हम जो चाहेगें सब वही खायेंगे
जैन धर्म पर्व का बहाना बनाकर महाराष्ट व छत्तीसगढ सरकार ने मास की ब्रिक्री पर दो दिनों के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। पहले यह प्रतिबंध महाराष्ट में 4 व छत्तीसगढ में 9 दिनों के लिए लगाया गया था। दोनों प्रदेश सरकारों द्वारा सुनाया गया यह फरमान सवर्णवादी- ब्राहमणवादी सोच से भरा हुआ है। भाजपा सरकार लगतार समाज में ब्राहमणवादी मूल्य थोप रही है। किसी भी सरकार को यह तय करने का कोई अधिकार नहीं है कि लोग क्या खायें क्या पहने। किन्तु देश में भाजपा सरकार यही सब कर रही है।
गैरतलब है, महाराष्ट में जैन सम्प्रदाय के महज 5 प्रतिशत लोग रहते हैं। और छत्तीसगढ तो आदिवासी बहुल प्रदेश है। आदिवासियों के बीच मास सिर्फ खान-पान से ही नहीं धार्मिक रीति-रिवाजों से जुडा हुआ है। प्रदेश सरकारों का मास पर प्रतिबंध बहुसंख्यक आवादी के खिलाफ है। यह प्रतिबंध मुसलमान, ईसाई, दलितों, आदिवासियों के खिलाफ है। बहुलांश आवादी पर घृणित ब्राहमणवादी आचार-विचार थोपना है। सरकार का यह फरमान सामान्य नागरिक अधिकारों के खिलाफ है। जो उसे उसकी पसंद के खाना खाने की इजाजत भी नहीं देता।
महाराष्ट सरकार ने इससे पूर्व भी मास पर प्रतिबंध लगाने की कोशिशे की थी। 2008 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक अपील की सुनवाई के दौरान सरकार द्वारा इस प्रतिबंध को गलत करार दिया था। किन्तु समाज का भगवाकरण करने की घृणित मंशा के कारण सरकार ने पुनः मास पर प्रतिबंध लगा दिया है।
भाजपा शासित प्रदेश ओर केन्द्र में मोदी सरकार का खुला ऐजेण्डा है कि वे समाज का भवाकरण करें। समाज की हर विभिद्ता को खत्म कर उनके स्थान पर सवर्णवादी-ब्राहमणवादी घृणित सोच अपनाने के लिए समाज को मजबूर करें। सत्ता के जोर से वह यह सब कर भी रही हैं। देश की इंसाफपसंद जनता को भाजपा के इस हमले का तीखा प्रतिकार करने की आवश्यकता है।

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