3 December 2012

क्रांतिकारी छात्र संघों के लिए संघर्ष करो! छात्र राजनीति में पसरी गुण्डागर्दी के विरुद्ध एकजुट हो!!

इंकलाब जिंदाबाद                                                  समाजवाद जिंदाबाद

साथियो,
    छात्र संघ चुनाव का माहौल अपने पूरे चरम पर है। परिसर होर्डिंग, बैनरों, पोस्टरों, चेस्ट कार्ड, आदि से पटे हुए हैं। परिसर में प्रत्याशी अपने समर्थकों के झुण्डों के साथ घूम-घूमकर वोट की अपील कर रहे हैं। शहर में यही समर्थक मोटरसाइकिलों पर बैठ उन्मादी शोर मचाते हुए गुजरते देखे जा सकते हैं। यह माहौल भले ही हममें से अधिकांश को पसंद न हो, लेकिन आज यही छात्र संघ चुनावों का प्रतीक बन चुका है। साल दर साल यही कहानी दोहरायी जा रही  है। साथ ही दोहरायी जा रही है, इस दौरान होने वाली गुण्डागर्दी। राजधानी देहरादून से लेकर कोटद्वार, ऋषिकेश, रामनगर व अन्य परिसरों में भी एक के बाद एक झगड़े हुए।

    इन सारे झगड़े-फसादों के दौरान प्रशासन को हमारे परिसरों को पुलिस छावनियां बनाने का पूरा मौका मिल गया है। आम छात्र एक तरफ छात्र राजनीति के नाम पर गुण्डागर्दी करने वाले इन तत्वों और दूसरी तरफ भारी पुलिस बल की मौजूदगी से किसी हद तक भयग्रस्त हंै। इस मुद्दाविहीन छात्र संघ चुनाव के शोर-शराबे, हंगामे, लड़ाई-झगड़ों व पुलिसिया खौफ के बीच हम आपसे छात्र राजनीति मंे पसरी इस गुण्डागर्दी से जुड़े कुछ प्रश्नों पर चर्चा करना चाहते हैं।
छात्र हितों के लिए लड़ना और गुण्डागर्दी क्या एक चीज है?
अक्सर ही गुण्डागर्दी करने वाले यह छात्र नेता जताते हैं कि वे छात्र हितों के लिए लड़ रहे हैं। अपनी गुण्डागर्दी को वे इसी रूप में जायज ठहराने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह ऐसा कैसा छात्र संघर्ष है, जिसमें आम छात्र मौजूद ही नहीं हैं। न ही आम छात्रों का संघर्ष के लिए कोई आह्वान ही किया जाता है। फिर महाविद्यालय के आम कर्मचारियों से मारपीट करना, इस गुण्डागर्दी का विरोध करने वालों के साथ भी मारपीट करना और चुनावबाज छात्र गुटों का आपस में झगड़ना छात्र हितों से कैसे जुड़ा हुआ है। दूसरा, यह सारे झगड़े-फसाद अक्सर चुनाव के दौरान ही क्यों होते हैं? छात्र हितों के लिए संघर्ष करने का दावा करने वाले ये लोग बाकी साल भर कहां रहते हैं?
    दरअसल यह कोई छात्र हितों के लिए संघर्ष नहीं है, बल्कि गुण्डागर्दी है। इन गुण्डागर्दों के पास वास्तव में छात्र संघर्षों का कोई एजेण्डा ही नहीं है। इसलिए इन्हें संघर्ष हेतु छात्रों को आह्वान करने की भी जरूरत नहीं है। आम छात्र इनके लिए महज वोट हैं।
यह गुण्डागर्द कौन हैं और वे क्या चाहते हैं?
    छात्र राजनीति के नाम पर गुण्डागर्दी करने वाले यह लोग महज चुनावबाज हैं। चुनाव में येन-केन प्रकारेण जीतना इनका एकमात्र उद्देश्य है। चुनाव से पहले छात्रों के बीच इनकी कोई पहचान नहीं होती है। कम से कम छात्र हितों के लिए संघर्ष करने वालों के रूप में तो नहीं होती है। ऐसे में सस्ती पहचान बनाने के लिए यह लोग गुण्डागर्दी व तोड़-फोड़ का सहारा लेते हैं। खुद को संघर्षशील की बजाय ‘दबंग’ नेता के रूप में प्रस्तुत करना ही इनके लिए पर्याप्त है। इन छात्र नेताओं व संगठनों के पीछे चुनावबाज राजनीतिक पार्टियां व नेता होते हैं। राजनीतिक पार्टियां ऐसे छात्र नेताओं के जरिये छात्रों के बीच अपना वोट बैंक बनाने की कोशिश करते हैं। अपनी बारी में ऐसे छात्र नेता अपने सरपरस्त नेताओं की चमचागिरी कर चुनावबाज राजनीति की ऊंची सीढ़ियां चढ़ने की फिराक में रहते हैं। यही वजह है कि कैरियर लोलुप ऐसे छात्र नेता साल भर छात्रों के बीच से गायब रहते हैं और छात्र हितों से उनका कोई सरोकार नहीं होता।
यह गुण्डागर्दी क्या साबित करती है?
    सर्वप्रथम यह गुण्डागर्दी साबित करती है कि आज हमारे इर्द-गिर्द की छात्र राजनीति कितनी ज्यादा मुद्दाविहीन हो चुकी है। यह चुनावबाज छात्र संगठन व गुट छात्र हितों से बहुत दूर जा चुके हैं। छात्र हितों से दूर यह एक-दूसरे के साथ चुनावी वर्चस्व की लड़ाई में ही मशगूल हैं। गुण्डागर्दी इसका स्वाभाविक परिणाम है। दूसरा, गुण्डागर्दी करने वाले इन लोगों में सत्य व तर्क की ताकत समाप्त हो चुकी है। यह लोग मानसिक नपुंसकता से ग्रस्त हैं। इसलिए जब भी कोई सही तर्क करता है अथवा छात्रों से जुड़ा सही मुद्दा उठाता है तो यह लोग भयग्रस्त व कुंठित हो जाते हैं। अपने इस भय व कुंठा में वे गुण्डागर्दी पर उतर जाते हैं। तीसरा, इस प्रकार की छात्र राजनीति भगतसिंह की क्रांतिकारी विरासत से कितनी दूर खड़ी है, यह भी हम समझते हैं। जहां भगतसिंह छात्र आंदोलन में वैचारिक शक्ति की आवश्यकता पर बल देते हैं, वहां ये छात्र नेता अक्ल के अंधे बनकर घूम रहे हैं। हमारे क्रांतिकारियों के त्याग-समर्पण के आदर्शों के विपरीत खुदगर्जी और मौज-मस्ती ही इनका आदर्श है। कुल मिलाकर ऐसे तत्व क्रांतिकारी छात्र आंदोलन के विकास में गंभीर समस्या बन चुके हैं।
इस गुण्डागर्दी से छात्र हितों का क्या नुकसान है?
    आज छात्र समुदाय के सामने शिक्षा और रोजगार से जुड़ी गंभीर समस्याएं खड़ी हैं। इन समस्याओं के समाधान और बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए छात्रों को व्यापक आंदोलन छेड़ना होगा। लेकिन हमारी पूंजीवादी सरकारें व उनके पिट्ठू संस्थाध्यक्ष परिसरों में ऐेसे किसी आंदोलन को खड़ा नहीं होने देना चाहते हैं। लिंगदोह समिति की सिफारिशें व सर्वोच्च न्यायालय के आदेश इसी का प्रयास हैं।
    लम्पट छात्र नेताओं द्वारा की जाने वाली यह गुण्डागर्दी शासन-प्रशासन की योजना में मददगार है। इस गुण्डागर्दी का बहाना बनाकर परिसरों को पुलिस छावनियों में तब्दील कर दिया गया है। लिंगदोह समिति की सिफारिशों को लागू कर छात्र संघों को पंगु बनाया जा रहा है। परिसरों के अंदर व्यापक छात्र आंदोलन के निर्माण की संभावना को कुचला जा रहा है।
    ऐसे में गुण्डागर्दी फैलाने वाले इन छात्र नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि वे किसके पक्ष में खड़े हैं। शासन-प्रशासन व पुलिस के अथवा आम छात्रों के।
छात्र राजनीति में पसरी इस गुण्डागर्दी का जवाब कैसे दिया जाए?
    लिंगदोह समिति की सिफारिशें लागू करते समय यह दावा किया गया कि यह छात्र राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगायेगी। इन सिफारिशों से गुण्डागर्दी पर कितनी रोक लगी है, यह जगजाहिर है। लिंगदोह साहब ने तो अपनी रिपोर्ट दे देने के बाद शायद ही पलटकर परिसर की तरफ देखा हो। इस मामले में वह शायद मुंह चुराना ही बेहतर समझ रहे होंगे। असल में गुण्डागर्दी खत्म करना इन सिफारिशों का मुख्य उद्देश्य था भी नहीं। इनका उद्देश्य छात्रों की संस्था छात्र संघों को कमजोर करना था और इसमें एक हद तक वे कामयाब हुए हैं।
    वास्तव में किसी प्रकार के प्रशासनिक या कानूनी सुधारों से इस गुण्डागर्दी को समाप्त किया ही नहीं जा सकता। तब तो और भी नहीं, जब राजनेताओं, अधिकारियों, पुलिस, पूंजीपतियों और अपराधियों का पूरा एक गठजोड़ पहले से कायम हो। परिसरों में गुण्डागर्दी करने वाले यह तथाकथित छात्र नेता इस गठजोड़ का ही हिस्सा हंै।
    परिसर में व्याप्त गुण्डागर्दी को व्यापक छात्र समुदाय ही अपने एकजुट हस्तक्षेप से रोक सकता है। जब वास्तविक छात्र हितों के गिर्द व्यापक छात्र आंदोलन खड़ा होगा, तभी ऐेसे गुण्डागर्दों को हाशिए पर डाला जा सकेगा। दरअसल हमारी कमजोरी ही उनकी मजबूती है। अपने आप में ऐसे गुण्डा तत्व बहुत कमजोर होते हैं।
    परिवर्तनकामी छात्र संगठन छात्र हितों के लिए समर्पित है। हम मानते हैं कि मौजूदा समय में छात्रों को व्यापक आंदोलन खड़ा करना होगा। जिससे पूंजीवादी व्यवस्था की नींव तक ढह जाए। ऐसे संघर्ष के लिए हम आप सभी छात्रों का आह्वान करते हैं।                              


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