गोवा में IIT स्थापित करने की योजना के तहत 10 लाख वर्ग मीटर जमीन दिये जाने की जुलाई में सरकार द्वारा घोषणा की गयी थी। गोवा के गुलेली गांव में यह जमीन आवंटित भी कर दी गई। स्थानीय लोगों ने जमीन दिये जाने का विरोध किया। जिस पर केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद सरकार का कहना है कि स्थानीय लोगों के विरोध के कारण 45,000 वर्ग मीटर जमीन धार्मिक कार्यों के लिए दे दी जायेगी। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कहा- 'हमने 45,000 वर्ग मीटर जमीन मंदिर के लिये चिन्हित की है। उनका ध्यान भटकेगा और अंतिम योजना से दूर रहेंगे...... यह गांव वालों के फायदे और विरोध को शांत करने के लिए किया गया। यह गांव वालों के भले में है।'
आज आधुनिक समाज में कोई साधारण सा व्यक्ति भी मंदिर और IIT में से IIT को ही अधिक महत्व देगा। पर सरकार क्या कहती है- 'मंदिर लोगों के हित में है।' साफ है कि आज संघी फासीवादी सरकार के लिए शिक्षा के बजाय मंदिर बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। जमीनों को उद्योगपतियों और औद्योगिक क्षेत्र के लिए तो सरकार जबरन आवंटित कर देती है। गांव के गांव उजाड़ दिये जाते हैं पर IIT के लिए जमीन का विरोध होने पर जमीन मंदिर को आवंटित कर दी गयी। जुलाई में कई गयी घोषणा अगस्त में वापस ले ली जाती है। शिक्षा से समझौता किया जाएगा पर मंदिर से नहीं। अगर कुछ लोग किसी वजह से विरोध कर भी रहे थे तो क्या उन्हें इस बारे में शिक्षित कर, उनके बीच आईआईटी की जरूरत का प्रचार कर उनको मनाया नहीं जा सकता था बिलकुल मनाया जा सकता था परन्तु भाजपा सरकार जिसका पूरा जीवन तन्त्र मंदिर की राजनीति से चलता हो उससे इस तरह के कदम उठाए जाने की उम्मीद करना बेईमानी ही है।
और ये सब कोरोना काल में हो रहा है जिसने पूरे समाज में मजबूती से यह साबित किया है कि सामान्य समय के अलावा इस संकट के समय भी शिक्षा, उच्च शिक्षा, शोध, आदि ही अधिक जरूरी हैं।
संघी फासीवादियों का यही नजरिया है कि ज्ञान-विज्ञान के विकास के बजाय अज्ञान-अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जाए। इस कूपमंडूकता में ही ये पूरे देश और समाज को धकेलना चाहते हैं। निश्चित ही छात्रों-नौजवानों को इसका जवाब ज्ञान-विज्ञान, प्रगति और क्रांति के विचारों से देना होगा। यही आज समय की मांग है।
क्रांतिकारी अभिवादन सहित
परिवर्तनकामी छात्र संगठन
(पछास)


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