क्रांतिकारी अजीत सिंह
इस समय जब तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन फैलता जा रहा है। सम्पूर्ण देश में एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग के हितों के लिए लाए गए कृषि कानूनों का विरोध जारी है तब बरबस ही सरदार अजीत सिंह का जिक्र भी सामने आ जाता है। सरदार अजीत सिंह शहीद-ए-आजम भगत सिंह के चाचा थे। सन् 1906 में ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन द्वारा लाए गए किसान विरोधी तीन काले कानूनों के खिलाफ उन्होंने सन् 1907 में किसानों के आन्दोलन की अगुवाई की थी। ये काले कानून थे- दोआब बारी एक्ट, पंजाब लैंड काॅलोनाइजेशन एक्ट और पंजाब लैंड एलियनेशन एक्ट।
इन कानूनों का उद्देश्य किसानों की जमीनें हड़पना था। इस कानून के अनुसार कोई भी किसान अपनी जमीन से पेड़ नहीं काट सकता था। अपनी जमीन पर घर तक भी नहीं बना सकता था। दूसरा खतरनाक प्रावधान यह था कि किसान अपनी जमीन केवल अपने बड़े बेटे को ही हस्तांतरित कर सकता था। अगर बड़ा बेटा वयस्क होने से पहले ही मर जाये तो उस जमीन पर ब्रिटिश सरकार कब्जा कर लेगी। अगर किसान के कोई औलाद नहीं होती तो जमीन अंग्रेजी शासन या रियासत के पास चली जाती थी। दोआब बारी कानून के अनुसार अंग्रेजों ने पंजाब में बारी दोआब नहर से सिंचित होने वाली जमीनों का लगान दुगना कर दिया था। इससे पूर्व 1879 में ब्रिटिश सरकार ने चिनाब नदी पर बारी दोआब नहर का निर्माण करने के लिए किसानों से जमीनें ली। इसके बदले दूसरी जगहों पर किसानों को जमीनें दे दी गयी। लेकिन नए कानून के अनुसार किसानों से जमीन का मालिकाना हक सरकार ने ले लिया और किसानों की हैसियत बटाईदार की हो गयी।
सरदार अजीत सिंह ने इन किसान विरोधी काले कानूनों के खिलाफ 1907 में शुरू हुए किसान आन्दोलन का नेतृत्व किया था। 22 मार्च 1907 को लायलपुर में किसानों की बड़ी सभा में लाला बांके दयाल ने ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ गीत गाया था। सन् 1907 का वर्ष भारत के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन की 50 वीं सालगिरह का भी वर्ष था। यह आन्दोलन 9 महीने तक चला था और किसानों की एकता और संघर्ष के दबाव में ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और नवम्बर 1907 को तीनों काले कानूनों को वापस लेना पड़ा था। हालांकि सरदार अजीत सिंह को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर वर्मा (आज जिसे म्यांमार कहा जाता है) की मांडले जेल भेज दिया। मांडले जेल से रिहा होने के बाद अजीत सिंह ने ‘भारत माता सोसायटी’ का गठन किया और ‘भारत माता बुक एजेंसी’ स्थापित की। जिसका कार्य ब्रिटिश सरकार विरोधी साहित्य सामग्री को प्रकाशित करना था। ब्रिटिश सरकार ने इसके द्वारा प्रकाशित साहित्य को जब्त कर लिया लेकिन सरदार अजीत सिंह ब्रिटिश सरकार के चंगुल से बचते हुए क्रांतिकारी साथी सूफी अम्बा प्रसाद के साथ सन् 1909 में कराची होते हुए ईरान चले गए। ईरान से वह पेरिस गए और वहां उन्होंने भारतीय क्रांतिकारी संघ की स्थापना की। इस दौरान वह यूरोप के अलग-अलग देशों में यात्रा करते रहे और बसे हुए भारतीय क्रांतिकारियों से मिलकर देश को आजाद कराने को प्रयत्न करते रहे। इस दौरान वह लेनिन और ट्राटस्की से भी मिले।
सन् 1914 में पहला विश्वयुद्ध प्रारम्भ होने पर वह ब्राजील आ गए और यहां हिन्दुस्तानी गदर पार्टी से सम्पर्क स्थापित किया। सरदार अजीत सिंह लगभग 38 साल तक देश से बाहर रहकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष करते रहे। सन् 1947 में वह भारत वापस आए। उनका देश की जनता ने गर्मजोशी से स्वागत किया। वह देश के विभाजन और साम्प्रदायिक दंगों से बहुत दुःखी थे। 15 अगस्त 1947 को जब देश आजादी का जश्न मना रहा था उसी दिन उन्होंने अंतिम सांस ली।
सरदार अजीत सिंह का जन्म 23 फरवरी 1881 को जालंधर के खटकलां गांव में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक पढ़ाई जालंधर में हुई उसके बाद लाहौर के डीएवी कालेज से पढ़ाई की। कानून की पढ़ाई के लिए बरेली कालेज, बरेली में प्रवेश लिया लेकिन ब्रिटिश उपनिवेशवाद से देश को आजाद कराने के लिए यह क्रांतिकारी विचारों और क्रांतिकारी राजनीति की तरफ मुड़ गए। सरदार अजीत सिंह का सम्पूर्ण जीवन ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध क्रांतिकारी राजनीति और संघर्ष का जीवन रहा है। उन्होंने पंजाब में ब्रिटिश सरकार के किसान विरोधी काले कानूनों के खिलाफ बड़े किसान आन्दोलन को संगठित करने से लेकर देश से बाहर रहकर क्रांतिकारी आन्दोलन को संगठित कर ब्रिटिश साम्राज्यवाद को पूरे जीवन भर चुनौती दी।
आज जब देश में संघी फासीवादी सत्ता में हैं और एक से बढ़कर एक किसान-मजदूर विरोधी काले कानून देश पर थोप रहे हैं। खेती-किसानी से लेकर मजदूरों के सस्ते श्रम को एकाधिकारी पूंजीपतियों के हवाले करने की साजिशें रची जा रही हैं तो इसका जवाब भी महान क्रांतिकारी सरदार अजीत सिंह के क्रांतिकारी आदर्शों और राजनीति से ही दिया जा सकता है।
साभार परचम वर्ष-12 अंक-2


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