विगत 1 जुलाई को बांग्लादेश के ढाका उच्च न्यायालय के आदेश पर आरक्षण की पुरानी व्यवस्था बहाल करने के विरोध में छात्रों के प्रदर्शन शुरू हुए। 2018 में आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों के दबाव में प्रधानमंत्री शेख हसीना ने आरक्षण समाप्त कर दिया था। अदालत के रास्ते आरक्षण के पक्ष में फैसला आने से छात्र सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए। प्रदर्शनों का पुलिस ने आंसू गैस, लाठीचार्ज, गोली मारकर दमन किया। पुलिस के अलावा सेना का भी इस्तमाल किया गया है। देशव्यापी इंटरनेट सेवाएं बन्द की गई हैं। छात्रों के इस जुझारू संघर्ष में अब तक 115 लोगों के मारे जाने की खबर है। 21 जुलाई को सर्वोच्च अदालत ने आरक्षण को सीमित करने का फैसला दिया। साथ ही छात्रों से विश्वविद्यालयों में जाकर पढ़ने की अपील की है।
कॉलेज-विश्वविद्यालय से निकले छात्रों से ढाका की सड़कें भर गई। विरोध प्रदर्शनों के पीछे छात्रों का गुस्सा बहुत पुराना है। जिसका कारण बढ़ती बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सरकारी निरंकुशता है। आरक्षण सम्बन्धी अदालती फैसला इसका तात्कालिक कारण बना। सरकारी दावों के अनुसार बांग्लादेश में बेरोजगारी दर 2023 में 3.36 फीसदी रही जो इस वर्ष की पहली तिमाही में बढ़कर 3.51 फीसदी हो गयी है। यह आंकड़े वास्तविकता को छुपाने वाले हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बेरोजगारी की वास्तविक दर 20-25 फीसदी के आसपास है। 2009 से बांग्लादेश में शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग की सरकार सत्ता में है। बांग्लादेश 0.499 गिनी सूचकांक के साथ भीषण असमानता वाले देशों में है।
बांग्लादेशी मेहनतकश जनता बहुत बुरे हालात में जी रही है, वहीं पूंजीपति और सरकार में बैठे लोग ऐय्याशी कर रहे हैं। इस गैरबराबरी को खत्म किये बिना बांग्लादेशी छात्रों सहित मेहनतकश जनता को मिली कोई भी राहत ज्यादा समय नहीं चलेगी।
बांग्लादेश के छात्रों के आरक्षण विरोधी इस संघर्ष को पूरी दुनिया के छात्र-नौजवान उम्मीद के साथ देख रहे हैं। आज दुनियाभर में सरकारें अधिकाधिक निरंकुशता से काम ले रही हैं। परिवर्तनकामी छात्र संगठन बांग्लादेश के छात्रों के इस संघर्ष को सलाम करता है। एक बार फिर छात्रों ने यह साबित किया है "सबको शिक्षा-सबको काम, लड़कर लेंगे नौजवान"।





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