30 May 2015

IIT मद्रास में स्टूडेंट ग्रुप पर लगे बैन का विरोध करो।


     IIT मद्रास(IITM) के अम्बेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल(APSC) को डीन आफ स्टूडेंट(DoS) ने 22 मई को एक आदेश द्वारा डी-रिकोनाइज्ड(नामंजूर) कर दिया है। DoS ने अपने आदेश में कहा है कि यह ग्रुप IITM द्वारा दिए जा रहे अधिकारों का दुरूपयोग कर रहा था। DoS द्वारा यह कदम MHRD द्वारा 15 मई को IITM को भेजे गए एक पत्र के संदर्भ में उठाया गया। जिसमें  APSC द्वारा बांटे गए पर्चे-पोस्टरों पर नफरत फैलाने का आरोप लगाते हुए जांच के आदेश दिए गए थे। और खुद MHRD द्वारा यह पत्र एक अनाम व्यक्ति की शिकायत को संज्ञान में लेते हुए भेजा गया था। जिसमें इस ग्रुप पर मोदी और हिन्दुओं के खिलाफ नफरत फैलाने का आरोप लगाते हुए इस पर कार्यवाही करने की मांग की गयी थी।

     14 अप्रैल 2014 में अपने गठन के बाद से ही  APSC पर IITM प्रशासन द्वारा निरंतर दवाब बनाया जा रहा था। इस पर राजनीतिक लोगों के नाम का इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर निरंतर इसकी कार्यवाहियों को रोकने की कोशिश की जा रही थी। जबकि इसी संस्थान में विवेकानंद के नाम से चल रहे एक दक्षिणपंथी स्टडी सर्किल से संस्थान को कोई आपत्ति नही है।
     दरअसल  APSC  उन छात्रों का ग्रुप है जो मोदी-नित भाजपा सरकार द्वारा समाज में लागू किए जा रहे फासिस्ट एजेण्डे का विरोध करता रहा है। यह ग्रुप मोदी सरकार की पूंजीपति परस्त नीतियों को छात्रों के बीच उजागर करता रहा है। इसी रोशनी में APSC पिछले एक वर्ष से कृषि सवाल पर, श्रम कानूनों में संशोधनों के खिलाफ, भाषा के सवाल आदि विषयों पर स्टडी सर्किल आयोजित कर चुका है। इन विषयों से ही IITM प्रशासन और MHRD को समस्या है। ये नहीं चाहते कि कोई भी इन सवालों पर बात कर सही सोच पर खड़े हो सके।
     पिछले एक वर्ष से मोदी सरकार द्वारा पूंजीपतियों के पक्ष में आर्थिक नीतियों को तेजी से लागू किया जा रहा है। मेक इन इण्डिया के नाम पर देशी-विदेशी पूंजीपतियों को प्राकृतिक संसाधनों को कौड़ियों के दाम पर बेचना, भूमि-श्रम कानूनों में संशोधन, विनेवशीकरण औ FDI को बढ़ावा देना आदि। जिसने पहले से ही कंगाल मजदूर-मेहनतकश जनता की जिंदगी को और अधिक बदतर बनाया है। वहीं दूसरी तरफ जनता की लड़ने और विरोध करने की क्षमता को कुंद करने के लिए समाज का तेजी से साम्प्रदायिकरण किया जा रहा है। इसी को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा संस्थानों को भी भगवा रंग में रंगा जा रहा है। इसके लिए शिक्षा संस्थानों में काम कर रहे दक्षिणपंथी ग्रुपों को फलने-फूलने के पूरे मौके दिए जा रहे हैं और जनवादी-तर्कपूर्ण वैज्ञानिक सोच वाले संगठनों और लोगों से बोलने का हक छीना जा रहा है।
     दरअसल सभी फासिस्ट संगठनों की तरह RSS व भाजपा सरकार भी समाज के तर्कपूर्ण सोचने, सवाल करने से घबराती है। अपने लाखों-लाख कार्यकर्ता और सर पर पूंजीपतियों का हाथ होने के बाद भी वो जानते हैं कि इतिहास में फासिस्टों की उम्र कभी भी ज्यादा नही रही। इसलिए भी सभी जनवादी-क्रांतिकारी ताकतों का ये फर्ज बनता है कि वो इनके इस डर को महज बनाए हुए ना रखे बल्कि फौलादी एकता के साथ इसे हकीकत में बदल इन्हें भी इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दें। इसलिए जरूरी हो जाता है कि हम सब एकजुट होकर APSC पर लगे बैन का विरोध करें।



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