छात्रों के संघर्ष से सरकार के होश ठिकाने पर
विगत 21 सितम्बर 2025 को उत्तराखण्ड में समूह ‘ग’ की भर्ती के लिए आयोजित परीक्षा का पेपर लीक हो गया था। परीक्षा शुरू होने के आधे घण्टे के अंदर पेपर लीक की खबर सार्वजनिक हो गयी थी। इस पर छात्रों का रोष उमड़ पड़ा। देहरादून का परेड ग्राउण्ड छात्रों के धरने प्रदर्शन का केन्द्र बन गया।
सरकार ने शुरूआती तौर पर पेपर लीक को मानने से इंकार किया। बाद में ‘पेपर लीक’ को ‘‘नकल’’ कह कर मामले को कमजोर करने की कोशिश की। इतना ही काफी होता पर हमेशा ही हिन्दू-मुस्लिम के हिसाब से बात करने वाली भाजपा की धामी सरकार ने पेपर लीक को भी नहीं बख्शा। उन्होंने इस मामले में पता चले शुरूआती आरोपी खालिद के नाम पर इसे ‘नकल जिहाद’ कहना शुरू कर दिया, जबकि परीक्षा केंद्र संचालक भाजपा नेता धर्मेंद्र चौहान था। सरकार के आंदोलन को भटकाने की हिन्दू-मुस्लिम राजनीति की चालों को समझ रहे थे। छात्रों ने इसका जोरदार जवाब दिया। अपने इस हथकंडे को विफल देख आगे बेशर्मी के साथ मुख्यमंत्री धामी जी ने उत्तराखण्ड में सबसे ज्यादा सरकारी नौकरी अपने कार्यकाल में देने का विज्ञापन करना शुरू कर दिया। छात्रों को न सिर्फ अपने संघर्ष को पूरे समाज तक ले जाने की जद्दोजहद करनी पड़ी। बल्कि आन्दोलन को भाजपा नेताओं, संघ-भाजपा की टोल आर्मी और भटकाने के सरकारी प्रयासों से भी निपटना पड़ा।
पेपर लीक मामले के उजागर होने के बाद सरकार समर्थित छात्रों के एक समूह को प्रायोजित कर मुख्यमंत्री को धन्यवाद दिलवाया गया। कहा गया कि परीक्षा का परिणाम घोषित किया जाये। ‘सांच को आंच नहीं’। सारे जतन के बाद आखिरकार छात्रों के संघर्ष को समाज से भरपूर समर्थन मिलने लगा। देहरादून में आंदोलन का नेतृत्व कर रहे और राज्यभार में आंदोलन को आगे बढ़ाने का आह्वान करने वाले उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा और उत्तराखंड बेरोजगार संघ को विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक संगठनों, व्यक्तियों का भरपूर सहयोग मिला। प्रदेश भर में पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन आयोजित होने लगे। जिसमें बड़ी संख्या में छात्र-नौजवान शामिल हो रहे थे। देहरादून के साथ ही 25 सितम्बर से हल्द्वानी भी स्थायी धरने का केन्द्र बन गया। हल्द्वानी में धरने के साथ आमरण अनशन भी शुरू हो गया। 29 सितम्बर को अनशनकारी को जबरन उठा दिया गया। इसी दिन देहरादून में मुख्यमंत्री धामी धरना स्थल पर पहुंचे। उन्होंने लिखित में आन्दोलन की दोनों प्रमुख मांगों को मानने का वायदा किया। पहली मांग उत्तराखण्ड सरकार सीबीआई मांग की संस्तुति करेगी। दूसरी, एसआईटी द्वारा जांच करा परीक्षा रद्द कर दोबारा परीक्षा हो।
भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री धरना स्थलों तक नहीं जाने के लिए पहचाने जाते हैं। हर जगह आन्दोलनकारियों को प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों से लेकर छुटभैये भाजपा-संघ के नेता 'आंदोलनजीवी' आदि अनाप-शनाप कहते रहते हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री धामी जी का देहरादून धरनास्थल तक आना सबको संदेहास्पद लगा। कइयों ने उम्मीद जताई कि यह आन्दोलन को तोड़ने के लिए किया जा रहा है। यह अनायास ही नहीं था, क्योंकि पेपर लीक मामले में धामी जी भी शुरू से ही अनर्गल बात कहते रहे। इसका दूसरा पहलू यह भी था कि पेपर लीक पर आक्रोश प्रदेश व्यापी था। देश भर में पेपर लीक के मामले लगातार ही सामने आते रहे हैं तो देशभर से भी इस आन्दोलन के लिए सहानुभूति और समर्थन था।
तय समय पर एसआईटी जांच कर पुनःपरीक्षा की घोषणा कर दी गयी और अब सीबीआई जांच भी शुरू हो गयी है। अब इस विषय पर सोचा जाए कि ऐसा क्यों हो गया? क्या मुख्यमंत्री धामी जी जनता के प्रति जवाबदेही महसूस करने लगे हैं? क्या छात्र संघर्ष की मांग मानने में ही सरकार ने भलाई समझी? क्या आगे से पेपर लीक जैसे मामले नहीं होंगे? क्या सबको रोजगार सुनिश्चित हो जायेगा? मुख्यमंत्री धामी जी जनता के प्रति जवाबदेही महसूस कर रहे हों ऐसा तो बिल्कुल नहीं है। क्योंकि कुछ दिन बाद ही चैखुटिया में अस्पतालों में सुविधाओं के लिए आन्दोलन चला तो सरकार ने ‘अर्बन नक्सल’ कह आन्दोलन को नजरअंदाज करना चाहा। संभव है किसी चुनावी लालच या आन्दोलन के व्यापक होने के डर में पेपर लीक की मांगें मानी गयीं। ठीक जिस समय पेपर लीक मामले में उत्तराखण्ड में छात्र आन्दोलनरत थे, उस समय ‘जेन-जी’ के आन्दोलन सत्ताओं को उखाड़ रहे थे। पड़ोसी देश नेपाल से लेकर अफ्रीका के देश मेडागास्कर तक शासक पद छोड़कर भागने पर मजबूर हुए। देश में भी उस समय लद्दाख के नौजवानों ने पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर छह साल के संघर्ष के बाद तीखे तेवर दिखाये। खुद 2022-23 में उत्तराखण्ड के छात्र पेपर लीक मामले में संघर्ष कर चुके थे जिसमें सरकारी दमन के अलावा छात्रों को केवल छला गया। देश-दुनिया में छात्रों के सक्रिय विद्रोह भी छात्रों के संघर्ष के समर्थन में सरकार को दबाव महसूस करवा रहे थे। छात्रों-युवाओं ने अपने शानदार संघर्ष से सरकार को मांग मनवाने पर मजबूर किया है। परन्तु देश की व्यवस्था में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं हुआ है। न मालिक-मजदूर की व्यवस्था खत्म हुई है। न अमीरी-गरीबी। सरकारें कुछ बड़े पूंजीपतियों की सेवा में ही लगी हैं और विज्ञापनों में अथाह पैसा खर्च कर अपनी भद्दी हरकतें छुपा रही हैं, चेहरा चमका रही हैं। यानी पेपर लीक की जमीन जस की तस मौजूद है। चंद नौकरियों के लिए हजारों-लाखों नौजवानों की प्रतियोगिता। इस तरह सबको नौकरी मिलना तो दूर की कौड़ी भी नहीं लगती।
यह समय हम छात्रों-नौजवानों से मांग करता है कि हम सचेत हों, सामने आ रही चुनौतियों से तो लड़ें ही। साथ ही इस व्यवस्था जिसमें करोड़ों-करोड़ लोग अभाव और परेशानियों में जीने को अभिशप्त हैं, उसको बदलने के लिए भी हरसंभव कोशिश करें। व्यवस्था बदलने के जुझारू संघर्ष में जीतकर ही पेपर लीक जैसी समस्या से छुटकारा मिल सकता है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि व्यवस्था परिवर्तन यानी इतिहास की क्रांतियों से सबक लिया जाये। फ्रांसीसी क्रांति, अक्टूबर समाजवादी क्रांति,....और भविष्य की क्रांति।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

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