गुजरात के सोमनाथ गीर जिले के ऊना में चमड़ा उद्योग से जुड़े चार दलितों की निर्मम पिटाई और फिर तीन घंटे तक पीटते हुए गांव में घुमाने की घटना से पैदा हुआ आक्रोश देश भर में फैल गया है। इस घटना ने प्रधानमंत्री मोदी के गुजरात और उनके अपने को दलित-महादलित के दावों की भी पोल खोल दी है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व भाजपा के पाले हुए गुण्डे जिन्होंने अपने को बजरंग दल, गौरक्षा दल आदि नाम दिये हुए हैं, पूरे देश में आतंक फैला रहे हैं। पशुओं की पूजा करने का ढोंग करने वाले ये इंसानों के कत्ल करने में अपने धर्म की रक्षा का गुमान पालते हैं। जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, गुजरात, उड़ीसा, कर्नाटक, शायद ही कोई राज्य बचा हो जहां इन तथाकथित गौ-रक्षकों ने उत्पात न मचाया हो।
‘मेरे गुजरात’ ‘मेरे गुजरात’ कहकर चुनावी शोर मचाने वाले मोदी जी की जुबान फिलवक्त चुप है। गुजरात में पिछले दो वर्षों में दलितों के ऊपर अत्याचार की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ी हैं। पुलिस में दर्ज आंकड़ों के अनुसार जहां वर्ष 2014 में दलितों के खिलाफ हिंसा व अपराध की 1130 घटनाएं हुयी थीं वहां 2015 में यह संख्या बढ़कर 6655 हो गयी थी। यानी लगभग 6 गुने की वृद्धि। ऐसे ही हालात देश के अन्य राज्यों के भी हैं।
राजस्थान में गुजरात की तरह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। यहां भारत की दलित आबादी के महज 6 फीसदी लोग रहते हैं परन्तु यहां देश भर में होने वाले कुल दलित विरोधी अपराधों के 17 फीसदी अपराध होते हैं। यही स्थिति हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र जैसे भाजपा शासित प्रदेशों की है। ये प्रदेश राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रयोगशाला भी रहे हैं। यहां इन्होंने दलितों को हिन्दू धर्म के खोल में बनाये रखने के लिए ‘सामाजिक समरसता’ जैसे कई कार्यक्रम चलाये हुए हैं। दलितों के घरों में भोज, मंदिरों में प्रवेश दिलाने जैसे नाटकीय कदमों के बावजूद यही सच्चाई है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के गौरक्षा जैसे अतिवादी हिंसक अभियानों के निशाने पर मुस्लिमों, ईसाईयों के साथ दलित स्वाभाविक तौर पर आ जाते हैं।
गुजरात में दलितों के आक्रोश के फूट पड़ने के बाद भारत की संसद और केन्द्रीय सरकार कुछ हरकत में आये। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इस मामले में लीपापोती करने की पूरी कोशिश की और अपनी सरकार के बचाव मेें निम्न स्तर पर उतर आये। असल में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेता घृणित सवर्ण मानसिकता और मध्ययुगीन मतिमूढ़ ब्राह्मणवादी मूल्यों के समर्थक हैं। मोदी सरकार के मंत्री आये दिन अपनी घृणित मानसिकता का प्रदर्शन करते हैं। पूर्व सेनाध्यक्ष व इस समय मंत्री वी.के.सिंह ने फरीदाबाद की घटना के बाद कहा था, ‘‘अगर कोई किसी कुत्ते पर पत्थर फेंकता है तो आप इसके लिए सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं।’’
स्मृति ईरानी ने रोहित वेमुला की आत्महत्या के समय जो घृणित भूमिका निभायी थी जगजाहिर है। उन्होंने रोहित को दलित मानने से ही इंकार कर दिया था। इस घटना से सम्भावित चुनावी नुकसान को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने लखनऊ विश्व विद्यालय में भावुकतापूर्ण बातें करते हुए आंसू बहाये थे। और ठीक उसी सभा में दोे दलित छात्रों को अपमानित, लांछित कर पहले सभा और बाद में विश्वविद्यालय में जीना मुश्किल कर दिया गया था।
दलितों के प्रति हाल के वर्षों में हिंसा में बढ़ोत्तरी होती गयी है। यह तब है जब हर पार्टी दलितों की हिमायती और बाबा साहेब अम्बेडकर की पुजारी बन गयी है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तक बाबा साहेब अम्बेडकर को अपने प्रातः स्मरणीय महापुरुषों में शामिल कर उनके नाम पर एक से बढ़कर एक कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। परन्तु उनके नेता व कार्यकर्ताओं के लिए यह महज राजनैतिक पाखण्ड है। दलितांे के खिलाफ हो रही हिंसा में इसके नेता, कार्यकर्ताओं व समर्थकों का शामिल होना अपनी कहानी आप कह देता है।
दलितों व मुस्लिमों के खिलाफ हो रहे हिंसक आक्रमण अपने आप में संघ-भाजपा के विचार और सोच से पैदा हो रही आयोजित-नियोजित सचेत राजनीतिक हिंसा है। पैसा कमाने राजनैतिक कैरियर बनाने से लेकर संघ के हिन्दू राष्ट्र बनाने जैसे कृत्य इसके पीछे हैं। राजनैतिक हिंसा का मकसद आतंक कायम करने से लेकर चुनाव में साम्प्रदायिक व जातीय ध्रुवीकरण तक है।
क्षोभ, आक्रोश, अवसाद, अलगाव में आत्मघाती कदम उठाने के स्थान पर पूरे समाज को जागृत व गोलबंद करने की दिशा में गुजरात के वर्तमान आंदोलन ने एक नयी राह दिखायी है। संघी लम्पटों की गुण्डागर्दी झेल रहे दलितों ने अब इसका एकजुट प्रतिरोध करना तय कर लिया है। हालांकि करीब 10 दलितों के आत्मघात के प्रयास की खबरें भी आ रही हैं। पर इससे ज्यादा महत्वपूर्ण वह व्यापक आंदोलन है जो पूरे गुजरात के साथ देश के बाकी हिस्सों में भी फैल रहा है। दलितों के समर्थन में दूसरी जातियों के भी लोग आगे आ रहे हैं।
18 जुलाई को गुजरात के सुरेन्द्रनगर जिला मुख्यालय के सामने मरी हुयी गायें फेंककर कुछ दलित गुटों ने उसी नीति का पालन किया जो ‘शठे शाठ्यम समाचरेत्’ (दुष्टों के साथ दुष्टों जैसा व्यवहार करो) के तहत आती है। गौरक्षकों पर प्रतिबंध की मांग मुखर हो चुकी है।
दलितों के इस क्षोभ व आक्रोश भरे प्रदर्शन के सामने संघी-भाजपायी भीगी बिल्ली बनकर रह गये हैं। ‘सामाजिक समरसता’ की बातें कर दलित वोट साधने की फिराक में लगे भागवत, मोदी, जेटली, राजनाथ आदि को समझ में नहीं आ रहा है कि वह इसका जवाब दें तो क्या दें। गुजरात को साधे तो कैसे साधें। उनकी आत्मा दलित विरोधी है सवर्ण ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रस्त है। गौरक्षा का सारा ढोंग इसी आत्मा को तुष्ट करता है। साथ ही वह दलितों-मुस्लिमों पर हमला बोलने की ओर भी ले जाता है। पर चुनावी गणित उन्हें ‘समरसता’ की बातें करने दलितों को साधने की मजबूरी पैदा करता है। इसीलिए इन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि अपने कुकर्मों से पैदा गौरक्षकों को पालने व दलितों को साधने के दोनों काम एक साथ कैसे करें।


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