उत्तराखण्ड में सत्ता संघर्ष
साथियो,
पिछले दिनों हमारे राज्य उत्तराखण्ड में जिस तरह पार्टियों के बीच सत्ता-सुख के लिए आपस में तू-तू ,मैं-मैं से लेकर खरीद फरोख्त चली, उससे हम सभी वाकिफ हैं। पिछले दो हफ्तों में भाजपा कांग्रेस में यह साबित करने की मानो होड़ मची थी कि कौन कितना धूर्त, चालाक, शातिर व षड्यंत्रकारी है। कौन किसके कितने विधायकों को तोड़, खरीद सकता है। कांग्रेसी सरकार और विपक्षी भाजपा का यह बेशर्म खेल अभी चल ही रहा था कि केन्द्र की मोदी सरकार ने राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर दिखा दिया कि भारतीय लोकतंत्र में केन्द्र के आगे राज्यों की कोई औकात नहीं है जो भी राज्य मोदी सरकार की इच्छानुसार नहीं चलेंगे, उन्हें अरुणाचल, उत्तराखण्ड की तरह केन्द्र धारा 356 का इस्तेमाल कर राष्ट्रपति शासन लगा सबक सिखायेगा। मोदी सरकार की यह फासीवादी तानाशाही बेहद घृणित है। हालांकि न्यायालय ने इसी दौरान सुनवाई कर सत्ता संघर्ष के खेल को दोबारा चालू करा केन्द्र की योजना पर पानी डाल दिया है।
इस सत्ता संघर्ष में आपस में सिर फुटौव्वल करती भाजपा-कांग्रेस के साथ सरकार में रहने के लिए कभी भी पाला बदलने को तैयार बसपा, यूकेडी व निर्दलियों का असली चेहरा सबके सामने आ गया है। खरीद फरोख्त के नंगे नाच ने हर जागरूक इंसान को इनके प्रति नफरत से भर दिया है। कुछ लोग आज भी इस भ्रम में हैं कि कुछ नेता, कुछ दल भ्रष्ट हो गये हैं और यदि ईमानदार नेताओं-पार्टियों को सत्ता में पहुंचा दिया जाये तो सब ठीक हो जायेगा। वे यह नहीं समझ पाते कि पूंजीवादी राजनीति में पद- सत्ता- पैसे के लिए संघर्ष, सांसदों विधायकों की खरीद बेच अपवाद नहीं आम बात है इसीलिए यह पतन उत्तराखण्ड ही नहीं पूरे देश की राजनीति में दिख रहा है। हालत यह है कि एक ही दल के भीतर भी नेता एक दूसरे की टांग खींचने में जुटे रहते हैं। उत्तराखण्ड में भाजपा, कांग्रेस के भीतर धड़ेबंदी से कौन वाकिफ नहीं हैं। यह सड़ती बजबजाती पूंजीवादी राजनीति की अनिवार्य परिणति है कि जो भी इसमें डुबकी लगायेगा वह अपने चेहरे पर कालिख लेकर ही निकलेगा।
पूंजीवादी नेताओं के लिए सिद्धान्तों व दलीय निष्ठा की बातें आज बेमानी हो चुकी हैं। देश के पूंजीवादी विकास के साथ यह सबके लिए स्पष्ट होता चला गया कि देश की सत्ता की चाभी असल में टाटा-बिड़ला-अम्बानी सरीखे पूंजीपतियों के हाथों में हैं। पार्टियां आपस में कितना भी सिर फुटौव्वल करें सत्ता में आने पर वे पूंजीपतियों के इशारों पर ही काम करती हैं। मोदी हो या मनमोहन देश की बुनियादी नीतियां एक रहती हैं। जब एक बार दलों के बीच अंतर खत्म होता चला गया तो फिर सिद्धान्त भी बेमानी होते चले गये।
आज देश व प्रदेश के पूंजीपतियों के हित में सरकारें हर संपदा-खनिजों जंगलों को पूंजीपतियों को लुटा रही हैं। मजदूरों पर कहर बरपा, नाम मात्र की सुरक्षा देने वाले श्रम कानूनों को छीन रही हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवायें महंगी कर बेरोजगारी बढ़ा रही हैं। उत्तराखण्ड में नैनीसार में कांग्रेस सरकार का जिंदल प्रेम किसी से छिपा नहीं है। पूंजीपतियों की चाकरी और जनता को हर तरह से लूटने खसोटने के सरकारों के इन कदमों में सभी पूंजीवादी पार्टियां अंदरखाने एकमत हैं।
लुटेरे पूंजीपतियों के लिए काम करने वाली भाजपा कांग्रेस से लेकर सभी पूंजीवादी पार्टियों के नेताओं का अब एक ही सिद्धान्त रह गया है सत्ता-पद और पैसा। पतन के गर्त में लोटते पूंजीवाद की पूंजीवादी राजनीति का पतन भी अपरिहार्य था। अब भाजपा या कांग्रेस को अपने विधायकों को खरीद फरोख्त से बचाने के लिए दिल्ली-जयपुर या कार्बेट, रामनगर भेजना पड़ता है। किसी भी दल को अपने ही विधायकों पर भरोसा नहीं है और विधायक भी आॅफर को तौल मनमाने तरीके से पाला बदल रहे हैं। पूंजीवादी राजनीति के पतन को ढंकने छिपाने के लिए बना दल बदल कानून भी इन्हें रोक नहीं पा रहा है। इनके आका विजय माल्या 9000 करोड़ लेकर भाग सकते हैं तो ये क्यों पीछे रहें। इन्हें अगले चुनावों में जनता का भय भी नहीं रह गया क्योंकि ये जानते हैं कि पैसे और प्रचार के दम पर जनता को कुछ भी समझा कर वोट पाये जा सकते हैं।
इसीलिए उत्तराखण्ड में सत्ता संघर्ष के इस नंगे नाच के मौके पर कोई अगर यह सोचता है कि पूंजीवादी राजनीति की इस सडांध को कुछ ईमानदार लोगों को सत्ता में बैठा, साफ किया जा सकता है तो वह भुलावे में है। इसीलिए नयी पार्टियां-नये नेता भी सड़ती बजबजाती पूंजीवादी राजनीति के अड्डे में जाकर उसी में ढलने को अभिशप्त हैं। गाजे बाजे के साथ भ्रष्टाचार विरोध का दिखावा कर खड़ी आम आदमी पार्टी का दिल्ली की सत्ता में आने पर असली चेहरा सबके सामने उजागर हो चुका है। आज ढेरों छल-कपट के मामले में वह भाजपा कांग्रेस को भी मात दे रही है।
पूंजीवादी राजनीति की यह सड़ांध, उसका यह नंगा नाच सड़ती गलती पूंजीवादी व्यवस्था का अनिवार्य परिणाम है। इसीलिए इस सडांध को खत्म करने का एक ही रास्ता है कि पूंजीवादी व्यवस्था को ही समाप्त करने के लिए लड़ा जाये। एक ऐसी क्रांति के लिए लामबंद हुआ जाये जो ऐसा समाज कायम करे जिसमें सत्ता मजदूरों मेहनतकशों के हिसाब से चले, जिसमें सत्ता की नीतियां तय करने में जनता की भागीदारी हो, जिसमें लुटेरे पूंजीपतियों और उनकी भ्रष्ट पार्टियों के लिए कोई जगह न हो, जहां राज्य हर व्यक्ति के रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन की पूरी गारंटी करे। ऐसा समाजवादी समाज पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त करके ही कायम किया जा सकता है।
ऐसा ही समाज कायम करना आजादी के वक्त लड़ने वाले भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का स्वप्न था जिन्होंने घोषित किया था कि यह लड़ाई न हमने शुरू की थी और न यह हमारे मरने के साथ समाप्त होगी। यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक लुटेरे पूंजीवाद-साम्राज्यवाद को समाप्त कर बराबरी का समाज न कायम कर दिया जाए।
आज जरूरत भगत सिंह के इन शब्दों को याद करने की और उनके स्वप्न को पूरा करने की लड़ाई में आगे आने की है। जरूरत सत्ता के लिए सिर फुटौव्वल करती पार्टियों से भरोसा त्याग, सत्ता परिवर्तन के बजाय व्यवस्था बदलने की लड़ाई को आगे बढ़ाने की हैै। जरूरत इंकलाब से नाता जोड़ने की है।
हम इंकलाबी मजदूर केन्द्र, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, उत्तराखण्ड की इस राजनैतिक हलचल की बेला में सभी संवेदनशील नागरिकों, मेहनतकशों, महिलाओं, छात्रों-नौजवानों का आह्वान करते हैं कि वे रंग बिरंगी टोपियों के पीछे चलना छोड़ क्रांतिकारी बदलाव के संघर्ष में हमारे साथ खड़े हों।
इंकलाब जिंदाबाद

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