उदारीकरण-वैश्वीकरण के इस दौर के भारत में बहुत सारे अमेरिका प्रेमी लोग हैं। इनमें मनमोहन सिंह, पी.चिदंबरम और मोंटेक सिंह आहलूवालिया के नाम प्रमुख हैं। अब इन्हीं में एक नाम शिक्षा के क्षेत्र से भी जुड़ गया। यह नाम है दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति दिनेश सिंह का।
दिनेश सिंह ने एक दिन बहुत भावभीने स्वर में यह कहा कि भारत के छात्र जब तीन साल का स्नातक कोर्स कर अमेरिका जाते हैं तो उन्हें स्नातकोत्तर पाठयक्रम में प्रवेश के लिए एक साल का अतिरिक्त पाठ्यक्रम करना होता है, इससे उन्हें कठिनाई होती है। दिल्ली विश्वविघालय में स्नातक का पाठ्यक्रम चार साल का कर देने से यह कठिनाई दूर हो जायेगी।
स्पष्ट ही दिनेश सिंह की चिंता अमेरिकी विश्वविद्यालयों के अनुरूप भारतीय छात्रों को ढालने की थी। भले ही अमेरिका जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या दो-चार प्रतिशत हो, पर दिनेश सिंह के लिए तो वही प्रमुख बात थी। यह इसलिए कि वे उदारीकरण के अन्य जिहादियों की तरह अपनी जहनियत में घोर अमेरिकापरस्त हैं।
उनकी इस अमेरिकापरस्ती पर जब तीखे सवाल उठे तो दिनेश सिंह और उनके समर्थकों ने बिलकुल दूसरे सिरे से बात करनी शुरू कर दी। अब वे अमेरिका पलायन कर जाने को उत्सुक सबसे अच्छे अंक पाने के हिसाब से छात्रों की नहीं बल्कि फेल हो जाने वाले छात्रों की बात करने लगे। उन्होंने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने वाले करीब तीस प्रतिशत छात्र अलग-अलग साल फेल हो जाते हैं और स्नातक की डिग्री नहीं हासिल कर पाते। अब दो साल के डिप्लोमा पाठ्यक्रम से जिसमें मूलभूत ग्यारह विषय पढ़ाये जायेगे, ऐसा नहीं होगा तथा ये छात्र दो साल बाद डिप्लोमा लेकर विश्वविद्यालय छोड़ सकते हैं। इस तरह वे इन छात्रों के हितैषी हैं, जो अधिकतर गरीब घरों से आते हैं तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के अपेक्षाकृत घटिया कालेजों में पढ़ते हैं। अमेरिकापरस्त दिनेश सिंह इस तरह सबसे ज्यादा अंक पाने वाले तथा अमेरिका पलयान कर जाने वाले और सबसे कम अंक पाने वाले और पूंजीवादी व्यवस्था में व्हाइट या ब्लू कालर मजदूर बन जाने वाले दोनों तरह के छात्रों के हितैषी के रूप में सामने आते हैं।
अब हम जानते हैं कि पूंजीवाद में ऐसा संभव नहीं है। पूंजीवाद में कोई एक साथ पूंजीपति और मजदूर का या प्रबंधक और मजदूर का हितैषी नहीं हो सकता। यदि कोई ऐसा कह रहा है तो वह निश्चित तौर पर पूंजीपति/प्रबंधक का हितैषी होगा तथा साथ ही मजदूर को धोखा देने के लिए ऐसा कर रहा होगा। दिनेश सिंह और उनके समर्थकों तथा मनमोहन सिंह एण्ड कंपनी जैसे उनके आकाओं के बारे में भी यही सच है।
पूंजीवाद में यह आम तौर पर होता है। पूंजीवादी व्यवस्था की श्रम शक्ति की जरूरतों के अनुरूप छात्रों का विभेदीकरण होता है, जिससे पूंजीपति को मजदूर (ह्वाइट व ब्लू कालर दोनों), सुपरवाइजर, इंजीनियर, प्रबंधक, इत्यादि मिल सकें। इन विभिन्न श्रेणियों में भर्ती आम तौर पर वर्गीय पैदाइश के अनुरूप होती है- मजदूर का बेटा मजदूर और प्रबंधक का बेटा प्रबंधक। पर बीच के संस्तरों में इस बात की गुंजाईश होती है कि कोई अपनी पैदाइश की हैसियत से ऊपर-नीचे चला जाये। यानी बाबू का बेटा/बेटी मजदूर या प्रबंधक बन जाये। शिक्षा हासिल करने की प्रक्रिया में आम तौर पर क्रमशः यह छंटनी होती है। आज भारत के पूंजीपति वर्ग की जरूरत बनती है कि उसे विभिन्न तरह के काम करने वाले उचित मात्रा में मिले। अक्सर पूंजीपति वर्ग की शिकायत भी होती है कि उसे आवश्यकता के अनुरूप लोग नहीं मिल रहे हैं, जिसमें यह शिकायत भी होती है कि किसी कम शिक्षा वाले काम के लिए ज्यादा शिक्षित लोग मिलते हैं और इससे परेशानी आती है।
यहीं पर विश्वविद्यालयों का पुराना ढांचा पूंजीपति वर्ग के इस जरूरत से बेमेल साबित हो रहा है। पूंजीवाद की पैदाइश के शुरूआती दौर में विश्वविद्यालय उच्च ज्ञान के केन्द्र के रूप में विकसित हुए। उनकी संख्या बहुत कम थी और उनमें छात्र सीमित मात्रा में होते थे। लेकिन उस उपलब्ध ज्ञान के स्वर को देखते हुए इन विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का स्तर बहुत ऊंचा था।
पूंजीवाद के विकास के साथ विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ने लगी, इनका आकार बढ़ने लगा तथा इनमें शिक्षा पाने वाले छात्रों की संख्या बढ़ने लगी। लेकिन तब भी माना यही जाता रहा कि ये विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के केन्द्र हैं और वहां न केवल शिक्षा का स्तर ऊंचा होना चाहिए बल्कि कुल माहौल भी स्कूल अथवा तकनीकी शिक्षण संस्थान से बिल्कुल अलग होना चाहिए। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा संस्थान ऊपरी तौर पर इस अवधारणा के तहत स्थापित किये गये।
पर वक्त के साथ यह पाया गया कि भारत जैसे देशों में विश्वविद्यालय शिक्षा के उच्च संस्थान न होकर भांति-भांति की डिग्रियां बांटने वाले संस्थान बन गये हैं। यह भी बेहद बेतरतीब हो गया। यह इस हद तक हो गया कि उच्च शिक्षा का डिग्री से संबंध समाप्त हो गया। यह उम्मीद करना बेमानी हो गया कि राजनीति शास्त्र का स्नातक वास्तविक राजनीति की कोई समझदारी रखता हो। इस तरह डिग्री की इस बेतरतीब बांट ने श्रम शक्ति के बाजार में कुशलता और डिग्री में बेमेल स्नातकों की भीड़ खड़ी करनी शुरू कर दी। शिक्षा के स्तर से विभिन्न डिग्री हासिल करने की इस आपा-धापी ने प्रवेश लेने वालों और पास होने वालों के फर्क को और बढ़ा दिया।
आज भारत में आम उच्च शिक्षा की सामान्य हालत है। सभी विश्वविद्यालयों का यही हाल है। दिनेश सिंह की दिल्ली विश्वविद्यालय को नये रूप में ढालने की कोशिश असल में इस समस्या का वह पूंजीवादी समाधान है, जो आज के उदारीकृत पूंजीवाद के अनुरूप है।
इस समाधान में विश्वविद्यालय की उच्च शिक्षा को विभेदीकृत कर दिया जायेगा और सही मायने में उच्च शिक्षा को केवल कुछ लोगों तक सीमित कर दिया जायेगा। बाकी लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा कि वे डिप्लोमा या सामान्य डिग्री लेकर विश्वविद्यालय छोड़ दें और श्रम शक्ति के बाजार में चले जायें। इस तरह सभी छात्रों की एक तरह की शिक्षा और एक तरह की डिग्री देकर श्रम शक्ति के बाजार में ढकेलने के बदले, अब अलग-अलग स्तर की शिक्षा और डिप्लोमा/डिग्री देकर विश्वविद्यालय उन्हें श्रम शक्ति के बाजार में डालेगा। दूसरी ओर स्नातक से ऊपर की स्नातकोत्तर पढ़ाई के लिए योग्य छात्रों की संख्या इससे स्वतः सीमित हो जायेगी क्योंकि उसमें प्रवेश लेने के लिए आनर्स के साथ स्नातक की डिग्री चाहिए, जो केवल चार साल की पढ़ाई पूरी करने पर ही मिलेगी। दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक पाठ्यक्रम इस रूप में होगा: दो साल में डिप्लोमा, तीन साल में सामान्य डिग्री, चार साल में आनर्स के साथ डिग्री। किसी भी छात्र को इनमें से किसी स्तर पर बाहर जाने का अवसर होगा। अभी स्नातक डिग्री हासिल कर स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में जो भीड़ हो जाती है, वह स्वतः छंट जायेगी।
इस तरह इस शिक्षा प्रणाली के लागू होने पर विश्वविद्यालयी शिक्षा का श्रम शक्ति के बाजार के साथ किसी हद तक सामंजस्य बैठेगा। अब ढेरों गरीब छात्र तीन साल की स्नातक की पढ़ाई करने और बी.ए. की डिग्री लेने के बाद श्रम शक्ति के बाजार में प्रवेश नहीं करेंगे, जहां हो सकता है उनकी पढ़ाई के अनुरूप उन्हें कोई काम न मिले। इसके विपरीत वे दो साल में ऐसा डिप्लोमा लेकर विश्वविद्यालय से बाहर हो जायेंगे, जिसमें ग्यारह बुनियादी विषय कुछ इस रूप में पढ़ाये गये होंगे कि वे ह्वाइट कालर मजदूरों की निचली पायदान में फिट हो सकें। यह कुछ उसी तरह का होगा जैसे ब्लू कालर मजदूरों के लिए आई.टी.आई. संस्थान करते हैं। और कहने की बात नहीं है कि आई.टी.आई. का पाठ्यक्रम भी दो साल का ही होता है। इसी तरह थोड़ा और बेहतर ह्वाइट कालर मजदूर बनने के लिए छात्र को तीन साल विश्वविद्यालय में रहना होगा और डिग्री हासिल करनी होगी। तब वह श्रम शक्ति के बाजार में थोड़ी ऊंची तनख्वाह पर जा सकता है। स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल करने और पूंजीवादी व्यवस्था में ऊपर की पायदान पर पहुंचने के लिए छात्र को चार साल की आनर्स वाली डिग्री हासिल करनी होगी।
इस तरह इस प्रणाली ने स्वतः ही एक ऐसी छन्नी का निर्माण कर दिया है, जिसके द्वारा विभिन्न हैसियत के छात्र क्रमशः छंटते जायेंगे और श्रम शक्ति के बाजार में शामिल होते जायेंगे। कुछ आलोचकों ने यह आरोप लगाया है कि यह प्रणाली गरीब छात्र विरोधी है क्योंकि एक तो चार साल का आनर्स डिग्री कोर्स होने से खर्च एक तिहाई बढ़ जाता है, दूसरे दो या तीन साल में डिप्लोमा या सामान्य डिग्री लेकर बाहर हो जाने की सुविधा के चलते ऐसे छात्रों को उनके गरीब मां-बाप विश्वविद्यालय से निकाल लेंगे। पर इस सम्पूर्ण प्रणाली का तो ठीक उद्देश्य ही नहीं है। यह इसी रूप में और इसीलिए निर्मित है कि गरीब छात्र विश्वविद्यालय में टिकने के बदले श्रम शक्ति के बाजार में जायें और विद्यालय सबसे नीचे के ह्वाइट कालर मजदूरों के रूप में अपना जीवन शुरू करें। पूंजीपति वर्ग को उनकी इसी रूप में जरूरत है और वह उन्हें बता रहा है कि तुम्हें बेवजह समय नष्ट करने के बदले अपनी स्थिति में फिट हो जाना चाहिए। यह यदि गरीब छात्रों में से कुछ के ऊपर निकल जाने की संभावना को और कम करता है तो यह पूर्णतया उदारीकृत पूंजीवाद के अनुरूप है, जिसमें घ्रुवीकरण बढ़ रहा है और नीचे से ऊपर की ओर गति पहले के मुकाबले बहुत मुश्किल हो गयी है।
आलोचकों का यह भी कहना है कि इससे लड़कियों की उच्च शिक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा क्योंकि तीन के बदले चार साल का पाठ्यक्रम होने और दो-तीन साल में डिप्लोमा/डिग्री लेकर बाहर होने की सुविधा के चलते मां-बाप लड़कियों को बाहर कर लेंगे, जिससे लड़कों की शिक्षा जारी रखी जा सके। पर असल में यह भी आज के श्रम शक्ति बाजार की जरूरतों के अनुरूप है। ह्वाइट कालर मजदूरों के निम्नतर स्तर पर इस तरह की लड़कियों की जरूरत है। ऐसे में उनका विश्वविद्यालयों से बाहर हो जाना पूंजीपति वर्ग के लिए फायदेमंद।
जब विश्वविद्यालय इस तरह श्रम शक्ति के बाजार के अनुरूप आपूर्ति करने वाले के रूप में ढाला जा रहा हो तो स्वाभाविक तौर पर यही उम्मीद की जायेगी कि वह श्रम शक्ति के भावी जीवन के अनुरूप अनुशासन भी पैदा करेगा। यानी एक ह्वाइट कालर मजदूर को अपनी काम की जगह पूंजीपति वर्ग के जिस कठोर अनुशासन में काम करना होता है, वह उसके अंदर स्थापित करने की कोशिश की जायेगी। जो अनुशासन मजदूर काम की जगह पर सीखता है, वह यदि भावी मजदूर अपने शिक्षण संस्थान में ही सीख जाये तो पूंजीपति वर्ग को बहुत फायदा होगा। इसीलिए दिनेश सिंह एण्ड कंपनी दिल्ली विश्वविद्यालय के पूरे माहौल को ही बदलने के लिए कटिबद्ध है। अब यह विश्वविद्यालय किसी स्कूल की तरह चलेगा। जुलूस, प्रदर्शन, आंदोलन सब प्रतिबंधित होंगे।छात्र-छात्राएं कहीं बैठे, टहलते या बात करते नजर नहीं आयेंगे। सांस्कृतिक इत्यादि गतिविधियां केवल उतनी ही होगी, जितना प्रशासन चाहेगा। बाहरी लोगों का विश्वविद्यालय में प्रवेश वर्जित होगा। इन सबको सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय में निजी सुरक्षा गार्ड और बाउंसर नियुक्त किये जायेंगे। दिनेश सिंह आजकल उन्हीं की छाया में चलते हैं।
क्रांतिकारी छात्रों की हमेशा से यह मांग रही है कि शिक्षा रोजगारपरक होनी चाहिए। अब दिल्ली विश्वविद्यालय ने आज के उदारीकृत पूंजीवाद के हिसाब से शिक्षा को रोजगारपरक बनाने में पहलकदमी ली है। देर-सबेर देश के सारे विश्वविद्यालय इसी रास्ते पर चलेंगे। लेकिन पूंजीवाद में इससे भिन्न रोजगारपरकता क्या हो सकती है? पूंजीवाद में पूंजीपति वर्ग को अलग-अलग योग्यता वाली श्रम शक्ति चाहिए। इसमें ज्यादातर हिस्सा उस ब्लू और ह्वाइट कालर मजदूर का होता है जो निहायत उबाऊ, रुटीनी काम करते हैं, वह चाहे मशीन पर हो, चाहे उससे इतर। इनसे अलग विश्वविद्यालयों की उच्च शिक्षा की आम स्नातक डिग्री इसके अनुरूप नहीं है। अब उसे काट-छांटकर बाजार के अनुरूप कर दिया जा रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था अपनी श्रम शक्ति की मांग के अनुरूप भावी श्रम शक्ति को टालने का ज्यादा बेहतर तरीका खोज रही है।
वास्तविक उच्च शिक्षा तथा मानवीय जीवन के अनुरूप एक भिन्न तरह की रोजगारपरकता, जिसमें व्यक्ति की सभी शारीरिक-मानसिक क्षमताओं का विकास और इस्तेमाल हो, की मांग करने का मतलब वास्तव में पूंजीवाद को समाप्त करने की मांग करता है। पूंजीवाद में तो लोग भिन्न-भिन्न तरह के श्रम शक्ति बेचने वाले हैं और पूंजीपति वर्ग चाहता है कि बाजार में उतनी ही मात्रा में उसी गुणवत्ता की श्रम शक्ति पर खर्च कम आयेगा और उसका इस्तेमाल भी ठीक तरीके से हो सकेगा (महत्वपूर्ण बात यह है कि इस चीज को अध्यापकों के मामले में इसी विश्वविद्यालय में लागू कर दिया गया है, जहां अब पचास प्रतिशत अध्यापक अस्थाई हैं)।
कुछ साल पहले पूंजीपतियों की ओर से उच्च शिक्षा के पुनर्गठन की एक परियोजना पेश की गयी थी। अब दिल्ली विश्वविद्यालय में सेमेस्टर सिस्टम तथा स्नातक पाठयक्रम के पुनर्गठन के साथ इसे व्यवहारतः लागू करने की शुरूआत कर दी गयी है। भविष्य में दिल्ली विश्वविद्यालय की निजीकरण, आउटसोंर्सिंग तथा विदेशी संस्थाओं को भी आमंत्रित करने की योजना है। इससे उच्च शिक्षा को उदारीकृत पूंजीवाद के अनुरूप ढालने की गति और तेज हो जायेगी।
मनमोहन सिंह एण्ड कंपनी के चेले दिनेश सिंह एण्ड कंपनी द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय में किये जा रहे बदलावों का यही वास्तविक निहितार्थ है।
इस तरह इस शिक्षा प्रणाली के लागू होने पर विश्वविद्यालयी शिक्षा का श्रम शक्ति के बाजार के साथ किसी हद तक सामंजस्य बैठेगा। अब ढेरों गरीब छात्र तीन साल की स्नातक की पढ़ाई करने और बी.ए. की डिग्री लेने के बाद श्रम शक्ति के बाजार में प्रवेश नहीं करेंगे, जहां हो सकता है उनकी पढ़ाई के अनुरूप उन्हें कोई काम न मिले। इसके विपरीत वे दो साल में ऐसा डिप्लोमा लेकर विश्वविद्यालय से बाहर हो जायेंगे, जिसमें ग्यारह बुनियादी विषय कुछ इस रूप में पढ़ाये गये होंगे कि वे ह्वाइट कालर मजदूरों की निचली पायदान में फिट हो सकें। यह कुछ उसी तरह का होगा जैसे ब्लू कालर मजदूरों के लिए आई.टी.आई. संस्थान करते हैं। और कहने की बात नहीं है कि आई.टी.आई. का पाठ्यक्रम भी दो साल का ही होता है। इसी तरह थोड़ा और बेहतर ह्वाइट कालर मजदूर बनने के लिए छात्र को तीन साल विश्वविद्यालय में रहना होगा और डिग्री हासिल करनी होगी। तब वह श्रम शक्ति के बाजार में थोड़ी ऊंची तनख्वाह पर जा सकता है। स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल करने और पूंजीवादी व्यवस्था में ऊपर की पायदान पर पहुंचने के लिए छात्र को चार साल की आनर्स वाली डिग्री हासिल करनी होगी।
इस तरह इस प्रणाली ने स्वतः ही एक ऐसी छन्नी का निर्माण कर दिया है, जिसके द्वारा विभिन्न हैसियत के छात्र क्रमशः छंटते जायेंगे और श्रम शक्ति के बाजार में शामिल होते जायेंगे। कुछ आलोचकों ने यह आरोप लगाया है कि यह प्रणाली गरीब छात्र विरोधी है क्योंकि एक तो चार साल का आनर्स डिग्री कोर्स होने से खर्च एक तिहाई बढ़ जाता है, दूसरे दो या तीन साल में डिप्लोमा या सामान्य डिग्री लेकर बाहर हो जाने की सुविधा के चलते ऐसे छात्रों को उनके गरीब मां-बाप विश्वविद्यालय से निकाल लेंगे। पर इस सम्पूर्ण प्रणाली का तो ठीक उद्देश्य ही नहीं है। यह इसी रूप में और इसीलिए निर्मित है कि गरीब छात्र विश्वविद्यालय में टिकने के बदले श्रम शक्ति के बाजार में जायें और विद्यालय सबसे नीचे के ह्वाइट कालर मजदूरों के रूप में अपना जीवन शुरू करें। पूंजीपति वर्ग को उनकी इसी रूप में जरूरत है और वह उन्हें बता रहा है कि तुम्हें बेवजह समय नष्ट करने के बदले अपनी स्थिति में फिट हो जाना चाहिए। यह यदि गरीब छात्रों में से कुछ के ऊपर निकल जाने की संभावना को और कम करता है तो यह पूर्णतया उदारीकृत पूंजीवाद के अनुरूप है, जिसमें घ्रुवीकरण बढ़ रहा है और नीचे से ऊपर की ओर गति पहले के मुकाबले बहुत मुश्किल हो गयी है।
आलोचकों का यह भी कहना है कि इससे लड़कियों की उच्च शिक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा क्योंकि तीन के बदले चार साल का पाठ्यक्रम होने और दो-तीन साल में डिप्लोमा/डिग्री लेकर बाहर होने की सुविधा के चलते मां-बाप लड़कियों को बाहर कर लेंगे, जिससे लड़कों की शिक्षा जारी रखी जा सके। पर असल में यह भी आज के श्रम शक्ति बाजार की जरूरतों के अनुरूप है। ह्वाइट कालर मजदूरों के निम्नतर स्तर पर इस तरह की लड़कियों की जरूरत है। ऐसे में उनका विश्वविद्यालयों से बाहर हो जाना पूंजीपति वर्ग के लिए फायदेमंद।
जब विश्वविद्यालय इस तरह श्रम शक्ति के बाजार के अनुरूप आपूर्ति करने वाले के रूप में ढाला जा रहा हो तो स्वाभाविक तौर पर यही उम्मीद की जायेगी कि वह श्रम शक्ति के भावी जीवन के अनुरूप अनुशासन भी पैदा करेगा। यानी एक ह्वाइट कालर मजदूर को अपनी काम की जगह पूंजीपति वर्ग के जिस कठोर अनुशासन में काम करना होता है, वह उसके अंदर स्थापित करने की कोशिश की जायेगी। जो अनुशासन मजदूर काम की जगह पर सीखता है, वह यदि भावी मजदूर अपने शिक्षण संस्थान में ही सीख जाये तो पूंजीपति वर्ग को बहुत फायदा होगा। इसीलिए दिनेश सिंह एण्ड कंपनी दिल्ली विश्वविद्यालय के पूरे माहौल को ही बदलने के लिए कटिबद्ध है। अब यह विश्वविद्यालय किसी स्कूल की तरह चलेगा। जुलूस, प्रदर्शन, आंदोलन सब प्रतिबंधित होंगे।छात्र-छात्राएं कहीं बैठे, टहलते या बात करते नजर नहीं आयेंगे। सांस्कृतिक इत्यादि गतिविधियां केवल उतनी ही होगी, जितना प्रशासन चाहेगा। बाहरी लोगों का विश्वविद्यालय में प्रवेश वर्जित होगा। इन सबको सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय में निजी सुरक्षा गार्ड और बाउंसर नियुक्त किये जायेंगे। दिनेश सिंह आजकल उन्हीं की छाया में चलते हैं।
क्रांतिकारी छात्रों की हमेशा से यह मांग रही है कि शिक्षा रोजगारपरक होनी चाहिए। अब दिल्ली विश्वविद्यालय ने आज के उदारीकृत पूंजीवाद के हिसाब से शिक्षा को रोजगारपरक बनाने में पहलकदमी ली है। देर-सबेर देश के सारे विश्वविद्यालय इसी रास्ते पर चलेंगे। लेकिन पूंजीवाद में इससे भिन्न रोजगारपरकता क्या हो सकती है? पूंजीवाद में पूंजीपति वर्ग को अलग-अलग योग्यता वाली श्रम शक्ति चाहिए। इसमें ज्यादातर हिस्सा उस ब्लू और ह्वाइट कालर मजदूर का होता है जो निहायत उबाऊ, रुटीनी काम करते हैं, वह चाहे मशीन पर हो, चाहे उससे इतर। इनसे अलग विश्वविद्यालयों की उच्च शिक्षा की आम स्नातक डिग्री इसके अनुरूप नहीं है। अब उसे काट-छांटकर बाजार के अनुरूप कर दिया जा रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था अपनी श्रम शक्ति की मांग के अनुरूप भावी श्रम शक्ति को टालने का ज्यादा बेहतर तरीका खोज रही है।
वास्तविक उच्च शिक्षा तथा मानवीय जीवन के अनुरूप एक भिन्न तरह की रोजगारपरकता, जिसमें व्यक्ति की सभी शारीरिक-मानसिक क्षमताओं का विकास और इस्तेमाल हो, की मांग करने का मतलब वास्तव में पूंजीवाद को समाप्त करने की मांग करता है। पूंजीवाद में तो लोग भिन्न-भिन्न तरह के श्रम शक्ति बेचने वाले हैं और पूंजीपति वर्ग चाहता है कि बाजार में उतनी ही मात्रा में उसी गुणवत्ता की श्रम शक्ति पर खर्च कम आयेगा और उसका इस्तेमाल भी ठीक तरीके से हो सकेगा (महत्वपूर्ण बात यह है कि इस चीज को अध्यापकों के मामले में इसी विश्वविद्यालय में लागू कर दिया गया है, जहां अब पचास प्रतिशत अध्यापक अस्थाई हैं)।
कुछ साल पहले पूंजीपतियों की ओर से उच्च शिक्षा के पुनर्गठन की एक परियोजना पेश की गयी थी। अब दिल्ली विश्वविद्यालय में सेमेस्टर सिस्टम तथा स्नातक पाठयक्रम के पुनर्गठन के साथ इसे व्यवहारतः लागू करने की शुरूआत कर दी गयी है। भविष्य में दिल्ली विश्वविद्यालय की निजीकरण, आउटसोंर्सिंग तथा विदेशी संस्थाओं को भी आमंत्रित करने की योजना है। इससे उच्च शिक्षा को उदारीकृत पूंजीवाद के अनुरूप ढालने की गति और तेज हो जायेगी।
मनमोहन सिंह एण्ड कंपनी के चेले दिनेश सिंह एण्ड कंपनी द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय में किये जा रहे बदलावों का यही वास्तविक निहितार्थ है।

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