16 August 2014

सिविल सेवा परिक्षा और भाषा का सवाल

    पिछले दो माह से सिविल सेवा परीक्षा के ‘सीसैट’ के पेपर का हिन्दी भाषी क्षेत्र से आने वाले छात्र विरोध कर रहे थे। ये छात्र ‘सीसैट’ के पेपर में अपनाए जा रहे पैटर्न को गैरबराबरी पूर्ण मानते हुए इसे हटाने की मांग कर रहे हैं। लगातार ‘हिन्दी-हिन्दी’ चिल्लाने वाली बीजेपी सरकार निर्लज्जता के साथ छात्रों की इस समस्या का हल लाठी-डंडों से कर रही है।

    दरअसल देश के शासकों के पास छात्रों की इस मांग का कोई मुकम्मिल हल है भी नहीं। सिविल सेवा परीक्षा की शुरूआत अंग्रेजों के समय में हुयी थी। जिसमें इंग्लैण्ड का मध्यम वर्ग ही भाग लेता था। इसलिए इसमें अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व था। बाद के दिनों में भारत का पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग इन परिक्षाओं में भाग लेने लगा और इसे भी अंग्रेजी भाषा से कोई परेशानी नहीं थी। उल्टा उसे तो अंग्रेजियत से प्यार था। आजादी मिलने के बाद सत्ता पर बैठा शासक वही पूंजीपति वर्ग था जो अंग्रेजों के रहमो-करम पर पला-बड़ा था। इसलिए अंग्रेजों की प्रत्यक्ष गुलामी से आजाद हो जाने क बावजूद पूंजीपति वर्ग ने अपने हितों के मुताबिक समाज व शिक्षा में औपनिवेशिक मूल्यों को बनाए रखा। जिसको आज तक भारत के छात्र अपने कंधे पर ढोने को मजबूर हैं।
    हमारा स्पष्ट मानना है कि प्रत्येक छात्र को उसके सर्वांगिण विकास के लिए उसकी मातृभाषा में शिक्षा मिलना उसका जनवादी अधिकार है और सरकार का कर्तव्य है कि वो इसके लिए भौतिक
परिस्थितियां मुहैया करवाए।
    जहां तक एक काॅमन भाषा का सवाल है यदि आजादी के बाद सभी भारतीय भाषाओं को फलने-फूलने के समान अवसर दिया जाता तो अलग-अलग भारतीय भाषाओं के सम्मिलन से एक काॅमन भाषा विकसित हो सकती थी। जिसकी सम्भावनाएं आज भी मौजूद है। परन्तु भारतीय शासक वर्ग यह कतई नही चाहता कि भविष्य में आम जनता पर डण्डा बजाते हुए उसकी व्यवस्था की चाकरी करने वाला अफसर आम जनता की भाषा बोले।
    अन्त में छात्रों को इस बात को समझना होगा कि ये सवाल सिर्फ भाषायी गैरबराबरी का नहीं है बल्कि रोजगार के सिकुड़ते अवसर, तेजी से बढ़ती आर्थिक असमानता, शहर-देहात का अंतर व भारतीय शासक वर्ग के हित इसका मुख्य कारण है। जिसका हल गैरबराबरी पर टिकी इस पूंजीवादी व्यवस्था के बदलाव के लिए निर्णायक संघर्ष खड़े करने की ओर जाता है।

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