बीते कई दिनों से भारत-चीन सीमा पर पैदा हुआ सीमा विवाद कई सैनिकों की मृत्यु का कारण बना। 20 भारतीय सैनिक इस विवाद की भेट चढ़े, तो दूसरी तरफ चीन ने अपने हताहत व घायल सैनिकों की कोई आधिकारिक सूचना जारी नहीं की है। हालांकि लगभग 40 चीनी सैनिकों के भी मारे जाने की खबर भारत के मीडिया व सोशल मीडिया में चल रही हैं।
भारत-चीन सीमा विवाद बहुत पुराना है। किन्तु नये हालात में यह नये सिरे से खड़ा हुआ। चीन अपनी विस्तारवादी सोच से अपनी सीमाओं की चौकसी बढ़ा रहा है तो भारत का विस्तारवाद चीन को रोककर दक्षिण एशिया में अपना प्रभुत्व चाहता है। अमेरिका की शह पाकर भारतीय शासक अपने विस्तारवादी मंसूबों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। भारतीय विस्तारवाद को हवा देने में अमेरिकी शासकों के चीन को घेरने के अपने हित शामिल हैं। शासकों की यह साम्राज्यवादी-विस्तारवादी रणनीति ही सीमा पर सैनिकों के मरने की एक मात्र वजह है।
संकटग्रस्त पूंजीवादी व्यवस्था और कोरोना के कारण संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था ने शासकों के बीच शह और मात का खेल बढ़ा दिया है। अमेरिका चीन को घेरना चाहता है तो चीन अपनी विस्तारवादी आकांक्षाओं के चलते अपनी सीमाओं पर चौकसी बढ़ा रहा है। भारत 'आत्मनिर्भर भारत' का नारा उछाल कर चीन से सामानों के आयात को कम करना चाहता है। हालांकि बैंक आफ चाइना की भारत में शाखाएं खोलने, पेटीएम को बढ़ावा देने, मोबाइल बाजार व तमाम ठेके वह चाइना को देता रहा है और दे रहा है। भारत सरकार आत्मनिर्भरता की बातें कह रही है किन्तु इसकी परिभाषा वह अपने हिसाब से गढ़ रही है।
आर्थिक-राजनीतिक तौर पर यह खींच-तान नये सम्बधों को पैदा कर रही है। जिन सम्बन्धों में देश के पूंजीपतियों के कारोबार, उनके बाजार की सुरक्षा तो शामिल है पर देश की सीमाओं पर खड़े सैनिकों और देश की मेहनतकश जनता के हित शामिल नहीं है।
बैंक ऑफ चाइना की शाखाएं भारत में खुल सकती है, जिओ (jio) सिम चीन में बनकर भारत में स्वदेशी बन सकती है, पेटीएम का सारा डाटा सरकार अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल कर सकती है। विभिन्न निर्माण कामों के ठेके चीनी कम्पनियों को बेरोक-टोक मिल सकते हैं। शासक झूला झूल सकते हैं। किन्तु कोरोना काल में महामारी, बेरोजगारी, कारोबार की बर्बादी, भयानक पलायन की मार झेल रही देश की जनता को राहत देने के बदले देश में अन्धराष्ट्रवाद-युद्दोन्माद भड़काया जा रहा है। इसे भडक़ाने में सरकार के साथ-साथ कारपोरेट मीडिया की भूमिका अग्रणी है। जो अब तक ना जाने कितने छद्म युद्ध अपने वातानुकूलित स्टूडियो में बैठकर लड़ चुका है।
शासकों द्वारा फैलाये जा रहे इस युद्दोन्माद में जनता की असल समस्याओं कोरोना महामारी, बेरोजगारी, कारोबार की बर्बादी, भयानक पलायन की मार झेल रही देश की जनता को गायब कर दिया जा रहा है। हमें उन्ही सवालों को प्रमुखता से उठाकर इस युद्दोन्माद के माहौल का विरोध करना चाहिए।

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