UGC ने विदेशी विश्विद्यालयों को भारत में खोलने के लिए नियमों का ड्राफ्ट पेश कर दिया है। इस ड्राफ्ट पर 18 जनवरी तक सुझाव मांगे गए हैं। इसके बाद नियमों को अंतिम रूप दिया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी इस बात की चर्चा थी। और अब सरकार तेजी से विदेशी विश्विद्यालयों को भारत में खोलने की अनुमति देने को आतुर है।
एम जगदीश कुमार ने कहा कि NEP के तहत विश्व स्तरीय और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने हेतु यह कदम उठाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जारी शैक्षिक सत्र में तकरीबन साढ़े चार लाख छात्र उच्च शिक्षा लेने हेतु दुनिया भर के देशों में गए। इनकी पढ़ाई पर अनुमानित 28 से 30 बिलियन डॉलर खर्च हो जाता है।
इस ड्राफ्ट को पेश करते हुए ऐसा जताया गया जैसे छात्रों और उनके अभिभावकों की सरकार को बड़ी चिंता हो। इन छात्रों का विदेशों में जाकर पढ़ने में जो बहुत पैसा खर्च होता है, उसकी सरकार को चिंता हो। ऐसा जताया जा रहा है जैसे UGC और सरकार छात्रों की गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने की चिंता में पतले हुए जा रहे हों। असल में ये सब दिखावटी आवरण हैं। असल में यह शिक्षा और विशेष तौर पर उच्च शिक्षा में निजी खिलाड़ियों को निवेश के लिए आमंत्रित करने की योजना है। एक तरफ जहां अपने देश में उच्च शिक्षा के बजट में कटौती निरंतर जारी है, विभिन्न कोर्सों में सीटों के संख्या में कटौती जारी है, जहां दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों सहित आम छात्रों को दी जा रही स्कॉलरशिप में कटौती की जा रही हो वहां पर इस मसौदे की असलियत को समझा जा सकता है।
Jnu में संघ और भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे को परवान चढ़ाने वाले एम जगदीश कुमार को शायद इसलिए UGC का चेयरमैन बनाया गया है की वो वैसे ही NEP को भी लागू करें। NEP में शिक्षा से सरकार के हाथ खींचने और शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने की बातें विस्तार से हैं। अब UGC द्वारा और एम जगदीश कुमार द्वारा इसी दिशा में तेजी से बढ़ा जा रहा है।
UGC इन विदेशी विश्विद्यालयों को अपने नियमों के तहत ही भारत में खोलने की अनुमति देने की बात कहता है। इनको ऑफलाइन कोर्स कराने होंगे, अपने देश के अनुरूप ही शिक्षा की गुणवत्ता रखनी होगी, भारतीय या विदेशी फैकल्टी की योग्यता मूल देश के मुख्य परिसर के अनुसार होगी। इस प्रकार ये कुछ बंदिशों की बातें है। लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार अपनी बंदिशों को भविष्य में स्थापित होने वाले विदेशी विश्विद्यालयों से लागू करवा पाती है नहीं।
लेकिन दूसरी तरफ बहुत सारी छूटें इन विदेशी विश्विद्यालयों को दी गई हैं। इनको अपने अनुसार प्रवेश प्रक्रिया तय करने, अपनी प्रवेश परीक्षा लेने, फीस तय करने, फंड को वापस अपने देश भेजने आदि छूटे दी गई हैं। इन संस्थानों में आरक्षण की नीति को लागू करने या न करने का निर्णय भी विदेशी विश्विद्यालय करेंगे। कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के छात्रों हेतु छात्रवृत्ति को लेकर भी स्पष्ठ भी नहीं किया गया है। जाहिर है इस पर भी विदेशी विश्विद्यालय ही फैसला लेंगे।
यह बात भी गौरतलब है कि राष्ट्रवाद की बातें करने वाली 'राष्ट्रवादी' सरकार 'विश्व स्तरीय शिक्षा' और 'गुणवत्ता पूर्ण' शिक्षा के लिए विदेशियों पर निर्भर होने जा रही है। इससे बड़ा प्रहसन और क्या होगा जब भारत को विश्वगुरु बनाने की जिद पकड़े हुए संघ-भाजपा की सरकार 'विश्व स्तरीय और गुणवत्ता पूर्ण' शिक्षा के लिए विदेशियों पर निर्भर होने को मजबूर हो रही है।
इन विदेशी विश्विद्यालयों का मकसद भारतीय शिक्षा बाजार से मुनाफा कमाना है। देशी और विदेशी पूंजीपति वर्ग इसके लिए ये लंबे समय से प्रयासरत थे। अब भाजपा और संघ की सरकार ने उनकी मांग पूरी कर दी है। पूर्व की कांग्रेस सरकार ने भी इसकी कोशिश की थी लेकिन तब भाजपा ने विदेशी विश्विद्यालयों को भारत में खोले जाने का विरोध किया था। पूँजी की सेवा में नतमस्तक संघ-भाजपा की सरकार ने अभी विदेशी विश्विद्यालयों को भारत में आने की अनुमति देकर शिक्षा के क्षेत्र में पूँजी की सेवा के लिए सारे रास्ते खोल दिये हैं।
जनता को हिंदू-मुस्लिम के झगड़ों में फंसाकर, उनको अंध राष्ट्रवाद के उन्माद में डालकर, भारत को विश्वगुरु बनाने का सपना बेचकर ये बड़ी पूंजी, साम्राज्यवादी पूंजी के सेवा में लगे हैं।
इस प्रकार विदेशी विश्विद्यालयों को भारत में खोलने की अनुमति देकर सरकार उच्च शिक्षा पर खर्च को कम करना चाहती है। इन विदेशी विश्विद्यालयों में जो फीस होगी उनको भारत के चंद लोग ही चुका पाने में सक्षम होंगे। यह शिक्षा में विभाजन की खाई को और चौड़ा कर देगा। एक तरफ चंद लोगों के लिए ऐसे विश्विद्यालय होंगे और दूसरी तरफ गरीबों और आम छात्रों के लिए संसाधन विहीन संस्थान होंगे।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)
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