26 जनवरी जिस दिन भारतीय शासक वर्ग अपने महान गणतंत्र का जश्न मनाता है और आजादी, समानता का ढोल पीटता है। उसी दिन भारतीय शासक वर्ग और भारतीय पूंजीपति अपने गणतंत्र, जनवादी अधिकारों की महानता का बखान करते नहीं थकता। ठीक उसी दिन 26 जनवरी को उधम सिंह नगर (उत्तराखण्ड) की पुलिस कायराना तरीके से इंकलाबी मजदूर केन्द्र के अध्यक्ष कैलाश भट्ट को गिरफ्तार कर लेती है।
सिडकुल रूद्रपुर में मजदूर अधिकारों के हनन, ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकार की खुलेआम धज्जियां उड़ाने व मजदूरों की गैरकानूनी गेटबंदी के खिलाफ 26 जनवरी को एक सभा का आयोजन किया गया था। सभा को न होने देने की भरपूर कोशिश उधम सिंह नगर पुलिस ने की लेकिन वे मजदूरों के तेवरों के आगे बेबश साबित हुए। इसकी खार उन्होंने कैलाश भट्ट को गिरफ्तार कर निकाली। गिरफ्तार करने के बाद ‘मित्रता, सेवा, सुरक्षा’ का परिचय देते हुए उधम सिंह नगर की पुलिस किसी को कुछ नहीं बताती। बहुत पता करने के बाद भी वह इंकलाबी मजदूर केन्द्र के कार्यकर्ताओं और सिडकुल के मजदूरों को गुमराह करती रहती है। और अंत में जाकर जब उसे मजदूरों के आक्रोश फूट पड़ने की आशंका लगती है तो पुलिस खुद आकर बताती है कि इंकलाबी मजदूर केन्द्र के अध्यक्ष कैलाश भट्ट को किच्छा पुलिस ने गिरफ्तार किया है और वे किच्छा कोतवाली में हैं।
ज्ञात हो कि कुछ दिनों पहले ही इंटरार्क कंपनी के मजदूरों ने अपने जुझारू संघर्ष के दम पर इंटरार्क प्रबंधन, उसकी सुरक्षा में लगे श्रम विभाग व उधम सिंह नगर प्रशासन और उत्तराखण्ड सरकार को झुकाते हुए जीत हासिल की है। कई महीने तक चले लंबे संघर्ष के बाद मजदूरों की जीत हुयी। इस पूरे संघर्ष में इंकलाबी मजदूर केन्द्र और इंकलाबी मजदूर केन्द्र के अध्यक्ष कैलाश भट्ट की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आंदोलन के हर मोड़ पर कैलाश भट्ट ने मजदूरों और उनकी यूनियन को सलाह-मशवरा दिया। आंदोलन को नेतृत्व देने और शासन-प्रशासन-मैनेजमेंट को झुकाने में इंकलाबी मजदूर केन्द्र सहित कैलाश भट्ट की महती भूमिका रही है। इस सब से उत्तराखण्ड शासन-प्रशासन और उधम सिंह नगर की पुलिस खिसयायी हुयी थी। इसी संघर्ष के दौरान कायराना तरीके से पुलिस ने कई नेतृत्वकारी मजदूरों सहित कैलाश भट्ट पर फर्जी मुकदमे थोप दिये थे। जिसमें मजदूरों को जेल जाना पड़ा था। इसी फर्जी मामले का हवाला देकर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया।
सिडकुल रूद्रपुर (उधम सिंह नगर) में यह आम बात है। किसी भी आंदोलन को नेतृत्व दे रहे मजदूरों और खासकर इंकलाबी मजदूर केन्द्र के कार्यकर्ताओं को फर्जी तरीके से झूठे मुकदमों में फंसाने की परिघटना आम है। इसी तरह कैलाश भट्ट पर कई गंभीर धाराओं में पूर्व में भी फर्जी मुकदमें दर्ज हुए है और महीनों तक कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा है। मजदूरों के आंदोलनों का पूर्णतयः दमन न कर पाने या अपने मन माफिक परिणाम न हासिल कर पाने की खार पुलिस-प्रशासन इसी तरह निकालते रहा है। यह पूंजीपतियों और शासन-प्रशासन के घृणित गठजोड़ का एक उदाहरण है।
परिवर्तनकामी छात्र संगठन पुलिस-प्रशासन व उत्तराखंड सरकार की इस कायराना हरकत की पुरजोर मुखालफत करता है। और मांग करता है कि इंकलाबी मजदूर केन्द्र के अध्यक्ष को तत्काल रिहा किया जाय और उन पर व अन्य मजदूरों पर थोपे गये फर्जी मुकदमे वापिस लिये जायें।


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