17 सितम्बर को विगत दो वर्षों से छात्र-युवा राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस के रूप में मना रहे हैं। 2020 में थाली, ताली, दिये जलाकर सरकार को जगाने के साथ ही युवाओं-बेरोजगारों ने सड़कों पर उतरकर भी रोजगार की मांग की। छात्रों-युवाओं के आक्रोश का उद्देश्य था कि सरकार रोजगार के मामले में जाग जाये। इस सबके बावजूद सरकार रोजगार उपलब्ध करवाने के मामले में युवा विरोधी, बेरोजगार विरोधी कदम उठाने पर ही लगी हुयी है। यह मांग करता है कि हम छात्र-युवा रोजगार के और अधिक मजबूती से एकजुट हो अपने संघर्ष को आगे बढ़ायें।
भर्ती प्रक्रियाओं के लटकने से लेकर, पेपर लीक, भ्रष्टाचार, अनियमितताओं के चलते एक ही भर्ती में सालों-साल छात्र-युवा भटकते रह जाते हैं। अभी उत्तराखण्ड में सरकारी नौकरियों में भ्रष्टाचार का मामला जगजाहिर है। ऐसे ही मामले हरियाणा, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, आदि राज्यों से भी रोजगार में भ्रष्टाचार के मामले सामने आये हैं। हर जगह संविदा, ठेकेदारी के तहत असुरक्षित नौकरियां ही हैं। सरकार मौद्रीकरण के नाम पर विभिन्न सरकारी संस्थानों को पूंजीपतियों को कौड़ियों के भाव बेचने में लगी है। निजी क्षेत्र की कम्पनियों में तो श्रम कानूनों में संसोधन के जरिये रोजगार की परिस्थितियां और भी अधिक बुरी बनाने के कदम पिछले समय में केन्द्र सरकार ने उठाये हैं। अन्य राज्य सरकारों की इस पर खुली-छिपी सहमति ही है। इस तरह देखा जाये तो बेरोजगारों के दिन बुरे से बहुत बुरे होते गये हैं।
इन बदल रहे हालातों को समझे बिना हमारे नारों, आंदोलनों, संघर्षों का असर कमजोर रहेगा। हमारे प्रदर्शन कोई नतीजा नहीं दे पायेंगे। हमारी एकजुटता स्थायी नहीं बन पायेगी और बेरोजगारी हर साल नौजवानों को आत्महत्या के लिए उकसाती रहेगी। एनसीआरबी की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि साल 2021 में 18,803 स्वरोजगारशुदा व 11,724 बेरोजगारों ने आत्महत्या की। इसी समय में देश के अडानी-अम्बानी सरीखे पूंजीपतियों की दौलत में इजाफे के नये कीर्तिमान रचे जा रहे हैं। दो धुर विरोधी चीजें एक साथ घटित हो रही हैं। यही छुट्टे पूंजीवाद की निर्मम सच्चाई है।
आज भारत सहित दुनियाभर में मुनाफे की व्यवस्था कायम है। फैक्टरियां, कम्पनियां, कल कारखाने निजी मुनाफे के लिए ही हैं। यहां तक कि मानव श्रम को भी बाजार में सस्ते माल की तरह लूटा जाता है। जिसके लिए बेरोजगारों की कुछ न कुछ संख्या हमेशा ही बनाकर रखी जाती है। प्राकृतिक संसाधनों और मेहनत की बेतहाशा लूट ही पूंजीवाद की क्रूर सच्चाई है।
हमारे भारत देश की आजादी के बाद जिन सरकारों ने सार्वजनिक फायदे के लिए काम करने का वायदा किया था वे अपने जन्म से ही क्रमशः धन्नासेठों, पूंजीपतियों के पक्ष में काम करने लगीं। आज हाल ये है कि देश की मेहनतकश जनता की खून-पसीने की कमायी से खड़े बीएचईएल, बीएसएनएल, एयर इंडिया, आदि-आदि सरकारी संस्थान भी निजी मुनाफे के लिए पूंजीपतियों को सौंप दिये जा रहे हैं। जहां ब्रिटिश लुटेरे शासक देश की मेहनतकश जनता की दौलत लूटकर अपने देश ले जाते थे। वहीं आज के पूंजीपति (मेहुल, नीरव, विजय माल्या......) भी पैसा लूटकर विदेशों में भाग जाते हैं। सरकार देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का नाटक करती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही स्विस खातों में भारतीय लुटेरों का पैसा बढ़ता जा रहा है। शहीद भगत सिंह ने ‘‘हमें गोरी गुलामी की जगह काली गुलामी नहीं चाहिए’’ ऐसे ही भविष्य का पूर्वानुमान लगाकर कहा था।
हम बेरोजगारों के सामने अपने दुखों-कष्टों के खिलाफ संघर्ष करने का ही एकमात्र रास्ता है। युवा अन्याय, अत्याचार, लूट, शोषण के खिलाफ हमेशा संघर्षरत रहे हैं। यही हमारी विरासत है। बेरोजगारी के खिलाफ हमारी लड़ाई का निशाना लुटेरे शासकों के साथ ही यह लुटेरी व्यवस्था भी है। हम बेरोजगारी को कम नहीं करना चाहते हम इस बुराई को समाज से हमेशा के लिए पूरी तरह खत्म कर देना चाहते हैं।
राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस के अवसर पर परिवर्तनकामी छात्र संगठन सभी छात्रों-युवाओं का आह्वान करता है कि बेरोजगारी के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष को आगे बढ़ायें।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)



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