हड़ताल के दौरान हिंसा के लिए सरकार जिम्मेदार
दो दिवसीय राष्टव्यापी हड़ताल के पहले दिन ही देश के कई शहरों में हिंसक झड़पों की घटनाएं हुई। अंबाला में रोडवेज यूनियन के एक नेता की इस दौरान हत्या भी कर दी गई। मेरठ में भी एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या किये जाने की सूचना आ रही है। इसके अलावा कई अन्य घटनाओं में भी बहुत से लोग ज़ख्मी हुए हैं। सरकार व उसका चाटूकार मीडिया इस हिंसा का सारा दोष यूनियन नेतृत्व व मजदूरों-कर्मचारियों पर डाल रहा है। जबकि यह सत्य नहीं है।
सरकार व प्रशासन का रुख हड़ताल की घोषणा के समय से ही इसके खिलाफ था। राष्टीय मीडिया शुरूआत से ही जनमानस में इस हड़ताल के विरूद्ध माहौल बनाने का काम कर रहा था। मजदूरों-कर्मचारियों की मांगों पर जोर देने के बजाय वह हड़ताल से होने वाले नुकसान व नेतृत्व के अडि़यलपन की बातें कर रहा था। गौरतलब हो कि नई आर्थिक नीतियों के काल में सरकारों का रुख अधिकाधिक दमनात्मक होता गया है। कुछ राज्य सरकारें तो इस मामले में खासी बदनामी बटोर चुकी हैं । हरयाणा की हुड्डा सरकार पिछले दो सालों से मारुति सुजुकी के मजदूरों के दमन-उत्पीड़पन में प्रबंधन के साथ हर मौके पर खड़ी दिखाई दी है। उतराखण्ड की बहुगुणा सरकार ने तो सरकार गठन के कुछ ही समय बाद राॅकमैन-सत्यम के अनशनकारी मजदूरों को अस्तपाल में पिटवाकर जिस तरह से उनका अनशन तुड़वाया था, वह उसके मजदूर विरोधी चरित्र को स्पष्ट करने के लिए प्रर्याप्त था। इन प्रतीक उदाहरणों को याद करते हुए हालिया हड़ताल में सरकारों के व्यवहार को अच्छे से समझा जा सकता है।
आज जब सरकारें आर्थिक सुधारों के नाम पर एक के बाद एक मजदूर-कर्मचारी विरोधी फैसले लागू कर रही है तब वह मजदूरों के किसी भी प्रतिरोध को सहन करने की मानसिकता में नहीं है। सरकारें देशी-विदेशी पूंजीपतियों की सेवा में इस कदर आतुर है कि मजदूर-कर्मचारी उन्हें तभी दिखाई देते हैं, जब उनकी तरफ से कोई प्रतिरोध होता है। और इस देखने में भी सरकारों की निगाह हमेशा टेड़ी ही रहती है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। मजदूर-कर्मचारियों का प्रतिरोध ही वह ताकत है जो पूंजीपतियों की मेहनतकश विरोधी मुनाफाखोर हवस को मुंहतोड़ जवाब दे सकती है।
इस दो दिवसीय हड़ताल के दौरान प्राप्त हुआ अनुभव साफ इशारा करता है कि मजदूर-कर्मचारियों की टेड यूनियनों में पिछले कुछ समय से पसरा कानूनवाद, सुधारवाद और महज वेतन-भतों तक मांगों का सीमित रहना अब नाकाफी हो चुका है। अब वक्त की मांग है कि मजदूरों-कर्मचारियों के संघर्ष को स्पष्ट राजनीतिक दिशा दी जाय। यह दिशा पूंजीवाद विरोधी समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष की ही हो सकती है। इस संघर्ष के लिए स्वाभाविक है कि समझौतावादी पुराना नेतृत्व नाकाफी है। मजदूरों-कर्मचारियों को नये क्रांतिकारी नेतृत्व की जरूरत है।
छात्र-नौजवान साथियों को भी मजदूरों के साथ हो रहे इस व्यवहार से सबक लेने की जरूरत है। आज जो उनको साथ हो रहा है कल वही छात्रों के साथ भी होगा, जब वे भी शिक्षा में पसर रही मुनाफाखोर नीतियों के खिलाफ संघर्ष में उतरेंगे। मजदूरों-कर्मचारियों और छात्र-नौजवानों दोनों की ही दुर्गति के लिए मौजूदा पंूजीवादी व्यवस्था जिम्मेदार है। इसलिए आज हम छात्रों-नौजवानों को मजदूरों-कर्मचारियों के दमन के खिलाफ मुस्तैदी से खड़े होने की जरूरत है।
अध्यक्ष
परिवर्तनकामी छात्र संगठन(पछास)
दो दिवसीय राष्टव्यापी हड़ताल के पहले दिन ही देश के कई शहरों में हिंसक झड़पों की घटनाएं हुई। अंबाला में रोडवेज यूनियन के एक नेता की इस दौरान हत्या भी कर दी गई। मेरठ में भी एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या किये जाने की सूचना आ रही है। इसके अलावा कई अन्य घटनाओं में भी बहुत से लोग ज़ख्मी हुए हैं। सरकार व उसका चाटूकार मीडिया इस हिंसा का सारा दोष यूनियन नेतृत्व व मजदूरों-कर्मचारियों पर डाल रहा है। जबकि यह सत्य नहीं है।
सरकार व प्रशासन का रुख हड़ताल की घोषणा के समय से ही इसके खिलाफ था। राष्टीय मीडिया शुरूआत से ही जनमानस में इस हड़ताल के विरूद्ध माहौल बनाने का काम कर रहा था। मजदूरों-कर्मचारियों की मांगों पर जोर देने के बजाय वह हड़ताल से होने वाले नुकसान व नेतृत्व के अडि़यलपन की बातें कर रहा था। गौरतलब हो कि नई आर्थिक नीतियों के काल में सरकारों का रुख अधिकाधिक दमनात्मक होता गया है। कुछ राज्य सरकारें तो इस मामले में खासी बदनामी बटोर चुकी हैं । हरयाणा की हुड्डा सरकार पिछले दो सालों से मारुति सुजुकी के मजदूरों के दमन-उत्पीड़पन में प्रबंधन के साथ हर मौके पर खड़ी दिखाई दी है। उतराखण्ड की बहुगुणा सरकार ने तो सरकार गठन के कुछ ही समय बाद राॅकमैन-सत्यम के अनशनकारी मजदूरों को अस्तपाल में पिटवाकर जिस तरह से उनका अनशन तुड़वाया था, वह उसके मजदूर विरोधी चरित्र को स्पष्ट करने के लिए प्रर्याप्त था। इन प्रतीक उदाहरणों को याद करते हुए हालिया हड़ताल में सरकारों के व्यवहार को अच्छे से समझा जा सकता है।
आज जब सरकारें आर्थिक सुधारों के नाम पर एक के बाद एक मजदूर-कर्मचारी विरोधी फैसले लागू कर रही है तब वह मजदूरों के किसी भी प्रतिरोध को सहन करने की मानसिकता में नहीं है। सरकारें देशी-विदेशी पूंजीपतियों की सेवा में इस कदर आतुर है कि मजदूर-कर्मचारी उन्हें तभी दिखाई देते हैं, जब उनकी तरफ से कोई प्रतिरोध होता है। और इस देखने में भी सरकारों की निगाह हमेशा टेड़ी ही रहती है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। मजदूर-कर्मचारियों का प्रतिरोध ही वह ताकत है जो पूंजीपतियों की मेहनतकश विरोधी मुनाफाखोर हवस को मुंहतोड़ जवाब दे सकती है।
इस दो दिवसीय हड़ताल के दौरान प्राप्त हुआ अनुभव साफ इशारा करता है कि मजदूर-कर्मचारियों की टेड यूनियनों में पिछले कुछ समय से पसरा कानूनवाद, सुधारवाद और महज वेतन-भतों तक मांगों का सीमित रहना अब नाकाफी हो चुका है। अब वक्त की मांग है कि मजदूरों-कर्मचारियों के संघर्ष को स्पष्ट राजनीतिक दिशा दी जाय। यह दिशा पूंजीवाद विरोधी समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष की ही हो सकती है। इस संघर्ष के लिए स्वाभाविक है कि समझौतावादी पुराना नेतृत्व नाकाफी है। मजदूरों-कर्मचारियों को नये क्रांतिकारी नेतृत्व की जरूरत है।
छात्र-नौजवान साथियों को भी मजदूरों के साथ हो रहे इस व्यवहार से सबक लेने की जरूरत है। आज जो उनको साथ हो रहा है कल वही छात्रों के साथ भी होगा, जब वे भी शिक्षा में पसर रही मुनाफाखोर नीतियों के खिलाफ संघर्ष में उतरेंगे। मजदूरों-कर्मचारियों और छात्र-नौजवानों दोनों की ही दुर्गति के लिए मौजूदा पंूजीवादी व्यवस्था जिम्मेदार है। इसलिए आज हम छात्रों-नौजवानों को मजदूरों-कर्मचारियों के दमन के खिलाफ मुस्तैदी से खड़े होने की जरूरत है।
अध्यक्ष
परिवर्तनकामी छात्र संगठन(पछास)

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