पूरा देश इस समय लोकसभा चुनाव के रंग में रंगा हुआ है। सारी पार्टियां और नेता दावा कर रहे हैं कि वे ही देश की तस्वीर बदल सकते हैं। ऐसे में छात्र-नौजवानों को विचार करना है कि क्या इन पार्टियों और नेताओं के दावों में कोई सच्चाई है? कुछ ज्वलंत सवाल बनते हैं, जिन पर हमें गंभीरता से सोचना होगा।
सरकार में विधायिका को छोड़कर कार्यपालिका व न्यायपालिका के गठन में जनता की कोई भागीदारी नहीं हैं, इनके चुनाव का अधिकार जनता को नहीं है। ऐसे में क्या मौजूदा व्यवस्था को ‘जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए’ शासन कहा जा सकता है?
विधायिका में भी लोकसभा को छोड़कर राज्यसभा व राष्ट्रपति का प्रत्यक्ष चुनाव जनता नहीं करती है। सारे महत्वपूर्ण फैसले कैबिनेट व विभिन्न समितियों के स्तर पर कर लिये जाते हैं। इन फैसलों पर कोई बहस संसद में होने के बजाय संसद फिजूल की बहसों और निरंतर व्यवधानों में अपना समय बर्बाद कर देती है। ऐसे माहौल में संसद कितनी कारगर रह गयी है?
चुनाव के बाद क्या पूंजीपति और मजदूरों, फार्मरों और खेत-मजदूरों, अधिकारियों और कर्मचारियों, छात्रों और कालेज प्रशासन, मालिकों और नौकरों के सम्बंधों में कोई बदलाव आ जायेगा? अगर नहीं तो चुनाव जनता के जीवन में कैसे बदलाव लायेगा?
आखिर क्यों आजादी के 67 साल बाद भी गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई जैसी समस्यायें बनी हुई हैं?
क्यों आज तक भी केवल लगभग 12 प्रतिशत नौजवान ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पा रहे हैं?
क्यों यह शिक्षा एक अदद रोजगार भी आज उपलब्ध करवाने में नाकाम सिद्ध हो रही है?
क्यों ‘अनेकता में एकता’ की बात करने के बावजूद देश में आयदिन धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर दंगे होते हैं और राजनीतिक पार्टियां इन्हें चुनावी मुद्दे बनाती हैं?
क्यों महिलायें आज भी गैर-बराबरी का शिकार हैं और उनका जीवन असुरक्षित बनता जा रहा है?
साथियों! हमारा कहना है कि मौजूदा व्यवस्था पूंजीवादी व्यवस्था है और यह जनतंत्र पूंजीवादी जनतंत्र है। यह व्यवस्था पूंजीपतियों के हित में काम करती है और इसमें केवल पूंजीपतियों के लिए ही जनतंत्र है। आम मेहनतकश जनता इसमें शोषण-उत्पीड़न का शिकार है और उस पर दिन-रात तानाशाही थोपी जाती है। 16वीं लोकसभा के चुनाव निपट जाने के बाद भी इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आने जा रहा है।
केवल और केवल समाजवादी क्रांति ही इस हालत को बदल सकती है। इसलिए छात्रों-नौजवानों को चाहिए कि वे आज भगतसिंह के विचारों को ग्रहण करें और समाजवादी व्यवस्था लाने के लिए संगठित होकर संघर्ष करें।
सरकार में विधायिका को छोड़कर कार्यपालिका व न्यायपालिका के गठन में जनता की कोई भागीदारी नहीं हैं, इनके चुनाव का अधिकार जनता को नहीं है। ऐसे में क्या मौजूदा व्यवस्था को ‘जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए’ शासन कहा जा सकता है?
विधायिका में भी लोकसभा को छोड़कर राज्यसभा व राष्ट्रपति का प्रत्यक्ष चुनाव जनता नहीं करती है। सारे महत्वपूर्ण फैसले कैबिनेट व विभिन्न समितियों के स्तर पर कर लिये जाते हैं। इन फैसलों पर कोई बहस संसद में होने के बजाय संसद फिजूल की बहसों और निरंतर व्यवधानों में अपना समय बर्बाद कर देती है। ऐसे माहौल में संसद कितनी कारगर रह गयी है?
चुनाव के बाद क्या पूंजीपति और मजदूरों, फार्मरों और खेत-मजदूरों, अधिकारियों और कर्मचारियों, छात्रों और कालेज प्रशासन, मालिकों और नौकरों के सम्बंधों में कोई बदलाव आ जायेगा? अगर नहीं तो चुनाव जनता के जीवन में कैसे बदलाव लायेगा?
आखिर क्यों आजादी के 67 साल बाद भी गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई जैसी समस्यायें बनी हुई हैं?
क्यों आज तक भी केवल लगभग 12 प्रतिशत नौजवान ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पा रहे हैं?
क्यों यह शिक्षा एक अदद रोजगार भी आज उपलब्ध करवाने में नाकाम सिद्ध हो रही है?
क्यों ‘अनेकता में एकता’ की बात करने के बावजूद देश में आयदिन धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर दंगे होते हैं और राजनीतिक पार्टियां इन्हें चुनावी मुद्दे बनाती हैं?
क्यों महिलायें आज भी गैर-बराबरी का शिकार हैं और उनका जीवन असुरक्षित बनता जा रहा है?
साथियों! हमारा कहना है कि मौजूदा व्यवस्था पूंजीवादी व्यवस्था है और यह जनतंत्र पूंजीवादी जनतंत्र है। यह व्यवस्था पूंजीपतियों के हित में काम करती है और इसमें केवल पूंजीपतियों के लिए ही जनतंत्र है। आम मेहनतकश जनता इसमें शोषण-उत्पीड़न का शिकार है और उस पर दिन-रात तानाशाही थोपी जाती है। 16वीं लोकसभा के चुनाव निपट जाने के बाद भी इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आने जा रहा है।
केवल और केवल समाजवादी क्रांति ही इस हालत को बदल सकती है। इसलिए छात्रों-नौजवानों को चाहिए कि वे आज भगतसिंह के विचारों को ग्रहण करें और समाजवादी व्यवस्था लाने के लिए संगठित होकर संघर्ष करें।
परिवर्तनकामी छात्र संगठन

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