29 अक्टूबर को देहरादून चलो!!
14-15 अक्टूबर 2012
को हरिद्वार में इंकलाबी मजदूर केन्द्र का तीसरा सम्मेलन आयोजित हो रहा था। यह सम्मेलन उत्तराखण्ड की
सरकार और हरिद्वार के पूंजीपतियों के पूंजीपतियों की आंखों में गड़ रहा
था। वे बेचैन और परेशान थे कि मजदूरों का एक ऐसा सम्मेलन ठीक उनकी नाक के
नीचे हो रहा है जिसे रोकने के लिए वे कुछ कर नहीं पा रहे हैं। इसे रोकने के
लिए वे षड्यंत्र रच रहे थे। परंतु इसमें वे असफल हो गए।
सम्मेलन के सफल आयोजन के बाद हरिद्वार
के चिन्मय कॉलेज के समीप जहां पर खुला सत्र आयोजित होना था ,वहां उन्होंने खुला
सत्र नहीं होने देने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया और फिर जब इंकलाबी मजदूर
केन्द्र के कार्यकर्ता, दर्जनों ट्रेड यूनियनें,
जनसंगठन व आम मजदूर जुलूस निकाल रहे थे, तब पुलिस ने इसे अपने पूरे दम-खम के साथ रोकने की कोशिश की।
इसमें भी असफल होने पर हरिद्वार पुलिस ने बदला लेने की भावना से 15 अक्टूबर की देर रात को 32 लोगों के खिलाफ नामजद व 150
अज्ञात लोगों के खिलाफ धारा 147, 341, 447, 505 व
7 क्रिमिनल ला के तहत गंभीर मुकदमे दायर कर दिए।
सवाल यह उठता है कि क्या हमारे देश में
अब मजदूरों को अपने सम्मेलन और शांतिपूर्वक जूलूस भी नहीं निकालने दिए जाएंगे? क्या हमारे देश में लोकतंत्र, जिसका दावा किया जाता है,
के स्थान पर कोई पुलिस राज कायम हो गया है? क्या अब ऐसे सभा व जुलूस जिनकी पूर्व सूचना दी व अनुमति
प्राप्त कर ली गई हों उन्हें भी नहीं होने दिया जाएगा? क्या देश में आपातकाल
लगा हुआ है? क्या जो पूंजीपति हर तरह से संगठित है जिनके फिक्की, एसोचेम, सीआईआई जैसे संगठन
राष्ट्रीय स्तर पर और हरिद्वार में सिडकुल एसोसिएशन के नाम से बने हुए हैं
मजदूरों को कोई यूनियन कोई संगठन नहीं बनाने देंगे?
क्या पुलिस, उत्तराखण्ड सरकार, भारतीय राज्य अब
मजदूरों को किसी तरह से संगठित नहीं होने देगा?
इन सवालों का जवाब कोई मुश्किल नहीं है। यही सच है कि देशी-विदेशी पूंजीपति,
भारतीय पूंजीवादी राज्य और उसकी
संस्थाएं ठीक यही चाहती हैं कि भारत के मजदूर चुप रहें। वे कोई आवाज नहीं उठाए।
वे कोई यूनियन नहीं बनाए। वह किसी भी तरह से उद्योग, जिले, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर संगठित न हों। फिर वह क्या करें?
वे चुप-चाप फैक्ट्री में काम करें। एक गुलाम की तरह जिंदगी बिताएं। वह भूल जाएं कि वह 21वीं सदी के इंसान हैं। वे भूल जाएं कि मजदूरों ने पूरी मानव जाति को आगे बढ़ाने में कितना योगदान किया है। वे
भूल जाएं कि भारत की आजादी की लड़ाई में भारत के मजदूरों ने कितनी कुर्बानी
दी है। वे 1930 के शोलापुर कम्यून को भूल जाएं। वे भूल जाएं कि 1947 में उन्होंने
अंग्रेजों को भारत से भागने के लिए कैसे
मजबूर किया था। वे भूल जाएं कि
उनके हजारों साथियों ने अपने प्राण देश
की आजादी के लिए न्यौछावर कर दिए
थे।
वे भूल जाएं कि 1871में फ्रांस के मजदूरों
ने पेरिस कम्यून स्थापित किया। वे यह भी भूल जाएं कि 1917 में
महान अक्टूबर क्रांति के जरिए
उन्होंने रूस में मजदूर राज की स्थापना
की थी। वे भूल जाएं कि 20वीं सदी
में 13
देशों में मजदूरों की सरकारें कायम हुई
थीं।
भारत का मजदूर सब भुलाकर कहे कि भारत और
दुनिया में जो आज पूंजीपति वर्ग व उनकी सरकारें कर रही हैं वह सब ठीक है।
निजीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण की नीतियां ठीक हैं। साम्राज्यवाद का ईराक, अफगानिस्तान, लीबिया .... में
हमला ठीक है।
मजदूरों को स्थाई नौकरी पर नहीं रखना
ठीक है। ठेकेदारी प्रथा
ठीक है और जब चाहे मजदूरों को रखा जाए
और जब चाहे मजदूरों को निकालदेने की
पूंजीपतियों की नीति ठीक है। महंगाई
बढ़ते जाना और उसकी मजदूरी घटते जाना
ठीक है। उसके बच्चे अशिक्षित रहें, भूखे
मरें यह भी ठीक है। बेरोजगारी ठीक
है, गरीबी
ठीक है। अम्बानी, टाटा, बिडला की दौलत बढ़ती जाए ठीक है। पूंजीपतिवर्ग
कितना ही चाहे भारत का मजदूर वर्ग यह नहीं कह सकता कि यह सब ठीक है। वह नहीं कह सकता की पूंजीवाद ठीक है। भारत का मजदूर
वर्ग हर हाल में कहेगा कि पूंजीवाद गलत है और समाजवाद ठीक है। यही वक्त
उससे कह रहा है। यही वर्तमान विश्व आर्थिक संकट का सबक है। यही पूरी मानवजाति
के लिए कहना आवश्यक हो गया है कि पूंजीवाद मुर्दाबाद! समाजवाद जिंदाबाद !!
इंकलाबी मजदूर यूनियन व विभिन्न मजदूर
ट्रेड यूनियन के नेताओं व
कार्यकर्ताओं पर लगाए गए फर्जी मुकदमे, उत्तराखण्ड सरकार की
खिसियाहट का परिणाम हैं। उसे यह मुकदमे तुरंत वापस लेने चाहिए। उसे उस
संविधान के कम से कम उन कानूनों का पालन करना चाहिए जिसमें भारत के नागरिकों को
एकत्र होने, सभा करने व संगठन बनाने का अधिकार दिया हुआ है।
हम उत्तराखण्ड सरकार से मांग करते हैं कि वह इंकलाबी मजदूर केन्द्र, व विभिन्न ट्रेड यूनियन के मजदूरों व कार्यकर्ताओं पर लगाए गए मुकदमों को फौरन वापस ले और वचन दे कि आगे से वह मजदूरों व
उनके संगठनों लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं करेगी। और यदि वह ऐसा करेगी
तो उसे मजदूरों व मेहनतकशों के जोरदार प्रतिरोध का सामना करना होगा।
उसे याद रखना होगा कि वर्तमान ट्रेड यूनियन व श्रम कानून मजदूरों के लम्बे
संघर्षों का परिणाम हैं। वे इसे छीनने नहीं देंगे। गोरे अंग्रेजों से जब 1926 में
ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार मजदूरों ने लड़कर हासिल किया तो मजदूर
आज अब काले अंग्रेजों को अपने यह अधिकार छीनने नहीं देंगे। वे सभा करने, सम्मेलन करने, संगठित होने व जुलूस
निकालने के अधिकार को छीनने नहीं देंगे। वे डट कर संघर्ष करेंगें।
आईए ! हम मजदूर व इंसाफ पसंद लोग, ट्रेड
यूनियनें/जनवादी संगठन/पार्टियां अपनी आवाज बुलंद करें। भारत व उत्तरखण्ड में
पुलिस राज कायम करने का विरोध किए जाने का विरोध करें 29 अक्टूबर को देहरादून
में भारी संख्या में इकट्ठा हों। उत्तराखण्ड सरकार को फर्जी
मुकदमें वापस लेने के लिए बाध्य करें।
कार्यक्रम
जिलाधिकारी कार्यालय हरिद्वार में मौन धरना
दिनांक-26 अक्टूबर 2012(शुक्रवार)
समय प्रातः 11 बजे से
जुलूस प्रदर्शन
दिनांक 29 अक्टूबर 2012(सोमवार)
समय प्रातः 11 बजे से
स्थान-परेड ग्राउंड, देहरादून
समय प्रातः 11 बजे से
जुलूस प्रदर्शन
दिनांक 29 अक्टूबर 2012(सोमवार)
समय प्रातः 11 बजे से
स्थान-परेड ग्राउंड, देहरादून
क्रांतिकारी
अभिवादन के साथ
निवेदक : इंकलाबी
मजदूर केन्द्र, भेल मजदूर ट्रेड यूनियन (हरिद्वार), जनअधिकार संयुक्त
संघर्ष समिति (कोटद्वार), प्रगतिशील महिला एकता
केन्द्र,परिवर्तनकामी छात्र संगठन,
क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन,सुमंगला महासंग (पौड़ी),
ठेका मजदूर कल्याण समिति, उत्तराखंड परिवर्तन
पार्टी, क्रांतिकारी नौजवान सभा,
सीटू(उ.सि.न.),पारले मजदूर संघ, ब्रिटानिया श्रमिक संघ, क्रांतिकारी जनवादी मंच,
महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा केस कमेटी, बड़वे इंजीनियरिंग वर्कर्स यूनियन,किच्छा चीनी मिल श्रमिक संघ,
थाई सुमित नील आटो कामगार संगठन, एल.जी.बी वर्कर्स
यूनियन।

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