17 May 2021

ये मौतें नहीं नरसंहार है!

     इस समय हमारा देश और हम एक ऐसा दर्द सह रहे हैं जिससे बचा जा सकता था। इस समय हमारा देश एक ऐसा देश बना दिया गया है जहां अपने प्रिय परिजनों को अस्पताल में भर्ती कराने के लिए रोते-गिड़गिड़ाते लोगों और ऑक्सीजन न मिल पाने के कारण तड़प-तड़प कर मर जाने वाले लोगों का मंजर, आम मंजर बन गया है। इस वक्त हमारा देश ऐसा देश बना दिया गया है जहां पर लोग अपने प्रियजनों की लाशों को अपने ही कंधों पर ढोने को मजबूर कर दिये गये हैं। हमने ऐसा पहले कभी नहीं देखा कि मृृतकों के लिए शमशान, लकड़ी और कब्रें भी कम पड़ गयी हों और सैकड़ों की संख्या में लाशें नदी में तैर रही हैं। इन तैरती लाशों को कुत्ते नोंच रहे हैं। कई परिवार तो ऐसे हैं जहां एक की मौत का मातम भी पूरा नहीं हुआ था कि दूसरी, तीसरी,.... मौतें हो गयीं। लोग अपने एक प्रिय की मौत पर सही से रो भी नहीं पाए थे कि अन्य प्रियजनों को बीमारी ने आ घेरा। कई परिवार तो ऐसे हो गये हैं जहां सिर्फ दुधमुहें बच्चे ही बचे हैं, जिनके सिर पर अब किसी का भी आसरा नहीं बचा।

कोई कह सकता है कि यह कोराना महामारी का प्रकोप है। लेकिन हम कोराना की पहली लहर से ही देख रहे हैं कि तबाही का यह मंजर एक अदृृश्य वायरस से ज्यादा मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था, मुनाफे के लालच और सत्ता में बैठे बात बहादुरों ने पैदा किया है। वायरस उतनी तबाही नहीं मचा रहा जितनी स्वास्थ्य सेवाओं की बदइंतजामी और जनता से पूरी तरह मुंह फेरे शासकों का व्यवहार मचा रहा है। राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों और संस्थाओं ने बार-बार सत्ता में बैठे हुक्मरानों को चेताया कि दूसरी लहर पहली से कहीं अधिक मारक होगी। लेकिन मोदी-शाह की जोड़ी, ये वे दो लोग हैं जो लगभग पूरी सत्ता को चला रहे हैं। उन्होंने अपने क्षुद्र हितों के लिए इन सब पर अमल करना तो दूर इन बातों को सुना तक नहीं।

     मोदी-शाह राज्यों में चुनाव जीतने के लिए बड़ी-बड़ी रैलियां करते रहे। लाखों की संख्या में भीड़ जुटाते रहे। पांच राज्यों के चुनाव, उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव और कुंभ के भीड़ भरे आयोजन ने वासरस के प्रसार को गांव-गांव तक पहुंचा दिया। आज गांव-गांव में भारी संख्या में मौतें हो रही हैं। जब राजधानी में चिकित्सा सुविधा के अभाव में लोग मर रहे हैं तो गांवों की कहानी आप ही समझी जा सकती है। इस समय हमारा देश प्रतिदिन कोरोना संक्रमण और होने वाली मौतों के मामले में शीर्ष पर है। मोदी-शाह और संघ भारत को 'विश्वगुरू' बनाने पर तुले थे लेकिन उन्होंने कोरोना महामारी के संक्रमण और मौतों के मामले में देश को शीर्ष पर पहुंचा दिया है। अस्पतालों में कोरोना से मरने वाले तो रिकार्ड में दर्ज हो जा रहे हैं लेकिन गांव-देहातों में जहां न टेस्टिंग है और न कोई दवा देने वाला, वहां कोरोना से हो रही मौतों का कोई हिसाब ही नहीं है। असल में कोरोना से हो रही मौतें उससे कहीं ज्यादा हैं जो रिकार्ड में दर्ज की जा रही हैं। मोदी-शाह द्वारा देश को ऐसा खौफनाक मंजर देने के लिए जब लोग कह रहे हैं कि ‘कुर्सी से हट क्यों नहीं जाते, यह जनाजा थोड़े न है’, तो ठीक ही कह रहे हैं। इन मौतों से लोगों को बचाया जा सकता था। यह समझने में कोई मुश्किल नहीं है कि ये मौतें नहीं बल्कि शासकों द्वारा आरोपित एक नरसंहार है।


बेशर्मी का आलम यह है कि एक तरफ बदइंतजामी और चीजों के अभाव में दम तोड़ते देश के नागरिक हैं और हमारा मुखिया है कि 20 हजार करोड़ रूपये की लागत का सेन्ट्रल विस्टा (नई संसद और प्रधानमंत्री आवास) बनाने की जिद पकड़े है। एक तरफ देश के नागरिकों की आंखों में आंसू हैं और वे उम्मीद लगाये थे कि उनका मुखिया उनके लिए कुछ करेगा, लेकिन मुखिया द्वारा आईडीबीआई बैंक का निजीकरण कर दिया गया। कोरोना की पिछली लहर के समय के व्यवहार (आपदा को अवसर में बदलने) को इस बार दूसरी लहर के समय में भी दोहराया जा रहा है। पिछली बार श्रम और कृषि कानूनों में मजदूर और किसान विरोधी बदलाव किये गये थे, इस बार यह यात्रा कहां तक जायेगी नहीं पता। वैसे मोदी सरकार ने सरकारी संस्थाओं के भारी पैमाने पर निजीकरण करने की घोषणा पूर्व में ही कर दी है।

     आज जब देश और विदेश में मोदी जी को ‘आत्ममुग्धता की बीमारी से ग्रसित’, ‘कोरोना महामारी का सुपर स्प्रेडर’ कहा जा रहा है तो यह किसी को गलत नहीं लग रहा है।

सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को कारपोरेटपरस्त उदारीकरण की नीतियों ने हजम कर दिया है। बचा-खुचा सरकारी स्वास्थ्य ढांचा, जो आम समय में आम बिमारियों के इलाज का भी बोझ उठाने में अक्षम है, तो इस महामारी का मुकाबला करने में पूरी तरह फेल होना ही था।


     पांच सितारा अस्पतालों के मालिक और प्रबंधक, दवा और वैक्सीन निर्माता कारपोरेट वे गिद्ध हैं जो इंसानों को नोंच खाने में जरा भी नहीं हिचक रहे हैं। कोरोना मरीजों को भर्ती करने के पहले ही वे लाखों रूपये जमा करने को कह कर या बीमारी के इलाज का मोटा खर्चा वसूल कर मोदी के कहे अनुसार आपदा को अवसर में बदल रहे हैं। ये वे गिद्ध हैं जो यह सोच रहे हैं कि शायद ऐसा अवसर फिर कभी न आये।


जो लोग कोरोना की पहली और अब दूसरी लहर से बचे हुए हैं, वह अपनी नौकरियों-स्वरोजगार से हाथ धोकर भुखमरी की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। फड़-खोखे वाले, छोटे दुकानदार व छोटे कारोबार करने वालों के लिए लाकडाउन आपदा से जरा भी कम नहीं है। इन सब लोगों के लिए सरकार ने कोई इंतजाम नहीं किये हैं। कोरोना के इलाज की ही तरह रोजी-रोटी के लिए ऐसे मेहनतकशों को अपना बंदोबस्त आप ही करने के लिए छोड़ दिया गया है। आत्मनिर्भर भारत का गला फाड़-फाड़कर प्रचार करने वाले प्रधानमंत्री ने कोरोना के इलाज और लाकडाउन में आजीविका का बंदोबस्त करने हेतु लोगों को अपनी व्यवस्था आप करने के लिए छोड़कर ‘आत्मनिर्भरता’ की नयी परिभाषा दी है। आज के इन सब हालातों को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे हमारे देश में सरकार जैसी किसी चीज का अस्तित्व ही नहीं है। रोज कमाकर खाने वाले के लिए ‘‘घर पर ही रहो सुरक्षित रहो’’ का नारा एक गाली सरीखा बन गया है। ऐसे लोग बाहर जायें तो कोरोना का खतरा मोल लें और घर पर ही रहें तो भूख से मरने को मजबूर हों।


महामारी के इस फैलाव के जिम्मेदार हमारे शासक हैं लेकिन इसका खामियाजा समाज के मेहनतकशों के साथ-साथ छात्र अपनी पढ़ाई से वंचित होकर, अपने कालेज-कैंपसों से दूर रहकर, घरों में कैद होने को विवश होकर चुका रहे हैं। घरों में कैद बच्चों से लेकर बड़े छात्र तक मानसिक तनाव झेलने को मजबूर हैं।


     ऐसे में आज तात्कालिक जरूरत है कि यह मांग उठायी जाये कि सभी निजी बड़े अस्पतालों का सरकार अधिग्रहण कर उनमें महामारी से पीड़ित लोगों को निःशुल्क स्वास्थ्य सुविधा दे। उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण की जनविरोधी नीतियों को रद्द कर सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत किया जाय। इसके साथ ही महामारी को नरसंहार में बदलने वाली इस पूंजीवादी व्यवस्था तथा इसके शासकों के खिलाफ संघर्ष तेज किया जाये। पूंजीवादी शासकों के चेहरे से नकाब नोंचने और उनके असली चरित्र को लोगों के सामने लाने की हर कोशिश हमें करनी होगी। दुनिया का इतिहास गवाह है कि मानवद्रोही व्यवस्था पूंजीवाद महामारियों से निपटने में अक्षम है। वह हर महामारी, हर आपदा को मुनाफा कमाने के अवसर में तब्दील कर देगा। एक निःशुल्क और मजबूत स्वास्थ्य ढांचा समाजवाद में ही संभव है। जहां लोगों की बिमारियों को मुनाफा कमाने के अवसर में देखने वाले कारपोरेट अस्पताल नहीं होंगे। बल्कि बिमारियों का संपूर्ण निदान करने की ओर अग्रसर स्वास्थ्य ढांचा और जनता के सेवक स्वास्थ्य कर्मी होंगे। इसलिए समाजवाद के लिए संघर्ष को तेज करने की ओर हमें बढ़ना होगा।


आइये मांग करें-
-प्रधानमंत्री इस्तीफा दो!
-उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियां वापस लो!
-बड़े निजी अस्पतालों का अधिग्रहण कर उनको कोरोना महामारी से निपटने में लगाया जाये!
-सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत बनाया जाये!
-कोरोना से पीड़ित सभी लोगों का निःशुल्क इलाज कराया जाये!
-सभी लोगों को मुफ्त में कोरोना की वैक्सीन लगायी जाये!
-सभी लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करो!
-महामारी और लाकडाउन के कारण अपनी आजीविका से वंचित लोगों के खाते में प्रतिमाह न्यूनतम वेतन के बराबर धनराशि डाली जाये!

परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

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