ये हमारा कहना नही। ये कहना है दिल्ली की निचली अदालत का। जिसने 1987 में मेरठ के मुस्लिम बहुल इलाके हाशिमपुरा में मारे गए 42 लोगों की हत्या के अभियुक्त बनाए गए सभी 16 PSC जवानों को बरी कर दिया है।
फैसले के बाद से न्याय की आस लगाए लोगों और मामले की हकीकत जानने वाले सभी लोगों की उम्मीदों को धक्का लगा है। तत्कालिन गाजीयाबाद के पुलिस अधिक्षक वी.एन.राय ने तो इस हत्याकाण्ड को उत्तर प्रदेश पुलिस के इतिहास में काला अध्याय कहा है।
फैसले के बाद से न्याय की आस लगाए लोगों और मामले की हकीकत जानने वाले सभी लोगों की उम्मीदों को धक्का लगा है। तत्कालिन गाजीयाबाद के पुलिस अधिक्षक वी.एन.राय ने तो इस हत्याकाण्ड को उत्तर प्रदेश पुलिस के इतिहास में काला अध्याय कहा है।
मना जाता है कि न्याय की देवी की आंखों में पट्टी बंधी होती है और हाथ में तराजू होता है। जिसमें वो साक्ष्यों को तौल कर फैसला सुनाती है। पर पिछले कुछ सालों के न्यायलयों द्वारा दिए गए फैसलों में ये तराजू हमेशा ताकत, सत्ता और पैसों के पक्ष में झुका है। चाहे वो शंकर बिगहा का मामला हो- जिसमें 23 दलितों की हत्या करने वाले रणवीर सेना के सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया या लक्ष्मण बाथे, बथानी टोला, नगरी, गुजरात दंगों, मुजफ्फर नगर दंगों के अभियुक्तों को रिहा करना हो। फेहरिस्त बहुत बड़ी है। इन सभी में मारे जाने वाले लोग गरीब, दलित या अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि के थे।
लेकिन जब कानून के कटघरे में दूसरी तरफ कोई मजदूर, गरीब, दलित या अल्पसंख्यक खड़ा होता है तो कानूनों के कोड़े से उसकी पीठ लहूलुहान कर दी जाती है। मारूति सुजुकी के मामले को लिजिए, जिसमें 147 र्निदोष मजदूरों को ढाई साल तक जमानत नहीं दी जाती। उनकी जमानत अर्जी को रद्द करते समय चण्डीगढ़ हाइकोर्ट बयान देती है कि ‘इससे विदेशी निवेश प्रभावित होगा’।
दरअसल जिस व्यवस्था में सब कुछ पैसों से तय होता है, वहां झूठ को सच और सच को झूठ बनाना ताकतवर लोगों के लिए रोजमर्रा का काम है। जब तक पैसे पर टिका ये राज नहीं बदला जाता तब तक गरीबों-मजदूरों-दलितों-अल्पसंख्यकों को इस व्यवस्था में न्याय की कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।

No comments:
Post a Comment