5 March 2020

दिल्ली सुनियोजित हमलों द्वारा शाहीन बाग आंदोलन को कुचलने की संघी कोशिश को ध्वस्त करो

अपने जन्म से ही संघ व संघ जैसे दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा जनता के बीच मुस्लिमों की कट्टरता, क्रूरता को लेकर एक से बढ़कर एक झूठ फैलाए गए हैं। CAA, NRC/NPR विरोधी आंदोलन की शुरूआत में राज्य द्वारा प्रायोजित हिंसा को भी वो मुस्लिमों द्वारा की गयी हिसा के रूप में प्रचारित करने में सफल रहे। परंतु उसके बाद पैदा हुए शाहीन बाग आंदोलन ने उसे बैकफुट पर धकेल दिया।

भारत के इतिहास में ये एक नए तरीके का आंदोलन था। जिसमें मुस्लिम महिलाओं (जिन्हें सबसे पिछड़ा हुआ माना जाता था) ने भारी संख्या में भागीदारी की। बात केवल भागीदारी तक नहीं रही अधिकांश जगहों पर मुस्लिम महिलाओं ने इस आंदोलन का नेतृत्व भी किया। पूरे आंदोलन का स्वरूप अहिंसावादी और धर्मनिरपेक्ष बनाकर रखा गया। सभी धर्मो के लोगों को इस आंदोलन से जोड़ने की कोशिश की गयी। पुराने नेतृत्व को नकारते हुए लगभग सभी जगह नए नेतृत्व ने आंदोलन की कमान संभाली। सदियों से जिनसे बोलने का हक छीन लिया गया था वो स्टेज पर चढ़कर घंटो भाषण देने लगे। यही नही बाहर से भागीदारी करने वाले प्रगतिशील संगठनों द्वारा भी इस आंदोलन की चेतना को आगे बढ़ाने का काम किया गया। 

इस आंदोलन ने भारत के अल्पसंख्यक समुदाय की चेतना को एक झटके में कई गुना आगे बढ़ा दिया। भले ही ये आंदोलन काले कानून के विरोध से शुरू हुआ हो पंरतु इसके केन्द्र में फासीवादी हमलों के खिलाफ पैदा हुआ गुस्सा था। जैसे-जैसे ये आंदोलन आगे बढ़ रहा था वैसे-वैसे समाज के अन्य हिस्सों में भी ये अपनी जगह बनाता जा रहा था।

इन्हीं सब बातों से संघी गिरोह इस आंदोलन से डरा हुआ था। उसने साम-दाम-दण्ड-भेद हर तरीके से आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया पंरतु सफलता हाथ न लगी। तमाम दुष्प्रचार, दमन, अदालती हस्तक्षेप के जरिए भी जब आंदोलन शांत न हुआ तो संघियों ने इसे रक्त में डुबोना चाहा। दिल्ली में सरकारी तंत्र और भगवा गुण्डों के जरिए CAA विरोधी आंदोलनकारियों पर हमले करवाए गए और इन्हें दंगो का नाम दे दिया गया। गोदी मीडिया द्वारा अल्पसंख्यकों को ही इन हमलों का जिम्मेदार ठहरा दिया गया। जगह-जगह शाहीन बाग के समर्थन में खड़े हुए आंदोलनों को कुचल दिया गया। और इन सबके जरिए भारतीय अल्पसंख्यकों में एक बार फिर भय का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है।

इन सब परिस्थितियों में आंदोलन दो दिशाओं में जा सकता है। पहला तो संघी गिरोह द्वारा किए गए दमन के माहौल में अदालत या अन्य तरीकों से आंदोलन को खत्म करवा दिया जाए। दूसरा एक झटका खाने के बाद नए ताप तैवर से आंदोलन फिर आगे बढ़े। हमें दूसरी परिस्थिति को अंजाम देने की भरसक कोशिश करनी चाहिए। 

दिल्ली में जिन जगहों पर आंदोलन खत्म किया गया है यदि उनमें से एक भी जगह फिर से आंदोलन शुरू हो जाए तो संघी गिरोह द्वारा फैलाएं गए डर के माहौल को तोड़ा जा सकता है। यही नही भय के माहौल में कमजोर पड़ रहे शाहीन बाग के मुख्य आंदोलन को मजबूत करने की कोशिशें भी हम सभी साथियों को करनी चाहिए। इसके लिए दिल्ली के सभी मजदूर-महिला-छात्र संगठनों को 8 मार्च व अन्य दिवसों पर शाहीन बाग आंदोलन में शामिल होने की अपील आम जनता से करनी चाहिए। अभी भी इस आंदोलन में संघी गिरोह को बेनकाब करने की सार्थकता मौजूद है। सभी प्रगतिशील ताकतों को इसे अंजाम तक पहूचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देना चाहिए। 

इसके साथ-साथ दिल्ली व अन्य जगह हमले कराने की संघी साजिशों को रोकने के लिए हमें इनके द्वारा फैलाये जा रहे झूठ का भंडाफोड़ करते हुए जगह-जगह अमन कमेटियां बनाने की कोशिश भी करनी चाहिए। हर बस्ती और कॉलोनी में जहाँ तक संभव हो अमन कमेटियां स्थापित करने का कठीन काम भी हमें हाथों में लेना होगा। आइए इन प्रयासों के साथ आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कमर कसें।

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