28 April 2015

किसान आत्महत्याएंः आखिर रास्ता क्या है?

दिल्ली के जंतर-मंतर में आप पार्टी की रैली में एक किसान गजेन्द्र द्वारा फांसी लगाकर आत्महत्या करने की घटना ने पूरे देश का ध्यान इस समस्या की ओर मोड़ दिया। विभिन्न पूंजीवादी पार्टियां भाजपा-कांग्रेस-आप आदि घड़ियाली आंसू बहाते हुए पूरे मामले को परस्पर जूतम-पैजार तक सीमित कर देना चाहती हैं। वे दशकों से जारी किसानों की आत्महत्याओं के असली कारणों को छुपा लेना चाहती है।

    दरअसल आजादी के बाद से ही भारतीय कृषि में पूंजीवादी विकास होने के चलते गरीब किसान की खेती निरन्तर बर्बाद होती रही है। पूरी खेती का बाजार उन्मुख बनना, सरकारों द्वारा किसानों को विभिन्न क्षेत्रों में दी जा रही सब्सीडी में कटौती, देशी-विदेशी पूंजी की खेती में घुसपैठ ने उन परिस्थितियों को पैदा किया है, जिसने किसानों को तेजी से ऐसे विभत्स कदम उठाने पर मजबूर किया है।स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले 10 वर्षो में देश के भीतर प्रतिदिन आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 46 थी। 1991 से जारी निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नितियों ने कृषि में पूंजीवाद की गति को और तेजी से बढ़ाया है। पूंजीवाद की गति ही यह है कि वो निरन्तर छोटी सम्पत्ति के मालिकों को उनकी सम्पत्ति से बेदखल करता जाता है। खेती से बेदखल किसान या तो शहरों में मजदूर बनने पहुंच रहा है अथवा बेरोजगारी की मार झेलते हुए आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है।
    हाल के वर्षो में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं का बड़ा कारण खेती के लिए लिया गया कर्ज ना चुका पाना रहा है। पिछले 5 वर्षो में पूंजीपतियों को 20 लाख करोड़ का बेल आउट पैकेज देने वाली और इस बजट में कारपोरेट टैक्स तक माफ कर देने वाली सरकारें, किसानों के कर्ज को माफ करने तक को तैयार नहीं है। उल्टा ये र्निलज्जता के साथ किसानों को मिलने वाली सब्सीडी में कटौती व भूमि अधिग्रहण कानून में पूंजीपतियों के पक्ष में संसोधन कर इस परिघटना को बढ़ाने का ही काम कर रही है।
    किसानों की ये आत्महत्याएं पूंजीवाद जनित रोग है। पूंजीवादी व्यवस्था के विरूद्ध समाजवादी व्यवस्था का निर्माण ही किसानों की बर्बादी और आत्महत्याओं को रोक सकता है। मजदूरों-किसानों के संश्रय से कायम समाजवादी राज्य, व्यक्तिगत पूंजीवादी खेती के स्थान पर सामूहिक खेती, राज्य द्वारा किसानों की उपज की खरीद तथा किसानों को राज्य द्वारा हर संभव मदद उपलब्ध करवाकर किसानों की समस्या का वैज्ञानिक हल पेश करता है। समाजवादी रूस इसका जीता-जागता उदाहरण रहा है।
    आज जरूरत बनती है कि समाज के प्रत्येक मेहनतकश तबके को एकजुट कर मेहनतकशों के खून से अपना मुनाफा बढ़ाने वाली इस पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ निर्णायक संघर्ष खड़े किए जाए। सरकारों द्वारा लिए जा रहे किसान-मेहनतकश विरोधी फैेसलों को अपनी फौलादी एकता से मुंहतोड़ जवाब दिया जाए।
    

No comments:

Post a Comment