ज्ञान पर पाबंदी नहीं चली है, नहीं चलेगी।
NOS वह स्कालरशिप है जो उन छात्रों को दी जाती है जो वंचित तबकों, जैसे अनुसूचित जाति, गैरसूचित खानाबदोश, अर्द्ध खानाबदोश जनजाति, भूमिहीन श्रमिक और पारंपरिक शिल्पकार से संबंधित है और जिनकी वार्षिक आय 8 लाख रुपये से कम है। NOS की व्यवस्था 50 के दशक में शुरू की गयी थी ताकि इन तबकों के छात्र विदेशी विद्यालयों में जाकर शोध कर सकें।
सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट कहती है कि पिछले 6 वर्षों में किसी वर्ष में सबसे कम 39 और सबसे ज्यादा 73 छात्रों को ही यह स्कालरशिप मिली है। जबकि इस हेतु आरक्षित तय सीटें 115 प्रति वर्ष थी, जिसे इस वर्ष 125 कर दिया गया है। भारत सरकार की वंचित विरोधी, जनविरोधी शैली भी कई पात्र छात्रों को इस अवसर का लाभ उठाने में बाधा पहुंचाती है।
लेकिन संघी सरकार को वंचित तबकों को मिलने वाली नाममात्र की राहत भी रास नहीं आ रही है। संघी सरकार का तर्क है कि ऐसे विषयों पर शोध करने के लिये भारतीय संस्थान व भारतीय शिक्षक सक्षम हैं। अपनी दलित विरोधी, जनजाति विरोधी मानसिकता को छुपाने के लिए वह कह रही है कि छात्रों को ‘आधुनिक विषयों’ पर ही विदेशी विश्व विद्यालयों में शोध करना चाहिए।
ये वही संघी सरकार है जो भारत का विश्वगुरू के रूप में गुणगान करती है। ‘भारतीय संस्कृति’, ‘भारतीय इतिहास’ से दुनिया को ज्ञान देने की सनक का बारम्बार प्रदर्शन करती है। लेकिन जब वंचित तबके के छात्र इन्हीं विषयों पर विदेशी विश्व विद्यालयों में जाकर शोध करना चाहते हैं तो वो उन्हें रोक रही है।
इसका कारण साफ है कि संघी फासीवादी अपने मुख से कभी सच नहीं बतायेंगे। किसी भी देश के इतिहास में सब कुछ स्वर्णिम नहीं हो सकता। यह भारत के इतिहास के बारे में भी सच है। जब भारत के इतिहास की बात होगी तो उसमें उसकी अच्छाइयों के साथ-साथ जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, महिलाओं की दुर्गति, शासकों की अय्याशी और निर्ममता की भी बात होगी। संघी हिन्दू फासीवादी भारत के इतिहास की इन बुराइयों के पक्षपोषक हैं।
ऐसे में दलित स्कालर जब उत्पीड़नकारी जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, कुरीतियों के बारे में बोलते-लिखते हैं तो संघियों को यह भारत विरोधी लगता है। जातिवाद की कड़वी सच्चाई संघी कभी स्वीकार नहीं करते बल्कि वे तो उसे आदर्श मानते हैं।
लोगों के खान-पान, कपड़ों, आस्थाओं को तय करने की संघी कोशिश करते हैं। उसी तरह शोध के विषय को भी खुद तय करना चाहते हैं। ऐसा कर वे एक बार फिर जता रहे हैं कि वे न सिर्फ दलितों, जनजातियों के खिलाफ हैं बल्कि ज्ञान व चिंतन की स्वतंत्रता के भी दुश्मन हैं।
पिछले समय में अनुसूचित जाति-जनजाति के छात्रों का एक छोटा हिस्सा विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने की स्थिति तक पहुंचा है। इन छात्रों ने भारत की जाति व्यवस्था की क्रूरता को वैश्विक स्तर पर उजागर किया है। तमाम विदेशी विश्वविद्यालयों को जाति प्रथा को एक क्रूर प्रथा के रूप में मान्यता देनी पड़ी है। भारत के संघी शासक जो जाति प्रथा के समर्थक हैं, यह नहीं चाहते कि जाति प्रथा की क्रूरता सारी दुनिया में आज भी उजागर हो। इसीलिए वे दलित, वंचित छात्रों के इस दिशा में शोध पर रोक लगाना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि भविष्य में कोई अम्बेडकर सरीखे सुधारक या जाति विरोधी योद्धा विदेशी विश्वविद्यालयों से पढ़कर निकलें।
छात्रों के ज्ञान, चिंतन को कैद करने तथा दलितों-वंचितों पर इस हमले का पुरजोर विरोध करना चाहिए।
वंचितों के हकों पर डकैती नहीं चलेगी।
ज्ञान पर पाबंदी नहीं चली है, नहीं चलेगी।

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