओं ने भी बात रखी। अक्टूबर क्रांति शताब्दी वर्ष समारोह समिति तथा जन संघर्ष मंच के साथियों ने क्रांतिकारी गीतों के साथ सेमिनार का समापन किया।






DU के सभी छात्रों के लिए हाॅस्टल की व्यवस्था करो

        
        26 अगस्त, पछास की दिल्ली इकाई ने डीयू में सभी छात्रों के लिए हाॅस्टल की व्यवस्था करने, रूम रेंट को रेगुलेट करने के लिए प्रभावी कानून बनाने तथा डीयू में सस्ते रेट पर छात्रों के लिए एक मैस की व्यवस्था करने की मांग करते हुए आर्ट फैकल्टी गेट के सामने एक सभा का आयोजन किया।
        सभा का संचालन करते हुए पछास की शिप्रा ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग 1 लाख 80 हजार छात्रों का एडमिशन है। इसमें से लगभग 1 लाख छात्र डे-स्काॅलर हैं। ऐसे में डीयू में लगभग 80 हजार छात्रों को हाॅस्टल की जरूरत है। परंतु डीयू में केवल 9 हजार छात्रों के लिए ही हाॅस्टल की व्यवस्था है। सालों से डीयू प्रशासन इस मामले पर चुप्पी लगाए बैठा हुआ है। हाॅस्टल की कमी के चलते हजारों छात्रों को डीयू के आस-पास पीजी/फ्लैट में रूम लेकर रहना पड़ता है। जहां मकान मालिक छात्रों की जेब को काटने की फिराक में बैठे रहते हैं। पीजी/फ्लैट में पहले दिन से ही सिक्यूरिटी एमाउन्ट, बिजली बिल तथा मनमाने किराए के नाम पर छात्रों को लूटने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। जो सालों तक छात्रों की पीछा नही छोड़ती। अकेला छात्र, मकान मालिक-नेता-पुलिस गठजोड़ के आगे बेबस सा लुटता रहता है। आज जरूरत बनती है कि संगठित होकर लूट के इस क्रम को तोड़ा जाए। डीयू प्रशासन की चुप्पी को तोड़ा जाए।
        सभा में बात रखते हुए पछास के अमन ने कहा कि मंहगी शिक्षा प्राप्त करके तैयार होने वाला छात्र भी अपनी बारी में अधिक से अधिक भ्रष्टाचार करके पैसा कमाना चहाता है। डीयू में मेहनतकश परिवार से आने वाले अधिकांश छात्रों को सस्ते कमरों की चाह में डीयू से दूर रहना पड़ता है तो कई छात्रों को इन मंहगे कमरों का किराया चुकाने के लिए पार्ट टाइम जाॅब तक करना पड़ता है। रूम रेंट को लेकर कोई प्रभावी कानून ना होने के चलते मकान मालिक जब-तब किराया बढ़ातेे रहते हैं। ऐसे में सीधे ही सवाल उठता है कि छात्रों को लुटता हुआ देखने के बावजूद सरकारें रूम किरायों को रेगुलेट करने के लिए कोई कानून नही बनाती। जब तक रूम रेंट को रेगुलेट करने के लिए कोई कानून नही बनाया जाता तब बक पछास का संघर्ष जारी रहेगा।
        सभा का समापन ‘गुलमिया अब हम ना ही बजाइबो, अजादिया हमरा के भावले’ गाने के साथ किया गया, साथ ही संघर्ष को आगे बढ़ाने का प्रण लिया गया।



ये आजादी आधी है, लुटेरों की चांदी है......


        दिल्ली, 15 अगस्त को इंकलाबी मजदूर केन्द्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन व प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र ने शाहबाद डेरी में विचार गोष्ठी का आयोजन किया। गोष्ठी का विषय 'आजादी के 69 वर्ष व मजदूर-मेहनतकशों का जीवन' था। गोष्ठी में बात रखते हुए वक्ताओं ने कहा कि 1947 से पहले देश को आजाद कराने के लिए दो तरह की शक्तियां संघर्ष कर रही थी। इसमें से एक धारा कांग्रेस के नेतृत्व में पूंजीपतियों-जमीदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करती थी तो दूसरी भगत सिंह-कम्युनिस्टों के नेतृत्व में देश के मजदूरों-मेहनतकशों के हितों का। 1947 के बाद देश की सत्ता पर पहली धारा का कब्जा हुआ जिसके परिणाम स्वरूप आजादी के 69 वर्ष बाद भी मजदूरों-मेहनतकशों की जिंदगी तबाह-बर्बाद है। 
        वक्ताओं ने जोर देते हुए कहा कि देश की जनता के लिए वास्तविक आजादी तभी हो सकती है जब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य के शोषण को खत्म किया जा सके और ये केवल मजदूर राज 'समाजवाद' में ही हो सकता है। इसलिए आम जनता को संगठित होकर भगत सिंह और हजारों शहीदों के सपनों को पूरा करने के लिए समाजवाद की दिशा में जुट जाना चाहिए।
फरीदाबाद में भी ‘आजादी और मजदूर वर्ग’ विषय पर इंकलाबी मजदूर केन्द्र द्वारा विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया। पछास के साथियों ने जोश-खरोश के साथ गोष्ठी में हिस्सा लिया।



बेरोजगारी पर एकदिवसीय शिविर का आयोजन

        बरेली इकाई द्वारा 24 जुलाई 2016 के दिन एकदिवसीय शिविर किया गया। शिविर का विषय ‘बेरोजगारी-कारण व समाधान’ था। क्रांतिकारी गीतों से शिविर की शुरूआत की गयी।
        राजनीतिक चर्चा के दौरान बेरोजगारी का आकलन व छात्र-नौजवानों पर बेरोजगारी का प्रभाव जैसे सवालों पर सर्वप्रथम चर्चा की गयी। अगले बिन्दू के तौर पर ‘बेरोजगारी कैसे पूंजीवादी व्यवस्था की देन है’ विषय पर चर्चा की गयी। पूंजीवादी शासकों द्वारा बेरोजगारी को लेकर फैलाए गए मिथकों जैसे जनसंख्या बेरोजगारी का कारण है आदि को खंडित किया गया। अंत में बेरोजगारी के समाधान ‘समाजवादी व्यवस्था’ पर चर्चा करते हुए तात्कालिक तौर पर किन मांगों पर संघर्ष किया जाए विषय पर चर्चा की गयी।
        शिविर के अंत में ‘मशीन’ नाटक का मंचन किया गया। कई अन्य क्रांतिकारी गीत भी साथियों द्वारा गाए गए।
       

 मजदूर बस्ती में मेडिकल कैम्प का आयोजन

        प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम(PMF) द्वारा 3 जुलाई को बरेली के बंशीनगला मोहल्ले में मेडिकल कैम्प लगाया गया। इस मेडिकल कैम्प में जनता के बीच में दवाओं का वितरण भी किया गया। मेडिकल कैम्प से पहले पछास, इमके, क्रालोस व अन्य सहयोगी संगठनों द्वारा बंशीनगला में पर्चा वितरण करते हुए स्वास्थ्य विभाग की खस्ता हालत के बारे में जनता को बताया गया।
        मेडिकल कैम्प के दौरान आम जनता को यह भी बताया गया कि देश के अंदर डाॅक्टरों की कमी के चलते (लगभग 1700 लोगों पर एक डाॅक्टर) आम जनता इलाज के अभाव में मरने को मजबूर है। देश में ‘विकास’ का ढ़िढ़ोरा पीटने वाली मोदी सरकार ने भी इस वर्ष स्वास्थ्य बजट में 20% की कटौती कर दी है जबकि इससे पहले भी बजट का 1% ही स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता रहा है। इससे पता चलता है कि सरकार आम जनता की कितनी परवाह करती है। 
        कैम्प के दौरान सरकार द्वारा चलाए जा रहे सफाई अभियान की सच्चाई के बारे में जनता को बताया गया कि जिन कालोनियों में पैसे वाले लोग रहते हैं, सरकारों का अभियान केवल वही तक चलाया जाता है। मजदूर बस्तियों व गरीबों के मौहल्लों में सफाई कर्मचारी झांकने भी नही आते। बहुत सी बीमारियां साफ पानी की कमी व गंदी नालियों व गलियों द्वारा फैलती हैं। ऐसे में आम जनता को बेहतर व मुफ्त इलाज के लिए संगठित होकर संघर्ष करना होगा। 






मई दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन

        पछास की विभिन्न इकाईयों ने मई दिवस के अवसर पर 1 मई  की क्रांतिकारी विरासत को याद करते हुए बिरादराना संगठनों के साथ विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर मजदूर वर्ग के साथ अपनी एकजुटता प्रकट की।
        दिल्ली, पछास की दिल्ली इकाई ने इमके व प्रमएके के साथ मिलकर 1 मई को एक मजदूर बस्ती, शाहबाद डेरी में एक सभा का आयोजन किया। इस दौरान पछास के साथियों द्वारा एक नुक्कड़ नाटक ‘मशीन’ का भी मंचन किया गया। इस मौके पर चली सभा को सम्बोधित करते हुए पछास की शिप्रा ने कहा कि आज मजदूरों के साथ-साथ छात्रों, किसानों व महिलाओं पर फासीवादी हमले तेज हुए है। जिनके खिलाफ पूरे देश में जनता संघर्षो को खड़ा कर रही है। आज जरूरत बनती है कि इन संघर्षो को एकजुट करते हुए इन्हें मुकाम पर पहुंचाया जाए। इन आंदोलानों का अंतिम लक्ष्य मजदूर वर्ग के नेतृत्व में होने वाली समाजवादी क्रांति ही हो सकती है। 




        हल्द्वानी, 1 मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर परिवर्तनकामी छात्र संगठन ने मई दिवस आयोजन समिति के साथ रोडवेज बस अड्डा प्रांगण में एक सभा का आयोजन किया। सभा में विभिन्न जनसंगठनों, ट्रेड यूनियनों, मजदूरों, कर्मचारियों व छात्रों ने शिरकत की। सभा की शुरूआत ‘हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेगें’ गीत के साथ हुयी। सभा में वक्ताओं ने मई दिवस के गौरवपूर्ण इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 8 घण्टे के कार्यदिवस की मांग करते हुए तथा पूंजीपति वर्ग व उसकी सरकारों के भीषण दमन को झेलते हुए मजदूरों ने दुनिया के स्तर पर 8 घण्टे का कार्यदिवस हासिल किया। वक्ताओं ने आज के हालात पर बात करते हुए कहा कि वर्तमान आर्थिक संकट ने मजदूरों-किसानों-छात्रों के जीवन को और कठिन बना दिया है। मोदी सरकार देशी-विदेशी कारपोरेट के पक्ष में नीतियां बनाते हुए पहले से चले आए श्रम कानूनों को खत्म कर 4-5 कोड बिलों में बदलने की साजिश रच रही है। वक्ताओं ने मजदूर वर्ग को संगठित करने का आहवान किया और मौजूदा वक्त की चुनौतियों को स्वीकारते हुए मजदूर राज समाजवाद के निर्माण के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया। इस कार्यक्रम में परिवर्तनकामी छात्र संगठन, इंकलाबी मजदूर केन्द्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र, जनवादी लोक मंच, रोडवेज कर्मचारी संयुक्त परिषद, शिक्षक-कर्मचारी-मजदूर समन्वय समिति, एक्टू, गणेश कत्था फैक्ट्री मजदूर यूनियन आदि संगठनों ने भागीदारी की।
        बरेली, परिवर्तनकामी छात्र संगठन के सदस्य, इंकलाबी मजदूर केन्द्र द्वारा आयोजित किए गए मई दिवस के कार्यक्रम में सक्रिय रहे। कार्यक्रम से पूर्व विभिन्न मजदूर बस्तियों, फैक्ट्रीयों में व्यापक पर्चा वितरण किया गया। मई दिवस का कार्यक्रम दामोदर पार्क बरेली में सभा से शुरू हुआ। सभा के दौरान एक नाटक ‘झंडा उठाके’ का मंचन भी प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच व पछास के साथियों द्वारा मिलकर किया गया। सभा के बाद जोरदार नारेबाजी के साथ अम्बेडकर पार्क तक जुलूस निकाला गया। 
        लालकुआँ, 1 मई मजदूर दिवस के अवसर पर नुक्कड़ सभा व जुलूस का कार्यक्रम इमके व प्रमएके के साथ आयोजित किया गया। सभा में पछास के महेश ने कहा कि मई दिवस की विरासत हमको काफी संघर्ष व दमन के बाद मिली है। मई दिवस के शहीदों ने काफी क्रुबानिया दी है।आज मोदी सरकार उन सारे अधिकारों को लगातार छीनकर पूंजीपतियों की झोली भरने में लगी है। इसलिए जरुरत है एकजुट होने की और उन शहीदों की विरासत को आगे बढ़ाने की ।



        काशीपुर, मई दिवस पर पछास के साथियों ने इमके द्वारा ओयोजित सभा में भागीदारी की। सभा में रिचा फैक्ट्री के सैकड़ों मजदूरों के साथ-साथ अन्य मजदूर भी उपस्थित रहे। सभा में पछास के साथियों ने छात्र-मजदूर एकता पर जोर देते हुए अपनी बात रखी।

JNU छात्रों का निष्कासन तत्काल वापस लो!
        
        लालकुंआ, JNU के छात्रों का निष्कासन रद्द करने व उन पर लगाए गए जुर्मानों को हटाने की मांग करते हुए पछास की इकाई ने तहसीलदार के माध्यम से राष्ट्रपति को सम्बोधित ज्ञापन प्रेषित किया। 
        इस दौरान चली सभा को सम्बोधित करते हुए पछास के महेश ने कहा कि JNU प्रशासन पूरी तरह से संघ के इशारे पर काम कर रहा है जिसका सबूत जांच कमेटी द्वारा JNU छात्रों को दी गयी सजा से साबित होता है। कोर्ट से बेल पर रिहा होने व अब तक छात्रों के खिलाफ कोई सबूत ना मिलने के बावजूद प्रशासन द्वारा छात्रों पर की गयी कार्यवाही एकतरफा है। केन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद शिक्षा संस्थानों पर भगवा गुण्डों को हमला तेज हुआ है। JNU के छात्रों पर ताजा हमला भी इसकी अगली कड़ी है। आज जरूरत बनती है कि इन हमलों का एकजुट होकर जवाब दिया जाए।
        प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र की बिन्दू ने कहा कि मोदी सरकार हम मोर्चो पर फेल हुयी है। वो चाहें रोजगार का मामला हो या फिर गरीबी-मंहगाई जैसे मुद्दे सभी क्षेत्रों में मोदी सरकार के वायदे हवाई ही साबित हुए हैं। यही नही पूंजीपतियों के पक्ष में लगातार नई नीतियां बनाई जा रही है जिनसे जनता की स्थिति और भी बदतर होनी है। ऐसे में बदहाल जनता सरकार व व्यवस्था के खिलाफ संघर्षो को ना छेड़ दे इसके लिए संघ द्वारा समाज में निरन्तर सांप्रदायिकता का जहर घोला जा रहा है। ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर जनवादी ताकतों पर हमला बोला जा रहा है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हम JNU के छात्रों के साथ खड़े हो और मजबूती के साथ इस फासीवादी हमले का विरोध करें। 




हिन्दू कालेज में गर्ल्स हाॅस्टल की फीसें कम करने की मांग को लेकर प्रदर्शन



        आज डीयू में हिन्दू कालेज के छात्रों व तमाम छात्र संगठनों ने हिन्दू कालेज प्रशासन के महिला विरोधी रूख व गर्ल्स हाॅस्टल की फीसें कम करने की मांग को लेकर कालेज के अंदर प्रदर्शन किया। दरअसल हिन्दू कालेज स्थापित होने के 170 वर्षो बाद इसी वर्ष गर्ल्स हाॅस्टल का निर्माण किया गया है। अभी से इसके लिए आवेदन आने भी शुरू हो चुके हैं। परंतु गर्ल्स हाॅस्टल व बाॅयज हाॅस्टल की फीसों में 3 गुने का अंतर है। जहां बाॅयज हाॅस्टल के लिए ये फीस 40 हजार के आस-पास है तो वहीं गर्ल्स हाॅस्टल की फीस 120000 के आस-पास। इस अंतर पर कालेज प्रशासन का कहना है कि ये अंतर गर्ल्स हाॅस्टल में दी गयी अधिक सुविधाओं के चलते है।
        यही नहीं इन हाॅस्टलों को संचालित करने के लिए महिला विरोधी कानूनों की लम्बी सूची तैयार की गयी है। कालेज ने अपने सूचि पत्र में लड़कियों के पहनावे से जुड़े कुछ नियम तय किए है। जिसके तहत लिखा गया है कि ‘हाॅस्टल निवासियों से उम्मीद की जाती है कि डायनिंग हाॅल, अतिथि गृह और हाॅस्टल या कालेज की अन्य जगहों पर जाने से पहले उनका पहनावा समाज के तय किए गए कायदों के अनुरूप हो। अगर जरूरत पड़ी तो नोटिस बोर्ड पर ड्रेस  कोड भी जारी कर दिया जाएगा।’
        इस पूरी प्रक्रिया में हिन्दू कालेज प्रशासन का महिला विरोधी चरित्र उजागर होता है तो वहीं दूसरी तरफ इस बात को भी इंगित करता है कि कितनी बारिकी से पुरूष प्रधान मानसिकता समाज के कोने-कोने में बैठी हुयी है। जिन शिक्षा संस्थानों को पुरूष प्रधान मानसिकता के खिलाफ संघर्षो का केन्द्र बनना चाहिए था वो इसे खाद-पानी देने का काम कर रहे हैं। हिन्दू कालेज प्रशासन का महिला विरोधी चरित्र फीसों के अंतर में भी दिखाई देता है। आखिर क्यों एक ही विश्वविद्यालय, एक ही कालेज में पढ़ने के बावजूद छात्राओं को अधिक फीस देनी होगी? इसका जवाब किसी के पास नही। मामला उजागर होने के बावजूद डीयू प्रशासन की इस मामले में चुप्पी भी उन्हें इस पूरी प्रक्रिया का समर्थक बनाती है।
        दरअसल हिन्दू कालेज जोकि एक पब्लिक फंडेड यूनिवर्सिटी डीयू का कालेज है, में ये नए हाॅस्टल प्राइवेट संस्थानों की तर्ज पर बनाए जा रहे हैं। यानि की निर्माण का सारा खर्च छात्रों से ही वहन किया जाएगा। ये सरकारी कालेजों के निजीकरण का ही एक तरीका है। जिसमें पैसे वाले ही छात्र कालेज में एडमिशन ले पाएगें और पैसे वाले ही छात्र हाॅस्टल में रह पाएगें। हिन्दू कालेज प्रशासन के इस फैसले का विरोध देशभर में बढ़ रहे निजीकरण के विरोध के साथ जुड़ जाता है तो दूसरी तरफ सरकार द्वारा उच्च शिक्षा के बजट में तेजी से किए जा रहे बजट कटौती के खिलाफ भी।






JNU कुलपति का पुतला दहन



        रामनगर, JNU 9 फरवरी प्रकरण में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा छात्र नेताओं पर लगाए गए आर्थिक जुर्माने व उन्हें सेमेस्टर से निलंबित करने की सजा का विरोध करते हुए पछास की रामनगर इकाई ने कल जेएनयू कुलपति का पुतला दहन किया।
        सभा में बोलते हुए वक्ताओं ने कहा कि जेएनयू मामले पर सभी छात्रों को कोर्ट से बेल मिल चुकी है। मामला अब तक कोर्ट में चल रहा है और अब तक आए सारे साक्ष्यों ने भी ये साबित किया है कि छात्रों को साजिश के तहत फंसाकर जेएनयू को बदनाम करने की साजिश संघी गिरोह द्वारा रची जा रही है। इसके बावजूद भी विवि प्रशासन द्वारा छात्रों पर की गयी कार्यवाहीए साबित करती है कि प्रशासन को सीधे नागपुर से आदेश आ रहे हैं। आज फिर से एक बार जेएनयू के छात्रों के साथ खड़े होने की जरूरत बनती है।
        पछास के चंदन ने कहा कि मोदी सरकार एक के बाद एक शिक्षा संस्थानों पर हमले बोल रही है। एफटीआईआई से शुरू हुआ ये सफर दर्जनों शिक्षा संस्थानों को अपने आगोश में ले चुका है। राष्ट्रवाद का भ्रामक फिजा तैयार करके हर जनवादी ताकत पर हमला बोला जा रहा है। ये जनता पर बढ़ रहे दमन को तो दिखाता है लेकिन मोदी सरकार की असफलता को भी दिखाता है। चुनाव पूर्व जनता को दिखाए गए सपनों को ये सरकार कभी पूरा नही कर सकती। मंहगाई, गरीबी, कंगाली की मार से परेशान जनता कही 'अच्छे दिनों' का हिसाब ना मांगने लग जाए इसी लिए ‘गौ माता', ‘भारत माता’, राष्ट्रवाद जैसे फर्जी नारे गड़े जा रहे हैं। आज समय की मांग है कि इन नारों का विरोध करते हुए जनता की वास्तविक समस्याओं के लिए सड़कों पर उतरा जाए।





जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड व पंतनगर के शहीदों की याद में प्रभात फेरी व सभा


13 अप्रैल पंतनगर, पछास ने अन्य बिरादराना संगठनों इंकलाबी मजदूर केन्द्र, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र, ठेका मजदूर कल्याण समिति व क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के साथ मिलकर 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड व 13 अप्रैल 1978 को पंतनगर गोलीकाण्ड में मारे गए 14 मजदूरों की याद में इलाके में प्रभात फेरी निकालते हुए शहीद चोक के पास संयुक्त रूप से एक सभा का आयोजन किया।

        सभा में बात रखते हुए वक्ताओं ने कहा कि शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब उनके सपनों की समाजवादी व्यवस्था देश में कायम होगी। शहीद भगत सिंह ने 1931 में ही कह दिया था कि कांग्रेस(पूंजीपति वर्ग) के नेतृत्व में मिली आजादी के बाद काले अंग्रेज देश की मेहनतकश जनता का शोषण करेगें। आज उनकी बात सही साबित हो रही है। एक तरफ चन्द पैसे वाले लोग दिन पर दिन मालामाल हो रहे हैं तो दूसरी तरफ आम जनता की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। सभा के अंत में शहीद चोक पर शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित की गयी। 



राजद्रोह(124A) को हटाने की मांग को लेकर प्रदर्शन


13 अप्रैल बरेली, पछास व क्रालोस द्वारा संयुक्त तौर पर एक धरना-प्रदर्शन का कार्यक्रम किया गया। कार्यक्रम में 13 अप्रैल 1919 जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए मांग की गयी कि अंग्रेजों के जमाने के बने काले कानून आजाद भारत से खत्म किए जांए। राजद्रोह(124A) को खत्म करने की मांग भी धरने में की गयी।

सभा में वक्ताओं ने कहा JNU, कुडाकूलम, लालकुंआ(प्रीति शर्मा हत्याकाण्ड) आदि मामलों में भारत सरकार राजद्रोह जैसे काले कानून के जरिए जनता की जनवादी आवाज को दबाने का काम कर रही है। राजद्रोह, अफसपा जैसे काले कानूनों का आज तक बने रहना भारतीय शासकों के दमनकारी चरित्र को उजागर करता है।

सभा के बाद DM कार्यालय तक एक जुलूस निकाला गया जहां SDM के माध्यम से राष्ट्रपति को सम्बोधित ज्ञापन में राजद्रोह की धारा खत्म करने की मांग की गयी।


 


कैम्पसों पर हो रहे फासीवादी हमलों के खिलाफ DU में सभा


7 अप्रैल, देश में कैम्पसों पर बढ़ रहे फासीवादी हमलों के खिलाफ आज DU में एक जन सभा का आयोजन Save DU द्वारा किया गया। सभा में सैकड़ों छात्रों-शिक्षकों ने भागीदारी करके कार्यक्रम के साथ अपनी एकजुटता जाहिर की। 

        सभा में बात रखते हुए जामिया के प्रोफेसर गोपीनाथ ने कहा कि पिछले डेढ़ सालों में सत्ता में बीजेपी सरकार आने के बाद से शिक्षा संस्थानों के भगवाकरण करने की कोशिशें बहुत तेज हुयी हैं। RSS से जुड़े लोगों की भर्तियां शिक्षा संस्थानों में करके सरकार अपनी विचारधारा को सभी छात्रों-शिक्षकों पर थोंपने का प्रयास कर रही है। FTII के छात्र इसी बात का विरोध करते हुए हड़ताल पर गए थे परंतु सरकार ने छात्रों की मांगें मानने के बजाए उनका दमन किया। आज जरूरत बनती है कि एकजुट होकर शिक्षा के भगवाकरण के खिलाफ आवाज उठायी जाए।

        सभा को आगे बढ़ाते हुए DU के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि बीजेपी द्वारा मुस्लिमों के खिलाफ किए जा रहे हमले बिल्कुल वैसे ही हैं जैसेकि हिटलर द्वारा यहूदियों पर किए गए। उन्होने कहा कि मोदी सरकार भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में हिंदू बहुलतावाद को लागू करने का प्रयास का रही है। गाय से लेकर भारत माता की जय के नाम पर देश में बढ़ रहे हमले इसी बात का परिचायक हैं। ये हमले बहुत ही सुनियोजित तरीके से किए जा रहे हैं जो देश की धर्मनिरपेक्षता पर हमला हैं। आज वक्त की जरूरत बनती है कि हम हिंदू बहुलतावाद का विरोध करते हुए धर्मनिरपेक्षता को बचाने के लिए आगे आएं।

        सभा में बात रखते हुए JNUSU उपाध्यक्ष शैला राशिद ने कहा कि मोदी सराकर ने पूरे देश में छात्रों के खिलाफ चैतरफा हमला बोला हुआ है। एक तरफ शिक्षा बजट कम किया जा रहा है, IIT की फीस बढ़ाई जा रही है, छात्रों को मिलने वाली फेलोशिप कट की जा रही है तो दूसरी तरफ इनका विरोध करने वाले छात्रों को ‘देशद्रोही’ घोषित कर उनपर हमला किया जा रहा है। FTII, हैदराबाद, JNU से होती हुयी ये आग अब कश्मीर पहुंच चुकी है। कश्मीर में पुलिस द्वारा छात्रों के दमन का विरोध करते हुए उन्होने कहा कि बीजेपी सरकार कश्मीर में छात्रों पर हुए दमन पर तो बोलती है पर हैदराबाद में छात्रों के दमन पर चुप्पी लगा जाती है। बीजेपी की इस घृणित राजनीति के खिलाफ छात्रों को एकजुट होकर विरोध करना जरूरी है।

        सभा को DUTA अध्यक्ष नंदिता नारायण, DU के प्रोफेसर हनी बाबू, अंबेडकर यूनिवर्सिटी के अरिंदम बनर्जी, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के रवि कुमार, JNU के रोहित आजाद व सुरजीत मजूमदार ने भी सम्बोधित किया।

सभा का अंत पछास, आइसा, केवाईएस, डीएसओ, डीएसयू, एसएफआई के कार्यकर्ताओं द्वारा सामूहिक गीत गाकर किया गया।  


बढ़ते महिला अपराधों के खिलाफ प्रदर्शन

        
पंतनगर, उत्तराखण्ड में 24 मार्च को तीन युवकों द्वारा एक 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला रामकलिया का बलात्कार किया गया। जिसके बाद हालत बिगड़ने के चलते उनकी मौत हो गयी। हालांकि तीनों आरोपियों को गिरफतार कर लिया गया है। परंतु ऐसी घटनाएं हमारे समाज में मौजूद नारी विरोधी सोच की मौजूदगी की व्यापकता को उजागर करती है। जब तक समाज में पुरूष प्रधान मानसिकता व महिलाओं को लेकर सामंती सोच मौजूद है तब तक ऐसी घटनाएं समाज में घटती ही रहेंगी। पूंजीवादी व्यवस्था में मौजूद उपभोक्तावादी संस्कृति भी महिलाओ पर हो रहे हमलों को बढ़ाने का ही काम करती है। ऐसे में जब तक महिला विरोधी सोच व उसे पालने वाली पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति अपने सघर्षो को लक्षित नही किया जाता तब तक समाज में महिलाओं पर अपराध बढ़ते ही रहेंगे। इसी रोशनी में प्रगतिशील महिला एकता केंन्द्र, ठेका मजदूर कल्याण समिति व परिवर्तनकामी छात्र संगठन ने इलाके में संयुक्त अभियान चलाते हुए कल 1 अप्रैल को नगर में सभा व जुलूस का आयोजन किया। सभा में मांग की गयी कि-
1.रामकलिया को न्याय दिलाने के लिए आगे आओ।
2.महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा मुहैया करायी जाए।
3.महिलाओं पर बढ़ते अपराधों पर रोक लगायी जाए।
4.पतित उपभोक्तावादी संस्कृति पर रोक लगायी जाए।


 

हैदराबाद विवि के छात्रों पर लाठीचार्ज के विरोध में दिल्ली में प्रदर्शन

        30 मार्च, हैदराबाद यूनिवर्सिटी में अप्पा राव की वापसी के विरोध में आयोजित विरोध-प्रदर्शन पर तेलंगाना पुलिस द्वारा किए गए बर्बर लाठीचार्ज के खिलाफ विभिन्न संगठनों ने आज मण्डी-हाउस से राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया।

         गौरतलब है कि रोहित की ‘आत्महत्या’ के बाद यूनिवर्सिटी के वीसी अप्पा राव व केन्द्रीय राज्य मंत्री दत्तात्रेय को एससी/एसटी एक्ट में चार्ज किया गया था साथ ही अप्पा राव को 2 माह के अवकाश पर भेज दिया गया था। अभी तक जांच पूरी ना होने के बावजूद अप्पा राव को फिर से वीसी के पद पर बैठा दिया गया। यही नही विरोध कर रहे छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज करते हुए 24 छात्रों, 2 शिक्षकों समेत कुल 27 लोगों को जेल भेज दिया गया।
         इसके विरोध में देशभर के छात्रों, शिक्षकों तथा प्रगतिशील लोगों ने अपनी आवाज बुलंद की पर अब तक संसद में रोहित को अपना ‘बच्चा’ कहने वाली शिक्षा मंत्री व रोहित की मौत पर ‘आंसू’ बहाने वाले प्रधानमंत्री चुप्पी साधं बैठे हैं। रोहित की ‘आत्महत्या’ व छात्रों पर दमन पर भाजपा सरकार की चुप्पी इस बात को दिखाती है कि वो ‘हत्यारो’ के साथ खड़े हैं।
         हजारों की संख्या में जुलूस में पहुंचे लोगों ने तेलंगाना पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज की निंदा करते हुए अप्पा राव, दत्तात्रेय व स्मृति ईरानी के इस्तीफे की मांग करते हुए नारे लगाए। राष्ट्रपति भवन की तरफ बढ़ रहे मार्च को दिल्ली पुलिस द्वारा संसद मार्ग पर ही रोक लिया गया। संसद मार्ग पर चली सभा में वक्ताओं ने मोदी सरकार के जनवाद विरोधी, दलित विरोधी रूख को बेनकाब करते हुए संघर्ष को आगे भी जारी रखने की जरूरत पर जोर दिया।

 

JNU पर बाले जा रहे हमले के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन

         15 मार्च को JNU के छात्रों उमर, अनिर्बान व डीयू के प्रो. गिलानी की रिहाई की मांग को लेकर मण्डी हाउस से जंतर-मंतर तक जुलूस-प्रदर्शन का कार्यक्रम रखा गया। कार्यक्रम का आयोजन JNU छात्र-संघ द्वारा किया गया था जबकि देशभर के छात्र संगठनों, शिक्षकों, जनवादी संगठनों ने कार्यक्रम में भागीदारी कर के JNU के छात्रों के साथ अपनी एकजुटता जाहिर की। पछास के साथियों ने भी देश के भीतर तेजी से सिकुड़ रहे जनवादी माहौल के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए कार्यक्रम में भागीदारी की।

        ‘उमर-अनिर्बान-गिलानी को रिहा करो’ के नारों के साथ हजारों छात्रों का कारवां मण्डी हाउस से होते हुए संसद मार्ग पर एक सभा में तब्दील हो गया। सभा को छात्र संगठनों व शिक्षकों द्वारा संबोधित किया गया। सभा में बात रखते हुए सभी वक्ताओं ने ये माना के JNU पर किया जा रहा हमला महज एक विश्वविद्यालय पर हमला नही है बल्कि यह एक सोची-समझी साजिश के तहत किया गया फासीवादी हमला है। मोदी सरकार के सत्ताशीन होने के बाद से देश में हक के लिए आवाज उठाने वाले लोगों पर हमले तेज हुए हैं। एक तरफ भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल बुरा है तो दूसरी तरफ जनता को किए गए अपने वादे पूरे करने में असफल रही मोदी सरकार ‘अच्छे दिनों’ का हिसाब मांग रही जनता पर हमले करके उनसे बोलने का हक भी छीन लेन चाहती है। JNU के छात्रों पर किया गया हमला भी इसी प्रक्रिया का परिणाम है। ऐसे में आज वक्त की मांग है कि अपनी पुरजोर ताकत से इस फासीवादी सरकार के खिलाफ खड़ा हुआ जाए। JNU के छात्रों के साथ खड़ा हुआ जाए। जनवाद व न्याय के पक्ष में खड़ा हुया जाए।
 

 JNU को समर्थन में दिल्ली में दसियों हजार लोग सड़को पर उतरे

        18 फरवरी, आज दिल्ली की सड़कों पर अगर कोई था तो बस-JNU । कामरेड कन्हैया को रिहा करो, RSS मुर्दाबाद, मोदी सरकार शर्म करो! के नारों के साथ आज दसियों हजार शिक्षक-छात्र-मजदूर-किसान ने दिल्ली की सड़कों को गुंजायमान कर दिया। हर कोई JNU के साथ मजबूती से खड़ा था। उनके नारे देश के हुक्मरानों को चुनौती दे रहे थे कि मोदी सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलना बंद करें।

         मण्डी हाउस से जंतर-मंतर मार्च में दिल्ली के हर विश्वविद्यालय से छात्र पहुंचे थे। वों चाहे डीयू हो, अंबेडकर हो, साउथ एशियन हो या फिर जामिया विश्वविद्यालय हो हर कोई JNU था।
         सबके दिलों में बैठा गुस्सा उनके नारों में झलकता था। जो जानते थे कि किस तरह इसी सरकार ने छात्रों पर दोतरफा हमले किए हैं। एक तरफ शिक्षा के निजीकरण के जरिए हमसे पढ़ने का अधिकार छीना जा रहा है। हमारी फेलोशिप कट की जा रही है। शिक्षा का बजट कम किया जा रहा है। तो दूसरी तरफ कैम्पसों को संघी सोच का अड्डा बनाया जा रहा है। बोलने की, सोचने की, विरोध करने की आजादी पर हमले तेज किए जा रहे हैं। इसी सरकार ने आते ही पहला हमला FTII पर किया, फिर हैदराबाद पर और अब JNU इन फर्जी ‘देशभक्तों’ के निशाने पर है।

         प्रदर्शन में वो छात्र शामिल थे जो जानते थे कि किस तरह संघी गिरोह ने मिलकर हैदराबाद में रोहित की हत्या की। उसे ‘देशद्रोही’ घोषित कर उसको आत्हत्या करने को मजबूर करने का जाल बुना गया। और अब यही जाल कन्हैया, उमर और JNU के अन्य छात्रों के खिलाफ बुना जा रहा है। सड़को पर उतरे लोग इस उम्मीद में भी आए थे कि भले ही हम रोहित को नही बचा सके पर हम JNU को नही मरने देंगे।
         प्रदर्शन में वो छात्र शामिल थे जो हिटलर से नफरत करते थे। जो पिछले कुछ सालों में देश में बढ़ रही उस घुटन को महसूस कर रहे थे जो हिटलर काल के जर्मनी की याद दिलाती हैं। जो नही चाहते की भारत, में कोई हिटलर आए।
         और अंत में प्रदर्शन में वो लोग शामिल थे जो जानते थे कि अब चुप बैठना खतरनाक है। अब फासीवादी ताकतें हमारे द्वार पर खड़ी दस्तक दे रही है। अब आवाज उठाने और सड़को पर उतरने का समय है। अब इस बात को तय करने का समय है कि हम क्या चुनते हैं।
फासीवाद या क्रांति ?

 DU में किए जा रहे साम्प्रदायिक सेमिनार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन

        विश्व हिन्दू परिषद के एक संगठन AVAP द्वारा DU में ‘राम जन्म भूमि’ के मुद्दे पर आयोजित सेमिनार का प्रगतिशील व क्रांतिकारी ताकतों द्वारा जोरदार विरोध किया गया। 9-10 जनवरी को आयोजित इस सेमिनार के खिलाफ 8 जनवरी को सभी छात्र-शिक्षक संगठनों द्वारा प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। 

        कांफ्रेंस में बात रखते हुए वक्ताओं ने कहा कि सेमिनार आयोजित करवाने वाली ताकतें कौन हैं हमें इसे पहचानना होगा? इनका उद्देश्य ‘राम-मंदिर’ के मामले पर छात्रों को शिक्षित करना नही बल्कि समाज को साम्प्रदायिक आधार पर बांटना है। पहले भी इन्ही ताकतों ने लोगों की धार्मिक आस्था का इस्तेमाल कर देश में दंगे करवाये हैं, जिसमें हजारों ही लोग मारे गए और लाखो बेघर हुए। ऐसे में देश को साम्प्रदायिक आधार पर बांटने की फिजा तैयार करने के लिए आयोजित किए जा रहे इस सेमिनार का विरोध होना जरूरी है।

        वक्ताओं ने ये भी कहा कि जब देश में चुनाव नजदीक आते हैं बीजेपी द्वारा साम्प्रदायिकता का कार्ड खेला जाता है। अगले साल यूपी में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसके लिए ही राम-मंदिर के मुद्दे को फिर से उछाला जा रहा है। लोकसभा चुनाव के समय भी मुजफ्फर नगर दंगो ने बीजेपी को चुनावी वैतरणी पार करवाायी थी। अब उसके द्वारा ‘राम-मंदिर’ को हवा दी जा रही है।

        छात्र संगठनों ने अपनी बात रखते हुए कहा कि सत्ता में आने के बाद से मोदी सरकार द्वारा तेजी से शिक्षा संस्थानों का भगवाकरण किया जा रहा है। वो चाहे FTII का मामला हो या पाठ्यक्रमों में बदलाव। इस सेमिनार को भी इसी रोशनी में देखने की जरूरत है। कैम्पस में सेमिनार आयोजित करवा कर ये साम्प्रदायिक ताकतें छात्रों को साम्प्रदायिक आधार पर बांटना चाहती है। जिसके खिलाफ संघर्ष जरूरी है।

        9 जनवरी को सेमिनार की शुरूआत होने पर सभी संगठनों द्वारा विरोध में प्रदर्शन आयोजित किया गया। पुलिस द्वारा छात्रों को अंदर जाने से रोका गया, उनके साथ धक्का-मुक्की की गयी। फिर भी सभी छात्रों ने अपने प्रदर्शन को जारी रखते हुए साम्प्रदायिक ताकतों को जवाब देते हुए बताया कि समाज को बांटने के तुम्हारे हर कदम में हम तुम्हारे खिलाफ खड़े हैं।  


इलाहाबाद विश्वविद्यालय बना छात्र संघर्ष का गवाह

        

बीते दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघर्ष फूट पड़ा। यह संघर्ष अपने मूल में लगातार बढ़ रही साम्प्रदायिकता के खिलाफ था। छात्र संघ में अभाविप से जुड़े नेताओं द्वारा घोर साम्प्रदायिक व्यक्ति योगी आदित्यनाथ, जो कि साम्प्रदायिक बयानवाजी के लिए कुख्यात है को छात्र संघ भवन के उद्घाटन के मौके पर मुख्य अतिथि बनाने की मुहिम छेडी गयी। सपष्ट ही है योगी आदित्यनाथ जैसे व्यक्ति को मुख्य अतिथि बनाने के पीछे अभाविप का मकसद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में साम्प्रदायिक माहौल फैलाना ही था। विश्वविद्यालय की फिजा में दूषित हवा भरना ही था। एक साम्प्रदायिक व्यक्ति को छात्रों के बीच लोकप्रिय बनाने का था। इस साजिश को सचेत छात्रों द्वारा नाकाम कर दिया गया।
        छात्र संघ अध्यक्ष रिचा सिंह व तमाम वामपंथी, जागरूक संगठनों व साम्प्रदायिकता विरोधी छात्र नौजवानों ने योगी को मुख्य अतिथि बनाये जाने का घोर विरोध किया।  18 नवम्बर को इनके द्वारा निकाले जा रहे शांतिपूर्ण जुलूस को बाधित करने के लिए अभाविप द्वारा इसका विरोध किया गया। जिस दौरान झडप भी हुईं। अभाविप के गुण्डों द्वारा लागों  के साथ अभद्रता की गयी। इनकी अभद्रता से विरोध रूका नहीं बल्कि और बढ़ गया। अगले ही दिन रिचा सिंह व पछास, आइसा, एआईडीएसबो, एनएसयूआई, समाजवादी छात्र सभा आदि संगठन धरने भूख हड़ताल पर बैठ गये। अभाविप के गुडां तत्वों द्वारा लगातार धरने पर उकसावे की कार्यवाही की जा रही थी। छात्रा साथियों पर अश्लील फप्तियां कसी जा रही थी। किन्तु धरने पर संख्या बल देखकर ये सीधे टकराव से डर रहे थे।
        छात्रों के विरोध को देखते हुए पहले शहर प्रशासन फिर कालेज प्रशासन ने योगी आदित्यनाथ के आने पर रोक लगा दी। अपने कुख्यात नेता को मुख्य अतिथि ना बना पाने के कारण अभाविप के गुडे और भी बौखला गये। उन्होने बहुत जोर लगाया किन्तु छात्रों का विरोध पर डटे रहने के कारण प्रशासन ने अनुमति देने से साफ मना कर दिया। खिसियाये अभाविप के कार्यकर्ता मौके की ताक पर थे। और आधी रात के बाद जब धरने पर संख्या कम हुई तो मौका पाकर अभाविप के गुंडों द्वारा उस पर हमला किया गया। हमले के दौरान साम्प्रदायिक नारे, अश्लील गालियां व छात्राओं के साथ अभद्रता इन गुंडों द्वारा की गयी। अभाविप की गुंडागर्दी को रोकने के लिए पुलिस व कालेज प्रशासन द्वारा कोई कदम नहीं उठाये गए। रात में की गयी इस गुंडागर्दी के खिलाफ भी छात्र अब भी किसी ना किसी रूप में संघर्षरत हैं। इस संघर्ष में पुलिस व कालेज प्रशासन की उपेक्षा का शिकार भी छात्रों को होना पड़ रहा है। छात्रों को अपने संघर्ष को और भी जोरदार ढंग से चलाने की आवश्यकता हैं। ताकि साम्प्रदायिक ताकतों को जवाब दिया जा सके उन्हें परास्त किया जा सके।

DUSU चुनाव में मुददा विहीन-संघर्ष विहीन राजनीति के खिलाफ सभा



9 सितम्बर, आर्ट फैकल्टी गेट पर जोरदार नारों के साथ सभा की शुरूआत की गयी। सभा का संचालन करते हुए शिप्रा ने कहा कि मौजूदा DUSU चुनाव में आम छात्रों की मांगे सिरे से गायब हैं। बढ़ती बेरोजगारीए शिक्षा का निजीकरण व भगवाकरण के खिलाफ संघर्ष हमारी मुख्य मांगे बनती है। पर DUSU में सब प्रत्याशी इन समस्याओं से किनारा किए हुए है। 
रामजस कालेज के पछास सदस्य अजय ने कहा कि पैसा और ताकत छात्र राजनीति का मुख्य हिस्सा बन गया है। चुनावबाज पार्टियों के छात्र संगठन पूरे छात्र संघ चुनाव को नेम-फेम की राजनीति में बदल देना चाहते हैं। ये पतित नेता दारू-मुर्गे की राजनीति कर आम छात्रों को भी पतित करना चाहते है। इस पूरी राजनीति को केवल क्रांतिकारी छात्र राजनीति के जरिए ही प्रतिस्थापित किया जा सकता है।
पछास के दीपक ने कहा कि आज छात्र समुदाय पर चैतरफा हमला बोला जा रहा है। केन्द्र में भाजपा सरकार आने के बाद से ये हमले और तेज हुए हैं। एक तरफ शिक्षा के भगवाकरण के जरिए छात्रों के दिमागो को साम्प्रदायिक रंग में रंगने की कोशिश की जा रही है तो दूसरी तरफ शिक्षा के निजीकरण के जरिए उच्च शिक्षा को पूंजीपतियों के हवाले करने की कोशिश की जा रही है। एक मजबूत क्रांतिकारी छात्र आंदोलन ही इन हमलों को पीछे धकेल सकता है। पछास ऐसे ही छात्र आंदोलन को विकसित करने का प्रयास कर रहा है जो साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के खिलाफ छात्रों को संगठित करें।
सभा में नए छात्रों ने ने बढ़-चढ़ कर भागीदारी की। साथ ही अपनी आवाज व मांग को उठाया।

DU में छात्रा के शारीरिक उत्पीड़न के खिलाफ प्रदर्शन

आज 6 जुलाई DU के स्टीफन कालेज में एक शिक्षक द्वारा पी.एच.डी छात्रा के साथ लम्बे समय से किए जा रहे शारीरिक उत्पीड़न के खिलाफ छात्र व महिला संगठनों नें संयुक्त रूप से कालेज के बाहर प्रदर्शन कर शिक्षक को गिरफतार करने की मांग की।
सभा में पछास की शिप्रा ने बात रखते हुए कहा कि कालेज प्रशासन को एक साल से उक्त मामले की जानकारी थी उसके बाद भी उसके द्वारा अपराधी के खिलाफ कोई कार्यवाही न करना उसे भी कटघरे में खड़ा करता है साथ ही मामले के उजागर होने के बाद भी पूरा DU प्रशासन चुप्पी साधे बैठा हुआ है। इससे ही ये पता चल जाता है कि वो भी अपनी पूरी ताकत के साथ अपराधी के साथ ही खड़ा है। जब तक समाज में किसी भी तरह की गैरबराबरी मौजूद है तब तक ऐसे मामलों को रोका नही जा सकता। इसलिए हर स्तर की गैरबराबरी के खिलाफ एकजुट संघर्ष ही एकमात्र समाधान बनता है।
इंकलाब जिन्दाबाद।।

FTII के छात्रों की हड़ताल के समर्थन में दिल्ली में प्रदर्शन

FTII के साथियों हम तुम्हारे साथ हैं। 

गजेन्द्र चैहान की नियुक्ति व FTII के भगवाकरण करने की साजिशों के खिलाफ आज तमाम जनवादी ताकतों संयुक्त रूप से FTII के छात्रों की हड़ताल के साथ अपनी एकजुटता दिखाते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय पर प्रदर्शन किया।

 प्रदर्शन में पछास के साथियों ने भी भागीदारी की। पछास की तरफ से बात रखते हुए दीपक ने कहा कि संघी ताकतें विज्ञान, इतिहास, कला सहित हर उस चीज से खौफ खाती हैं जो समाज को आगे बढ़ाने का काम करती है। इसलिए वो विभिन्न सामाजिक संस्थाओं में अपने पिठठुओं को बैठाकर उन्हें अपनी संघी विचारधारा से दूषित करना चाहती है। गजेन्द्र चैहान की नियुक्ति भी इसी प्रक्रिया का नतीजा है। संघी राज में शिक्षा मंत्री से लेकर उनका हर कारिन्दा कूपमण्डुक सोच से ही ग्रसित होगा। वो ज्ञान को आगे नहीं बल्कि पीछे की ओर ही ले जाएगा। इसलिए जरूरी हो जाता है कि FTII के साथियों द्वारा खड़े किए गए संघर्ष का साथ देते हुए इन दक्षिणपंथी ताकतों के खिलाफ निर्णायक संघर्ष छेड़ा जाए।

प्रदर्शन में FTII के छात्र रह चुके नकुल ने कहा कि FTII में हमेशा ही जनवादी व धर्मनिरपेक्ष ताकतों का इतिहास रहा है। जिससे निकले कई छात्रों ने पूंजीवादी सिनेमा के प्रतिरोध में जनता की आवाज को प्रतिध्वनित करते हुए सिनेमा का भी निर्माण किया है। और इसी बात से संघ व भाजपा डरा हुआ है। पूर्व में FTII के निजीकरण की कोशिशें भी की गयी। इसके खिलाफ भी छात्रों ने 2 साल तक हड़ताल करके सरकार को अपने कदम खींचने पर मजबूर कर दिया था।
सभा प्रदर्शन में AISA, PACHHAS, JNUSU, SFI, NSD के छात्र तथा FTII के भूतपूर्व छात्र शामिल थे।

मई दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन

दिल्ली- पछास की दिल्ली इकाई ने इंकलाबी मजदूर केन्द्र और प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र के साथ मिलकर वजीरपुर औधोगिक क्षेत्र व शाहबाद डेरी में मई दिवस मनाया। दोनों ही जगह पछास के साथियों ने सभा को सम्बोधित करते हुए मजदूर वर्ग से अपनी घनिष्ठता व एकता पर जोर दिया। 

कोटद्वार- इकाई ने अन्य संगठनों के साथ मिलकर मई दिवस पर गोष्ठी आयोजित की। गोष्ठी में वक्ताओं ने मई दिवस के इतिहास और आज के सन्दर्भाें में इसे मनाए जाने की जरूरत पर बात रखी।

लालकुंआ-हल्द्वानी- दोनों टीमों ने मई दिवस संयुक्त रूप से रूद्रपुर में इंकलाबी मजदूर केन्द्र व सिडकुल की विभिन्न टेड यूनियनों के साथ मनाया। क्रान्तिकारी गीतों और नारों के साथ सिडकुल क्षेत्र में जुलूस निकाला गया। सभा को सम्बोधित करते हुए पछास के साथी ने कहा कि- मई दिवस का आन्दोलन महज श्रमकाल के घटों को कम करने का संघर्ष नहीं है बल्कि ये मजदूर मुक्ति के संघर्ष के लिए संघर्ष का प्रतिक दिवस है

इसी तरह के कार्यक्रम देहरादून, बरेली व काशीपुर टीम द्वारा भी किए गए।

बलात्कार के आरोपी को गिरफ्तार करने की मांग को लेकर धरना

    नैनीताल जिले के ओखलकाण्डा ब्लाक के हरीशताल गांव में तहसीलदार धारी के ड्राइवर द्वारा एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार करने की कोशिश की गयी। इस घटना में शामिल तहसीलदार के ड्राइवर को तत्काल गिरफ्तार करने तथा गांव वालों पर लगे फर्जी मुकदमों को हटाने की मांग को लेकर हल्द्वानी में प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र के साथ मिलकर परिवर्तनकामी छात्र संगठन ने धरना दिया।

    ज्ञात हो कि हरीशताल को एक पर्यटक स्थल बनाने के लिए वहां विभिन्न विभागों जिसमें डी एम (नैनीताल), एस डी एम समेत बहुत से प्रशासनिक अधिकारी मौजूद थे। एक जनता दरबार लगा हुआ था। 9 जनवरी 2014 को तहसीलदार का ड्राइवर एक 12 वर्षीय नाबालिग बच्ची को बहला-फुसलाकर अपनी गाड़ी में ले गया। उसने बच्ची के साथ बलात्कार करने की कोशिश की। यह बच्ची हल्द्वानी से हरीशताल अपने नाना जी के वार्षिक श्राद्ध में गयी थी। बहसी दरिंदा यह ड्राइवर दो दिन से पीड़िता के ननिहाल में ही रह रहा था।
  
  बच्ची ने किसी तरह गाड़ी से भागकर अपने माता-पिता को घटना के बारे में बताया। जब माता-पिता गांव वालों के साथ रिर्पोट दर्ज कराने गए तो उनकी रिर्पोट नहीं दर्ज की गयी। थाना मुक्तेश्वर में जब वहां कड़ाके की ठंड पड़ रही थी तो पीड़िता व उसके परिजनों को रात भर थाने में बिठाये रखा गया। अन्त में रात 1ः30 बजे पुलिस ने अपने अनुसार तहरीर लिखवाई।
    न्याय ना मिल पाने की वजह से पाड़िता व उसके परिजन लगभग 40 किमी पैदल चलकर हल्द्वानी पहुंचे जहां वे महिला चिकित्सालय में मेडिकल कराने गए। यहां भी उपरी दवाब के चलते पीड़िता का मेडिकल करने से मना कर दिया गया। जनदवाब के बल पर उसका मेडिकल करवाया गया। देर रात 9ः30 बजे पीड़िता व उसके परिजनों का बयान दर्ज किया गया।
    धरने में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि तहसीलदार और प्रशासन घटना को दबाने और अपराधी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। अपराधी पर कार्यवाही करने के बजाए गांव वालों पर ही फर्जी मुकदमें लगाना शासन-प्रशासन की पक्षधरता को साफ-साफ बयां कर देता है। धरने में पीड़िता की माता-पिता,रिश्तेदारों समेत अधिक संख्या में महिलांए शामिल हुयी। अपराधी की तत्काल गिरफ्तारी ना करने व दोषी को बचाने वाले अधिकारियों पर कार्यवाही ना करने पर आंदोलन को उग्र करने की चेतावनी प्रशासन को दी गयी। प्रशासन को 5 दिन का समय दिया गया है, उसके बाद आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा।

काकोरी के शहीदों की याद में शहीद सप्ताह मनाया 

काकोरी के शहीदों की याद में पछास की विभिन्न इकाईयों ने 13-19 दिसम्बर तक शहीद सप्ताह के रूप में मनाया। इस दौरान केन्द्रीय पर्चे ‘‘मरते बिस्मिल-रोशन-लाहिड़ी-अशफ़ाक़ अत्याचार से। सैकड़ों पैदा होंगे उनके रुधिर की धार से।।’’ का व्यापक वितरण किया गया। शहीद सप्ताह का समापन 19 दिसम्बर को विभिन्न कार्यक्रम करके किया गया।

        लालकुंआ टीम ने 19 दिसम्बर को सुबह 6 बजे से शहर में प्रभात फेरी निकाली और शाम को धरना व सभा का कार्यक्रम किया।

हल्द्वानी इकाई ने भी कालेज गेट पर पोस्टरों व क्रान्तिकारी गीतों के साथ सभा की। शाम को संयुक्त रूप से बुद्ध पार्क में सभा की गयी।देहरादून में काकोरी के शहीदों की शहादत व आज के दौर में उनकी प्रसांगिकता विषय पर गोष्ठी की गयी। बरेली टीम ने भी संयुक्त रूप से गोष्ठी कर शहीद सप्ताह मनाया। अन्य टीमों ने भी इसी तरह के कार्यक्रमों के साथ शहीद सप्ताह मनाया।

परिवर्तनकामी छात्र संगठन का 8वां सम्मेलन सफलता पूर्वक सम्पन्न


परिवर्तनकामी छात्र संगठन का 8वां सम्मेलन 23-24 नवम्बर को बरेली(यूपी) में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। 

सम्मेलन की कुछ फोटो-

राइका लालकुंआ आन्दोलन 

राइका लालकुआ में अधिकांश शिक्षकों के तबादले कर दिए गए है, जिसके विरोध में पछास के नेतृत्व में 23 सितम्बर को नगर में विशाल जुलूस निकाला गया। 1 अक्टूबर को स्थानीय विधायक दुर्गापाल का घेराव करने जाते छात्र छात्राओ को पुलिस प्रशासन ने आगे नहीं बढ़ने दिया। छात्राओ ने तहसील प्रांगण में ही सभा करते हुए अपना ज्ञापन सौंपा।

 29 सित0 को उत्तराखण्ड आपदा पर सेमिनार 

       ‘उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच’ द्वारा कालूमल धर्मशाला देहरादून में ‘उत्तराखण्ड आपदा से उपजे सवाल व उनका समाधान’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार के प्रारम्भ में दो मिनट का मौन रखकर उत्तराखण्ड आपदा में मारे गये लोगों को श्रद्धांजलि दी गयी। ‘उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच’ द्वारा इस दौरान एक डाक्यूमेण्ट्री फिल्म ‘केदार का शोक’ भी दिखाई गयी। मंच से जुड़े पछास के अध्यक्ष नितिन मुण्डेपी द्वारा मंच की तरफ से सेमिनार पत्र प्रस्तुत किया गया। पत्र में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में सरकार द्वारा चलाये जा रहे राहत एवं पुनर्निर्माण कार्यों में सरकार द्वारा की जा रही लापरवाही व असंवेदनशीलता की आलोचना करते हुए राहत व पुनर्वास कार्य तुरन्त पूरा करने तथा आपदा प्रभावित क्षेत्रों के सभी बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता दिये जाने इत्यादि की मांग की गयी है। 

       सेमिनार को सम्बोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सरकार को मौसम विभाग व कृषि सलाह बुलेटिन के माध्यम से 14 जून को ही उत्तराखण्ड में अगले 72 घण्टों तक भारी बारिश व चार धाम यात्रा पर रोक लगाने की चेतावनी मिल चुकी थी। परन्तु सरकार ने इस पर गंभीरता नहीं दिखाई। 16 व 17 जून की आपदा के बाद सरकार ने 21 जून को राहत व बचाव कार्य शुरू किये। 18 जून से 21 जून के बीच बड़ी संख्या में लोग मारे गये, जिनकी जानें बचायी जा सकती थीं। वक्ताओं ने इसे प्राकृतिक नहीं बल्कि सरकार व पूंजीवाद जनित आपदा करार दिया। 

     वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखण्ड में कुकुरमुत्तों की तरह से लगायी जा रहीं जल विद्युत परियोजनाओं ने आपदा को और भी विकराल बना दिया। जल विद्युत कंपनियों द्वारा मुनाफे की अंधी हवस के लिए विस्फोट करके कई-कई किमी. लम्बी सुरंगें बनायी गयी हैं जिसने गांवों, नदियों, पर्वतों व पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया है। सोनप्रयाग के पास लैंको कम्पनी ने तो मंदाकिनी का पानी सुरंग में डालने के लिए मंदाकिनी के रास्ते में ही दीवार खड़ी कर दी है, जिसके कारण सोनप्रयाग व आसपास भारी तबाही हुयी है। अन्य जल विद्युत परियोजनाएं भी इसी तरह से प्रकृति के साथ अवैज्ञानिक छेड़-छाड़ करने में पीछे नहीं हैं। वक्ताओं ने उत्तराखण्ड में लग रहीं जल विद्युत परियोजनाओं के आंकलन पर जोर देते हुए पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहीं जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगाने की मांग की।



    सेमिनार का संचालन भूपाल सिंह ने किया। सभा को त्रेपन सिंह चैहान, पंकज, संगीता नेगी, युद्धवीर त्यागी, स्वतंत्र मिश्र, गंगा देवी, नितिन, महेश चंद्र, जितेन्द्र भारती, तन्मय मंगगाई, पी.पी.आर्य, जाह्नवी तिवारी, मुनीष कुमार आदि ने संबोधित किया।   

                



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                  “उच्च शिक्षा का निजीकरण और FYUP                   विषय पर आयोजित सेमिनार में भागीदारी करें 

साथी
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      1991 में लागू की गई नई आर्थिक नीतियों के दुष्परिणाम राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में पहले ही दिखने लगे थे। इन नीतियों ने अपने लागू होने के बाद से ही देश की मेहनतकश जनता की कमर तोड़ रखी थी। अब इसके दुष्परिणाम शिक्षा के क्षेत्र में भी आने लगे हैं। शासक वर्ग एक तरफ शिक्षा के निजीकरण के जरिए सीधे ही अपनी तिजोरियां भरना चाहता है वहीं दूसरी तरफ FYUP के जरिए शिक्षा को बाजार की मांग के अनुसार ढालना चाहता है। ऐसे में प्रगतिशील ताकतों द्वारा FYUP के पीछे छिपे शासक वर्गीय मंसूबों को बेनकाब कर व्यापक स्तर पर छात्र-शिक्षक एकता बनाने की जरूरत है।
     इसी रोशनी में परिवर्तनकामी छात्र संगठन उच्च शिक्षा का निजीकरण और मौजूदा चार वर्षीय स्नातक प्रोग्राम विषय पर एक सेमिनार का आयोजन कर रहा है। आप सभी छात्र, शिक्षक, प्रगतिशील ताकतें इस सेमिनार में आमंत्रित हैं।

कार्यक्रम        -  सेमिनार
विषय           & उच्च शिक्षा का निजीकरण और मौजूदा चार वर्षीय स्नातक प्रोग्राम
दिनांक       &  25 सितंबर 2013, बुधवार
समय           & 2 बजे से 8 बजे तक
स्थान          & गांधी शांति प्रतिष्ठान] ITO चौक दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली

साथी सेमिनार में उपरोक्त विषय पर अपना पेपर प्रस्तुत करने एवं सेमिनार में अपने शामिल होने की सूचना अवश्य दें।

Cont. No : 9650170246      
Blog : pachhas1998.blogspot.in  

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सीरिया पर संभावित हमले के विरोध में गोष्ठी       
       आज दिनांक 8 सितम्बर को उत्तराखण्ड के नैनीताल जिले के रामनगर शहर में एक गोष्ठी आयोजित की गयी। गोष्ठी का विषय था साम्राज्यवादी देश और सीरिया की दशा और दिशा’। गोष्ठी की शुरूआत में परिवर्तनकामी छात्र संगठन की तरफ से एक छात्रा ने ‘आ गये यहां जवां कदम, रागिनी को ढूंढते हए’ गीत गाया।  गोष्ठी में बात रखते हुए वक्ताओं ने अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा सीरिया के साथ-साथ अन्य तमाम देशों में साम्राज्यवादियों के हस्तक्षेप को उजागर किया। 21वीं सदी में अफगानिस्तान, ईराक पर जहां सीधे हमला कर उस पर कब्जा जमा लिया वहीं लीबिया, सूडान, मिस्र, आदि तमाम अरब व अफ्रीकी मुल्कों में सक्रिय हस्तक्षेप अमेरिका ने किया। लीबिया के शासक गद्दाफी का कत्ल किया वहीं सूडान को दो भागों में विभाजित कर दिया। गोष्ठी में इस बात को साफ किया गया कि अमेरिकी साम्राज्यवाद की यह कोई नयी प्रवृत्ति नहीं है बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही उसने आजाद हुए मुल्कों पर अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया तथा उन पर बलपूर्वक अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की। जिन देशों ने उसके प्रभाव में आने से इंकार किया उन पर उसने भयंकर बमबारी की। लाओस में उसने 20 लाख टन बमों की बरसात की। तो वहीं क्यूबा में उसने 6,50,000 टन बमों की बरसात की। जिनमें लाखों निर्दोष नागरिक मारे गये। उसने मध्य एशिया के कच्चे तेल पर कब्जा करने के लिए मध्य एशिया में छोटे-छोटे देश में बंटवारा कर दिया ताकि उन छोटे-छोटे देशों को अपने कब्जे में आसानी से ले सके। उसने अफगानिस्तान में तालिबान को चेचेन्या में ओसामा बिन लादेन को पैदा किया। करोड़ों लोग द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से छेड़े गये युद्धों में मारे गये।
    ईराक पर आर्थिक प्रतिबंधों के कारण वहां 10 सालों के अंदर 6 लाख बच्चे भूख, दवाई, व दूध के अभाव में मारे गये। अफगानिस्तान व पाकिस्तान में आज भी ड्रोन हमले मे महिलायें, बच्चे व निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं। और अमेरिका का राष्ट्रपति इन मौतों को ‘कोलेटरल डेमेज’ कह रहा है। सन् 2011 में उठे जनविद्रोह जिन्हें ‘अरब बसंत’ का नाम दिया गया का फायदा उठा कर अमेरिका ने उन देशों में जहां उसके खिलाफ में सरकारें थीं, विद्रोही गुटों को सैनिक सहायता देकर अपने-अपने शासकों के खिलाफ गृहयुद्ध में झोंक दिया। लीबिया व सीरिया ऐसे ही देश में हैं। वह लीबिया में तो सफल हुआ लेकिन सीरिया में लगभग 2.5 साल से भी ज्यादा समय में वह कब्जा नहीं कर पाया है। ऐसे में वह बौखला गया है। तथा सीधे हमले की योजना बना रहा है। अमेरिका में इस हमले का जनता विरोध कर रही है। तथा खुद शासक वर्ग के एक धड़े से इसका विरोध हो रहा है। और जब यह प्रस्ताव सीनेट समिति के पास गया तो दो दिन तक बहस होने के बाद यह 7 के मुकाबले 10 वोट से पास  हुआ। दिनांक 9 सितम्बर को इसे संसद में पेश होना है।
    पिछले हमलों से सबक लेते हुए अमेरिका इस बार सीरिया की धरती पर अपने सैनिक नहीं उतार रहा है। बल्कि हवाई हमले ही करेगा। वरना मृत अमेरिकी सैनिकों के शव अमेरिका में आने पर कहीं जनता में असंतोष के स्वर न जग जायें।
    गोष्ठी में बात रखते हुए बताया गया कि ऐसा भी नहीं है कि सीरिया की वर्तमान असद की सरकार कोई जनसमर्थक सरकार है। असद की सरकार भी अन्य देशों की सरकारों की तरह मजदूर-मेहनतकश विरोधी है। वहां भी निजी पूंजी के खूनी पंजे मजदूर-मेहनतकशों का खून चूसते हैं। आज अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध का मतलब असद की सरकार का समर्थन नहीं है। बल्कि हमारा कहना है कि इस हमले के द्वारा मजदूर- मेहनतकश वर्ग की मुश्किलें और बढ़ेंगी। उनकी तबाही बर्बादी और बढ़ेगी। अमेरिका वहां किसी तरह का कोई मजदूर-मेहनतकशों का राज स्थापित नहीं करने जा रहा है। बल्कि वह अमेरिका के मजदूर वर्ग से वहां के पूंजीपति वर्ग की रक्षा ही करेगा। और अपनी पूंजी के हित साधेगा। अगर सीरिया में असद की सरकार के खिलाफ वास्तविक संघर्ष खड़ा कर एक नये समाज का निर्माण कर सकता है तो वहां का मजदूर वर्ग है और अमेरिका उसके इस काम में बाधा ही पहुंचायेगा। अतः देश-दुनिया के मजदूर-मेहनतकश वर्ग अमेरिका के इस हमले का विरोध करते हैं। गोष्ठी का समापन एक क्रांतिकारी गीत ‘हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे’ तथा ‘साम्राज्यवाद हो बर्बाद’ नारे के साथ किया गया। गोष्ठी को इंकलाबी मजदूर केन्द्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन और प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र की तरफ से आयोजित किया गया।


सीरिया पर संभावित अमेरिकी हमले के खिलाफ बरेली में अन्य संगठनो के साथ मिलकर अमेरिकी साम्राज्यवाद का पुतला दहन करते पछास कार्यकर्ता।


सांस्कृतिककर्मी और छात्र नेता हेम पाण्डे की गिरफ्तारी के विरोध में रामनगर में नागरिक अधिकार मंच के बैनर तले धरना दिया गया जिसमें पछास भी शामिल रहा।

 

8 वर्षीय चंचल की गुमशुदगी के खिलाफ लालकुंआ में जुलूस निकालते पछास व प्रमएके कार्यकर्ता




उत्तराखण्ड आपदा का दोषी कौन? पुनर्वास व पुनर्निर्माण की चुनौतियां विषय पर संगोष्ठी

       दिल्ली 7 अगस्त, उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच द्वारा गांधी शांति प्रतिष्ठान में  सांय 5 बजे से  “उत्तराखण्ड आपदा का दोषी कौन? पुनर्वास व पुनर्निर्माण की चुनौतियां” विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई। इस संगोष्ठी में समयांतर पत्रिका के संपादक पंकज बिष्ट, उत्तराखण्ड के जाने-माने पत्रकार व बुद्धिजीवी चारु तिवारी व ‘नागरिक’ पत्र के संपादक व उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच के संयोजक मुनीष कुमार मुख्य वक्ता थे। संगोष्ठी का संचालन क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, जोकि उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच का घटक संगठन है, के कमलेश कुमार ने किया।

       गोष्ठी की शुरुआत में ‘उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच’ के संयोजक व नागरिक पत्र के संपादक मुनीष कुमार ने उत्तराखण्ड के आपदाग्रस्त इलाकों के हालात तथा वहां की जनता के दुःखों-कष्टों की एक विस्तृत रिर्पोटिंग रखी। अपनी रिर्पोटिंग में उन्होंने बताया कि उत्तराखण्ड के गांवों में तबाही और मौत के भीषण मंजर के बाद आज तक भी राहत सामग्री नहीं पहुंच पा रही है। राहत सामग्री सरकारी दफ्तरों में नष्ट हो रही है लेकिन उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए सरकार कोई विशेष उपाय नहीं कर रही है। सरकारी कर्मचारी तो उन इलाकों में जाना ही नहीं चाहते।
       उन्होंने उत्तराखण्ड आपदा के बाद राहत व बचाव कार्यों में हीला-हवाली व देरी करने के लिए सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि रस्सी का सम्पर्क मार्ग जो एक दिन मे बनाया जाता है उसे 12 जुलाई (लगभग 25 दिन बाद) बनाया गया। उन्होंने बताया कि जियोलॉजिकल  सर्वे ऑफ  इंडिया व भू-गर्भ शास्त्रियों ने उत्तराखण्ड में भविष्य में आने वाले संकटों के बारे में 1994 से ही आगाह करना शुरु कर दिया था और इस आपदा से पूर्व भी भारत मौसम विज्ञान विभाग ¼Metrological Department½ ने सरकार से चार धाम यात्रा रोक देने का आग्रह किया था लेकिन सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने उत्तराखण्ड में व्यापक तबाही के लिए कॉरपोरेट पूंजी के हित में संचालित बड़े बांध परियोजनाओं जिसके लिए अंधा-धुंध डायनामाइट का प्रयोग करने, जल विद्युत परियोजनाओं हेतु पहाड़ों के भीतर कई किलोमीटर की सुरंग बनाने, जल संग्रहण के लिए दीवार बनाकर नदियों की धारा अवरुद्ध करने तथा नदियों को इन परियोजनाओं के दौरान पैदा हुए मलवे से पाटने आदि को जिम्मेदार ठहराया। अपने अंतिम विश्लेषण में उन्होंने इस आपदा को मुनाफा केन्द्रित व्यवस्था द्वारा जनित आपदा घोषित करते हुए इसका भंडाफोड़ कर जनता के व्यापक हस्तक्षेप की जरूरत पर बल दिया।
      गोष्ठी को संबोधित करते हुए उत्तराखण्ड के जाने-माने पत्रकार चारु तिवारी ने इस आपदा के लिए उत्तराखण्ड राज्य व देश के नीति नियंताओं को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कॉरपोरेट लूट व सरकारी संरक्षण में पनप रहे भू माफिया, वन माफिया व खनन माफियाओं के कारनामों तथा पहाड़ की जरूरत के बजाय कारपोरेट जगत के हितों को ध्यान मे रखकर किये जा रहे तथाकथित विकास कार्यों को भी इस तरह की आपदाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने हिमालय के हितों को ध्यान में रखकर हिमालय के लिए नीति बनाने की वकालत की।
     उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच की ओर से लगाये गये मेडिकल कैम्प में सेवायें देने वाले प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम के डा. आशुतोष ने सरकारी राहत कार्यों की आलोचना करते हुए बताया कि दूर-दराज के पहाड़ी गांवों में जनसंपर्क मार्ग बंद होने की वजह से लोगों को खतरनाक वैकल्पिक मार्गों द्वारा जान की बाजी लगाकर राहत सामग्री पाने के लिए पहुंचना पड़ रहा है तथा बीमारी की अवस्था में इन्हीं दिक्कतों के कारण वे चुपचाप कष्ट झेलने के लिए मजबूर हैं। सरकार द्वारा सम्पर्क मार्गों को आज तक भी दुरुस्त नहीं किया गया है। उन्होंने खुद यह स्वीकार किया कि सम्पर्क मार्गों के क्षतिग्रस्त होने के चलते वे व्यापक स्तर पर जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच सके।
       समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट ने इस बात पर हैरानी जतायी कि सरकार की मुख्य चिंता लोगों को राहत पहुंचाना नहीं बल्कि केदारनाथ मंदिर में दुबारा जल्द से जल्द पूजा शुरु करवाना है। उन्होंने एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में सरकार व शासक वर्ग द्वारा सुनियोजित तरीकों से धार्मिक यात्राओं व आयोजनों को बढ़ावा देने की नीति की आलोचना की तथा इसे देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे व साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए खतरा बताते हुए धर्म स्थलों पर हो रही तमाम दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार माना। उन्होंने धार्मिक यात्राओं पर कर लगाकर उस धन से स्थानीय स्तर पर जनता को रोजगार उपलब्ध कराने की बात की।
      बिष्ट जी ने नव-उदारवाद के दौर में कारपोरेट व सरकारों के बीच अपवित्र गठबंधन ¼Nexus½ तथा उसके फलस्वरूप पहाड़ों की लूट व तबाही को इस तरह की आपदाओं के लिए जिम्मेदार माना।
      पर्यावरणविद नागराज ने कारपोरेट पूंजीपतियों द्वारा पर्यावरण मानकों को धता बता कर तथा मुनाफे को केन्द्र में रखकर प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन व बड़े पैमाने पर उत्पादक कार्रवाइयों के दौरान पैदा हो रहे प्रदूषण और इन सबके फलस्वरूप हो रही ग्लोबल वार्मिंग को भी प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया तथा इस आपदा के दौरान हुई व्यापक तबाही व हजारों मौतों के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया।
      गोष्ठी के अंत में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें इस घटना की न्यायिक जांच करने, इस आपदा के दौरान सरकार की लापरवाही के चलते हजारों की संख्या में हुई मौतों व तबाही के लिए जिम्मेदार राज्य सरकार को बर्खास्त करने, घटना के दोषी लोगों को कड़ी सजा देने, घटना से प्रभावित प्रत्येक व्यक्ति को समुचित मुआवजा देने तथा इस आपदा के चलते हुई तबाही में अपने रोजगार का साधन खो चुके लोगों को एक-एक लाख रूपये का मुआवजा देने की मांग की गई।
     संगोष्ठी में इंकलाबी मजदूर केन्द्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र, प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम, विपल्व सांस्कृति मंच, पहाड़ बचाओ अभियान, उत्तराखण्ड पीपुल्स फोरम, ए. आई. एफ. टी. यू (न्यू), जनज्वार डॉट. कॉम , आर. डी. एफ के प्रतिनिधियों व कार्यकताओं के अलावा दिल्ली के अनेक बुद्धिजीवी, पत्रकार व जे. एन. यू के छात्र उपस्थित थे।
     संगोष्ठी का समापन करते हुए संचालक कमलेश कुमार ने दिल्ली के अन्य सामाजिक व जनपक्षधर संगठनों को साथ लेकर उत्तराखण्ड आपदा राहत अभियान को आगे बढ़ाने व इस आपदा के दौरान सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार, लापरवाही व अनियमितताओं को उजागर करने की बात की। गोष्ठी का समापन उत्तराखण्ड के जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ के प्रसिद्ध गीत ‘जतां एक दिनौ तो आलौ, उदिन यौ दुनी में, से हुआ।

 संगोष्ठी में पारित प्रस्ताव 

        15-17 जून को उत्तराखण्ड आपदा में हजारों की संख्या में लोग मारे गये तथा बेघर हो गये हैं। सरकार ने 14 जून को मौसम विभाग द्वारा दी गई चेतावनी के बावजूद भी चार धाम यात्रा पर रोक नहीं लगाई तथा राहत व बचाव कार्य भी काफी देरी से शुरु किये गये। सरकार यदि समय पर चार धाम यात्रा पर रोक लगा देती तथा बचाव कार्य समय पर प्रारम्भ कर देती तो हजारों जाने बचायी जा सकती थीं।
        आपदा के 5 सप्ताह बीत जाने के बावजूद भी केदार व कालीमठ के दर्जनों गांवों का सम्पर्क टूटा हुआ है। जनता के घरों तक न तो कोई प्रशासनिक अधिकारी पहुंचा है और न ही कोई जनप्रतिनिधि। सरकारी राहत कार्य ऊखीमठ तथा गुप्तकाशी तक ही सिमट कर रह गये हैं। जो लोग केदारनाथ से वापस नहीं आये हैं, उनके परिजनों की मानसिक स्थिति काफी खराब है। गांवों में न तो डॉक्टर हैं और न ही बिजली। सरकार द्वारा एक माह तक अनाज इत्यादि निःशुल्क तथा जान-माल के नुकसान का मुआवजा देने की घोषणा की गई है। सरकारी घोषणा जनता के वास्तविक नुकसान के मुकाबले में काफी कम है। एक लाख रुपये के खच्चर का मुआवजा मात्र 20 हजार ही घोषित किया गया है। डोली उठाने वाले मेहनतकश साथियों के लिए किसी भी प्रकार के मुआवजे की घोषणा नहीं की गई है।
      सरकार के कुछ बुद्धिजीवी इस आपदा को दैवीय/प्राकृतिक आपदा बताकर अपनी जवाबदेही व जिम्मेदारी से बच रहे हैं। पूंजीपतियों के मुनाफे की हवस व उत्तराखण्ड की परिस्थितियों का आंकलन किये बगैर यहां पर लगाई गई जल विद्युत परियोजनाओं ने पर्वतों व नदियों को तहस-नहस कर दिया है।
       गोष्ठी सरकार द्वारा उत्तराखण्ड आपदा को लेकर की जा रही राहत व बचाव कार्य की नीति की निंदा करती है तथा इसके लिए सरकार व पूर्व सरकारों को जिम्मेदार मानती है तथा मांग करती है कि प्रत्येक गांव तक सड़क मार्ग व विद्युत आपूर्ति तत्काल दुरुस्त की जाये। डम्प पड़ी राहत सामग्री तत्काल जनता में वितरित की जाये। सभी गांवों में जनता को चिकित्सा सुविधायें मुहैया कराई जायें। जब तक रोजगार का इंतजाम नहीं हो जाता सभी बेरोजगारों व विधवाओं को बेरोजगारी भत्ता दिया जाये। घाटी में लगाई जा रहीं जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगाई जाये। एक लाख तक के ऋणों को माफ किया जाये। संवेदनशील गांवों व आवासों को सुरक्षित स्थानों पर विस्थापित किया जाये। सभी बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जाये। क्षतिग्रस्त मकानों, झोंपडि़यों, घोड़ों-खच्चरों, खेतों इत्यादि का मुआवजा उनके बाजार मूल्य पर दिया जाये। डोली उठाने वाले व अन्य श्रमिक जो कि आपदा के समय केदारनाथ, गौरीकुण्ड, रामबाड़ा इत्यादि मे थे, सभी को एक-एक लाख रुपये का मुआवजा दिया जाये।  



 भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव का शहादत दिवस (23 मार्च)


31 जुलाई, उघम सिंह शहादत दिवस पर कार्यक्रम
31 जुलाई, उघम सिंह शहादत दिवस पर रूद्रपुर, उत्तराखण्ड में सांप्रदायिकता के खिलाफ प्रदर्शन किया गया। इससे पहले पूरे इलाके में चार दिवसीय अभियान चलाते हुए भारी संख्या में पर्चे व पोस्टर का वितरण किया गया। विगत लम्बे समय से पूरे इलाके में सांप्रदायिक ताकतों संघ व उसकी मण्डली द्वारा सांप्रदायिक सोहार्द बिगाड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में उघम सिेह का पूरा जीवन आम जनता के लिए प्रेरणा सोत्र बनता हैं।

         सभा के दौरान निकाला गया जुलूस व नाटक करते सदस्य
















उत्तराखण्ड आपदा पर संगोष्ठी

                                                                        



                                 

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