आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में 37 वर्षीय वी. चंद्रशेखर ने अपने छह और सात साल के बच्चों की हत्या कर दी। खुद भी आत्महत्या कर ली। सुसाइड नोट में हत्या का कारण बच्चों का पढ़ाई में कमजोर होना बताया। हर समय गलाकाटू प्रतियोगिता के लिए तैयार होने की बातें होती हैं। प्रतियोगिता के साये में बच्चों, नौजवानों से लेकर माता-पिता तक सब रहते हैं। बाजार में मालों की होड़ से लेकर, अपने को बाजार के लायक बनाने की इंसानी होड़ ही पूंजीवाद की सच्चाई है। क्या समाज ऐसा ही हो सकता है?
उत्पादन के साधनों (फैक्टरी, खदान, प्राकृतिक संसाधनों, आदि) पर पूंजीपतियों का कब्जा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की आड़ में पूंजीवादी व्यवस्था चलती है। सरकारें भी लोकतांत्रिक नहीं बल्कि पूंजीवादी ही हैं। अन्य लोगों के लिए खुद को इन "मालिकों" (लुटेरे) के काम के लायक बनाना ही जीने का एकमात्र जरिया बनता है। वी. चंद्रशेखर सरकारी तेल कंपनी ओएनजीसी में कार्यरत कर्मचारी थे। मजदूरों की दुर्दशा को हर तरह से छुपाने की कोशिश होती है। लेकिन अन्य मेहनतकशों के जरिये इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
प्रतियोगिता और पूंजीपतियों के लायक सेवक बन किसी भी तरह बस जीने से बेहतर है- उत्पादन के साधनों के मालिक होना। यही समानता पर आधारित समाज की नींव है। इसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था, सरकार जिससे भी भिड़ना पड़े, वह कम ही पीड़ादायी है। तिल-तिल मरने से बेहतर है। वी. चंद्रशेखर और उनके बच्चे बेमौत इसका शिकार बने।


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