22 March 2014

23 मार्चः शहादत दिवस

   छात्र-नौजवान देश का भविष्य होते हैं। बेहतर भविष्य के लिए उन्हें वर्तमान में संघर्ष करना होता है। किंतु इस संघर्ष को अधिकांश नौजवान अलग-थलग पड़कर और केवल अपने बेहतर भविष्य के लिए कर रहे होते हैं। समूह, देश और समाज की चिंता करना उन्हें नहीं सिखाया जाता। इसलिए वे राजनीति से भी दूर रहते हैं। यहां तक कि अराजनीतिक कहलाना वे अपनी शान समझते हैं।छात्र-युवाओं का यह व्यवहार नुकसानदेह है। इस मामले में भी हमें भगतसिंह के क्रांतिकारी विचारों का अनुसरण करना चाहिए। भगतसिंह ने कहा था-‘‘......हमारी शिक्षा निकम्मी और फिजूल होती है। और विद्यार्थी-युवा-जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता। उन्हें इस सम्बंध में कोई भी ज्ञान नहीं होता। जब वे पढ़कर निकलते हैं तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफसोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता। जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज ही अक्ल के अंधे बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए हासिल की जाय। ऐसी शिक्षा की जरूरत ही क्या है?’’

   -भगतसिंह, (जुलाई, 1928, ‘‘विद्यार्थी और राजनीति’’ लेख से)

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