1 July 2020

जनता को लूटकर अपना खजाना भरती सरकारें

पेट्रोल- डीजल के दामों में भारी बढ़ोत्तरी


पिछली 7 जून 2020 से भारत में तेल की खुदरा कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी जारी है। 7 जून से देश में डीज़ल के दामों में लगातार 21 दिन तक वृद्धि हुई तथा इन 21 दिनों में पेट्रोल के दाम भी 20 बार बढ़े। दिल्ली में इन दिनों में पेट्रोल के दाम 9.17 रुपये बढ़कर 80.38 रुपये तो डीजल के दाम 11.23 रुपये बढ़कर 80.40 रुपये हो गए। वहीं मुम्बई में पेट्रोल के दाम 87.14 रूपये व डीजल के दाम 78.71 रूपये हो गए। सब कुछ 'ऐतिहासिक' करने वाली मोदी सरकार के काल में तेल की खुदरा कीमतें भी ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गयी। तेल के दामों में यह भारी वृद्धि तब हुयी है जब कोरोना महामारी के चलते विश्व में तेल की मांग में गिरावट आने के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम काफी ज्यादा गिर गए। 


गौरतलब है कि भारत में तेल की कीमतों का निर्धारण पहले केंद्र सरकार किया करती थी। जून 2010 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को और अक्टूबर 2014 में मोदी सरकार ने डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर तेल की कीमतों में वृद्धि का अधिकार तेल कंपनियों को दे दिया। तेल कंपनियां पहले तेल की कीमतों का निर्धारण हर पखवाड़े किया करती थी, परंतु जून 2017 से यह तेल की कीमतों का निर्धारण रोज़ाना करने लगी। इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि विश्व बाज़ार में तेल की कीमतें गिरने पर उपभोक्ताओं को तुरंत इसका लाभ दिया जा सकेगा। लेकिन आज जब तेल की कीमतें गिर गयी हैं तो सरकारें व तेल कंपनियां इसका लाभ जनता तक पहुंचाने के बजाय अपने खज़ाने को भरने में लगी हैं।

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में गिरावट का लाभ जनता तक न पहुंचने का कारण सरकारों द्वारा इस पर वसूला जाने वाला कर (Tax) है। भारत पेट्रोलियम पदार्थों में दुनिया में सबसे ज्यादा टैक्स वसूलने वाले देशों में से है। तेल की कीमतों में केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा वसूले जाने वाले टैक्स का हिस्सा दो तिहाई तक होता है। केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क (Excise Duty) के रूप में तो राज्य सरकारें वैट (VAT) के रूप में तेल पर कर वसूलती हैं। कभी-कभी 'सेस' व अन्य आवश्यक करों के रूप में भी अतिरिक्त कर वसूला जाता है।

मार्च 2020 में कोरोना संकट के चलते जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने लगी तो केंद्र सरकार ने 14 मार्च को डीजल-पेट्रोल पर 3 रूपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क (Excise Duty) बढ़ाकर इसका लाभ जनता तक नहीं पहुंचने दिया। अप्रैल में जब कच्चे तेल की कीमतें गिरकर 18 डॉलर प्रति बैरल (1 बैरल= 159 लीटर) तक पहुँच गयी तो केंद्र सरकार ने फिर से 6 मई को डीजल में 13 रूपये व पेट्रोल में 10 रूपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया। इस समय केंद्र सरकार डीजल पर 31.83 रुपये व पेट्रोल पर 32.98 रूपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क वसूल रही है। राज्य सरकारों द्वारा वसूला जाने वाला कर (VAT) इसके अतिरिक्त है। दिल्ली सरकार ने भी 4 मई को वैट की दरों में वृद्धि कर डीजल पर वैट 13.25% व पेट्रोल पर 3% बढ़ाकर दोनों में ही 30% कर दिया। इस कर वृद्धि से दिल्ली में डीजल के दाम, भारत में पहली बार, पेट्रोल से भी ज्यादा हो गए। इस वृद्धि के बाद दिल्ली सरकार द्वारा कर वसूली डीजल पर 16.26 व पेट्रोल पर 16.44 रूपये प्रति लीटर हो गयी। इसी प्रकार अन्य राज्य सरकारों द्वारा भी तेल पर कर वसूली की जा रही है।


मई अंत व जून में जब कच्चे तेल की कीमतों में कुछ वृद्धि होने लगी तो सरकारों द्वारा अपने करों में कटौती करने के बजाय इसका बोझ आम जनता पर डाल दिया गया। इस समय अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम 40-42 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर हैं फिर भी सरकार द्वारा तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी की जा रही है। ज्ञात हो कि कोरोना संकट व कच्चे तेल के दामों में कमी आने के चलते तेल कंपनियों ने 15 मार्च से तेल की कीमतों की समीक्षा रोक दी थी। 7 जून से जब तेल की कीमतों की रोजाना समीक्षा दोबारा शुरू हुई तो तब से लगातार तेल के दामों में वृद्धि हो रही है।

देखें तालिका में अप्रैल 2014 व जून 2020 में तेल के कच्चे दामों में भारी अन्तर

याद हो कि भाजपा जब विपक्ष में थी तो उस समय (2013-14) विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने पर देश में तेल की कीमतों में हुयी वृद्धि पर इसके नेताओं ने खूब शोर मचाया था। तब भाजपा नेता तेल की कीमतें देश में आधी कर देने का दावा कर रहे थे। बाबा से लाला बन गए रामदेव द्वारा भी भाजपा सरकार बनने पर तेल की कीमतें 35-40 रुपये हो जाने का दावा किया गया। 2014 के लोक सभा चुनाव में तो 'बहुत हुयी पेट्रोल-डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार' इनके प्रमुख नारों में से एक था। परन्तु सत्ता में आते ही और कच्चे तेल के दाम आधे हो जाने के बाद भी, यह नारा भी अन्य नारों-वादों की तरह 'जुमला' ही साबित हुआ। उलटे मोदी सरकार ने 2014 से अब तक उत्पाद शुल्क में 12 बार बढ़ोत्तरी की है जबकि सिर्फ दो बार कटौती की है।

कोरोना संकट के काल में जब जनता अचानक व अयोजनाबद्ध ढंग से लागू किये गए लॉकडाउन के चलते त्रस्त है तब सरकारों द्वारा तेल की कीमतों में की जा रही वृद्धि जनता पर दोहरी मार है। सरकार समर्थित मीडिया व बहुरूपिये ठगों ने इस पर चुप्पी साध रखी है। भाजपा आईटी सेल द्वारा इस मूल्य वृद्धि को जायज ठहराने के लिए सोशल मीडिया पर तर्क-कुतर्क प्रस्तुत किये जा रहे हैं। हमें इनकी असलियत को जनता के बीच उजागर कर इनके मुखोटों को नोंच लेने की जरुरत है। तेल के दामों में की जा रही वृद्धि की मुखालफत करने की जरुरत है।

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