एन आर सी बी के आंकड़े
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एन सी आर बी) देश में हत्या दुर्घटना, आत्महत्या, सहित अपराध के आंकड़े जारी करने वाली सरकारी संस्था है। 2 सितंबर 2020 को इसने वर्ष 2019 में दुर्घटना और आत्महत्या के आंकड़े पेश किए। जिसमें बताया गया कि 2018 में 1,34,516 आत्महत्या की घटनाएं हुई और 2019 में 3.4% की बढ़ोतरी के साथ यहां आंकड़ा 1,39,123 हो गया। विकास के दावों और "सब चंगा सी" के बीच आत्महत्या के मामले अपनी कहानी आप ही बयां करते हैं।
आत्महत्या के इन मामलों में 4% यानी 2,851 लोगों की मौत का कारण बेरोजगारी बताया गया। जबकि आत्महत्या करने वाले 14,019 लोग यानी लगभग 10.1% लोग बेरोजगार थे। वहीं मरने वाले कुल लोगों में 67% यानी 93016 लोग 18 से 45 वर्ष के बीच आयु वर्ग के युवा थे। खेती से जुड़े 10,281 लोगों की आत्महत्या में 5,957 किसान तो 4,324 खेत मजदूर थे।
यदि केवल छात्रों बेरोजगारों की बात करें तो परीक्षा में असफल हो आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या 2018 में 2,625 के मुकाबले 4.5% की बढ़ोतरी के साथ 2,744 हो गई। बेरोजगारों में 2018 के 2,741 के मुकाबले 4.0% बढ़ोतरी के साथ 2019 में 2851 लोगों ने आत्महत्या की। चहुंओर प्रतियोगिता और अनिश्चितता से घिरे छात्रों की सुध कहां ली जा रही है। धीरज रखने, तनाव ना लेने वाले प्रवचनों के अलावा इस पर सरकार ने कोई प्रयास नहीं किए हैं। वहीं बेरोजगारों के मामले में तो "2 करोड़ रोजगार" के वायदों, लंबी लटकती नियुक्ति प्रक्रिया से लेकर निजी क्षेत्र में घटते रोजगार (छटनी आदि के अलावा) की कहानी सभी जानते हैं। स्वरोजगार, "स्टार्टअप", "आत्मनिर्भर भारत" आदि सरकारी नारों का आईना और उनके मुंह पर तमाचा है, बेरोजगारों की आत्महत्या में बढ़ोतरी के मामले।
रिपोर्ट में आत्महत्या के कारणों में पारिवारिक समस्या, नशे की लत, कैरियर (भविष्य) समस्या, दिवालिया होना और असफल प्रेम को प्रमुख कारण बताया गया है। रिपोर्ट कारणों को लोगों की निजी समस्याओं में तलाशती है। जबकि साधारण से साधारण इंसान भी जानता है कि निजी समस्याओं के कारण सामाजिक व्यवस्था में छिपे होते हैं। यह कौन नहीं जानता कि किसानों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों ने कृषि संकट और सरकारी उदासीनता को सामाजिक मुद्दा बना दिया था। 2 वर्ष पूर्व कोटा में तैयारी के लिए गए छात्रों की आत्महत्या ने पढ़ाई-कैरियर से पैदा होते तनाव और असुरक्षित भविष्य के सवालों को समाज के सामने ला खड़ा किया। रिपोर्ट में बताए गए निजी कारण केवल अभिव्यक्ति हैं। वास्तविक कारण तो मौजूदा समाज व्यवस्था है। लुटेरी पूंजीवादी समाज व्यवस्था।
कौन नहीं जानता कि बेरोजगारी आज नए-नए कीर्तिमान रच रही है। कौन नहीं जानता कि किसानों की समस्याओं का कोई हल किए बगैर सरकार "खैरात" बांटने वाली बन गई। हर कोई अपने भविष्य को लेकर इतिहास के किसी भी दौर से ज्यादा घबराया हुआ है। असुरक्षित भविष्य ने निजी जीवन और संबंधों में भी अतीत से कहीं ज्यादा असुरक्षा- अविश्वास पैदा कर दिया है। वहीं अंबानी-अडानी सरीखे चंद पूंजीपतियों की बढ़ती संपत्ति और उसका अश्लील हो-हल्ला करोड़ों-करोड़ लोगों का मजाक बनाता है।
यह दोनों घटनाएं पूंजीवाद में एक साथ घटती हैं। एक तरफ अंबानी-अडानी की बढ़ती संपत्ति तो दूसरी तरफ हताश-निराश आत्महत्या करते लोग। यह आत्महत्या क्या साबित करती हैं? पहला; इस व्यवस्था में मेहनतकशों के लिए कोई स्थान नहीं है। इसका सारा विकास चंद पूंजीपतियों की तिजोरी में बंद है। दूसरा; आत्महत्या से हालातों में कोई फर्क नहीं पड़ता। समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं।
तब क्या किया जाए? हालातों को बदलने के लिए संघर्ष। जीवन संघर्ष की मांग कर रहा है। जीवन मांग करता है कि मौत की कारण इस पूंजीवादी व्यवस्था से हर कदम पर संघर्ष हो। व्यवस्था के सेवक मोदी-शाह पर नहीं मेहनतकशों, छात्रों-नौजवानों और उत्पीड़ितों पर भरोसा करो। भरोसा करो उत्पीड़ितों की एकता का। क्रांतिकारी एकता का। जो जीवन के लिए संघर्ष करे और लुटेरी पूंजीवादी व्यवस्था का अंत करे। यही है आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं का सबक।




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