28 सितंबर भगत सिंह के जन्म दिवस पर!
भगत सिंह ने 23 मार्च 1931 को अपनी शहादत से पहले कहा था ‘‘समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है। और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैया कराने वाला बुनकर अपना तथा अपने बच्चों के तन ढकने भर को कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।’’ (‘बम काण्ड पर सेशन कोर्ट में भगत सिंह और दत्त का बयान’ से)
भगत सिंह ने ये बातें तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत के लिए कही थी। लेकिन एक बार अपने देश-समाज की हालत को देखें और सोचें तो क्या आज भी यही हालात मौजूद नहीं हैं? ये आज भी उतना ही सच है जितना अंग्रेजों के शासन में था। हां, बस शासकों की चमड़ी का रंग बदल गया है। आजादी के शहीदों के सपनों का भारत कहीं नजर नहीं आता। इसी सच को छुपाने के लिए मोदी सरकार द्वारा आजादी के अमृत महोत्सव का हल्ला किया जा रहा है ताकि इसके शोर में महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी की मार झेलती आम जनता की आह दबी की दबी रह जाए।
भगत सिंह खुद एक छात्र थे और अपनी शहादत से पहले तक वो लगातार छात्रों-युवाओं को संगठित करने का प्रयास करते रहे। छात्र होने के बावजूद वो लगातार देश के अन्य मेहनतकश वर्गाें के सवालों को भी पूरी शिद्दत के साथ उठाते रहे। तब के समय में भी छात्रों को राजनीति करने से रोका जाता था। जिसका जवाब देते हुए भगत सिंह ने कहा था कि ‘‘जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज ही अक्ल के अन्धे बनाने की कोशिश की जा रही है।’’ (‘विद्यार्थी और राजनीति’ लेख से) ठीक वैसे ही आज की हमारी सरकारें भी हम छात्र-नौजवानों को अक्ल का अंधा बनाने की कोशिश कर रही हैं। इसके लिए उनके द्वारा कई हथियारों का प्रयोग किया जा रहा है।
हाल के दिनों में हम छात्रों पर शिक्षा के निजीकरण के जरिए मोदी सरकार ने पूर्व की सरकारों से भी बड़ा हमला बोला गया है। मोदी सरकार द्वारा निजीकरण को नई ऊंचाईयों पर पहुंचाने के लिए ही ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ लागू की गई है। इस नीति के तहत शिक्षा के निजीकरण के विस्तार द्वारा मेहनतकश, गरीब परिवारों के बच्चों से शिक्षा पाने का अधिकार छीनने की कोशिश की जा रही है। इसके दुष्परिणाम भी हमें दिखने शुरू हो चुके हैं। हरियाणा, असम, मध्य प्रदेश में छात्रों की कम संख्या का बहाना बनाकर सैकड़ों सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है। इसी नीति के तहत उच्च शिक्षा में स्नातक को तीन से चार साल कर के, कालेजों को रिजल्ट के आधार पर फंड देने आदि तरीकों से शिक्षा के दरवाजे आम छात्रों के लिए बंद करने की कोशिश की जा रही है। सोचिए! आजादी के 75 वर्ष बाद भी सरकार हर एक छात्र को शिक्षा तक नहीं दे पाई है। इसके बावजूद भी मोदी सरकार बेशर्मी से हमें ‘विश्वगुरू’ बनने का ख्वाब दिखाकर हमें अक्ल का अंधा ही बना रही है।
दूसरी तरफ हम नौजवानों पर बेरोजगारी की तलवार से निरंतर हमला कर हमें घायल किया हुआ है। बेरोजगारी बढ़ाने में पूर्व की सरकारें भी कम नहीं थी लेकिन मोदी जी की सरकार ने तो सारे रिकार्ड ही तोड़ डाले। जैसे-तैसे डिग्रियां पूरी कर जब हम रोजगार के लिए पहुंच रहे हैं तो वहां सुरसा की तरह बढ़ती बेरोजगारी हमें खाने के लिए तैयार बैठी है। एनसीआरबी के अनुसार साल 2021 में 37,751 दिहाड़ी मजदूर, 18,803 स्वरोजगारशुदा और 11,724 बेरोजगार लोग आत्महत्या कर असमय मौत के मुंह में धकेल दिये गये।
एक फार्म, फिर दूसरा, फिर तीसरा ..... एक पेपर, फिर दूसरा, फिर तीसरा ..... सब कुछ है पर हम नौजवानों के लिए केन्द्र की मोदी सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों के पास एक अदद नौकरी नहीं है। जैसे-तैसे अगर पेपर हो भी रहा है तो माफियाओं द्वारा पेपर ही लीक करवा दिया जा रहा है। अगर पेपर ठीक-ठाक तरीके से हो जा रहा है तो रिजल्ट अटका दिया जा रहा है। और हम नौजवान सालों की अपनी मेहनत, पैसे, सपनों को बर्बाद होता देख फिर नई नौकरी की तैयारी में लग जा रहे हैं। यह इस सब के बावजूद कि सरकारी नौकरियों में लाखों पद रिक्त पड़े हुए हैं।
ये सरकारी नौकरियों का हाल है। प्राइवेट में तो जिंदगी और भी बुरी है। 10 से 12 हजार सैलरी, 12-12 घंटे काम, ठेके पर नौकरी और जब मन आया लात मार कर हमें बाहर कर दिया जा रहा है। हम अपनी पीठ झाड़ते फिर किसी दूसरी नौकरी की तलाश में लग जा रहे हैं।
लगातार तबाह होती जिंदगी के खिलाफ जनता के संघर्षों से बचने के लिए मोदी सरकार अपने मातृ संगठन आरएसएस के साथ मिलकर हम युवाओं को ही आपस में लड़ाने की चाल चल रही है। अंग्रेजों की तरह ‘बांटो और राज करो’ नीति पर चलते हुए मोदी सरकार आम जनता के दिमाग में लगातार सांप्रदायिकता का जहर घोल रही है। पूंजीपतियों का मीडिया भी बेरोजगारी, महंगाई, निजीकरण जैसी हमारी समस्याएं दिखाने के बजाए हिंदू-मुस्लिम की डिबेट में रात-दिन लगा हुआ है। इन सारी चीजों से सरकार हमें एक हो कर लड़ने से रोकना चाहती है। हम युवाओं के दिमाग में सांप्रदायिक जहर घोलकर मोदी सरकार, अंग्रेजों की ही तरह हमें ‘अक्ल का अंधा बना रही है।’
अंग्रेजों की गुलामी के साथ ही आज की तरह की बाकी स्थितियां भगत सिंह और उनके साथियों के सामने भी थी। देश की ऐसी स्थिति को देखते हुए भगत सिंह ने स्पष्ट कहा ‘‘यह भयानक असमानता और जबरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुंह पर बैठकर रंगरलियां मना रहा है और शोषितों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।’’ (‘बम काण्ड पर सेशन कोर्ट में भगत सिंह और दत्त के बयान’ से)
कब तक हम अपने सपनों, भविष्य और देश को ऐसे ही लुटते देखेंगे? क्या हम हमारी जिंदगी को धूल धूसरित करने वाले शासकों का गिरेबान पकड़ उन्हें तख्त से नहीं उतारेंगे? क्या हम अपने शहीदों के संघर्षों से कुछ नहीं सीखेंगे? जिन्होंने गैरबराबरी, शोषण मुक्त भारत बनाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।
आज पूंजीवादी समाज और पूंजीवादी शासक नौजवानों को कुछ भी सकारात्मक देने में निरंतर असफल साबित होते जा रहे हैं। युवाओं को नशे, अवसाद, अंधकारमय भविष्य के दलदल में फंसाने का काम भी पूंजीवादी शासकों द्वारा किया जा रहा है। निराशा और पस्तहिम्मती में कई युवा आत्महत्मा करने को मजबूर किये जा रहे हैं। युवा अपनी ऊर्जा और रचनात्मकता के जरिये इन शासकों को कोई चुनौती पेश न कर पायें इसके लिए सांप्रदायिकता व फर्जी राष्ट्रवाद के उन्माद में युवाओं को डुबाने का प्रयास किया जा रहा है। आज यही चुनौती युवाओं के सामने है कि शासकों के इन हथकंडों में फंसने के बजाय वह भगत सिंह के बताये रास्ते पर चलें। उनके विचारों को जानें।
आज की परिस्थितियां चीख-चीखकर हम नौजवानों से एक नए समाज, समाजवादी समाज की मांग कर रही हैं। आज हमारा देश हमसे मांग कर रहा है कि हम अपने संगठित संघर्षों से क्रांति का ऐसा ज्वार पैदा करें जिसमें शोषण, गरीबी, सांप्रदायिकता, अशिक्षा, जातिवाद, बेरोजगारी जैसी समस्याएं सदा के लिए खत्म हो जाएं। भगत सिंह और उनके साथी भी ऐसे ही समाजवादी भारत के निर्माण में निरंतर लगे रहे और इसी सपने के लिए शहीद हो गये। आज इस सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी हम छात्र नौजवानों के कंधों पर है। भगत सिंह ने युवाओं को दिशा दिखाते हुए कहा था ‘‘हम समाजवादी क्रांति चाहते हैं, जिसके लिए बुनियादी जरूरत राजनीतिक क्रांति की है। ..... इसके बाद पूरी संजीदगी से पूरे समाज को समाजवादी दिशा में ले जाने के लिए जुट जाना होगा।’’ (‘नवयुवक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र’ से) आइए! समाजवादी भारत के निर्माण में हम जी जान से जुट जाएं।
लेकिन क्रांति या समाज बदलाव का ये काम हम छात्र-नौजवान अकेले-अकेले नहीं कर सकते। हमें मजदूर-मेहनतकशों के क्रांतिकारी संगठनों के साथ कंधे से कंधा मिलाना होगा। छात्रों-युवाओं को इसी उद्देश्य से एकजुट करने हेतु हमने परिवर्तनकामी छात्र संगठन का निर्माण किया है। पछास अपनी पूरी ताकत के साथ भगत सिंह के विचारों को समाज में फैलाने और उनके आदर्शों पर चलते हुए समाजवादी भारत के निर्माण के लिए संघर्ष कर रहा है। इस संघर्ष में आप भी हमारे हमसफर बनें। आइए संगठित होकर शोषण मुक्त भारत के निर्माण के लिए आगे बढ़े।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

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