गुजरात अंबुजा सिडकुल मजदूर अपनी जायज मांगों को लेकर पिछले माह 28 जनवरी से संघर्षरत हैं। यह कंपनी उत्तराखंड राज्य के ऊधम सिंह नगर जिले के एक औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल सितारगंज में स्थित है। कंपनी मक्के से स्टार्च का निर्माण करती है और उसे अन्य कंपनियों को सप्लाई करती है। इसी से शहद, होरलिक्स, आदि खाद्य पदार्थों का निर्माण होता है। कंपनी मालिक के साथ उत्तराखंड सरकार मजदूरों की मांगों को नहीं सुन रही है। उत्तराखंड सरकार भी पूजीपतियों के साथ खड़ी है और हर संभव तरीके से आंदोलन का दमन करने में लगी है। परिवर्तनकामी छात्र संगठन गुजरात अंबुजा के मजदूरों के साथ अपनी एकजुटता जाहिर करते हुए उत्तराखंड सरकार से मांग करता है कि वह अपनी मजदूर विरोधी दमनकारी नीतियों को छोड़ते हुए मजदूरों की मांगों को जल्द से जल्द पूरा करे।
पिछले 4 सप्ताह से गुजरात अंबुजा के मजदूर हड़ताल पर हैं। मजदूरों का 2 वर्षों से वेतन समझौता नहीं हुआ है। और ना ही मांग पत्र पर सुनवाई की जा रही है। मजदूरों को ईएसआई एंव ईपीएफ की सुविधा भी को नहीं दी जा रही है। बोनस एक्ट में 7000 का प्रावधान है पर मजदूरों को 200 से 300 रुपए ही दिये गये। कई तरह की अनियमितताओं व श्रम कानूनों को लागू न करने के विरोध में यूनियन द्वारा विगत कई माह से काला फीता बांधना, चैस्ट कार्ड लगाना आदि तरीके से विरोध दर्ज किया गया। परंतु मैनेजमेंट की कानों में जूं तक नहीं रेंगी। 8 जनवरी 2020 को पूर्व हड़ताल का नोटिस दिया गया। एम.डी. की अपील पर 27 जनवरी तक हड़ताल स्थगित कर आगे बढ़ाया गया। उसके बाद भी कुछ सुनवाई न होता देख मजदूरों के सब्र का बांध टूट गया और 28 जनवरी को जनरल ए व बी शिफ्ट के मजदूर कंपनी के भीतर हड़ताल पर चले गये। महिलाएं और नाइट शिफ्ट के मजदूर कंपनी गेट के बाहर बैठ गये। 24 घंटे तक प्रबंधक व स्टाफ को बंधक बनाए रखा। हड़ताल के साथ ही पुलिस व पीएसी कंपनी में तैनात कर दी गई।
महिलाओं और मजदूरों का भयंकर दमन- 29 जनवरी को एडीएम की मध्यस्थता में हुई वार्ता में इंटरार्क कंपनी के मजदूरों के आंदोलन का हवाला देते हुए मजदूरों को डराया धमकाया गया। साथ ही वह वार्ता भी विफल रही। 30 जनवरी को मजदूरों और महिलाओं का भयंकर दमन कर 200 से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। महिलाओं को शक्तिफार्म थाने, मजदूरों को अलग-अलग थानों पर रखा गया। पुलिस ने 11 मजदूर नेताओं पर कंपनी में तोड़फोड़ करने, नुकसान पहुंचाने आदि संगीन धाराओं में मुकदमे लगा दिये। शक्तिफार्म पुलिस ने जब महिलाओं को घर जाने के लिए कहा तो महिलाएं अपने मजदूर साथियों को रिहा करने पर अड़ गयीं। वही नानकमत्ता में जब पुलिस गिरफ्तार मजदूर नेताओं को अलग गाड़ी में बैठाकर जेल ले जाने की तैयारी करने लगी। ऐसा कर पुलिस मजदूरों को उनके नेताओं से अलग कर आंदोलन को तोड़ना चाह रही थी। परंतु मजदूरों ने पुलिस की इस चाल का सफल नहीं होने दिया। आक्रोशित मजदूर गाड़ी के आगे लेट गये और मजदूर नेताओं के साथ जेल जाने के लिए कहने लगे। संघर्षरत मजदूरों की एकता व हौसले के आगे पुलिस को झुकना पड़ा और मजदूर नेताओं को अलग गाड़ी से उतारा तो मजदूरों ने चारों ओर से उन्हें घेर लिया।
जब 5 हिम्मती महिलाओं ने जाम लगा दिया- 30 जनवरी के दिन जब पुलिस आंदोलन का दमन करने पर आमादा थी तो 5 महिलाओं को जब मजदूरों की गिरफ्तारी की खबर पहुंची तो वह आक्रोशित हो उठीं। छोटे-छोटे छोटे बच्चों के साथ सितारगंज के मुख्य चैराहे नकुलिया चैराहे पर बैठकर जाम लगा दिया। इन 5 महिलाओं के तेवरों को देखते हुए मुहल्ले के लोग और मजदूर सहित लगभग 500-600 लोगों ने पूरा चैराहा घेर लिया। इतने लोगों के इकट्ठा होने से प्रशासन के हाथ पांव फूल गये। वह दमन करने को आगे आया तो महिलाओं ने बच्चों को गोद में पकड़ लिया और बहादुरी से पुलिस का सामना करते हुए बलप्रयोग को ललकारती रही। बढ़ती भीड़ व महिलाओं की हिम्मत देख पुलिस को सभी मजदूरों सहित महिलाओं को रिहा करना पड़ा।
महिलाओं-मजदूरों व न्याय प्रिय जनता की एकता- गुजरात अंबुजा के मजदूरों-महिलाओं की एकता काफी मजबूत रही है। इसके बाद सिडकुल सितारगंज व शहर में मजदूर संयुक्त मोर्चा सितारगंज के बैनर तले सभा-प्रदर्शन किये गये। सिडकुल रुद्रपुर में भी मजदूर संयुक्त मोर्चा के बैनर तले प्रदर्शन, डी.एल.सी. का घेराव आदि कार्यक्रम मजदूरों ने किये। महिलाएं धरना-प्रदर्शन के साथ-साथ अपना घर भी सभाल रही हैं और एक दूसरे का सहयोग भी कर रही हैं। महिलाओं ने स्थानीय भाजपा विधायक के नाम खुला पत्र जारी किया है। जिसको वह सितारगंज शहर व कंपनी के आस-पास बांट रही हैं। साथ में आंदोलन के लिए आर्थिक सहयोग व समर्थन मांग रही हैं। जनता भी खुले मन से उनका सहयोग-सर्मथन कर रही है। सिडकुल सितारगंज के अलग-अलग कंपनी के मजदूर व यूनियनें भी उनका सहयोग और समर्थन कर रहे हैं और मजबूती से संघर्षरत मजदूरों के साथ खड़े हैं। आज इस चीज की बहुत जरूरत है कि अगर एक फैक्टरी के मजदूर संघर्ष कर रहे हैं तो अन्य फैक्टरियों के मजदूर उनका सहयोग समर्थन करें। इससे एकता और शक्ति मजबूत होती है और इसी एकता और शक्ति के बल पर मालिकों-प्रबंधकों से अपना हक छीना जा सकता है।
मांगें पूरी न होता देख 20 फरवरी से महिलाएं विधायक आवास पर अनशन पर बैठ गयी हैं। वहीं दूसरी ओर कंपनी प्लांट हेड अपने आपको आर.एस.एस. का आदमी बताता रहा व मोहन भागवत से गहरा संबंध की बात कर मजदूरों को धमका रहा था। वह भी महिलाओं के खुले पत्र से इतना घबराया कि उसने अपनी बेटियों को कंपनी के मजदूरों के खिलाफ आस-पास के इलाकों में प्रचार के लिए उतार दिया।
भाईचारे और सामुहिक हितों की मिसाल- संघर्षरत गुजरात अंबुजा के मजदूर पूरे समर्पण और सामुहिक हित के लिए लड़ी जा रही इस लड़ाई में मिसाल पेश कर रहे हैं। स्थायी मजदूरों ने अस्थाई मजदूरों को स्थाई करने की मांग को मुख्य मांग के रूप में उठाया है। अस्थाई मजदूरों को बरगलाने और अपने पाले में करने के प्रबंधक के हर हथकंडे पर प्रबंधक को मुंह की खानी पड़ी है। लाख कोशिशों के बाद भी प्रबंधक स्थाई-अस्थाई का भेद पैदा करने, लालच देकर भी मजदूरों को आपस में नहीं बांट पा रहा है। अस्थाई मजदूर भी पूरे दम-खम के साथ स्थाई मजदूरों के साथ खड़े हैं। सामुहिक हित के लिए मजदूर अपने निजी और पारिवारिक कामों को भी छोड़ दे रहे हैं। अपने भाई की शादी और भांजे की शादी जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर भी मजदूर आंदोलन स्थल पर जमे रहे ताकि एकजुटता और ताकत को बरकरार रखा जाय। एक-दूसरे के दुख-परेशानी में भी आंदोलन की तरह ही कंधे से कंधा मिलाकर साथ-साथ चल रहे हैं। सच में मजदूरों-मेहनतकशों का ऐसा भाईचारा ही उनकी सच्ची पहचान है। और यही भाईचारा जब भविष्य में और व्यापक और मजबूत होगा तो ऐसा कोई संघर्ष नहीं होगा जिसे मजदूर-मेहनतकश न जीत सकें।
इस सबके बाद एक बात साफ हो गई है कि राज्य सरकारें व केंद्र सरकार श्रम कानूनों का पालन करवाने की जगह कंपनी मालिकों के साथ सांठ-गांठ कर रही हैं। स्थाई नौकरी को समाप्त कर समान काम का समान वेतन भी नहीं दे रही है। उत्तराखंड के औद्योगिक केंद्रों में श्रम कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही है। आज मजदूरों पर हमले इस कदर बढ़ गये हैं कि श्रम कानूनों को बदलकर मजदूरों के खिलाफ करने की साजिशें परवान चढ़ रही हैं। श्रम कानूनों को बदलकर मजदूर विरोधी बनाया जा रहा है। पूंजीपतियों की इस खुली लूट के सामने सरकारें आंखे मूंदें बेठी हैं। प्रशासन, श्रम विभाग, पुलिस और जन प्रतिनिधियों ने अपने आंख और कान इस कदर बंद किये हैं कि वे मजदूरों और उनके बच्चों की चित्कार भी नहीं सुन-देख रहे है। शांतिपूर्वक और अपने हक की लड़ाई में पूरा तंत्र उनके खिलाफ है। हैरान-परेशान मजदूर अपनी छोटी-छोटी जनवादी मांगों को मनवाने के लिए भी सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
परिवर्तनकामी छात्र संगठन के कार्यकर्ताओ ने भी समय समय पर मजदूरों के इस जूझरु आंदोलन में हिस्सा लिया। छात्र मजदूर एकता की मिसाल को आगे बढ़ाया। पछास के साथियों द्वारा मजदूरों की सभा मे गीत गाये, क्रांतिकारी गीतों से आंदोलन को और बल मिला ओर अपने संघर्ष को और मजबूती से लड़ने की प्रेणना मिली। मजदूरों की सभा को सम्बोधित करते हुए पछास के साथियों ने कहा कि हम छात्रों मजदूरों को मिलकर संघर्ष करना होगा क्योंकि इस पूँजीवादी व्यवस्था में छात्र मजदूर सहित सभी पीड़ित है। यह लड़ाई सारे उत्पीड़ितों की लड़ाई है सारे उत्पीड़कों के खिलाफ।
परिवर्तनकामी छात्र संगठन सरकार से मांग करता है कि गुजरात अंबुजा सहित सभी मजदूर आंदोलनों की न्याय पूर्ण मांगों को जल्द से जल्द पूरा करें। साथ ही छात्रों-नौजवानों व न्याय प्रिय जनता से अपील करता है कि गुजरात अंबुजा के मजदूरों का साथ देते हुए उत्तराखंड सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों का मुकम्मल जवाब दें।
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)




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