कर्नाटक से उपजा हिजाब विवाद अब पूरे देश में चर्चा में है। कर्नाटक के स्कूलों में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगाने के बाद पहले वहां एक स्कूल की मुस्लिम छात्राओं ने इसका विरोध किया। मुस्लिम छात्राओं के विरोध के बाद हिन्दू छात्र-छात्राएं भी भगवा शाल व पगड़ी पहनकर स्कूल आने लगे। जिससे आमने-सामने टकराहटें होने लगीं और मसला पूरे कर्नाटक में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का जरिया बन गया। आज कर्नाटक सहित देश में हिजाब के समर्थन और विरोध में ध्रुवीकरण तेजी पर है और लगातार प्रदर्शन जारी हैं।
कर्नाटक की भाजपा सरकार द्वारा शिक्षा सत्र के लगभग अंत में जब परीक्षाएं बिल्कुल निकट हैं, स्कूलों में हिजाब को प्रतिबंधित करना उसकी सांप्रदायिक मंशा को साफ जाहिर कर देता है। पहले जान- बूझकर विवाद को भड़कने दिया गया ताकि इसका इस्तेमाल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए किया जा सके। हिजाब को प्रतिबंधित करने के खिलाफ दो याचिकाएं कोर्ट में लंबित हैं। इनमें से एक याचिका में कहा गया है कि ‘‘शिक्षा सत्र 2021-22 की एकेडमिक गाइडलाइन्स में प्री यूनिवर्सिटी कालेजों के लिए कोई यूनिफार्म तय नहीं की गयी है। अगर कोई कालेज यूनिफार्म तय करता है तो उसके खिलाफ विभाग सख्त कार्यवाही करेगा।’’
हमेशा से कालेजों में मुस्लिम छात्राएं हिजाब पहनकर जाती रही हैं। लेकिन संघ-भाजपा गिरोह द्वारा सोची-समझी साजिश के तहत हिजाब पर प्रतिबंध लगाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश की गयी है। वे इसमें सफल भी हो गये हैं। कुल जमा आज कर्नाटक के क्या हाल है? पहले कुछ दिन स्कूल बंद कर दिए गए। फिर हाइकोर्ट द्वारा किसी भी धार्मिक चिन्ह को कॉलेज में न लाने के तात्कालिक फैसले से हिन्दू फासीवादियों की इच्छा एक हद तक पूरी हो गयी और लड़कियों के हिजाब पहन कर स्कूल-कॉलेज आने पर रोक लग गयी। परिणामतः ढेरों लड़कियों का फिलहाल स्कूल आना रुक गया है।
इस विवाद पर भाजपा, विहिप के नेताओं के बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का मुद्दा बनाना चाहते थे। इन नेताओं का कहना है कि जिनकों हिजाब पर प्रतिबंध से दिक्कत है वे पाकिस्तान चले जाएं या घर पर रहें। उनके लिए छात्राओं की पढ़ाई-लिखाई कोई मायने नहीं रखती। वे हर मुद्दे पर अपनी घृणित राजनीति से बाज नहीं आते।
हिजाब पर प्रतिबंध लगाने के पीछे संघ-भाजपा या उनके द्वारा आंदोलित किये गये लोगों द्वारा जो तर्क दिया जा रहा वह यह है कि हिजाब पर प्रतिबंध से समानता व एकरूपता आयेगी। कुछ आगे बढ़ते हुए यह भी कहते हैं कि मुस्लिम छात्राओं को जबरन हिजाब पहनने पर मजबूर किया जाता है। और हिजाब पर प्रतिबंध लगाकर हम उनकी आजादी का समर्थन कर रहे हैं।
सवाल यह है कि स्कूलों में इस समानता व एकरूपता की याद उन्हें कर्नाटक में होने वाले चुनावों से पहले क्यों आयी? वह भी सत्र के लगभग अंत में। असल बात यह है कि वे अपने सांप्रदायिक और फासीवादी एजेण्डे को एकरूपता व समानता का आवरण पहना रहे हैं। उनकी ‘समानता’ व ‘एकरूपता’ हमेशा अल्पसंख्यकों के खिलाफ लक्षित रही है। कभी वह एक समान नागरिक संहिता, कभी तीन तलाक तो कभी ड्रेस कोड के रूप में। दुनिया का सारा पिछड़ापन और जबरदस्ती का राज इन्हें अल्पसंख्यकों में ही नजर आता है। कर्नाटक के भीतर ही कभी गौहत्या, कभी धर्मान्तरण, कभी संस्कृति की रक्षा के नाम पर अपनी सांप्रदायिक व फासीवादी राजनीति से जनता को बांटते रहे हैं और अल्पसंख्यकों पर हमलावर रहे हैं। 2007-08 में वहां चर्चों पर हमले हुए थे। अब हिजाब के नाम पर, ड्रेस कोड के नाम पर यह नया एजेण्डा अल्पसंख्यकों के खिलाफ लक्षित है।
एकरूपता व समानता के नाम पर संघी शासक हिन्दू प्रतीकों-संस्कृति-रूपों को पूरे समाज पर थोपना चाहते हैं। स्कूल-कॉलेजों में सरस्वती पूजा, तिलक लगाकर आने, हिन्दू प्रतीकों को बढ़ावा देने वाले स्कूल-कॉलेजों में छात्राओं के बुर्का पहनने को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है।
शिक्षा, शिक्षण संस्थानों व सामाजिक जीवन में निश्चित ही धर्म व धार्मिक प्रतीकों की कोई जगह नही होनी चाहिये। धर्म को राज्य व शिक्षा से अलग कर व्यक्ति का निजी मामला बना दिया जाना चाहिये। लेकिन जब सर्व-धर्म समभाव के नाम पर चारों तरफ हिन्दू धार्मिक प्रतीकों की भरमार हो, शिक्षा में अतीत के ज्ञान के नाम पर हिन्दू पौराणिक कथाओं व पद्धतियों को शामिल किया जा रहा हो, स्कूलों में तिलक लगा कर आना व हिन्दू प्रतीकों का इस्तेमाल सामान्य बात हो, तब सिर्फ हिज़ाब पर प्रतिबंध लगाना संघ- भाजपा के सांप्रदायिक- फ़ासीवादी मंसूबों को ही दिखाता है।
साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के इस मुद्दे का लाभ मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतें भी उठा रही हैं जो 'पहले हिजाब फिर किताब' का नारा देकर प्रकारान्तर से मुस्लिम छात्राओं के लिये शिक्षा के दरवाजे बंद करने में मदद कर रही हैं।
अगले वर्ष कर्नाटक में चुनाव हैं। संघ-भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर वोट हासिल करने की क्षुद्र राजनीति कर रहे हैं। इस विवाद का लाभ वे उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों के चुनावों में भी उठाना चाहते हैं। अन्य राजनीतिक दल भी इस विवाद में अपने-अपने वोट बैंक के हिसाब से ही प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
संघ-भाजपा की चाहत है कि लोग क्या खाएं, क्या पहने और किससे प्रेम करें, यह सब तय करने का अधिकार उनको हो। संघ-भाजपा इन सब को हिंदूवादी सांप्रदायिक व फासीवादी विचारों के अनुरूप तय करती है। ये आम तौर पर ही लोगों के जीवन को नियंत्रित करना चाहते हैं और खास तौर पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणित हरकतों पर उतर आते हैं।
संघ-भाजपा के इस घृणित एजेण्डे का विरोध करना जरूरी है। देश को इनकी प्रयोगशाला बनने से रोकने के लिए छात्रों-युवाओं को सांप्रदायिक सौहार्द और एकता के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए। ऐसा सौहार्द व एकता संघ-भाजपा के हिन्दू फासीवादी एजेण्डे के विरोध में एकजुट होकर ही कायम किया जा सकता है।

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