4 November 2018

डीयू में कांचा इलैया की किताबों पर रोक लगाए जाने का विरोध करो !

शिक्षा पर संघी गिरोह द्वारा किए जा रहे हमलों के खिलाफ एकजुट हो !!


        डीयू में ‘दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टैंडिंग कमेटी आॅन अकैडमिक मैटर्स’ ने दलित चिंतक कांचा इलैया द्वारा लीखित ‘गाॅड ऐज पाॅलिटिकल फिलाॅसफर’, वाय आइ एम नाॅट हिंदू, ‘पोस्ट हिंदू इंडिया’, नंदिनी सुंदर द्वारा लिखित ‘बर्निंग बस्तर’ और क्रिस्टोफर जैफरलाॅट की ‘द मिलिशियाज आॅफ हिंदुत्व’ जैसी किताबों को एम.ए. राजनीतिक विज्ञान के पाठ्यक्रम से हटाने का सुझाव दिया है। यही नही डीयू के पाठ्यक्रम में कहीं भी ‘दलित’ शब्द का उपयोग करने पर भी आपत्ति जताते हुए ‘स्टेंडिंग कमेटी’ द्वारा इसे न प्रयोग करने का सुझाव दिया गया है। ये दोनों सुझाव एकेडमिक काउंसिल को भेजे गए हैं। वहां से फैसला आने के बाद ही इसे लागू किया जाएगा।


        कांचा इलैया की ये सभी किताबें हिन्दू धर्म के प्रति एक भिन्न दृष्टिकोण हमारे सामने रखती है। अपने व्यक्तिगत जीवन से प्राप्त अनुभवों को किताबों में संजोते हुए कांचा जाति व्यवस्था और ब्राहम्णवाद की कटु आलोचना करते हैं। ऐसे में घोर मध्ययुगीन, घोर ब्राहम्णवादी संघी मण्डली का कांचा व उनकी किताबों से विरोध बनना ही था। इसलिए भी संघी गिरोह द्वारा पहले भी उन पर हमले किए गए और अब उनकी किताबों पर हमला बोला जा रहा है।



        डीयू के राजनीतिक विज्ञान के पाठ्यक्रम में घोर अल्पसंख्यक विरोधी, महिला विरोधी गोलवरकर से लेकर सावरकर तक को पढ़ाया जाता है। यही नही गांधी, माक्र्स से लेकर हिटलर तक को डीयू में पढ़ाया जाता है। जिससे की छात्र इन सभी भिन्न-भिन्न विचारों पर बहस कर सके। इन्हे बेहतर तरीके से समझ सके। अगर कोई विचारधारा गलत है तो क्यों गलत है? ये उसे पढ़कर ही समझा जा सकता है।

        विश्वविद्यालय इन्ही चीजों का केन्द्र बनते हैं। जहां छात्र विभिन्न विचारों को जानते-समझते हैं, उनपर बहस करते हैं। और अपनी आगे की राह बनाते हैं। ऐसे में जरूरी है कि वो विभिन्न दृष्टिकोणों से अवगत हो। जरूरी है कि वो किसी भी सवाल को विभिन्न आयामों से देख सके। और इसी चीज से संघ मण्डली को आपत्ति है। वो चाहते हैं कि छात्र वही पढ़े जो वो चाहते हैं। वो वही बोले जो वो कहते हैं। वो छात्रों को सोचने-समझने वाला प्राणी नही बल्कि अपने तथाकथित ‘हिन्दू राष्ट्र’ की पालकी ढ़ोने वाला एक कहार बनाना चाहते हैं। ऐसे में उनके इन प्रयासों का विरोध करना सभी प्रगतिशाील छात्रों का कर्तव्य बन जाता है।

        कांचा की किताबों से संघी मण्डली को हो रही परेशानी को उनकी एक किताब ‘मैं हिंदू क्यों नहीं हूं’ की भूमिका में लिखे इस उद्धरण से समझा जा सकता है ‘अब मेरे सामने सवाल यह नही है कि मैं मुस्लमानों, ईसाइयों और सिखों के साथ अपने दुश्मनों जैसा व्यवहार करूं। हिन्दुत्ववादी मुझ से यही करवाना चाहते हैं। सवाल यह है हम निचले दर्जे के शूद्र और अतिशूद्र (जिनको मैं दलितबहुजन कहता हूं) इस हिंदूवाद या हिन्दूत्व का क्या करें? यह सिर्फ मेरी ही बात नही है बल्कि भारत के हम सब दलितबहुजनों ने इस ‘हिन्दू’ नामक शब्द को अपने बचपन के दिनों में भी नही सुना है, न एक शब्द के रूप में, न किसी संस्कृति के रूप में और न किसी धर्म के रूप में। हमने तुरूकुल्लु (मुस्लमान) सुना है। हमने क्रिस्तानापुल्लु (ईसाई) सुना है। हमने बापानुल्लु (ब्राहम्ण) और कुमतुल्लु (बनिया) के बारे में सुना है। ये हमसे भिन्न लोग हैं। इन चारों श्रेणियों में से बापानुल्लु और कुमतुल्लु सबसे ज्यादा भिन्न हैं। हमारे जीवन में कम से कम कुछ ऐसे आयाम हैं जो मुस्लमानों और ईसाइयों से मिलते-जुलते हैं। हम सब मांस खाते हैं और हम एक दूसरे को छू सकते हैं। मुसलमानों के साथ हमारे कई प्रकार के नाते हैं। हम दोनों पीरिला उत्सव एक साथ मनाते हैं। कई मुस्लमान हमारे साथ खेतों पर काम करते हैं। सिर्फ ब्राहम्ण और बनिया ही ऐसे हैं जिनके साथ हमारा कोई संबंध नहीं है। लेकिन आज अचानक हमें बताया जाता है कि ब्राहम्णों और बनियों के साथ हमारे एकसमान सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं। यह केवल आश्चर्यपूर्ण बात नहीं है बल्कि यह चैंका देने वाली बात है।’ (मैं हिन्दू क्यों नहीं हूं किताब की भूमिका से)

        कांचा इलैया, नंदिनी सुंदर और क्रिस्टोफर जैफरलाॅट के विचारों से सहमती-असहमती एक दीगर बात है। इसके बावजूद पछास इनकी किताबों को पाठ्यक्रम से हटाए जाने का पुरजोर विरोध करता है। हम सभी प्रगतिशील ताकतों से आहवान करते हैं कि वो शिक्षा को भगवा रंग में रंगने की साजिशों के खिलाफ एकजुट हो।

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