भगत सिंह को याद करो! फासीवादी ताकतों के खिलाफ संघर्ष तेज करो!!
साथियो, इस 28 सितम्बर को शहीद-ए-आजम भगत सिंह का 111वां जन्म दिवस है। भगत सिंह और उनके साथियों ने देशी-विदेशी शासकों से आजाद कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। भगत सिंह का सपना भूख-गरीबी-शोषण मुक्त समाजवादी भारत का सपना था। जिससे देशी-विदेशी दोनों ही शासक खौफ खाते थे। इसलिए अंग्रेजों ने उनके शरीर को फांसी पर लटकाया तो मरने के बाद आजाद भारत के शासकों ने उनके सपनों-विचारों की हत्या की। परंतु आज भी भूख-गरीबी-शोषण की मार सहता हुआ भारत हम नौजवानों से उन सपनों को पूरा करने की मांग कर रहा है।
जहां तक हम छात्र-नौजवानों की बात है। आजाद भारत की सरकारों ने हमेशा हमें ठगा ही है। हमारे भीतर मौजूद असीम ऊर्जा- बेहतर शिक्षा, रोजगार के अभाव में- निरंतर ही दम तोड़ती रही है। एक सुंदर भविष्य का सपना निरंतर ही हमें सोने नहीं देता है। हमारे सपनों को सरकारों द्वारा देशी-विदेशी पूंजीपतियों की तिजोरी में गिरवी रखा जा चुका है। शिक्षा संस्थानों को दुकानों में तब्दील करने की प्रक्रिया बहुत पहले से ही शुरु की जा चुकी है और अब ‘अच्छे दिनों’ का नारा देने वाली सरकार इसे अपनी परिणिति तक पहुंचा रही है।
शिक्षा बजट में कटौती, सीट कट, स्वायत्ता, आदि-आदि तरीकों से मोदी सरकार द्वारा शिक्षा को निजी हाथों में देने की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। मोदी सरकार द्वारा देश के 62 शिक्षा संस्थानों को ‘स्वायत्त’ का तमगा देकर निजीकरण की दिशा में धकेल दिया गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के भी 6 कॉलेजों को ‘स्वायत्त’ करने का दबाव सरकार द्वारा बनाया जा रहा है। इसके बाद से ये संस्थान छात्रों से मनमर्जी फीस वसूलने के लिए आजाद होंगे। जिसकी सबसे अधिक मार गरीब-निम्न वर्गीय परिवारों से आने वाले छात्रों पर पड़नी तय है। एक-एक करके हम और हमारी आने वाली पीढ़ी इन संस्थानों से बाहर कर दी जाएगी।
शिक्षा-रोजगार से लेकर हर मोर्चे पर विफल ये सरकार अंग्रेजों की तरह ही बांटों और राज करो की नीति पर चल रही है। देश को आजाद कराने में हिन्दू-मुस्लिम सभी ने अपना योगदान दिया था। अशफाक-बिस्मिल ने एक साथ फांसी के फंदे को चूमा था। परंतु पिछले 4 सालों में देश को हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर लड़ाने के प्रयास तेज हुए हैं। जगह-जगह गौहत्या का भ्रम फैलाकर मुस्लिमों की हत्याएं की जा रही है। सरकार बेशर्मी के साथ खड़े होकर हत्याओं को प्रोत्साहित कर रही है। मुस्लिमों के अलावा दलितों, आदिवासियों, महिलाओं पर भी हमलों की बाढ़ सी आ गयी है।
इन सब हमलों के जवाब में सिर उठाने वाली हर आवाज को फासीवादी सरकार द्वारा बेरहमी से कुचला जा रहा है। विश्वविद्यालय के छात्रों को देशद्रोही घोषित कर उन पर हमले किये जा रहे हैं। यही नहीं सवाल पूछना, सोचना, सच के हक में आवाज उठाना, सरकार द्वारा गुनाह घोषित किया जा चुका है। पिछले चार सालों में शायद ही कोई संस्थान बचा हो जो संघ मण्डली के हमलों का गवाह न बना हो।
आजादी के आन्दोलन में भगत सिंह और उनके साथियों को भी साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ना पड़ रहा था, उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)-भाजपा जैसी साम्प्रदायिक-फासीवादी ताकतों को जवाब देते हुए उन्होंने लिखा था- ‘‘लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है। गरीब-मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इन हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वो किसी भी जाति, रंग, धर्म, राष्ट्र के हों अधिकार एक ही हैं।’’
आज जब संकटग्रस्त पूंजीवादी व्यवस्था अपने बचाव के लिए फासीवादी ताकतों को आगे बढ़ा रही है तो भगत सिंह का रास्ता आज पहले के समयों की तुलना में कई अधिक प्रासंगिक हो चुका है। और वो रास्ता सुधार व अवसरवाद के बरक्स क्रांति का रास्ता है। आइए हम छात्र-नौजवान भगत सिंह के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए भूख-गरीबी-शोषण से मुक्त एक समाजवादी भारत के निर्माण का संकल्प लें।

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