3 September 2015

प्रो. एम.एम. कुलबर्गी की हत्या का विरोध करो!

        प्रो0 एम0एम0 कुलबर्गी को तर्कपरकता और धार्मिक अंधविश्वास का विरोध करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। प्रो0 कुलबर्गी हम्पी यूनिवर्सिटी के पूर्व वायस चांसलर (कुलपति) थेे और अपने लेखों व लिखी किताबों के द्वारा धार्मिक पोंगापंथ का विरोध करने का काम करते रहे थे। उनकी 30 अगस्त को उनके घर पर ही गोली मारकर हत्या कर दी गयी। अपने काम के कारण उनको लंबे समय से हिन्दू फासीवादी संगठनों द्वारा आलोचना व धमकी का शिकार होना पड़ा था।
        इससे पूर्व नरेन्द्र दाभोलकर और पानसरे को भी तर्क को स्थापित करने तथा धार्मिक अंधविश्वास का विरोध करने की सजा के तौर पर मौत के घाट उतार दिया गया था। दरअसल हिन्दू फासीवादी तत्व देश में ऐसी किसी आवाज को नहीं उठने देना चाहते हैं जो तर्क की बात करती हो, जो धार्मिक पोंगापंथ व अंधविश्वास का विरोध करती हो। वे हर उस आवाज को दबा देना चाहते हैं जो उनके द्वारा फैलाये जा रहे मिथकों का भंड़ाभोड़ करती हो। 
        वैसे हिन्दू फासीवादी तत्व पहले से ही कूपमंडूक, सांप्रदायिक व फासीवादी विचारों का प्रचार-प्रसार करते रहे हैं। इसके साथ ही वे प्रगतिशील व तार्किक विचारों का घोर विरोध करते रहे हैं। लेकिन केन्द्र में संघ-भाजपा के पूर्ण बहुमत से विराजमान होने से हिन्दू फासीवादियों के हौसले अब सातवें आसमान पर हैं। वे खुलकर न सिर्फ सांप्रदायिक व फासीवादी विचारों का जहर समाज में फैला रहे हैं बल्कि बेखौफ होकर हत्याओं को भी अंजाम दे रहे हैं। दरअसल वे जानते हैं कि उनको रोकने वाला कोई नहीं है। केन्द्र से लेकर कई राज्यों में फासीवादी संघ-भाजपा की सरकारें हैं। जब भाजपा के केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर संघ-भाजपा के बड़े नेता सार्वजनिक मंचों से फासीवादी व सांप्रदायिक विचारों का विषवमन कर रहे हैं तो छुटभैय्ये तत्व उनसे भी चार कदम आगे बढ़कर हत्याओं को अंजाम दे रहे हैं। 
        आज का समय बेहद चुनौतिपूर्ण समय है। पहले के किसी समय की तुलना में आज भारत में फासीवाद का खतरा बढ़ गया है। छात्रों-नौजवानों को हिन्दू फासीवादियों के इन कुकर्मों का मुंहतोड़ जवाब देने की जरूरत है। फासीवादियों के अंधविश्वास, पोंगापंथ व कूपमंडूकता के जवाब में तर्क, विज्ञान व प्रगतिशीलता को समाज में स्थापित कर ही इनका मुकाबला किया जा सकता है। तालिबान, इस्लामिक स्टेट के ये भारतीय संस्करण समाज को मध्ययुगीनता में पहुंचाने की चाहत रखते है। लेकिन पोंगापंथ व अंधविश्वास के संघर्ष में विजय तर्क व विज्ञान की ही हुई है। इतिहास ने बार-बार यह साबित किया है। लाख कोशिशों के बाद भी प्रतिक्रियावादियों को मुंह की खानी पड़ी है। प्रगतिशील ताकतोें ने अपने संघर्षाें को निरतंर जारी रख इनको शिकस्त दी है। आज एक बार फिर मेहनतकशों, छात्रों-नौजवानों को इन तत्वों से लोहा लेने व इनको निर्णायक शिकस्त देने की जरूरत है।  

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