8 March 2013

8 मार्च अन्तर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस के अवसर पर



 इंकलाब ज़िन्दाबाद!                                                                                                                                          समाजवाद ज़िन्दाबाद!!
                         8 मार्च अन्तर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस के अवसर पर
       पुरूष प्रधान मूल्य-मान्यताओं और नारी विरोधी उपभोक्तावादी संस्कृति पर धावा बोलो!
              अंतर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस की क्रांतिकारी विरासत को आगे बढ़ाओं!!
                कामगार बहिनों और भाइयों! भारत में महिलाओं को कितनी बेखौफ आज़ादी और सुरक्षा हासिल है, राजधानी दिल्ली में पैरामेडिकल की छात्रा दामिनी के साथ हुये सामूहिक बलात्कार की दर्दनाक घटना इसका प्रतीक उदाहरण है। कार्यस्थलों से लेकर घर के भीतर तक महिलायें असुरक्षित हैं। यहां तक कि कोख में भी बच्चियां असुरक्षित हैं।

                8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस दुनिया की आधी आबादी की मुक्ति के लिये कामगार महिलाओं द्वारा किये गये बहादुराना संघर्षों की एक श्रृंखला है। एक ऐसा दिन जब सारे विश्व मे महिलायें एक सूत्र में बंधकर हर प्रकार के शोषण-उत्पीड़न और गैरबराबरी के खिलाफ सड़कों पर उतरती हैं। नारी मुक्ति के सवाल को निजी सम्पत्ति के खात्मे से जोड़कर महिलाओं को मज़दूर वर्ग के साथ में कंधे से कंधा मिलाकर पूंजीवाद के खिलाफ और समाजवाद की स्थापना के लिये क्रान्तिकारी संघर्ष खड़े करने के लिये गोलबंद होने का आह्वान कर शोषकों उत्पीड़कों के भीतर सिहरन पैदा करती हैं।
                टाटा-बिड़ला-अंबानी जैसे देशी-विदेशी कारपोरेट सरकारों/ सेंसर बोर्ड की मेहरबानी से अश्लील फिल्मों, गानों, सीरियलों, विज्ञापनों, पोर्न वेबसाइटों, पत्र-पत्रिकाओं आदि में नारी देह का इस्तेमाल कर अपनी दौलत को बढ़ा रहे हैं, समाज में नारी विरोधी अश्लील उपभोक्तावादी संस्कृति को परोसकर यौन कुंठाओं से ग्रसित लोगों को तैयार कर रहे हैं। इस घृणित कारोबार का वीभत्स परिणाम महिलाओं को यौन हिंसा के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
                हमारा तथाकथित सभ्य समाज बलात्कार पीड़िता के साथ में बलात्कारी से भी अधिक क्रूर व्यवहार करता है। बलात्कार पीड़िता के जीवित बच जाने की स्थिति में परिजनों के मुंह से अक्सर यही शब्द निकलते हैं कि-‘‘ इससे अच्छा तो यह मर जाती’’। बलात्कारी को बचाने के लिए परिजन पूरा ज़ोर लगा देते हैं। बलात्कार पीड़िता के संदर्भ में कहा जाता है कि इसकी इज्जत लुट गयी है, वहीं बलात्कारी इज्ज़तदार बना रहता है। पीड़िता का जीना दूभर हो जाता है।
                महिला विरोधी खाप पंचायतें शासक वर्गों की सह पर खुलेआम महापंचायतें आयोजित कर महिला विरोधी फतवे जारी कर रही हैं। प्रेमी जोड़ों को सरेआम कत्ल किया जाता है। झूठी इज्जत के नाम पर लड़कियों की हत्यायें करना आम बात है। पूंजीवादी राजनैतिक पार्टियां अपने वोट बैंक की खातिर इन प्रतिगामी ताकतों को पाल-पोस रही हैं। दिल्ली गैंगरेप की दर्दनाक घटना के बाद भाजपा, कांग्रेस सहित अन्य पूंजीवादी पार्टियों के नेताओं, तथाकथित धर्म गुरूओं एवं फासिस्टों द्वारा ‘‘देश को आजादी आधी रात में मिली इसका मतलब यह नहीं है कि महिलायें रात के अंधेरे में बाहर निकलें’’ जैसे महिला विरोधी बयान देना एवं निचली जाति की भंवरी देवी के मामले में राजस्थान सेशन कोर्ट के जज का यह बयान कि ‘‘ सवर्ण जाति के ये सम्मानित लोग दलित जाति की महिला के साथ बलात्कार नहीं कर सकतें हैं’’, भारतीय पूंजीवादी व्यवस्था के कर्णधारों के नारी विरोधी, दलित विरोधी चरित्र को ही दर्शाते हैं।
                जिस व्यवस्था में कश्मीर, पूर्वोत्तर से मध्य भारत तक में पुलिस एवं सेना महिलाओं के साथ बलात्कार कर पूंजीपति वर्ग की सत्ता की ताकत को प्रदर्शित करती हो, शिक्षिका सोनी सौरी के गुप्तांगों में पत्थर भरने वाले एस0 पी0 अंकित गर्ग को वीरता पदक दिया जाता हो, ऐसी व्यवस्था में महिलाओें को न्याय व मुक्ति मिलेगी?
                कामगार महिलाओं के हित पूंजीवादी महिलाओं एवं नारीवादियों के हितों से अलग हैं। पूजीवादी महिलाओं/नारीवादियों का उद्देश्य महज पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर अपनें पतियों, पिताओं, भाइयों के समान ही सुविधायें, ताकत और अधिकार हासिल करना है, जबकि कामगार महिलाओं का उद्देश्य जन्म या सम्पत्ति से प्राप्त सभी सुविधाओं को समाप्त करना है। एक कामगार महिला कामगार एवं नागरिक होने के साथ ही एक मां भी है। वर्तमान राजसत्ता का कामगार महिलाओं एवं उनके बच्चों के प्रति कोई सरोकार बनता है? बेहद मामूली वेतन पर प्रतिदिन 10-12 घंटों तक कार्यस्थलों में खटने वाली एक कामगार महिला अपने बच्चों की परवरिश कैसे कर पायेगी? महिला मजदूरों के कार्य के दौरान अपने बच्चों की चिन्ता में प्राण सूखे रहते हैं। मालिकों द्वारा महिला मजदूरों के बच्चों को एक तरह से अनाथ बना दिया गया है। गर्भवती होने पर महिला मज़दूरों को मालिकों द्वारा संवेदनहीन हो काम से निकालकर अपने शिशु के साथ भूखा मरने के लिये छोड़ दिया जाता है। क्या सोनिया गांधी, प्रतिभा पाटिल, एश्वर्य राय, किरन बेदी जैसी शासक वर्गीय महिलाओं को भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ता है? क्या महिला मजदूर इन शासक वर्गीय महिलाओं की संवेदना की पात्र बनती हैं? क्या महिला मज़दूरों को इस बात से कोई फर्क पड़ता है कि उसका मालिक पुरूष है अथवा महिला? कामगार महिलाओं की वर्गीय एकता पुरूष मज़दूरों के साथ में बनती है। कामगार महिलाओं की मुक्ति का सवाल अभिन्न रूप से मजदूर वर्ग की मुक्ति से जुड़ा है।
       दुनिया के सबसे बड़े देश रूस में अक्टूबर 1917 में मजदूर वर्ग के नेतृत्व में की गयी समाजवादी क्रांति के बाद गठित समाजवादी राज्य ने महिलाओं की मुक्ति के लिये वास्तविक आधार प्रदान किया । सभी नागरिकों को सम्मानजनक रोज़गार उपलब्ध कराने से महिलाओं की सार्वजनिक उत्पादन में व्यापक भागीदारी बनी। महिलाओं को घरेलू दासता से मुक्त कराने के लिए घरेलू कामों को सार्वजनिक दायरे में लाकर सरकार द्वारा सार्वजनिक भोजशालायें, शिशुपालन गृह, कपड़े धोने के लिए सार्वजनिक लान्ड्रियाँ खोली गयी, कामगार महिलाओं के लिए सवेतनिक प्रसूति एवं मातृत्व अवकाश घोषित किया गया, विवाह का आधार प्रेम बनाया गया। ऐसे ही अनेक कदम उठाने से महिलाओं की सामाजिक, राजनैतिक आदि क्षेत्रों में व्यापक भागीदारी बनी।
       सख्त कानून बनाओ, फांसी-फांसी की चीख पुकार के खोखले नुस्खों से यौन अपराधों पर कितनी रोक लगेगी इससे कामगार एवं आम महिलायें भली भांति परिचित हSa। जब वे अपनी रिपोर्ट लिखाने थाने जाती हैं तो थाने में बैठे पुलिस वालों द्वारा उनके साथ कितना अपमानजनक व्यवहार किया जाता है। कामगार महिलायें जब संस्थानों में श्रम कानूनों को लागू कराने के लिए संघर्ष करती है तो पूरी पूंजीवादी राज्य मशीनरी द्वारा अपनी पुलिस द्वारा उनका भयंकर दमन कर उन्हें कानूनों का असली अर्थ समझा दिया जाता है। वर्तमान समय में बलात्कार, आनर किलिंग, दहेज हत्याएं, कन्या भू्ण हत्याएं पूंजीवादी व्यवस्था की ही देन हैं । किस-किस को फांसी के फंदे पर लटकाओगे? नारी मुक्ति के लिये महिलाओं को मजदूरों-मेहनतकशों के साथ वर्गीय एकता कायम करते हुये पूंजीवाद के खिलाफ एवं समाजवाद की स्थापना के लिये संगठित होकर संघर्ष खड़े करने होंगे।
       आइये! अंतर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस के अवसर पर 8 मार्च को होने वाले कार्यक्रम में शामिल होकर महिला मुक्ति हेतु संघर्ष को आगे बढायें।
हमारी तात्कालिक मांगेs-                          
1. अश्लील फिल्मों-गानों-विज्ञापनों-सीरियलों-पोर्न वेबसाइटों-पत्र-पत्रिकाओं, अश्लील डांस पार्टियों पर प्रतिबंध लगाओ। इन्हें बनाने, प्रचारित-प्रसारित करने एवं मंजूरी देने वालों के खिलाफ कठोर कार्यवाही करो।
2. महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा एवं सम्मानजनक रोजगार प्रदान करो।
3.महिला विरोधी खाप पंचायतों को प्रतिबंधित करो।
4. महिलाओं के प्रति घटित अपराधों की शिकायतों पर उचित कार्यवाही न करने वाले पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त कर दंडित करो।
5. बलात्कार की जांच के लिए अपमानजनक ‘‘टू फिंगर टैस्ट’’ को प्रतिबंधित करो।
6. समान काम का समान वेतन एवं आठ घंटे के कार्य दिवस के कानून को सख्ती से लागू कराओ।
7. स्थायी काम के लिये स्थायी रोजगार के कानून को सख्ती से लागू कराओ।
8. सवैतनिक प्रसूति एवं मातृत्व अवकाश, बच्चों के लिए कार्यस्थलों पर क्रैच ;शिशुपालन गृह के कानूनी प्रावधानों को सख्ती से लागू कराओ।
9.कामगार महिलाओं के लिए कार्यस्थलों में आने-जाने के लिए मुफ्त एवं सुरक्षित परिवहन सुविधा उपलब्ध कराओ। रोडवेज एवं प्राइवेट बसों में कम से कम एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो।
10. कार्यस्थलों, शिक्षण संस्थानों में महिलाओं एवं छात्राओं के लिए विशेष शिकायत कमेटी गठित करो।

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