18 June 2020

अभिनेता सुशांत का यों चले जाना क्या बताता है...

14 जून को हिंदी सिनेमा जगत के अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के आत्महत्या की खबर आई। काई पो चे, ब्योमकेश बख्शी, पीके, छिछोरे, सोनचिड़िया, आदि फिल्मों में अपने अभिनय के लिए सुशांत जाने गए।


उनकी आत्महत्या के बाद फिल्म जगत में ऊंचा उठने और ऊंचा उठने के लिए होने वाले छल-प्रपंच (प्रतियोगिता) पर चर्चाएं जोरों पर हैं। साथ ही रुपहली दिखने वाली फिल्मी दुनिया में एकांगीपन भी सामने आया।

सुशांत को विगत 6 माह से अवसाद (डिप्रेशन) से पीड़ित बताया जा रहा है। उनके तनाव के कारणों को ठीक ही उनके पेशे की प्रतियोगिता, छल-कपट पिछड़ना आदि रूपों में और पारिवारिक सामाजिक संबंधों में देखा जा रहा है। ये वही प्रतियोगिता है जिसका पूंजीवाद में हर कहीं गुणगान किया जाता है। जिसके बारे में दावा किया जाता है कि प्रतियोगिता खत्म तो विकास खत्म। हत्याओं-लाशों के ढेर पर होता है पूंजी का विकास। कभी प्रतियोगिता में पिछड़ता छात्र, कभी प्रतियोगिता में पिछड़कर बेरोजगार, कभी नौकरी से हाथ धोकर मजदूर तो कभी बर्बाद फसल को देखकर पिछड़ता किसान आत्महत्या करते हैं और अगले दिन व्यवस्था पूरे जोर से शोर मचाती है- प्रतियोगिता करो। यह पूंजीवादी प्रतियोगिता ही एकांगीपन, अलगाव, अवसाद का स्रोत है। यहां तक कि इसने संबंधों में भी प्रेम-विश्वास की जगह स्वार्थ, जलन, प्रतियोगिता, आदि को ही पनपाया है। इन सब में पिसता व्यक्ति जीवन को तुच्छ समझने लगता है। और कई बार आत्महत्या तक का कदम उठा लेता है। और व्यवस्था का न्याय अगर व्यक्ति बच गया तो अपराधी हो जाता है। पर कभी भी व्यवस्था कठघरे में नहीं होती।

फ़िल्म जगत की क्रूर प्रतियोगिता को सुशांत की आत्महत्या से जोड़कर इसे 'प्लानिंग के साथ की गई हत्या' या 'बॉलीवुड द्वारा की गई हत्या' कहा जा रहा है। ठीक ही कहा जा रहा है। पर क्या यह प्रतियोगिता हमारे चारों ओर नहीं फैली है? बॉलीवुड में फिल्मों की कमाई या पुरस्कार मिलना कलाकार के करियर या भविष्य को तय करते हैं तो बाकी समाज में अन्य रूपों में। यह कटु और क्रूर प्रतियोगिता ही अवसाद या आत्महत्या के कारण बनते हैं। और व्यवस्था इनकी पोषक। किसानों, मजदूरों, छात्रों या बेरोजगारों के मामले में व्यवस्था की उदासीनता इसके मुख्य कारण होते हैं। तो समाज के ऊपरी हिस्सों में आपसी प्रतियोगिता।

सुशांत की मृत्यु के बाद फिल्म जगत से जुड़े लोग बॉलीवुड में होने वाली कटु प्रतियोगिता और भाई-भतीजावाद के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। यह सब सुशांत के जीते जी भी होना चाहिए था और सुशांत खुद भी संघर्ष की इस राह को चुनते तो अच्छा होता।

पर क्या अब उनके प्रशंसक या तथाकथित मित्र उस कटु प्रतियोगिता के खिलाफ वास्तव में लड़ेंगे। यह नहीं हो सकता कि सुशांत के तथाकथित मित्र या प्रशंसक फ़िल्म जगत की उस खूनी कटु प्रतियोगिता के खिलाफ तो बोलें पर व्यवस्था के खूनी चरित्र के खिलाफ कुछ न बोलें। सुशांत की आत्महत्या के कारणों पर बात करते हुए मजदूरों, किसानों, छात्रों- नौजवानों की आत्महत्या के कारणों पर न बोलें। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो सुशांत के साथ भी न्याय नहीं करेंगे।

आज आत्महत्या जैसी सामाजिक समस्या के खिलाफ बोला जाना पहले किसी भी समय से ज्यादा जरूरी हो गया है। कोरोना काल में सरकार द्वारा लगाया गये मनमाने लॉक डाउन ने पहले से ही संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था को और अधिक संकटग्रस्त कर दिया है। इससे पैदा होने वाला सामाजिक संकट और विकराल रूप में अवसाद और आत्महत्या की समस्या को बढ़ाएगा।

सुशांत के सच्चे समर्थकों को पूरी व्यवस्था के खूनी चरित्र के खिलाफ आवाज उठानी होगी तभी बाकी मेहनतकशों के साथ ही सुशांत को भी इंसाफ मिलेगा। हमें कटु खूनी प्रतियोगिता वाला समाज नहीं चाहिए। सामूहिकता पर आधारित समाजवाद चाहिए, जहां न कोई सुशांत आत्महत्या करेगा और न ही कोई अन्य मेहनतकश।

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