(ये लेख परचम पत्रिका के अंक जनवरी-मार्च, 2016 से साभार लिया गया है। 3 जनवरी, सावित्री बाई फुले के जन्मदिवस पर हम इसे अपने ब्लाॅग पर जगह दे रहे हैं। आशा करते हैं के ये लेख सावित्री बाई फुले व उनके विचारों को समझने में कारगर होगा)
सावित्री बाई फुले भारत की प्रथम महिला अध्यापिका तथा भारत में नारी मुक्ति आंदोलन की नींव रखने वाली पहली महिला थी। उन्होंने अपने पति महात्मा ज्योतिबा फुले के सहयोग से हमारे देश में महिला शिक्षा की नींव रखी। उन्नीसवीं सदी में भारतीय समाज में शिक्षा पर चन्द पुरुष सवर्णों का ही अधिकार था। स्त्रियों तथा शूद्रों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। समाज में जात-पात, छुआ-छूत, बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह निषेध जैसी कई कुरीतियां मौजूद थीं। सम्पूर्ण भारत में घोर ब्राह्मणवादी पाखण्ड व मनुवादी विचारों के चलते महिलाएं गुलामी का सा जीवन जीने को मजबूर थीं। महिलाओं को कोई अधिकार तथा सामाजिक समानता प्राप्त नहीं थी। ऐसे में सावित्री बाई फुले ने अपने पति के साथ मिलकर स्त्री शिक्षा, समानता तथा विधवा पुनर्विवाह जैसे सामाजिक कार्यों को अपने लक्ष्य में लिया तथा आजीवन इन कार्यों को जारी रखा।
सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ। इनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे तथा माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्री का विवाह मात्र 9 वर्ष की आयु (1840) में, 13 वर्ष के ज्योतिराव गोविन्दराव फुले के साथ हो गया था। सावित्री को अपने पिता के घर अध्ययन का बिल्कुल भी अवसर प्राप्त नहीं हुआ। उनके पिता स्वयं स्त्री शिक्षा के घोर विरोधी थे। एक बार जब सावित्री एक अंग्रेजी किताब के पन्ने पलट रही थीं तो उनके पिता ने उन्हें देख लिया तथा क्रोध में आकर वह किताब सावित्री के हाथों से छीनकर खिड़कीसे बाहर फेंक दी। हालांकि सावित्री ने उस समय उनका विरोध नहीं किया परन्तु उन्होंने चुपचाप वह किताब ढूंढ कर छिपा दी। निश्चय किया कि एक दिन वह जरूर उस किताब को पढ़कर रहेंगी।
उनका यह सपना उनके पति ज्योतिबा फुले ने पूरा किया। ज्योतिबा स्वयं एक समाज सुधारक थे। उन्होंने न केवल सावित्री को पढ़ना सिखाया बल्कि जीवन भर उनके गुरू, सहयोगी व मार्गदर्शक बनकर सावित्री के मिशन में उनका हाथ भी बंटाया।
सावित्री ने समाज में महिलाओं की दशा को देखते हुये महिला शिक्षा का सपना बुना। उस समय समाज में सती प्रथा, बाल विवाह तथा विधवा मुण्डन जैसी कठोर परम्परायें हावी थीं। जात-पात तथा ब्राह्मणवादी कर्मकाण्डों ने महिलाओं को गुलाम बना रखा था। सावित्री को स्त्रियों की दशा सुधारने का एकमात्र रास्ता स्त्री शिक्षा ही दिखायी दिया। और उन्होंने इसे अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया।
सावित्री व उनके पति ज्योतिबा फुले ने अपने प्रथम प्रयास से 1 जनवरी 1848 में 9 बालिकाओं के साथ देश का पहला बालिका विद्यालय पूना के बुधवारा पेठ में स्थापित किया। जिसमें फातमा शेख नामक महिला ने उनकी सहायता की। उस समय स्त्री शिक्षा को सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं थी। जिस कारण धर्म पंडितों व समाज के महिला शिक्षा विरोधियों द्वारा इन्हें काफी परेशान किया गया। परन्तु फुले दम्पत्ति पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। पुरुषों ही नहीं अपितु महिलाओं ने भी सावित्री को काफी उलाहनायें दीं। ताने मारकर उन्हें प्रताड़ित करने के प्रयास किये। जैसे यह काफी न था, जब वह अपने विद्यालय जाती थीं, तो लोग उन पर कीचड़ तथा गोबर तक फेंका करते थे। परन्तु सावित्री ने हार नहीं मानी। अब वह एक और साड़ी लेकर विद्यालय जातीं तथा विद्यालय पहुंचकर अपने कीचड़ सने कपड़े बदल लिया करती। और वापस आते समय फिर से गन्दी साड़ी पहन लिया करतीं।
चार वर्षों में सावित्री के प्रयास रंग लाये तथा इस दौरान उन्होंने देश में 18 बालिका विद्यालय खोलने में सफलता हासिल की। उनका संचालन भी किया। 1852 में सावित्री ने अछूत बालिकाओं के लिये एक अलग विद्यालय की भी स्थापना की।
28 जनवरी 1853 में फुले दम्पत्ति ने मिलकर बाल हत्या प्रतिबन्धक गृह की स्थापना की; जिसमें उन्होंने कई विधवा व परित्यक्त महिलाओं की प्रसूति करायी तथा बच्चों को बचाया। आत्महत्या का प्रयास करती एक विधवा महिला काशीबाई को बचाकर उन्होंने उसकी प्रसूति कराई तथा उसके पुत्र को गोद लिया और स्वयं उसका पालन-पोषण किया। वह बाद में एक चिकित्सक बने।
1855 में सावित्री की एक 11 वर्षीय शिष्या मुक्ताबाई ने ध्यानोदय पत्रिका में एक प्रभावशाली निबन्ध लिखा, जिसमें ब्राह्मणवादी मूल्यों, पाखण्ड का पर्दाफाश करते हुये, दलितों की व्यथा को प्रस्तुत किया गया था।
सावित्री स्त्री शिक्षा की प्रणेता ही नहीं थी अपितु उनकी लेखनी भी काफी प्रभावशाली थी। अपने लेखन में सावित्रीबाई ने स्त्री शिक्षा, जाति व्यवस्था, भारत की गुलामी को प्रस्तुत किया। 1854 में उनका पहला संग्रह ‘काव्य फुले’ के नाम से प्रकाशित हुआ। यह अपने किस्म का पहला ऐतिहासिक साहित्य था, जिसमें सावित्री बाई ने मराठी के प्रचलित ऊमंगों को अपनी शैली के रूप में प्रयोग किया। उनकी भाषा सरल और प्रभावी थी। उन्होंने अपने काव्य में स्त्रियों की दशा व समस्याओं को प्रबलता से उठाया है। यह संग्रह आज मराठी साहित्य का आधार माना जाता है। उनका एक अन्य महत्वपूर्ण काव्य संग्रह महात्मा फुले की जीवनी पर था, जो ‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’ के नाम से (1891) प्रकाशित हुआ। सावित्री बाई ने इसके अलावा कई पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। अपने एक निबन्ध कार्य में वे लिखती हैं, ‘‘त्यौहारों व कर्मकाण्डों से परलोक नहीं सुधरने वाला’’।
उस समय किसी स्त्री के विधवा हो जाने पर नाई द्वारा उनके बाल जड़ से काट दिये जाते थे। यही नहीं आजीवन मिष्ठान, मेवों, फलों तथा रंगीन कपड़ों का भी त्याग करना पड़ता था। साथ ही विधवाओं को दोबारा विवाह करने का भी अधिकार प्राप्त नहीं था। सावित्री बाई ने इस विधवा मुण्डन प्रथा के खिलाफ 1860 में एक हड़ताल का आयोजन किया, जो अपने आप में सफल रही।
फुले दम्पत्ति ने श्रमिकों के लिये रात्रि पाठशाला आरम्भ की। चूंकि दिन में श्रमिकों को समय नहीं मिल पाता था। उन्होंने श्रमिकों के साथ-साथ खेत-खलिहानों में काम करने वाले अशिक्षितों को भी शिक्षा की ओर लाने का प्रयास किया।
सावित्री बाई फुले तथा ज्योतिबा फुले ने मिलकर एक संस्था ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की, जिसनें 1876-79 के अकाल के दौरान 52 स्थानों पर अन्न सत्र चलाये तथा अनाथालयों के 2000 से अधिक छात्रों व गरीब जरूरतमंदों के लिये मुफ्त भोजन की व्यवस्था की।
सावित्री बाई द्वारा विधवा पुनर्विवाह सभा का भी आयोजन किया जाता रहा। 25 दिसम्बर 1873 को उन्होंने पहला विधवा विवाह सम्पन्न कराया जिसका परम्परावादियों व ब्राह्मणवादियों द्वारा घोर विरोध किया गया। परन्तु सावित्री ने पुलिस की मदद से यह विवाह सम्पन्न करा ही दिया। इस विवाह में पुरोहित (पंडित) को शामिल नहीं किया गया।
‘सत्यशोधक समाज’ में फुले दम्पत्ति ने मिलकर स्त्रियों को समानता व बराबरी दिलाने के उद्देश्य से विवाह की एक नई विधि की रचना भी की जिसमें विवाह में गाये जाने वाले मंगलाष्टक (मंगल मंत्रोच्चार) में स्त्री-पुरुष को प्रतिज्ञा कराई जाती थी कि वह स्त्री को समान व मित्रवत मानेगा। इसमें वधु वर से कहती है- ‘‘हमें स्वतंत्रता का अनुभव नहीं है। अतः तुम इस बात की शपथ लो कि स्त्रियों को उनका अधिकार दोगे, उन्हें स्वतंत्रता का अनुभव करने दोगे’’। यह आकांक्षा सिर्फ वधू की ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण नारी जाति की ओर से थी।
28 नवम्बर 1890 को महात्मा फुले रोगियों की सेवा करते हुये स्वयं रोगग्रस्त हो गये, जिस कारण उनकी मृत्यु हो गयी। अपने पति का अन्तिम संस्कार स्वयं सावित्री बाई ने उनकी चिता को मुखाग्नि देकर किया और इस प्रकार एक बार फिर ब्राह्मणवादी विचारों व पुरुषवादी वर्चस्व को चुनौती दी।
ज्योतिबा के देहान्त के बाद भी सावित्री कमजोर नहीं पड़ी बल्कि उन्होंने सत्यशोधक समाज की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर ले ली। 1893 में उन्होंने संस्था की बैठक की अध्यक्षता की। 1897 में पूना प्लेग की चपेट में आ गया। सावित्री अपनी संस्था व दत्तक पुत्र यशवंत के साथ रोगियों की सेवा में जुट गई। दुर्भाग्यवश वे स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गयी और 10 मार्च 1897 को उनका देहान्त हो गया।
सावित्री बाई फुले का सम्पूर्ण जीवन संघर्षमय रहा। उन्होंने जीवनभर वर्चस्ववादी सिद्धान्त, ब्राह्मणवादी विचारों, मूल्यों, परम्पराओं व कर्मकाण्ड के खिलाफ स्त्री समानता व शिक्षा का परचम उठाये रखा। अपने प्रत्येेक कार्य से उन्होंने उन रूढ़िवादी मान्यताओं को ध्वस्त करने का कार्य किया, जिन्होंने स्त्रियों को दासता की बेड़ियों में जकड़ रखा था। इस सबसे एक कदम और आगे बढ़कर उन्होंने भारत में स्त्री शिक्षा का दीप जलाया और आजीवन उसे बुझने नहीं दिया। उनका पूरा जीवन समाज के दबे-कुचले तबके, वंचितों व खासकर महिलाओं, दलितों के अधिकारों के लिये संघर्ष करते हुये बीता।
उनकी एक प्रसिद्ध कविता जिसमें वे सबको पढ़ने-लिखने की प्रेरणा तथा जातिगत बन्धनों को तोड़ने की बात कहती हैं, इस प्रकार है-
जाओ, जाकर पढ़ो-लिखो
बनो आत्मनिर्भर बनो मेहनती
काम करो और ज्ञान इकट्ठा करो,
ज्ञान के बिना सब खो जाता है।
ज्ञान बिना हम जानवर बन जाते हैं।
इसलिए न बैठो खाली
जाओ, जाकर शिक्षा लो
दमितों और त्याग दिये गये दुःखों का अन्त करो।
तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है।
इसलिये सीखो कि जाति के बन्धन तोड़ दो
ब्राह्मणों के ग्रन्थ जल्दी से जल्दी फेंक दो।
आज सावित्री बाई के जीवन से हमारे समाज को प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। जो सपना उन्होंने, आज से लगभग 150 वर्ष पहले देखा क्या आज वो पूरा हो गया है? वास्तविकता यह है कि आज भी भारत में 41.3 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 19 वर्ष से कम आयु में ही हो जाता है। आज भी 58 प्रतिशत महिलायें ऐसी हैं जो कभी विद्यालय नहीं गयीं। सही मायनों में कहा जाये तो सावित्री बाई फुले का सपना अभी भी दूर की ही कौड़ी है और इसे यह पूंजीवादी व्यवस्था पूरा भी नहीं कर सकती।


भारत की एक महान शिक्षिका
ReplyDeleteसावित्री तेरे सपनों को हम मंजिल तक पहुंचाएंगे।
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