आखिरकार छात्र संघ चुनाव पुनः शुरु करवाने में छात्रों ने सफलता पायी है। कोरोना काल में लगी पाबंदियों के बाद सब कुछ शुरु होने के बावजूद छात्र संघ चुनाव के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। अंततः 24 दिसम्बर को कुमाऊं विश्वविद्यालय के कॉलेजों में चुनाव सम्पन्न होने हैं।
छात्र संघों को सरकारों ने शैक्षिक मामलों से बहुत पहले ही दूर कर दिया था। इसके चलते शिक्षा, पाठ्यक्रम, संस्थानों में संसाधनों की बेहतरी जैसे विषयों पर फैसले तो दूर चर्चा, राय से भी छात्र संघ बाहर कर दिये गये हैं। सरकार के इन कदमों ने छात्र संघों के महत्व को गिरा दिया।
ऐसे में छात्र संघों का प्रभाव कमजोर होता चला गया। कभी उत्तराखण्ड में राज्य आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो जैसे आंदोलनों में छात्र संघों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके बाद भी छात्र हितों व सामाजिक मुद्दों पर छात्रों की स्वतंत्र भूमिका बनी रही है।
लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों; उम्र, एक ही बार चुनाव लड़ना, आदि; ने छात्र संघ चुनाव को मात्र प्रत्याशियों की नूराकुश्ती का क्षेत्र बना दिया। वहीं पैसे, प्रिंटेट पोस्टरों पर रोक, आदि जैसी लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें कभी लागू ही नहीं करवायी जाती हैं। अब चुनाव लड़ने का एकमात्र मौका मिलने और जीतने की ललक ने छात्र संघ चुनाव को और खर्चीला और गुण्डागर्दी से भर दिया है। पैसे-प्रचार की ताकत प्रमुखता हासिल करती गयी है। आज छात्र संघ चुनावों में छात्रा, दलित, जनजाति, अल्पसंख्यक छात्रों का प्रतिनिधित्व होने की गुंजाइश और भी कमजोर हो गयी है। अब इन छात्र संघ चुनावों में सब कुछ है अगर नहीं हैं तो छात्रों के असल मुददे। अपने कैरियर के लिए चुनाव लड़ने वाले विभिन्न पार्टियों के प्रतिनिधियों ने इसके स्तर को और भी नीचे गिरा दिया है। संसदीय चुनाव की पतनशीलता यहां भी आम बन गयी है।
एक मात्र मौके में जीतने के कारण छात्र संघ चुनावों में प्रत्याशियों के बीच विवाद-झगड़े होते हैं। इसका बहाना बना छात्र संघों को ही खत्म करने की आवाज उठती हैं। लेकिन ऐसा करने वाले सरकार के शिक्षा-छात्र विरोधी कदमों और लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों की भूल कर भी आलोचना नहीं करते हैं। छात्र संघों की संघर्षशील भूमिका के लिए छात्रों को सजग होना होगा।
शिक्षा-छात्र हितों के खिलाफ उठ रहे सरकारी कदमों का विरोध करने के लिए छात्र संघों को खड़ा करना होगा। छात्र प्रतिनिधियों को गिफ्टों-पार्टियों, फिजूल खर्चों पर टोकना होगा। छात्र हितों, शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ, सामाजिक हितों के विषयों पर संघर्ष के लिए छात्र संघों को तैयार करना होगा। किसी भी तरह जीतने के चुनावी दलदल से छात्र संघों को बाहर निकालने के लिए जरूरी है कि हम छात्र संघर्षों की गौरवशाली क्रांतिकारी परम्परा से जुड़ें। शिक्षा-रोजगार के लिए देश-दुनिया में हो रहे छात्र संघर्षों से खुद को जोड़ें, उनसे प्रेरणा लें। इसी राह पर चलकर हम छात्र; समाज को बेहतर बनाने में अपनी सकारात्मक भूमिका निभा सकेंगे।
परिवर्तनकामी छात्र संगठन इस हेतु सभी छात्रों का आह्वान करता है कि छात्र संघों को छात्र हितों के संघर्ष का वास्तविक मंच बनाने की हमारी मुहिम से जुड़ें।
सम्पर्क सूत्र- 9837479097 follow us- pachhas haldwani
क्रांतिकारी अभिववादन सहित
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)
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