सत्ता परिवर्तन नहीं, व्यवस्था परिवर्तन हेतु संघर्ष के लिये आगे आयें!
भगत सिंह ने यह बात अंग्रेजों की संसद के बारे में कही थी लेकिन यह आज भी 100 फीसदी सच है।भगत सिंह ने कहा था-
**....... बहुत कुछ सोचने के बाद भी एक ऐसी संस्था के अस्तित्व का औचित्य हमारी समझ में नहीं आ सका जो, बावजूद उस तमाम शानो-शौकत के, जिसका आधार भारत के करोड़ों मेहनतकशों की गाढ़ी कमाई है, केवल मात्र दिल को बहलाने वाली, थोथी, दिखावटी और शरारतों से भरी हुई एक संस्था है। हम सार्वजनिक नेताओं की मनोवृत्ति को समझ पाने में भी असमर्थ हैं। हमारी समझ में नहीं आता कि हमारे नेतागण भारत की असहाय परतंत्रता की खिल्ली उड़ाने वाले इतने स्पष्ट एवं पूर्वनियोजित प्रदर्शनों पर सार्वजनिक सम्पत्ति एवं समय बर्बाद करने में सहायक क्यों बनते हैं।**
साथियों
उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। चुनाव लड़ने वाले सभी दल वोट पाने के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर रहे हैं। ऐसा ये दल जनता को भरमाने के लिए कर रहे हैं। चुनाव जीतने के बाद इनके द्वारा की जा रही इन घोषणाओं के बारे में पूछने वाला कोई नहीं। अगर कोई पूछ भी ले तो 'हर किसी के खाते में 15 लाख रूपये आने' की तरह इसे जुमला बोलने में इन नेताओं को न तो कोई हिचक होगी न ही कोई शर्म।
बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा के लगातार बिगड़ते हालात, स्वास्थ्य तंत्र के खस्ताहाल होने जैसे मुददे इस चुनाव में गायब हैं।
ये चुनावबाज दल चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक नीचे गिर सकते हैं। जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे निम्न कोटी की राजनीति जोरो पर होने लगी है। हर चुनाव की तरह इस चुनाव में भी जाति-धर्म के आधार पर वोट पाने की जुगत जोरों पर है। अभी तक इन दोनों राज्यों में सत्ता पर काबिज भाजपा अपनी स्थिति कमजोर होने का आभास होने पर अपने पुराने घोर सांप्रदायिक एजेण्डे पर उतर आयी है। मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगलने में भाजपा के छोटे से लेकर बड़े नेता तक कोई कम नहीं है। हालांकि जाति-धर्म-क्षेत्र के आधार पर घृणित राजनीति करने में अन्य दल भी जरा भी कम नहीं हैं।
आज यह बात और ज्यादा स्पष्ट हो गयी है कि चुनावबाज पूंजीवादी राजनीति पैसे का खेल है। 'हर एक वोट जरूरी है' , 'मेरा वोट मेरा अधिकार' और समान अवसर की बात बार-बार किये जाने के बावजूद यह चुनाव विशुद्ध पैसे वालों का है। कोई मजदूर, कोई गरीब चुनाव लड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकता। चुनाव लड़ने वालों या पिछले चुनावों में जीते/हारे उम्मीदवारों पर नजर दौड़ाएं तो हम पाते हैं कि उनमें करोड़पतियों का ही बहुमत है। कानूनी तौर पर कोई प्रत्याशी लाखों रूपये चुनाव में खर्च कर सकता है लेकिन वोट खरीदने के लिए दी जाने वाली तरह-तरह की रिश्वत में कितना पैसा बहाया जाता है इसका कोई हिसाब नहीं। चुनाव आयोग की बंदिशों के बाद भी धन का प्रयोग बढ़ता ही गया है। रोज कमाकर खाने वाला इस चुनाव में कहां खड़ा है? एक वक्त का खाना खाकर गुजारा करने वाला इस लोकतंत्र में इन धनपतियों के सम्मुख क्या औकात रखता है? वह मात्र एक वोटर बना दिया गया है।
नरेन्द्र मोदी जब 2014 से पूर्व चुनाव प्रचार कर रहे थे तो उनको देश के बड़े पूंजीपतियों का समर्थन प्राप्त था। अंबानी-अडानी जैसे बड़े पूंजीपतियों के समर्थन से ही वे प्रधानमंत्री बने। उनको 'महापुरूष', 'विकासपुरूष' घोषित करने में कारपोरेट मीडिया और उनके मालिक बड़े पूंजीपतियों ने दिन-रात एक कर दिया। मोदी जी ने अच्छे दिनों की बातें कीं, हर वर्ष 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने की बात की, सबका साथ सबका विकास करने की बातें कीं। लेकिन उनके शासन काल में क्या हुआ? उनके शासन काल में अंबानी-अडानी की दौलत बढ़ती गयी और गरीब लोग और गरीब हो गये। हर वर्ष 2 करोड़ रोजगार तो दूर की बात रही वर्ष 2018 में भारत में 45 वर्षों में सर्वाधिक बेरोजगारी हो गयी। सीएमआई के अनुसार दिसंबर 2021 में भारत में 5 करोड़ तीस लाख लोग बेरोजगार थे। उत्तर प्रदेश में जहां चुनाव प्रचार जोरों पर है वहां बेरोजगारों की मांगों को सुनने वाला कोई नहीं। कई भर्तियों में हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ भी छात्र-बेरोजगार धरने पर हैं लेकिन उनकी मांगें सुनने के वजाय सरकार उन पर लाठीचार्ज कर रही है। सबका साथ सबका विकास का क्या हस्र है? एक तरफ कभी लव जिहाद तो कभी गौहत्या के नाम पर दलितों-अल्पसंख्यकों की हत्याएं की गयीं। हद तो तब हो गयी जब दलितों-अल्पसंख्यकों- बुद्धिजीवियों की हत्याएं करने वालों को भाजपा नेताओं द्वारा सम्मानित किया गया। कश्मीर के कठुआ में नाबालिग बालिका की बलात्कार-हत्या के आरोपियों को बचाने के लिए तिरंगा यात्रा निकाली गयी।
आक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार 2021 में 84 प्रतिशत भारतीय परिवारों की आय में गिरावट आयी है। लेकिन दूसरी तरफ 40 नये अरबपति बने हैं। रिपोर्ट यह भी कहती है कि महामारी के दौरान अरबपतियों की आय में 30 लाख करोड़ की वृद्धि हुयी है तो 4.6 करोड़ लोग भीषण गरीबी में आ गये हैं। जहां सबसे अमीर 100 लोगों की कुल संपत्ति 57.3 लाख करोड़ है वहीं नीचे की 50 प्रतिशत आबादी के पास देश की संपत्ति का मात्र 6 प्रतिशत है। भारत के ही 10 सबसे अमीरों के पास इतना पैसा इकटठा हो गया है कि आक्सफेम का कहना है कि यह भारत के प्रत्येक बच्चे को 25 सालों तक स्कूली और उच्च शिक्षा के खर्च के लिए पर्याप्त है।
कोरोना काल के समय चुनाव जीतकर सत्ता में बैठी सरकारों ने जनता की तरफ से मुंह फेर लिया। चुनाव के समय वोटरों को पूजने वाले ये लोग महामारी के समय अपने हाल पर छोड़ दिये गये। अव्यवस्था का आलम यह था कि गंगा शव वाहिनी गंगा बन गयी। आक्सीजन की कमी से लोग दम तोड़ने लगे।
छात्रों की पढ़ाई कोराना काल में बुरी तरह प्रभावित कर दी गयी। कई केन्द्रीय विश्वविद्यालय कोरोना के आगमन से आज तक नहीं खुले। आनलाइन पढ़ाई से वे छात्र शिक्षा से दूर कर दिये गये जिनके पास एन्ड्रायड फोन या डाटा या कनेक्टीविटी नहीं थी। गरीब छात्र और ग्रामीण छात्र नाममात्र की आनलाइन पढ़ाई से भी वंचित कर दिये गये। इस दौरान निजी स्कूलों के शिक्षकों का वेतन कम कर दिया गया और छात्रों और उनके अभिभावकों को निचोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
एक अनुमान के अनुसार भारत में 2020 में लगभग 12 करोड़ लोगों का रोजगार गया। वहीं 2021 में अप्रैल-जून में लगभग 1.5 करोड़ लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा। हालांकि विकसित पूंजीवादी देशों में बेरोजगारी भत्ता जैसी मदों में थोड़ा खर्च किया गया पर भारत में तो मोदी सरकार या राज्य सरकारों ने इसका जिक्र तक नहीं किया।
अगर अच्छे दिन किसी के आये तो वे अंबानी-अडानी जैसे लोग थे। कोरोना महामारी के दौरान मोदी जी ने इसे 'आपदा में अवसर' के रूप में पेश किया। आज यह स्पष्ट हो गया कि यह छात्रों- गरीबों के लिए एक बड़ी विपदा थी और अंबानी- अडानी जैसों के लिए अपनी आय बढ़ाने का एक अवसर।
जिनके समर्थन-सहयोग से मोदी जी सत्ता में आये थे उन्होंने उन्हीं के लिए काम किया। अंबानी के जियो को लाभ पहुंचाने के लिए बीएसएनएल को बर्बाद किया गया। एअर इंडिया को टाटा को लगभग मुफ्त में बेच दिया। कई सरकारी कंपनियों का निजीकरण बड़े पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है।
भूख, गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी जैसी समस्याओं के कारण जनता विद्रोह न कर दें इस कारण समाज को जाति-धर्म के आधार पर बांटा गया। अल्पसंख्यकों, दलितों, महिलाओं के खिलाफ फासीवादी राजनीति का घृणित खेल इसीलिए खेला जा रहा है कि जनता आपस में ही झगड़ते रहे। वे इन समाजिक समस्याओं- जिसके सूत्रधार हमारे शासक हैं - के खिलाफ उठ संघर्ष न कर दे इसीलिए उसे विभाजित करने के लिए ऐसी राजनीति की जा रही है।
वर्ष दर वर्ष चुनाव होते रहे हैं जिसमें पूंजीवादी दल और नेता जीतते रहे हैं और जनता हारती रही है। जनता से कभी 'गरीबी हटाने' के वायदे किये गये तो कभी 'अच्छे दिन लाने' के वायदे किये गये। कोई अपने राज्य के लाखों अस्थाई कर्मचारियों को स्थायी नहीं कर रहा परंतु दूसरे राज्य में चुनाव जीतने के लिए हर परिवार से एक को रोजगार देने का वायदा कर रहा है। पर चुनावों से न तो गरीबी हटी और न ही अच्छे दिन आये। छात्रों-नौजवानों व गरीब जनता के जीवन के कष्टों का अंत चुनावों के बाद नहीं होता। चुनावों के जरिये इन कष्टों का अंत हो भी नहीं सकता। चुनावों के जरिये एक दल के बदले दूसरे दल, एक नेता के बदले दूसरे नेता तो सत्ता पर काबिज हो सकते हैं लेकिन जनता के कष्टों का अंत नहीं हो सकता।
अगर हमें आजादी मिली तो वह संघर्ष के दम पर मिली। अगर काले कृषि कानूनों की वापसी हुई तो वह किसानों का संघर्ष था। अगर अलग उत्तराखंड राज्य बना तो वह भी संघर्ष के ही बदौलत मिला। चुनाव मात्र जनता को भ्रम में रखने का एक जरिया है। यह भ्रम कि हम ही सरकार को चुनते हैं या हम ही सरकार हैं। बल्कि सच्चाई यही है कि इन चुनावों के माध्यम से हम मात्र कानून बनाने वाली संस्था का ही चुनाव करते हैं। असली सरकार (पुलिसए, प्रशासन, बड़े- बड़े अफसरों, विभिन्न कोर्ट के जजों) जिसका जनता से रोज-रोज का वास्ता पड़ता उसे कोई जनता नहीं चुनती।
चुनाव के इस मौके पर हम छात्रों-युवाओं को वोट मांगने आने वाले नेताओं से यह पूछना चाहिए कि वे बेरोजगारी को वे कैसे खत्म करेंगे? कि वे शिक्षा के निजीकरण व बिगडते हालात को कैसे खत्म करेंगे? कि वे महंगाई को कैसे रोकेंगे? हमें छात्रों-युवाओं और जनता के मुददों पर उनसे सवाल करने चाहिए। लेकिन यह कभी नहीं भूला जाय कि चुनावों से हमारे हालात नहीं बदल सकते। हमारा जीवन नहीं बदल सकता। आज हमें सरकार बदलने के स्थान पर व्यवस्था परिवर्तन के संघर्ष में उतरना होगा। हमें पूंजीवादी व्यवस्था के स्थान पर समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष करना होगा।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

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