इस समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर जिला साम्प्रदायिक उन्माद की आग में जल रहा है। 9 सितम्बर के अखबारों में 21 से 28 तक मृतकों की संख्या बताई गई है। कई लोग लापता भी बताये जा रहे हैं। उम्मीद है कि मृतकों की वास्तविक संख्या घोषित आंकड़ों से दुगनी-तिगुनी होगी।
मुजफ्फरनगर के विभिन्न गांवों-कस्बों में पिछले पखवाड़े भर से साम्प्रदायिक दुष्प्रचार किया जा रहा था। छेड़खानी की घटना को लेकर हुए दोतरफा हत्याकांड (कंवाल प्रकरण) को कट्टरपंथी ताकतों ने पूरी तरह से साम्प्रदायिक रंग में रंग डाला। संघ-भाजपा व उनसे जुड़े संगठनों की इसमें मुख्य भूमिका है। प0 उत्तर प्रदेश में खासा प्रभाव रखने वाली, टिकैत परिवार से जुड़ी, भारतीय किसान यूनियन भी हिंदू कट्टरपंथियों के साथ है । 7 सितंबर को इन पार्टियों-संगठनों द्वारा आयोजित हथियारबंद ‘बहू-बेटी बचाओ’ महापंचायत के बाद ही साम्प्रदायिक तनाव को व्यापक दंगों में बदल दिया गया।
स्थानीय प्रशासन व राज्य की सपा सरकार ने शुरूवात से ही इस पूरे मामले में घोर लापरवाही व अगंभीरता का परिचय दिया। कंवाल प्रकरण को सामान्य कानून-व्यवस्था के दायर में मुस्तैदी से नहीं निपटाया गया। मुद्दे का साम्प्रदायीकरण हो जाने दिया। विभिन्न तरीकों से किये जा रहे साम्प्रदायिक प्रचार को रोकने के लिए विशेष कदम नहीं उठाये गये। 7 सितंबर की महापंचायत को नहीं रोका गया। और भी, इसी तरह की लापरवाहियां की गयीं। संभवतः लापरवाही की बजाय यह शासन-प्रशासन की दंगों में संलिप्तता का मामला भी हो सकता है।
2014 में आम चुनाव होने हैं। सभी पार्टियां इसके लिए पूरा दम-खम लगा रहीं है। भाजपा एक बार फिर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के अपने एजेण्डे को मुख्य रणनीति के बतौर इस चुनाव में इस्तेमाल कर रही है। भले ही यह राष्ट्रीय मंचों से खुले साम्प्रदायिक विषवमन के रूप में ना हो, किंतु नरेंद्र मोदी की अगुवाई, अमित शाह को उ0प्र0 का चुनाव प्रभारी बना, अयोध्या में ‘84 कोसी परिक्रमा विवाद’, जगह-जगह प्रायोजित दंगे, आदि इस ध्रुवीकरण के ही उपक्रम हैं । पिछले साल भर में केवल उ0प्र0 के अंदर ही तीन दर्जन से ज्यादा दंगे हो चुके है। इनमें बरेली, फैजाबाद और अब मुजफ्फरनगर का यह दंगा तो बड़ी घटनायें हैं।
हिंदुत्व के नाम पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण संघ का घोषित ऐजेण्डा है। किंतु गठबंधन की राजनीति के दबाव में पिछले एक-डेढ़ दशक से भाजपा ने इसे अपने घोषित ऐजेण्डों में पीछे रखा हुआ था। दो बार की चुनावी पराजय और राजग गठबंधन के मुखर साम्प्रदायिक पार्टियों तक सीमित रह जाने के बाद इस बार भाजपा साम्प्रदायिकता के ऐजेण्डे को पुनः आगे ले आयी है। नरेंद्र मोदी इस देशव्यापी प्रचार अभियान का ‘पोस्टर ब्वाय’ है। मुजफ्फरनगर व हाल में हुए अन्य दंगे इस प्रचार अभियान का ही हिस्सा हैं।
संघ-भाजपा के इस साम्प्रदायिक प्रचार अभियान के प्रति कांग्रेस-सपा जैसी पार्टियों की भूमिका बेहद घृणास्पद है। वे यह चुनावी गणित बैठा रहे हैं कि यदि मोदी व हिंदुत्व का अधिकाधिक प्रचार होगा तो मुस्लिम भयाक्रांत होकर उनके साथ सुदृढ़ हो जायेंगे। देश में बिगड़ते साम्प्रदायिक माहौल की इन्हें चिंता नहीं है।
देश के सामने इस वक्त चुनौतिपूर्ण स्थिति है। देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है। एक के बाद एक जनविरोधी बिल पारित किये जा रहे हैं। जगह-जगह जनांदोलनों का दमन किया जा रहा है। सरकारें चोतरफा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हैं। ऐसे में पूंजीवादी शासकों के खिलाफ जन लामबंदी स्वाभाविक है। किंतु साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण इस लामबंदी को खंडित कर देगा। इस प्रकार यह ध्रुवीकरण और इसकी आड़ में तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों का दब जाना न केवल भाजपा बल्कि सभी पूंजीवादी पार्टियों व पूजीपति वर्ग के हित में है।
परिवर्तनकामी छात्र संगठन सभी क्रांतिकारी-जनवादी-प्रगतिशील संगठनों व छात्रों-नौजवानों का आह्वान करता है कि पूंजीवादी शासकों व कट्टरपंथी ताकतों के इस षड्यंत्र को नाकाम करने के लिए आगे आयें।
मुजफ्फरनगर के विभिन्न गांवों-कस्बों में पिछले पखवाड़े भर से साम्प्रदायिक दुष्प्रचार किया जा रहा था। छेड़खानी की घटना को लेकर हुए दोतरफा हत्याकांड (कंवाल प्रकरण) को कट्टरपंथी ताकतों ने पूरी तरह से साम्प्रदायिक रंग में रंग डाला। संघ-भाजपा व उनसे जुड़े संगठनों की इसमें मुख्य भूमिका है। प0 उत्तर प्रदेश में खासा प्रभाव रखने वाली, टिकैत परिवार से जुड़ी, भारतीय किसान यूनियन भी हिंदू कट्टरपंथियों के साथ है । 7 सितंबर को इन पार्टियों-संगठनों द्वारा आयोजित हथियारबंद ‘बहू-बेटी बचाओ’ महापंचायत के बाद ही साम्प्रदायिक तनाव को व्यापक दंगों में बदल दिया गया।
स्थानीय प्रशासन व राज्य की सपा सरकार ने शुरूवात से ही इस पूरे मामले में घोर लापरवाही व अगंभीरता का परिचय दिया। कंवाल प्रकरण को सामान्य कानून-व्यवस्था के दायर में मुस्तैदी से नहीं निपटाया गया। मुद्दे का साम्प्रदायीकरण हो जाने दिया। विभिन्न तरीकों से किये जा रहे साम्प्रदायिक प्रचार को रोकने के लिए विशेष कदम नहीं उठाये गये। 7 सितंबर की महापंचायत को नहीं रोका गया। और भी, इसी तरह की लापरवाहियां की गयीं। संभवतः लापरवाही की बजाय यह शासन-प्रशासन की दंगों में संलिप्तता का मामला भी हो सकता है।
2014 में आम चुनाव होने हैं। सभी पार्टियां इसके लिए पूरा दम-खम लगा रहीं है। भाजपा एक बार फिर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के अपने एजेण्डे को मुख्य रणनीति के बतौर इस चुनाव में इस्तेमाल कर रही है। भले ही यह राष्ट्रीय मंचों से खुले साम्प्रदायिक विषवमन के रूप में ना हो, किंतु नरेंद्र मोदी की अगुवाई, अमित शाह को उ0प्र0 का चुनाव प्रभारी बना, अयोध्या में ‘84 कोसी परिक्रमा विवाद’, जगह-जगह प्रायोजित दंगे, आदि इस ध्रुवीकरण के ही उपक्रम हैं । पिछले साल भर में केवल उ0प्र0 के अंदर ही तीन दर्जन से ज्यादा दंगे हो चुके है। इनमें बरेली, फैजाबाद और अब मुजफ्फरनगर का यह दंगा तो बड़ी घटनायें हैं।
हिंदुत्व के नाम पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण संघ का घोषित ऐजेण्डा है। किंतु गठबंधन की राजनीति के दबाव में पिछले एक-डेढ़ दशक से भाजपा ने इसे अपने घोषित ऐजेण्डों में पीछे रखा हुआ था। दो बार की चुनावी पराजय और राजग गठबंधन के मुखर साम्प्रदायिक पार्टियों तक सीमित रह जाने के बाद इस बार भाजपा साम्प्रदायिकता के ऐजेण्डे को पुनः आगे ले आयी है। नरेंद्र मोदी इस देशव्यापी प्रचार अभियान का ‘पोस्टर ब्वाय’ है। मुजफ्फरनगर व हाल में हुए अन्य दंगे इस प्रचार अभियान का ही हिस्सा हैं।
संघ-भाजपा के इस साम्प्रदायिक प्रचार अभियान के प्रति कांग्रेस-सपा जैसी पार्टियों की भूमिका बेहद घृणास्पद है। वे यह चुनावी गणित बैठा रहे हैं कि यदि मोदी व हिंदुत्व का अधिकाधिक प्रचार होगा तो मुस्लिम भयाक्रांत होकर उनके साथ सुदृढ़ हो जायेंगे। देश में बिगड़ते साम्प्रदायिक माहौल की इन्हें चिंता नहीं है।
देश के सामने इस वक्त चुनौतिपूर्ण स्थिति है। देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है। एक के बाद एक जनविरोधी बिल पारित किये जा रहे हैं। जगह-जगह जनांदोलनों का दमन किया जा रहा है। सरकारें चोतरफा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हैं। ऐसे में पूंजीवादी शासकों के खिलाफ जन लामबंदी स्वाभाविक है। किंतु साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण इस लामबंदी को खंडित कर देगा। इस प्रकार यह ध्रुवीकरण और इसकी आड़ में तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों का दब जाना न केवल भाजपा बल्कि सभी पूंजीवादी पार्टियों व पूजीपति वर्ग के हित में है।
परिवर्तनकामी छात्र संगठन सभी क्रांतिकारी-जनवादी-प्रगतिशील संगठनों व छात्रों-नौजवानों का आह्वान करता है कि पूंजीवादी शासकों व कट्टरपंथी ताकतों के इस षड्यंत्र को नाकाम करने के लिए आगे आयें।
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