“मी टू'' अभियान में इन दिन कई भारतीय हस्तियां बेनकाब हो रही है। फ़िल्मी कलाकारों से लेकर राजनेता आदि कई चर्चित नामो का खुलासा बीते दिनों में हुए। समाज ने एक बहस “मी टू" को लेकर चल रही है। इस पूरे मामले को छात्र-नौजवानों को कैसे देखना चाहिए इसे समझने के लिए नागरिक समाचार पत्र में छपा यह लेख बहुत उपयोगी है।
सड़ते-गलते पूंजीवादी समाज की एक ऐसी सच्चाई जिसे हर सामान्य, हर मजदूर-मेहनतकश स्त्री अपने रोज के अनुभव से जानती है, वह है उसके साथ होने वाला यौन दुर्व्यवहार। यह यौन दुर्व्यवहार सामान्य छेड़छाड़, फब्तियां कसने से लेकर वीभत्स गैंग रेप से आगे हत्या तक जाता है।
पिछले कुछ महीनों से एक हैशटेग ‘‘#Metoo’’या ‘‘मैं भी’’ काफी अखबारी सुर्खियां बटोर रहा है। ‘‘मी टू’’ या ‘‘मैं भी’’ आंदोलन तब चर्चा का विषय बना जब स.रा. अमेरिका की फिल्म इण्डस्ट्री हालीवुड के एक फिल्म निर्माता हार्वी वाइनस्टीन के खिलाफ एक मशहूर अभिनेत्री अल्पासा मिलानो ने मोर्चा खोला था। उसके बाद हार्वी से उत्पीड़ित कई मशहूर अभिनेत्रियों ने ‘मी टू’ के जरिये अपने बुरे और वीभत्स अनुभव साझा किये। इनमें सलमा हायेक, एंजेलीना जोली, रोज मैक गोवन, ग्वेनेथ पाल्ट्रो आदि शामिल थीं। इसके बाद एक के बाद एक सैकड़ों खुलासे हुए। कुछ भारतीय अभिनेत्रियों ने भी अपने साथ ऐसे ही अनुभवों की बातें कहीं।
असल में ‘‘मी टू’’ नया नहीं है। यह 1998 से एक महिला पत्रकार तराना ब्रुके के द्वारा चलाया जा रहा है। इसकी वेबसाइट के अनुसार अब तक एक करोड़ सत्तर लाख महिलाओं ने अपने साथ हुए यौन दुर्व्यवहार की बातें साझा की हैं।
‘‘मी टू’’ आंदोलन ने गति तब पकड़ी जब मशहूर महिला हस्तियों ने कुछ साहस का परिचय देते हुए अति प्रभावशाली रसूखदार हस्तियों के खिलाफ मोर्चा खोला। इनमें सबसे ऊपर यदि कोई है तो वह स्वयं स.रा. अमेरिका के एक पूर्व और एक वर्तमान राष्ट्रपति हैं। बिल क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रम्प। एक डेमोक्रेट और दूसरा रिपब्लिकन।
‘‘मी टू’’ की यही बात खास है कि यह सत्ताधारी वर्ग की ढंकी-छिपी सच्चाई को बाहर लाता है। यहां उत्पीड़क और उत्पीड़ित दोनों ही पूंजीपति वर्ग के सदस्य हैं। उत्पीड़क अपनी कुत्सित यौन इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है। वह राष्ट्रपति होकर एक स्त्री के मान, गरिमा, इच्छा किसी से भी खेल सकता है। और जिससे खेला जा रहा हो वह अपने को इसके लिए चाहे-अनचाहे पेश करती है। चुप रहती है क्योंकि चुप रहने से उस वक्त लाभ है। उसके कैरियर को सहारा मिल सकता है। उसे सफलता मिल सकती है। दौलत, शौहरत, ग्लैमर के साथ सेलीब्रेटी बनने का मौका मिल सकता है। यह उस समय कैरियर के लिए किया जाने वाला अति आवश्यक समझौता (कम्प्रोमाइज) बन जाता है।
हर कोई जानता है कि ऐसा होता है। जो कर रहा है वह तो मजे ले रहा है। जिसके साथ हो रहा है वह मानता है यह एक कम्प्रोमाइज है। एक वक्ती चीज है।
जब शासक वर्ग के मशहूर लोगों के बारे में ऐसे खुलासे हो रहे हैं तो क्या समझा जाए।
सबसे पहली बात तो यही है ‘देर आयद दुरस्त आयद’ की कहावत की तर्ज पर ये महिलायें जो खुलासे कर रही हैं, वे जाने-अनजाने सड़ते-गलते पूंजीवादी समाज की गंदगी को उजागर कर अच्छा ही काम कर रही हैं। बस वे ये काम देर से कर रही है और आधा अधूरा कर रही हैं। तब कर रही हैं जब अब उन्हें समझौते की उतनी जरूरत नहीं रही।
सच्चाई पेश होने से ऊपरी समाज में थोड़ी हलचल, सनसनी जरूर फैली है। इसने चटाखेदार खबरों के सिलसिले को भी पेश किया है और कईयों के लिए पैसा बनाने का जरिया भी बन गया है।
‘‘मी टू’’ आंदोलन की कई सीमाएं हैं। सबसे पहले तो यह महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न की सामाजिक जमीन को नहीं तलाशता। यह पूंजीवादी समाज की सड़न-गलन को धिक्कार कर उसे बदलने की बात नहीं करता। यह बेहद व्यक्तिपरक ढंग से चलता है और एक तरह से खुलासों का सिलसिला बन जाता है। कुछ दिनों में इसमें एक ठहराव आना लाजिमी है। सनसनी तभी फैलेगी जब कोई ऐसा शख्स सामने आये जो पहले की सच्ची कहानियों के शख्सों से ज्यादा बड़ा मशहूर हो और यही बात उत्पीड़ित पर भी लागू होती है।
‘‘मी टू’’ को टाइम मैगजीन ने ‘पर्सन आफ द ईयर’ घोषित किया। इसका मतलब यह है कि पूंजीवादी समाज के कर्ता-धर्ताओं ने इसको मान्यता देकर अपने समाज को सुधारने की बड़ी और आवश्यक कार्यवाही माना है। यानी एक सड़ते-गलते समाज को सुधारने की कोशिश। इस तरह ‘‘मी टू’’ एक सुधारवादी आंदोलन है। इसका मतलब यह हुआ कि पूंजीवादी समाज वैसे तो ठीक है पर कुछ गड़बड़ लोग इसमें गलत हैं। यदि उनका खुलासा हो जाए; वे दण्डित हो जायें; कुछ कानून-वानून बन जायें; कुछ ‘बहादुर’ महिलायें आगे आ जायें तो यह समाज और ठीक हो जाये। निजी सम्पत्ति, मुनाफे पर चलने वाली व्यवस्था को यह लम्बी उम्र देने की कवायद है।
‘‘मी टू’’ पश्चिमी पूंजीवादी खासकर साम्राज्यवादी देशों में शासक वर्गीय या मध्यमवर्गीय हलकों में चलने वाले कई नारीवादी-सुधारवादी आंदोलनों की ही एक कड़ी है। ‘‘स्लट मूवमेंट’’(बेशर्मी आंदोलन), ‘‘बेयर चेस्ट मूवमेंट’’, ‘‘बेड टच मूवमेंट’’, ‘‘सैनिटरी नैपकिन’’ आदि, आदि तरह के अभियान, कार्यवाहियां, प्रदर्शन हाल के सालों में सामने आते रहे हैं। इनकी आम प्रवृत्ति महिलाओं के साथ होने वाल यौन उत्पीड़न तक ही महिला मुद्दे को सीमित करने की रही है।
इनका एक ही सकारात्मक पहलू यह है कि ये पूंजीवादी समाज में महिलाओं के साथ होने वाली यौन गैर बराबरी को उजागर करते हैं। वीभत्स सच्चाई को सामने लाते हैं। पाखण्ड, झूठे आचरण, ढंकी-छुपी गंदगी बाहर आ जाती है। फैशन परस्त नारीवादी आंदोलन भी इस मामले में कुछ काम तो कर ही जाता है। इनमें से कोई भी वह सवाल उठाने से बचता है जो महिलाओं के साथ होने वाली यौन गैर बराबरी के मूल में है। इस तरह ये महिलाओं की मुक्ति की लड़ाई में ढेर सारे भ्रमों को जन्म देता है। यह उन्हें उलझा कर रखता है। सच्चाई की गहरी छानबीन और उससे निकलने वाली आवश्यक कार्यवाही इंकलाब की ओर जाने से रोक देता है। यह इस नारीवादी निष्कर्ष तक सीमित कर देता है कि सारे मर्द एक जैसे होते हैं और इस तरह पूंजीवादी समाज को बदलने के काम को तिलांजलि दे देता है।

Good article
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