08 मार्च मेहनतकश महिलाओं के न्यायसंगत विद्रोहों का प्रतीक दिवस है। इसकी शुरूआत 1910 में यूरोप की समाजवादी क्रांतिकारी महिलाओं ने की थी। इन क्रांतिकारी महिलाओं के नेतृत्व में उस समय मेहनतकश महिलायें ‘घरेलू दासता से मुक्ति’, ‘समान काम का समान वेतन’, ‘10 घंटे का कार्य दिवस’, ‘यूनियन बनाने का अधिकार’, ‘सार्विक मताधिकार’ जैसे न्यायपूर्ण मांगों के लिए लड़ रही थीं।
08 मार्च, 1909 को न्यूयार्क में हुए ऐसे ही एक संघर्ष को ‘20,000 का विद्रोह’ के रूप में जाना जाता है। इसी संघर्ष से प्रेरणा पाकर 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। 1974 में संयुक्त राष्ट्र संघ को इस दिवस को औपचारिक मान्यता देनी पड़ी। पूंजीवाद मेहनतकशों के संघर्षों को कमजोर करने के लिए उन्हें उनकी गौरवपूर्ण विरासत से काटने का काम करता है। इसी क्रम में उसने महिला दिवस को भी नाचने-गाने, सजने-संवरने और कुछ सरकारी-गैर सरकारी औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित कर दिया है। सौंदर्य प्रसाधन कंपनियां इन कार्यक्रमों की मुख्य प्रायोजक बन गयीं हैं। कुछ अमीर महिलाओं का प्रतीक लेकर सम्पूर्ण महिला जगत के सशक्तिकरण के दावे कर दिये जाते हैं। लेकिन यह सच नहीं है।
आम मेहनतकश महिलायें आज भी परिवार व बाजार के दोहरे बंधनों में जकड़ी हुई हैं। पिछड़ी मूल्य-मान्यतायें और उपभोक्तावादी-पूंजीवादी संस्कृति रोज ही उन्हें अपना शिकार बना रही है। घर व सामाजिक जीवन दोनों ही जगह उन्हें आज भी बराबरी का दर्जा हासिल नहीं हो सका है। बढ़ती यौन हिंसा समाज की कटु सच्चाई है।
आइये! ऐसे में पूंजीवादी प्रचार के भुलावे में न पड़ें और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की क्रांतिकारी विरासत से जुड़ते हुए मेहनतकश परिवारों की महिलाओं व छात्राओं की सामाजिक मुक्ति के लिए संघर्ष को तेज करें।

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