12 March 2022

शिक्षण संस्थानों में लैटरल इंट्री का आरंभ।

ये कदम लाखों छात्रों का भविष्य खत्म करने वाला है ।


        यूजीसी द्वारा हाल ही में एक प्रस्ताव पर चर्चा हुई। इस प्रस्ताव द्वारा UPSC की तरह ही उच्च शिक्षण संस्थानों में किए जाने वाले शिक्षण कार्यों में भी लैटरल इंट्री को लागू किया जाएगा।

        इसके तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाने के लिए पीएचडी और नेट की पात्रता की भी आवश्यकता नहीं होगी। अलग- अलग विषयों के विशेषज्ञों को इसके लिए पात्र माना जायेगा और उन्हें "प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस" का नाम दिया जायेगा। और कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के लिए इनकी नियुक्तियां की जाएंगी ।

        ये खबर उन सभी छात्रों के लिए बहुत निराशाजनक है जो लाखों की संख्या में नेट पास करके भी बेरोजगार हैं। और उन छात्रों के लिए भी जो पीएचडी करने के बाद शिक्षक बनने का सपना देख रहे हैं।


        यूजीसी के इस कदम से बड़ा सवाल ये पैदा होता है कि इस लैटरल इंट्री के लिए जिस विशेषज्ञता की मांग की जा रही है, उसके निर्धारण की योग्यता क्या है?


       उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाने के लिए पहले से ही एक कठिन मापदंड तय है और उस मापदंड की सभी योग्यताओं को पूरा करने के बाद आज भी जब लाखों छात्र बेरोजगार हैं तो उसी उच्च शिक्षण संस्थानों में बिना किसी योग्यता के निर्धारण से नियुक्तियां करना क्या उन लाखों छात्रों के साथ विश्वासघात नहीं है?

       इस कदम से उच्च शिक्षण संस्थानों को दो तरफा नुकसान होगा पहला तो ये कि प्रोफेसर बनने की अब तक की निर्धारित योग्यता के बावजूद छात्र बेरोजगार रह जाएंगे। दूसरा जो तथाकथित "प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस" होंगे उनसे शिक्षा की गुणवत्ता भी पूरी तरह प्रभावित होगी क्यूंकि उनके पास शिक्षण कार्यों का अनुभव और प्रशिक्षण नहीं होगा।

        यूजीसी द्वारा इस कदम को उठाने का रास्ता राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंदर से निकलता है जिसमें वो खुले रूप से शिक्षा को उद्योगों से जोड़ने की बात करती है। इस लैटरल इंट्री की शुरूआत भी इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स जैसे विषयों के साथ शुरू की जा रही है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि आने वाले समय में इसमेंअन्य विषयों को भी शामिल कर लिया जाएगा। अपने 'हितों' की पूर्ति करते हुए शिक्षण संस्थानों में नियुक्तियां की जाएंगी। यह सरकार और सरकार में बैठे लोगों को अपनी पसंद के लोगों को "प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस" भर्ती करने की खुली छूट देता है। संघ-भाजपा का शासनकाल किसी योग्यता के बजाय संघी मानसिकता के लोगों को ऐसे स्थानों में बैठाने का रहा है। इस कदम से यह और भी तेजी से किया जाएगा।


        परिवर्तनकामी छात्र संगठन यूजीसी द्वारा उठाए जाने वाले इस छात्र और शिक्षा विरोधी कदम का कड़ा विरोध करता है । और शिक्षा को बर्बाद करने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को वापस लेने की मांग करता है।

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