25 December 2024

भगतसिंह पर हमले का विरोध करें!


     कानपुर लिटरेचर फेस्टिवल में इतिहासकार अपर्णा वैदिक और कारवां नाम से इतिहास संबंधी विषयों पर एक प्लेटफार्म चलाने वाले ईशान शर्मा ने शहीद ए आज़म भगत सिंह को लेकर अपमानजनक शब्दों का चयन किया। दर्शकों ने इस पर कठोर आपत्ति जताई, जिसके बाद इन्होंने "शब्दों के गलत चयन" की गलती मानी और माफी मांगी। आयोजक अतुल तिवारी ने भी इसके लिए माफी मांगी। परिवर्तनकामी छात्र संगठन शहीद भगत सिंह व अन्य क्रांतिकारियों के अपमान की निंदा करता है, साथ ही ऐसी गलती का दोहराव न करने की अपील करता है।


     अपनी किताब के प्रमोशन के दौरान इतिहासकार प्रेरणा वैदिक और उनका इंटरव्यू लेने वाले ईशान शर्मा ने शहीद भगत सिंह को "बहुरूपिया" और "आरामतलबी" बताया। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारियों को गुप्त तरीके से अपने कामों को अंजाम देना होता था। ब्रिटिश पुलिस की पकड़ से बचने के लिए भेष बदलना होता था। इसे "बहुरूपिया" कहना इस काम के महत्व को न समझने और इतिहास की मामूली समझदारी की कमी की ही निशानी है। जेल में राजनीतिक अधिकारों के लिए भगत सिंह व अन्य क्रांतिकारियों ने भूख हड़ताल की, जिसमें क्रांतिकारी जतिन दास शहीद हो गए। ऐसे महान क्रांतिकारियों को "आरामतलबी" कहने का साहस तो ब्रिटिश शासकों का भी नहीं था, क्योंकि इन क्रांतिकारियों के कारनामों से उनकी नींद हराम थी। यह इन तथाकथित यूटूबर ईशान और तथाकथित इतिहासकार अपर्णा के इतिहास के अध्ययन की असलियत को दिखा देता है।

     भगत सिंह और तमाम क्रांतिकारियों ने आजादी के आंदोलन में ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ संघर्ष किया था। देश की आज़ादी तथा सामाजवादी क्रांति के लिए भगत सिंह व अन्य तमाम क्रांतिकारी फाँसी पर झूल गए। उनकी शहादत ने देश के तमाम लोगों को प्रभावित किया जो एक शोषणविहीन समाज के लिए लड़ रहें हैं, लेकिन कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी इतिहासकार अपनी विद्वता दिखाने के चक्कर में अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करने लगते हैं।

     परिवर्तनकामी छात्र संगठन पुनः इतिहासकार अपर्णा वैदिक और यूटूबर इशान की शहीद भगत सिंह पर की गई टिप्पणी की आलोचना करता है और आगे से इसका दोहराव न करें। क्रांतिकारियों की शहादत को कम करके आकँना, उन्हें आपमानजनक शब्द कहना हमारे देश के भविष्य के लिये चिंताजनक है। अपनी क्रांतिकारी विरासत का सम्मान किये बिना हम बेहतर भविष्य की कामना नहीं कर सकते। इसलिए हम लोगों का यह कार्यभार बनता है कि न सिर्फ क्रांतिकारियों के सपनों को पूरा करने के लिये संघर्ष करे बल्कि उन लोगो के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठाये जो आज़ादी के मतवालों को बदनाम करते हैं। इसके लिए हमें क्रांतिकारियों के योगदान पर प्रामाणिक साहित्य को गंभीरता से पढ़ने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

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